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Hindi Section ( 24 Jun 2021, NewAgeIslam.Com)

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False Authority of Men over Women: Part 7-B स्त्री और उन पर पुरुषों की झूठी फ़ज़ीलत: भाग-7-B

मौलवी मुमताज़ अली की माया नाज़ तसनीफ हुकूके निसवां

उर्दू से अनुवादन्यू एज इस्लाम

अतः अगर इस जमाने में भी इस प्रकार के लोग हों कि उनके इख्तियार में यतीम लडकियां और उनसे निकाह करने में यह डर हो कि इंसाफ कायम नहीं रह सकेगा तो इस आयत से उनको जायज़ है कि वह न्याय के शर्त के साथ एक से अधिक निकाह कर लें मगर अगर यह स्थिति नहीं है तो आम निकाह की निस्बत जायज़ है या नहीं कुरआन मजीद साकित है और गालिबन इस मामले का निपटारा सभ्यता की स्थिति व सभ्यता के युग और पक्षों के सहूलत पर छोड़ा गया है। इसलिए इस कुरआनी आदेश से किसी तरह बहुविवाह का औचित्य साबित नहीं होता और इसलिए यह आदेश मर्दों की फजीलत की दलील नहीं हो सकता।

तलाक़ देने का इख्तियार जो मर्दों को दिया गया है वह ऐसा है कि मर्दों को इससे शर्माना चाहिए और अगर उनमें शराफते इंसानी का सुबूत हो सकता है तो इस इख्तियार को इस्तेमाल में ना लाने से हो सकता है तलाक़ एक बहुत कड़वी दवा है जो केवल ऐसे मर्ज़ का इलाज है जिस की और कोई इलाज की तदबीर न हो सके। पति पत्नी के आपसी संबंध ऐसे नाज़ुक और अहम और काबिले इख्फा होते हैं कि दुनियावी अदालतों की की तरफ उनके फैसले के लिए रुख करना उन रंजिशों को और तरक्की देना है। यह सहीह है कि निकाह एक समझौता है जैसे की दोसरे समझौते हैं। समझौते की तकमील के बाद हर पक्ष को इख्तियार है कि वादा तोड़ने वाले पक्ष को समझौते के इफा पर शरअन मजबूर करे या कराए। मगर यह वादा तोड़ना ऐसी कल्बी हालत का नतीजा होता है कि इस हालत की मौजूदगी में जबरन इफाए मुआहेदा करना केवल एक ज़ाहिरी इफा हो सकता है। लेकिन वास्तव में मुआहेदा शौहर व बीवी की कलबी इर्तेबात से संबंध रखता है और जब्र से इसका इफाए हकीकी संभव नहीं है कुछ शक नहीं कि ज़ाहिरी समझौता एक बाहरी निशान और एलान दो शख्सियतों में रूहानी रिश्ता पैदा होने का है लेकिन रूह खो कर अदालत से ज़ाहिरी मुआहेदे का इफा ब जब्र कराना क्या फायदा दे सकता है। जरूरी है कि ऐसे नागुजीर हालात में पक्षों की राय से अलगाव की इजाजत दी जाए मगर सवाल यह है कि किस पक्ष के हाथ में यह इख्तियार रखा जावे हमारी राय में जहां हवास का इख्तियार दोनों पक्षों में किसी हाथ में होना बराबर नतीजा पैदा करेगा।

क्योंकि आम तौर पर यह संभव नहीं है कि मर्द तो अपनी बीवी से यह कहे कि मैं आइन्दा तुझको अपनी बीवी बना कर रखना नहीं चाहता। और बीवी को उस मर्द से ऐसी मुहब्बत हो कि उससे जुदा न होना चाहे। अतः ऐसी हालत में जरुरी है कि अलगाव हो चाहे इसका इज़हार मर्द की तरफ से हो चाहे औरत की तरफ से।

