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Hindi Section ( 6 Jun 2014, NewAgeIslam.Com)

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Cultural Narcissism-Part 3 तहज़ीबी नर्गिसियत भाग (3)


 मुबारक हैदर

वो विश्वास जो दुनिया भर में धर्म को पुनर्स्थापित और इस्लाम के प्रभुत्व के आंदोलन की बुनियाद में कारक हैं, इस तरह बयान किये जा सकते हैं।

1. इस्लाम पूर्ण जीवन पद्धति है, इसमें हर समस्या का अनंतिम और स्थायी समाधान मौजूद है।

2. इस्लाम का हर हुक्म, हर नियम हमेशा के लिए है यानि हर दौर में उसी तरह अमल किया जाएगा जैसे रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम और शेखैन के दौर में किया गया।

3. इस्लाम एकमात्र सच्चाई है, इसके अलावा जो कुछ है उसे इस्लाम के मुताबिक़ ढलना चाहिए वरना उसे खत्म करना मुसलमानों का कर्तव्य है यानि जो भी इस्लाम से मतभेद करे गुमराही पर है और जाहिलियत पर है जिसको खत्म करना मुसलमानों के लिए अनिवार्य है।

4. अल्लाह का हुक्म है कि इस्लाम को सभी दूसरे धर्मों और व्यवस्थाओं पर प्रभुत्व दिया जाए, क्योंकि इस्लाम के अलावा हर प्रणाली जाहिलियत की प्रणाली और अल्लाह से बग़ावत है।

5. मुस्लिम उम्मत सभी क़ौमों से बेहतर है और इस दुनिया पर हुकूमत के लिए चुन लिया गया है। दुनिया और आखिरत (परलोक) की फज़ीलत सिर्फ सच्चे मुसलमानों के लिए है, सच्चा मुसलमान वो है जो शरीयत के मुताबिक़ अमल करता है।

6. दुनिया पर इस्लाम का प्रभुत्व स्थापित करने और कुफ्र की ताक़तों को मिटाने के लिए नीयत कर के जो भी कदम उठाया जाए वो जिहाद है। इस जिहाद में मरने वाला शहीद है। शहीद का इनाम है जन्नत और उसकी हूरें। शहीद के सब गुनाह माफ़ हो जाते हैं, शहीद का ईनाम शहादत हासिल होते ही शहीद को हासिल हो जाते हैं।

7. जिहाद हर सेहतमंद मुसलमान पर फ़र्ज़ है और जिहाद का मतलब है गैर-मुस्लिमों पर इस्लाम का प्रभुत्व स्थापित करने के लिए हथियार से लड़ाई क्योंकि कुफ़्फ़ार अल्लाह के दुश्मन हैं, जिहाद के सभी दूसरे अर्थ कम महत्व रखते हैं। जिहाद केवल रक्षा के लिए नहीं बल्कि इस्लाम का प्रभुत्व स्थापित करने के लिए आगे बढ़ कर काफिरों के खिलाफ किया जाता है।

8. धर्म और अस्लाफ (प्रारम्भिक मुसलमानों) के हुक्म से मतभेद कुफ्र है या कम से कम बुराई है। काफिर और बुराई करने वाले चाहे कुछ भी कर लें उसका कोई कारनामा उसे सच्चे मुसलमान के बराबर स्थान नहीं दिला सकता चाहे सच्चा मुसलमान मानसिक स्तर पर कुछ भी हो।

9. धर्म का ज्ञान सभी ज्ञानों से बेहतर है, जो व्यक्ति धर्म का आलिम है उससे बेहतर आलिम और कोई नहीं। धर्म का ज्ञान इतना गहरा और व्यापक है कि ये जनता की बुद्धि से बहुत ऊपर है। जो व्यक्ति उलमा का मार्गदर्शन और इस्लामी जीवन शैली नहीं अपनाता वो इस्लाम का आलिम हो ही नहीं सकता।

10. दीन की दावत और शिक्षा देने वाले ये उलमा अल्लाह के पैदा किये लोगों में सर्वश्रेष्ठ लोग हैं। इन शिक्षकों से सीखना और उनके निर्देशों पर अमल करना हर मुसलमान पर अनिवार्य है।

