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Hindi Section ( 17 Apr 2014, NewAgeIslam.Com)

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Will Shiite and Sunni Islam Ever Reconcile? क्या शिया और सुन्नी इस्लाम में कभी मेल मिलाप होगा?

 

 

 

 

 

माइक ग़ौस

24 मार्च, 2013

तथ्यों से कोई फर्क नहीं पड़ता। राष्ट्रपति बुश के नेतृत्व और उनके आज्ञाकारी अनुयायियों के मामले में तथ्यों से कोई फर्क नहीं पड़ता। WMD (Weapons of Mass Destruction- सामूहिक नरसंहार के हथियारों) के बारे में प्रतिकूल जानकारी के बावजूद वो इसके बारे में जैसा फैसला कर चुके हैं, वैसा ही विश्वास करने को उन्होंने चुना है।

मुसलमानों का नेतृत्व इससे अलग नहीं है, प्रत्येक समुदाय की अपनी विशिष्ट मान्यताएं हैं और तथ्यों का इन पर भी कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसा लगता है कि अगर वो तथ्यों को स्वीकार करेंगे तो उनके पैरों तले ज़मीन खिसक जाएगी। अगर सुन्नी मुसलमान, शियाओं के संस्करण वाले इस्लाम को सच्चाई के रूप में स्वीकार करते हैं और या शिया मुसलमान सुन्नी संस्करण वाले इस्लाम को सच के रूप में देखते हैं, तो उनका पूरा धर्मशास्त्र ही समाप्त हो जाएगा, सभी का अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा और इसी वजह से वो एक दूसरे की 'सच्चाईयों' की पुष्टि नहीं करेंगे।

नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के आखरी खुत्बे (भाषण) के बाद से दोनों समूहों के बीच गहरे मतभेद पैदा हुए।

सुन्नी मुसलमानों का मानना ​​है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया है कि वो अपने पीछे इस किताब (कुरान) को अपने अनुयायियों के लिए धर्म को सीखने, समझने और उस पर अमल करने के लिए छोड़कर जा रहे हैं। हर कोई अपने कार्यों के लिए व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह है, जबकि शिया मुसलमानों का मानना ​​है कि नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने ये भी कहा है कि वो लोगों के मार्गदर्शन के लिए अपने वंशजों को अपने बाद छोड़कर जा रहे हैं।

मोमिनों के लिए दोनों संस्करण प्रमाणिक हैं, और यही समस्या है। अगर शिया इस्लाम को सुन्नी मुसलमान स्वीकार करते हैं तो उन्हें पैग़म्बर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के खानदान से निकले आध्यात्मिक नेतृत्व को भी स्वीकार करना होगा और शिया इमामों को अपना आध्यात्मिक पेशवा स्वीकार करना होगा। दूसरी तरफ अगर शिया मुसलमान सुन्नी संस्करण को स्वीकार कर लें तो वो अपने आपको दिशाहीन पाएंगे, क्योंकि सुन्नी इस्लाम में कोई औपचारिक आध्यात्मिक नेता नहीं है।  हालांकि खिलाफत ने 1924 तक इन समुदायों का नेतृत्व किया और ज़रूरी नहीं कि वो आध्यात्मिक पेशवा थे, वो सामाजिक और राजनीतिक नेता थे।

यहां तक ​​कि अगर हम मोहम्मद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की वास्तविक आवाज़ और उनके भाषण को भी हासिल कर लें तो दोनों समूहों में से कोई भी इस पर विश्वास नहीं करेगा और ये उनकी वर्तमान मान्यताओं को खत्म करने के समान होगा और ऐसा होने नहीं जा रहा है।