ये विश्वास सिर्फ पाकिस्तान के उत्तरी क्षेत्रों या अफगानिस्तान के मुसलमानों के ही नहीं न ये सिर्फ पाकिस्तान के मदरसों तक सीमित हैं। ये सभी मुसलमानों के विश्वास हैं जो बिल्कुल उसी रूप में उन मुसलमानों में भी प्रचलित है जो दुनिया भर से पलायन करके दुनिया के आधुनिक औद्योगिक समाजों में रोज़गार और समृद्धि की तलाश में आबाद हुए हैं और अब वहां के नागरिक बन चुके हैं। धर्म की तरफ बुलाने और धर्म को पुनर्स्थापित करने के आंदोलन को इन बसने वालों ने ऐसा जोश और विश्वास प्रदान किया है कि ये अपने मेज़बान देशों में मुसलमानों के शासन के सपने देखते हैं। सैयद कुतुब के अनुयायियों डॉ. कलीम सिद्दीकी की ग्लोबल इस्लामिक मूवमेंट, ब्रिटेन में मुस्लिम पार्लिमेंट का आंदोलन चला रही है। फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड और दूसरे देशों में मुसलमानों के जोश का अंदाज़ा उस आंदोलन से लगाया जा सकता है जो उन्होंने अपनी मस्जिदों के इमामों के नेतृत्व में कार्टून छपने पर चलाये थे। और छोटे अल्पसंख्यक और पिछड़े होने के बावजूद इन बसने वालों के जोश का आलम वही था जो हर मुल्क मल्के मास्त कि मल्के खुदाए मास्त के विश्वास से पैदा होता है यानि हर देश मेरा है क्योंकि मेरे खुदा का है। स्पेन में तो मुस्लिम शरणार्थी बिल्कुल ये नहीं समझते कि वो वहाँ अल्पसंख्यक हैं या उन्हें स्पेन का किसी भी तरह शुक्रगुज़ार होना चाहिए कि वहाँ उन्हें नागरिकता मिली और बराबर के अधिकार मिले, जबकि उनके भाई यानी अरब वाले तो किसी गैर अरब मुस्लिम को सारी ज़िंदगी एड़ियां रगड़ने पर भी नागरिकता नहीं देते। स्पेन के मुस्लिम शरणार्थियों का एलानिया दावा है कि स्पेन मुसलमानों की संपत्ति है क्योंकि यहाँ हमारे पूर्वजों ने 8 सौ साल हुकूमत की है, जैसे भारत में अल्पसंख्यक होते हुए भी खिलाफत आंदोलन के अग्रणी मुसलमानों का दावा है कि भारत पर हुकूमत मुसलमानों का अधिकार है, ये दावा पाकिस्तान के इस्लाम के प्रभुत्व के आंदोलन का भी है जो अफगान युद्ध के बाद सारे देश में की गई वॉल चेकिंग से स्पष्ट हुआ था और बाकायदा सैद्धांतिक आधार पर अब भी सिखाया जाता है। दुनिया भर में हमारी ये शैली सबसे अलग है। जहां एक तरफ हर देश पर हम अपना अधिकार समझते हैं कि इस्लाम और मुस्लिम उम्मत की महानता के लिए आंदोलन चलाएं, मस्जिदें बनाएं, तब्लीग़ी केन्द्रों की स्थापना करें और मेज़बान देश की व्यवस्था को काफ़िराना व्यवस्था कहकर खुलकर इसकी निंदा करें, वहाँ भी ये हमारे ईमान का हिस्सा है कि किसी को इस्लाम के खिलाफ गुस्ताख़ी करने की इजाज़त न दें, चाहे ये गुस्ताखी वो अपने देश में बैठ कर कर रहा हो। दूसरी तरफ ये भी कायदा कानून की हैसियत रखता है कि मुस्लिम समाज में रहने वाले ग़ैर मुस्लिम अपनी किसी कथनी और करनी से इस्लाम का विरोध न करें, ज़रा सी आपत्ति भी न करें, अपने विश्वास को इस्लाम से अच्छा कहने का साहस न करें, इस्लामी इतिहास और हमारे अस्लाफ की आलोचना न करें। हमारा विश्वास है कि एक इस्लामी समाज में गैर मुस्लिम को किसी भी तरीके से सत्ता के ऊँचे दर्जे तक पहुंचने की इजाज़त नहीं दी जा सकती और गैर मुसलमानों को मुसलमानों के बराबर अधिकार नहीं दिए जा सकते। ये सब इसलिए है कि विश्वास के अनुसार इस्लाम एकमात्र सच्चाई है जिसे प्रमुख स्थिति में रहने के लिए किसी औचित्य की ज़रूरत नहीं।

धर्म परिवर्तन पर भी हमारा विश्वास अद्वितीय है: हर धर्म के लोगों को अपना धर्म छोड़ कर मुसलमान बनाना हमारा अधिकार है लेकिन किसी दूसरे धर्म के प्रचारकों को ये अधिकार नहीं कि किसी मुस्लिम को अपने धर्म की तरफ ले आएं। इसी तरह लोगों को इस्लाम में आने की इजाज़त है लेकिन छोड़ने की नहीं।

जो मौजूदा शांति की बिगड़ती स्थिति पर ये टिप्पणी करते हैं कि ये उग्रवाद का परिणाम है और भाषणों, लेखों, टिप्पणियों और वार्ता में बड़े दुख के साथ अपीले कर रहे हैं कि चरमपंथी तत्व कानून और राज्य का ध्यान रखते हुए सीधे रास्ते पर आ जाएं, या कि इस्लाम का ऐसा चेहरा पेश करें जो ''सभ्य'' दुनिया को पसंद आये, न जाने किस आधार पर ये अपील और ये टिप्पणियाँ कर रहे हैं। जिन उपायों को कट्टरपंथ, उग्रवाद और तोड़फोड़ कहा जा रहा है वो इस्लाम के उन घोषित मान्यताओं के अनुसार सिर्फ जायज़ ही नहीं बल्कि मुसलमानों पर फ़र्ज़ हैं। सैयद कुतुब और सैयद मौदूदी ने इस्लाम के पुनर्स्थापना का जो आंदोलन चलाया था उसकी ये खुले तौर पर शिक्षा थी। इससे पहले शेख अब्दुल वहाब रहमतुल्लाह अलैहि और हज़रत शाह वलीउल्लाह रहमतुल्लाह अलैहि और उनसे भी पहले हज़रत इमाम अहमद बिन हंबल रहमतुल्लाह अलैहि और कितने ही बुज़ुर्गों ने यही शिक्षा दी थी, इकबाल रहमतुल्लाह अलैहि ने इन्हीं भावनाओं को सिंचित किया था। मुस्लिम खून में शाहीन और गाज़ी की इमेज गूँथी गई है और ''शहादत हमारी इच्छा है'' एक अर्से से मौलाना मौदूदी के नौजवान मुजाहिदों का नारा चला आ रहा है। आज जब खून में गुँथे हुए ये ख्वाब और लबों पर तड़पते हुए ये नारे हक़ीक़त का रंग लेने लगे हैं तो इस पर हमारी हैरत आश्चर्य चकित करने वाली है। और शायद एक तरह से छल कपटपूर्ण भी। छल कपटपूर्ण इसलिए अगर हमें इस विश्वास से मतभेद है तो हमने कभी कहा क्यों नहीं और अगर इन विश्वासों की कोई दूसरी व्याख्या हमारे यहां मौजूद है तो इसे पेश करने में रुकावट क्या है? क्या सिर्फ अपनी आसानी के लिए? क्या सैद्धांतिक मामलों में और क़ौमों के वैचारिक निर्माण में आसानी तलाश करना सहन करने लायक़ है? .. अगर उलमा का कोई समूह राजनीतिक आवश्यकताओं से विवश होकर आत्मघाती हमलों की निंदा करता तो अफसोस होता है क्योंकि दूसरी सांस में ये लोग फिर उन्हीं विश्वास का प्रचार करते नज़र आते हैं जिनका सीधा नतीजा ये क़दम हैं।

इस्लाम के प्रभुत्व के आंदोलन से जो यातना आम लोगों तक पहुंच रही है यानी निर्दोष लोगों की मौतें, अनिश्चितता और अशांति के वातावरण से तानाशाही प्रवृत्तियों को बल मिलना, जनता की समस्याओं से सरकार की बढ़ती हुई उपेक्षा और फलस्वरूप जनता की बेबसी, वास्तव में खतरनाक है। लेकिन इससे कहीं बढ़कर भयानक भविष्य का वो नक्शा है जो इस आंदोलन के भोले भाले परवाने अपने लहू से और जनता के लहू से खींच रहे हैं, जो समझते हैं कि आंदोलन चरणबद्ध रूप में दुनिया भर में इस्लाम के प्रभुत्व की ओर जा रहा है जैसा कि उनके शिक्षक उन्हें बताते हैं। ये लाखों दीवाने और करोड़ों मुस्लिम जनता इस विश्वास के प्रति समर्पित होकर आगे बढ़ रहे हैं कि इस्लामी राज्य का ये सपना पूरा होने वाला है। वो अपने शिक्षकों की भविष्यवाणी को विश्वास का दर्जा देकर ये यक़ीन कर चुके हैं कि जब उनके लश्कर भारत और चीन जैसे देशों के खिलाफ निकलेंगे तो कामयाबी उनके कदम ऐसे ही चूमेगी जैसे मोहम्मद बिन क़ासिम के, महमूद गज़नवी और कतीबा बिन मुस्लिम बाहली के क़दम चूमे थे।