सबसे अच्छा है कि कुरान से मिलने वाले मार्गदर्शन का पालन करें और आप इस पर विश्वास करें कि आपके लिए क्या  अच्छा है, और मैं इस पर विश्वास करूं कि मेरे लिए क्या अच्छा है और जब तक हम एक दूसरे के मामले, जीविका और पालन पोषण में दखल नहीं देते हैं। अगर हम खुदा की रचनाओं पर ध्यान दें तो दोनों जन्नत (स्वर्ग) में जायेंगे।

जैसा कि कहावत है, सुंदरता देखने वाले की आंखों में होती है। मैं इसमें ये जोड़ना चाहूँगा कि ईमान (विश्वास) मोमिनों के दिल में होता है। शियाओं के विश्वास शिया लोगों के लिए सही है, जैसे कि सुन्नी, वहाबी, अहमदिया, बोहरा, इस्माइली, सल्फ़ी, सूफी, दीन मोहम्मद, बरेलवी, देवबंदी और दूसरे विश्वास आदि प्रत्येक के लिए सदियों से उनके लिए सही है। क्या हमें बदलाव की ज़रूरत महसूस होती है?

धर्म फुटबॉल का खेल नहीं है, जहां टचडाउन (touchdown) का फैसला इस तरह किया जायेगा अगर खिलाड़ी का पैर या पैर का कोई भी हिस्सा इण्ड ज़ोन में गेंद पकड़ते वक्त लाइन के अंदर था। धर्म इतना सटीक नहीं है। एक गुनहगार औरत किसी प्यासे जानवर को पानी पिला सकती है और खुदा की रहमत हासिल कर सकती है। और एक शराबी जिसने कभी नमाज़ नहीं पढ़ी हो वो अपने पड़ोसी के साथ खाने में शरीक हो सकता है और नियमित रूप से नमाज़ पढ़ने वाले पर प्राथमिकता हासिल कर सकता है। इस्लाम महान वैश्विक धर्म है और बहुत छोटी सीमा रेखाओं द्वारा परिभाषित नहीं हो सकता है। कुरान में खुदा ने आश्वासन दिया है कि सभी लोग जन्नत में जायेंगे, चाहे वो यहूदी, ईसाई या कोई और हो, आपको परेशान होने की ज़रूरत नहीं है, आप जो अच्छे काम करते हैं, उनका बदला आपको मिलेगा। सार ये है कि अगर आप इंसानों, जानवरों और पर्यावरण का ख्याल रखते हैं- वास्तव में खुदा की रचनाओं का संरक्षण और उनकी सेवा यानि खुदा की सेवा करते हैं।

हमारे बीच विवाद वास्तविक नहीं हैं बल्कि ऐसे हैं जो एक दूसरे के मामलों, जीविका और पालन पोषण को प्रभावित नहीं करते हैं। खुदा ने जानबूझकर हमें अलग होने के लिए बनाया है, उसने हमें एक जोड़े से कई जनजातियों, समुदायों और राष्ट्रों के रूप में बनाया है, और वो हम से अलग होने की उम्मीद रखता है, लेकिन वो हमसे ये भी उम्मीद करता है कि हम एक दूसरे को जानें और इस बात को हल करें कि कैसे उसकी रचनाओं का संरक्षण किया जाए और उसको परेशान न किया जाए। खुदा फरमाता है कि तुममें से सबसे अच्छा व्यक्ति वो है जो परहेज़गार है और जो बिना किसी प्रतिरोध के खुदा की की रचनाओं का ख्याल रखता है।

ये मानव जिज्ञासा है और हमें अपने मतभेदों के बारे में जानने की ज़रूरत है, लेकिन हमें किसी भी तरीके से दूसरों को बदनाम करने के प्रलोभन से लड़ने में जिहाद- अपने आंतरिक संघर्ष को अंजाम देने की ज़रूरत है। यहाँ फिर खुदा हमसे  प्यार करता है और एक दूसरे को किसी भी तरह से नीचा दिखाए बिना बातचीत करने के लिए मार्गदर्शन करता है।

सुन्नी नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की सभी बावियों को अपने परिवार में शामिल मानते हैं जबकि शिया पैगम्बर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की बेटी हज़रत फातिमा और उनके पति हज़रत अली और उनके वंशजों तक ही इसे सीमित रखते हैं। इसके अलावा कुछ सुन्नी ऐसे हैं जो विशेषाधिकार हासिल करने के लिए खुद को नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के वंशज होने का दावा करते हैं। इस्लाम समानता और विनम्रता सिखाता है इसमें किसी विशेषाधिकार के लिए जगह नहीं है। इस्लाम में कोई विशेष नहीं है, जब तक कि वो अपने कार्यों, धर्मपरायणता में विशेष न हो। नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फ़ातिमा से भी कहा था कि वो सिर्फ इसलिए जन्नत में नहीं जायेगी कि वो पैगम्बर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की बेटी हैं, तो ऐसे में क्या कोई विशेषाधिकार प्राप्त होने के बारे में सोच सकता है? नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अभिमानी विशेषाधिकार को खत्म कर दिया था, क्योंकि इस तरह की स्थिति का दावा करना घमंड है और खुदा इसे पसंद नहीं करता क्योंकि अहंकार उसकी शांतिपूर्ण रचना को परेशान करता है जबकि विनम्रता शांतिपूर्ण समाज के निर्माण में मदद करती है।

नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने उस समय आज़ाद किये गये एक अफ़्रीकी गुलाम हज़रत बिलाल को मोमिनों को नमाज़ के लिए बुलाने यानि अज़ान देने वाले के सबसे ऊंचे स्थान पर नियुक्त किया था। इसका उद्देश्य अहंकारी लोगों का मुँह पर ताला लगाना था जो ये कहते थे कि वो एक गुलाम थे। आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने खुद दिखावा करने वालों को एक जुट समाज की संदरता को बताया और उन्हें अहंकार छोड़ने और इस बात पर ध्यान दिये बिना कि तुम्हारे बगल में कौन है नमाज के लिए एक ही पंक्ति में खड़े होने के लिए कहा। उन्होंने महिलाओं (जिन्हें संपत्ति, पुरुषों की निजी संपत्ति माना जाता था और यहां तक ​​कि एक या दो सदी पहले अमेरिका में भी ऐसा ही था) को आज़ादी दी और ऐलान किया कि वो भी मर्दों की ही तरह आज़ाद हैं, जो शादी करने, तलाक़ लेने, संपत्ति और व्यापार का मालिक होने के लिए आज़ाद थीं। बेशक मर्द तो मर्द होते हैं, सिवाय कुछ मर्दों को छोड़कर जाति, धर्म या राष्ट्रीयता से परे ज्यादातर मर्द इन अधिकारों को रखते हैं।

नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अपने मिशन को जारी रखा और कहा कि सभी लोग विनम्रता का एहसास करने के लिए रोज़ा (उपवास) रखेंगे। और याद करें कि आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने ज़कात (दसवाँ भाग) को अनुपातिक बनाया ताकि सभी लोग अच्छे काम में अपना सहयोग दे सकें। क्या आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने हज (जीवन में एक बार तीर्थयात्रा करना) सभी के लिए आवश्यक बनाया? नहीं और वहन करने के कारक की वजह से केवल यही एक चीज़ है जो सबके लिए ज़रूरी नहीं है। जब तक आप उन संसधानों के प्रति ईमानदार और सच्चे हैं जो आपको अमीर बनाते हैं, तो इस्लाम पैसा बनाने और मालदार होने के खिलाफ कभी नहीं है।

एक सुन्नी के रूप में मैं अपने मुसलमान साथियों से अनुरोध करता हूँ कि वो एक दूसरे की परंपराओं और मान्यताओं का सम्मान करना सीखें। एक दूसरे को गलत साबित करने का कोई मतलब नहीं है। मैं शिया, सुन्नी और अहमदिया मुसलमानों से दूसरों की भिन्नता को दूसरे को सही करने के प्रलोभन के बिना स्वीकार करने का अनुरोध करता हूँ। सभी इंसान अच्छे होने के लिए सिर्फ अल्लाह और पैगम्बर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के मार्गदर्शन का पालन करें।