काश आज की दुनिया आज से 13 सौ साल या हज़ार साल पहले की दुनिया होती जहां अरबों ने और कई दूसरे मुस्लिम आक्रमणकारियों ने विजय पाई। अगर मुस्लिम उम्मत की वैचारिक स्थिति नहीं बदली तो इसका मतलब ये नहीं कि दुनिया भी नहीं बदली। सदियों से आत्मोह और अपनी क़ौम पर गर्व की जिस गुफा में हमें सुलाया गया है वो इस वक्त तक एक सफारी पार्क में बदल चुकी है जिसके चारों तरफ एक मज़बूत बाड़ है और शायद लोहे की इस बाड़ में हाई वोल्टेज करंट छोड़ा गया है जिसका कंट्रोल रूम हमें मालूम नहीं। हम शेर हैं, हम शाहीन हैं, हम ग़ाज़ी हैं और शहादत हमारी इच्छा है, लेकिन दुनिया के लोग इस जंगल से निकल आए हैं जहां हम बादशाह थे। अब ये एक और तरह का जंगल है जहां हमसे भी बड़ी बलाओं की हुकूमत है और हम इन बलाओं के मनोरंजन स्थल में रहते हैं और ये बलाएं अपने मनोरंजन के लिए सफारी पार्क में कभी चने फेंकती हैं और कभी कंकड़, क्योंकि उनके हिसाब से तो शायद हम शेर भी नहीं, बल्कि सिर्फ चने चबाने वाले कोई प्राणी हैं, जिनसे वो कभी कभी अपनी जनता को डराने का काम लेते हैं।

इस्लाम के प्रभुत्व के आंदोलन के जिन चरणों का नक्शा हमारे विद्वानों ने आंदोलन के कार्यकर्ताओं के सामने खींच रखा है, किस हद तक पूरे होंगे, स्पष्ट रूप से कहा नहीं जा सकता। सम्भव है कि मुस्लिम देशों के शासकों को बेइज़्ज़त करने और सरकारी व्यवस्था को तबाह करने तक का चरण सफलतापूर्वक तय हो जाए। इसलिए कि ये इन ताक़तों को अधिक परेशान नहीं करता जिनके खिलाफ हम शहादत के नशे में चूर रहते हैं।

मल्टीनेशनल कार्पोरेशनों का व्यापारिक सामान लगातार बिकता हैः कराची में एक सौ चालीस लाशों और पांच सौ घायलों के बिखरे हुए अंगों की खबरें रोककर एक छोटे से कमर्शियल ब्रेक में नाचते गाते लड़के लड़कियां मोबाइल फोन से खेलते और पेप्सी की बोतल को सिर के चारों ओर घुमाते नज़र आते हैं, और कुछ खूबसूरत कारें शोरूम में एक दूसरे से बढ़ती हुई दिखाई देती हैं। सम्भव है मुस्लिम देशों की हर सरकार और हर राजनेता को अपमान और बदनामी में डालना बहुराष्ट्रीय निगमों के लिए सीधे तौर पर उपयोगी हो। राष्ट्रवाद, देशभक्ति और नेशन- स्टेट के वो विचार जिनकी शक्ति से क़ौमे औपनिवेशिक चंगुल से निकली हैं, एक संगठित तरीके के साथ खत्म किए जा रहे हैं। पिछड़े और नौ स्वतंत्र राष्ट्रों की मंडियों तक पहुँच के लिए इन क़ौमों के केंद्रीय राष्ट्रीय सत्ता प्रतिष्ठान को अराजक स्थिति में डालना एक आम सा सुझाव है जिस पर काफी बरसों से अमल हो रहा है। आईटीओ के तहत होने वाले अंतर्राष्ट्रीय समझौते इसके व्यावहारिक रूप हैं। और इस्लाम के पुनर्स्थापना का आंदोलन जब तक मुस्लिम देशों की सीमाओं और सरकारों को तबाह करता है, तब तक मल्टीनेशनल सिस्टम को कोई नुकसान नहीं है क्योंकि ये ऐसे ही है जैसे सफारी पार्क में शेरों, लकड़बग्घों या चीतों को हिरन के शिकार या हाथियों के गोल को सताने की इजाज़त दी गई हो।

भविष्य की महान त्रासदी केवल ये नहीं होगी कि हम इन चरणों के दौरान अपनी राष्ट्रीय सीमाओं और संप्रभुता के प्रभावी संस्थानों से वंचित हो जाएंगे, महान त्रासदी सिर्फ इस उम्मीद में भी नहीं कि हमारी कई पीढ़ियां अपनी क्षमताओं और संसाधनों को अपनी ही अँतड़ियां उधेड़ने में खर्च कर चुके होंगे। महान विडंबना इसमें है कि अगर हम इन चरणों से गुज़र कर तालिबान के पैन इस्लामिक सल्तनत स्थापित कर भी लें यानि वैश्विक कॉर्पोरेट माफिया के लिए जो उपयोगी है वो तालिबानी खिलाफत दिन-ब-दिन ताक़तवर और प्रभावी होती चली जाएगी और ये सब देखते हुए भी पड़ोस में चीन और भारत हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें, और इस तरह ये चमत्कार पूरा हो जाए तो इस वक्त इस्लाम के प्रभुत्व के लिए समर्पित इस्लामी लश्कर को भारत और चीन पर चढ़ दौड़ने से रोकना मुमकिन नहीं होगा, महान त्रासदी दरअसल इस वक्त शुरू होगी। ये बहुत संभावना हम इसलिए मान रहे हैं कि ये इस आंदोलन का तार्किक परिणाम है। महान त्रासदी इसलिए पेश आएगी क्योंकि:

ये सम्भावना से परे नहीं कि लड़ते भिड़ते, मरते मारते, ये मुस्लिम भीड़ खिलाफते इस्लामिया का केंद्र स्थापित करने के दौरान इतनी विकसित भी हो जाएंगे कि आधुनिक ज्ञान और कौशल (साइंस और टेक्नोलोजी) भी उनके कदमों में पड़ी हो।  यानि अत्याधुनिक रक्षा प्रणाली स्थापित हो चुकी हो, उन्होंने केमिकल और न्युक्लियाई हथियारों के खिलाफ रक्षा कवच का भी आविष्कार कर लिया हो, जो कि विकसित देशों के पास मौजूद हैं, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी भी अमीरुल मोमिनीन के ब्रीफ केस में मौजूद हो, अंतर्राष्ट्रीय मानक से भी आगे की आक्रामक रणनीति हमारे ज्ञान में हो और पूरी दुनिया की विनाशकारी सैन्य क्षमताओं का हर तोड़ का हम ने आविष्कार कर लिया हो।

ये सब सम्भव नहीं क्योंकि जिस तरीके से इस्लामी आंदोलनों को आधुनिक विज्ञान से अलग किया गया है उसका तार्किक परिणाम ये है कि हम शायद पारम्परिक हथियारों की तैयारी के भी योग्य नहीं रहेंगे। काफिरों के पास हमारे शहादत का जज़्बा निश्चित रूप से अंशमात्र भी नहीं लेकिन अपने सुरक्षित ठिकानों से व्यापक विनाश के हथिायार चलाना तो शहादत की किसी भावना के बिना भी सम्भव है। दुनिया के आधुनिक वैज्ञानिक और औद्योगिक देश इतिहास और प्रयोग से लापरवाही को बहुत बड़ा पाप समझते हैं। सब जानते हैं कि कुछ देशों को अरबों ने हराया था, बगदाद को तातारियों ने तबाह करके इस्लामी संस्कृति का स्वर्ण युग समाप्त कर दिया था। सभी को पता है कि इन दोनों स्थितियों में दो बड़ी वजहें थीं।

1. हमलावरों की कर्कश सादगी और विजय पाने की तीव्र भावना, चाहे ये जज़्बा ईमानी हो या तातारियों की वासना हो।

2. हमले का सामना करने वालों की समृद्धि से पैदा होने वाली आसानी और युद्ध से विरक्ति।