मैं आप सभी से खुद एक दूसरे की इबादत की जगहों पर जाना शुरू करने और जिस तरह वो लोग इबादत करते हैं उसमें उनके समर्पण को समझने का सुझाव देता हूँ। अगर मैं खुद ऐसा नहीं करता हूँ तो मैं किसी से ऐसा करने के लिए नहीं कहूंगा। मैं खुशक़िस्मत हूँ कि मुझे काबा, मस्जिद नब्वी, मस्जिद अक्सा और बैतुल मोक़द्दस सहित हर मस्जिद में जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। मैंने इस्माइली के अलावा बोहरा, वारिस दीन मोहम्मद, अहमदिया, शिया, सुन्नी और सूफी सभी मस्जिदों में अक्सर नमाज़ अदा की है और इफ्तार भी किया है। इंशा-अल्लाह खुदा मेरी इस इच्छा और शियों की इमाम अली मस्जिद में नमाज़ पढ़ने की मेरी इच्छा पूरी करेगा।

साथी मुसलमानों के प्रति पूर्वाग्रह को दूर करना शांतिपूर्ण है। इसके लिए कोशिश करें। ये आपको भी प्यारा लगेगा। अल-हमदोलिल्लाह, अब मैं अपनी बात खत्म करता हूँ।

इंशा अल्लाह हम और अधिक अंतः धार्मिक संवाद करेंगे और हम जो विश्वास करते हैं उसके लिए एक दूसरे का सम्मान करना सीखेंगे और एक दूसरे के विश्वास को गलत साबित करने और उससे इंकार कर जहन्नम की राह नहीं पकड़ेंगे। मैं आम भलाई के लिए लोगों को आपस में जोड़ने के लिए अपने हिस्से का काम करूँगा। इसके लिए जो ज़रूरी है वो ये है कि हम तय करें और ऐसी मीटिंग्स को आयोजित करें और बेहतर दुनिया बनाने के लिए एक दूसरे के बारे में जाने। (कुरान 49: 13)

माइक ग़ौस ने संगठित अमेरिका के निर्माण के लिए अपने आपको समर्पित कर रखा है, और रोजमर्रा की समस्याओं पर बहुलवादी समाधान पेश करते हैं और वो एक पेशेवर वक्ता, विचारक और बहुलवादी, राजनीति, नागरिक मामलों, इस्लाम, भारत, इसराइल, शांति और न्याय के विषय पर लिखतें हैं। माइक फॉक्स टीवी पर सीन हनीटी शो पर अक्सर मेहमान के तौर पर आते हैं, और नेशनल रेडियो नेटवर्क पर एक कमेंटेटर हैं। माइक डलास मॉर्निग न्यूज़ में साप्ताहिक टेक्सास फेथ कालम लिखते हैं और हफिंगटन पोस्ट और दुनिया के दूसरे अखबारों में अक्सर लिखतें हैं। उनका ब्लॉग www.theghousediary.com रोज़ाना अपडेट किया जाता है।

स्रोत: http://www.worldmuslimcongress.blogspot.com/2013/03/sunni-muslims-at-shia-and-ahmadiyya.html

URL for English article:

http://newageislam.com/the-war-within-islam/by-mike-ghouse/will-shiite-and-sunni-islam-ever-reconcile?/d/10900

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http://www.newageislam.com/urdu-section/mike-ghouse-tr-new-age-islam--مائیک-غوث/will-shiite-and-sunni-islam-ever-reconcile?--کیا-شیعہ-اور-سنی-اسلام-میں-کبھی-مفاہمت-ہوگی-؟/d/11642

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