लेकिन पिछले दौर में दोनों शक्तियों के बीच कम कम अंतर होता था। यानी हमलावर और रक्षा करने वाले पक्षों के पास हथियारों के मामले में कोई बड़ा अंतर मौजूद नहीं था। इन कारकों से आधुनिक राष्ट्र लापरवाह नहीं। जिस जिहाद की भावना से मुसलमान जीते, जिस हराने की भावना से तातार जीते, वो सब शायद प्रभावी नहीं रहते अगर रक्षा करने वालों के पास ज़हर भरी हवाएं या व्यापक विनाश के हथियार मौजूद होते। आज के इन विकसित देशों के पास ये हथियार मौजूद हैं यहां तक ​​कि ये लिखे जाने तक रूस ऐसे परमाणु हथियार बनाने में सफल हो गया है जिसके विनाश का प्रभाव सम्बंधित क्षेत्र से बाहर नहीं फैलता और ये अनुमान से परे नहीं कि ये देश हमलावरों के खिलाफ अपने हथियार का उपयोग नहीं करेंगे। यही वो भयानक त्रासदी होगी जिससे हमारे धार्मिक नेता लापरवाह नज़र आते हैं।

एक दृष्टिकोण ये है कि इस तरह की आशंकाएं व्यक्त करने वालों को तत्काल रूप से कायरता का खिताब देकर अपने लोगों का विश्वास बहाल रखा जाए लेकिन ये रवैया इसलिए घातक और खराब है कि इतने स्पष्ट विनाश को न देखना या अपने भोले भाले अनुयायियों को बहादुरी के नाम पर उकसाते रहना किसी धार्मिक या नैतिक सिद्धांत से सही नहीं।

माना कि रूस, चीन, भारत पश्चिमी औपनिवेश को मिटाना सही, पाक- अफगान मदरसों से ईमान की रौशनी पाकर निकलने वाले इस्लामी नेतृत्व को दुनिया के शासन पर बिठाना भी सही, हरमैन शरीफ़ैन के रक्षकों को सारी दुनिया का रक्षक बनाना भी सही, (ये धारणाएं अगर मान भी ली जाएं), लेकिन क्या ये लक्ष्य इतने सच्चे हैं कि उनके लिए करोड़ों मुस्लिम मुजाहिदीन की सामूहिक शहादत भी जायज़ है? इस सवाल का जवाब उस समय तक निर्णायक नहीं जब तक ये तय न हो जाए कि उन विश्वासों की मज़बूती क्या है जिन के आधार पर इन लक्ष्यों को सत्य करार दिया जा रहा है। और इस बात की क्या गारंटी है कि इन सामूहिक क़ुर्बानियों के बाद जिस विजय की भविष्वाणी की जा रही है वो पूरी होगी या नहीं?

ये अजीब है कि जब हम मौजूदा वैचारिक आंदोलन को इस तरह से बयान करते हैं तो आम पाठक इसे व्यंग्य के रूप में लेता है। संभव है कुछ लोग नाराज़ भी हों कि इस्लामी आंदोलनों को व्यंग्य का निशाना बनाया जा रहा है लेकिन ये एक इत्तेफाक़ है जबकि वास्तव में ये नक्शा व्यंग्यात्मक नहीं बल्कि ये सैद्धांतिक रूपरेखा और आंदोलन के भविष्य की ये योजना एक शोध पर आधारित है जो विभिन्न धार्मिक छात्रों और उस्तादों से सम्पर्क करने के बाद तैयार किया गया है, जमाते इस्लामी के साहित्य के अलावा मुस्लिम ब्रदरहुड के नेता सैयद कुतुब के लेखन का अध्ययन किया गया है, भारत, ब्रिटेन, स्पेन और अन्य देशों के मुस्लिम संगठनों के नारों और मैनिफेस्टो को देखा गया है। ये सैद्धांतिक रूपरेखा यहां तक ​​सम्भव है अतिशयोक्ति से परहेज़ करते हुए बयान की गयी है लेकिन इसके अतिशयोक्तिपूर्ण दिखाई देने की वजह ये है कि आज का आम पढ़ा लिखा मुसलमान आधुनिक युग के वैचारिक आंदोलनों से प्रभावित हुआ है, जिनमें मानवाधिकार, राय देने की आज़ादी और लोकतंत्र की अवधारणाएं ऐसी अवधारणाएं हैं जिनके सामने इस्लाम की वो अवधारणाएं एक विशेष तरीके से पिछड़ी हुई दिखाई देती हैं जो मदरसों में इस्लाम के प्रभुत्व के आंदोलनों में पायी जाती हैं। इसलिए जब इनका बयान इनके मूल और बेहिचक तरीके से किया जाता है तो शायद हास्य, अगंभीर या अतिशयोक्तिपूर्ण दिखाई देता है और ये बात अपनी जगह अलग त्रासदी है।

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