कोई शख्स इस अम्र से इनकार नहीं कर सकता कि औरत में शर्म और हया और ख्वाहिशे हिफ्ज़े नामूस मर्द से बदरजहां अधिक शर्म व हया उसके सरिश्त में गोया खमीर कर दी गई है और तमाम वह अख्लाके लतीफा जिन से मिजाज़ में नरमी जो औरत को प्राकृतिक रूप से दी गई है ज़ाहिर है उनमें अतम दर्जे तक पाए जाते हैं। रहम-तरस- खौफे खुदा- हमदर्दी- मुहब्बत औरत की प्राकृतिक गुण हैं। जो अलगाव तलाक़ के माध्यम से अमल में आती है चाहे वह ख़ास हालात में कैसी ही उचित कारणों पर आधारित हो लेकिन इसका जहूर ऐसे इंसान से जिसकी सरीश्त मुहब्बत व उल्फत से बनी हो निहायत मकरूह व बदनुमा मालुम होता है। और इस सरापा उल्फत पर जिसके रग व रेशे में सच्ची वफादारी रखी है बहुत बदज़ेब दाग होता इसलिए खुदा ने ऐसे करियह आरोप से जिसको खुदा के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम भी फरमाते हैं कि दुनिया की तमाम जायज़ चीजों में से बदतरीन चीज है औरत की ज़ात को सुरक्षित रखना। अफ़सोस है मर्दों के हाल पर और उनकी नालायकी पर कि खुदाए ताला तो एक चीज को बदतरीन चीज फरमा दे और मर्द उसको अपनी फजीलत का मोजिब करार दें। अलबत्ता यह बात गौर तलब है कि क्या मर्दों को कोई ऐसा इख्तियार तो नहीं दिया गया कि उसके जरिये से वह औरतों को गलत तौर पर सता सकें।

संभव था कि मर्द बावजूद आपसी रंजिश के औरत को तलाक़ दे कर अलग न करता इस गर्ज़ से कि वह इस बुरी हालत से निजात न पाए उसी सूरत में औरत को इख्तियार दिया गया है कि वह जबरन मर्द से क़ाज़ी के जरिये तलाक हासिल करे। और औरत के इस हक़ को शरई उर्फ़ में खला कहते हैं।

उस सूरत में भी गोया कि औरत अपना अलग होने का मकसद हासिल कर लेती है। मगर शख्से कि सांप मरे और लाठी न टूटे खुदाए पाक ने अलग होने का आरोप औरत पर आने नहीं दिया बल्कि ज़ाहिर इसको क़ाज़ी की तरफ मुन्तकिल कर दिया। अखबारे सहीह में लिखा है कि मदीना में हफ्सा बिन्ते सहल एक बहुत हसीना व शकीला औरत थी। उसका शौहर जो बहुत बद शकल था उसके हुस्न व जमाल पर फरेफ्ता था मगर बीवी को उससे सख्त नफरत थी और उनमें हर रोज़ बद मजगी व रंजिश रहती थी। आखिर हफ्सा ने हुजुर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से अर्ज़ किया कि या हज़रत मेरा दिल अपने शौहर से हद से ज़्यादा नफरत रखता है और खौफ है कि मुबादा शौहर के हक़ में कमी करने से मुझ से हिसाब हो। आप मुझे उससे जुदा कर दीजिये। आपने बहुत कुछ समझाया। मगर जब देखा कि उनका इत्तेफाक मुश्किल है तो उसके शौहर से उसको अलग करने को कहा। शौहर ने अर्ज़ किया कि मैंने उसको एक बाग़ दिया है और अब यह खुद मेरे कुसूर के बिना मुझसे अलग होती है पस मेरा बाग़ वापस करा दीजिये। हफ्सा ने कहा कि अगर बाग़ के साथ कुछ और भी ले कर मुझे छोड़ दे तो गनीमत है। आखिर हज़रत ने केवल बाग़ वापस करा कर उनको अलग कर दिया। पस मर्द के बदसुलुकियों से बचने के लिए औरतों को इससे बेहतर और क्या हक़ दिया जा सकता था और इससे ज़्यादा दिलजुई व मराआत औरत की क्या हो सकती थी जो शारेअ अलैहिस्सलाम ने कानुने शरई में मलहुज़ रखी। दुनिया के सब तर्क जब केवल निकम्मी निकलें तो मर्द आलमे आखिरत के तरफ दौड़े और अपनी फजीलत का दार मदार जन्नत की हूरों पर ठहराया। मगर यह तर्क भी अपनी बेहूदगी में बाकी तर्कों से कम नहीं। कुरआन मजीद के अलफ़ाज़ जिन पर यह फर्जी बुज़ुर्गी साबित की जाती है यह हैं। वलहुम फीहा अजवाजुन मूतहहरा अर्थात उनके लिए बहिश्त में पाक जोड़े होंगे। इन अलफ़ाज़ से वह यह समझते हैं कि हम जो जमीर मुज़क्कर है मर्दों की तरफ राजेअ है और अजदवाज से हुराने बहिश्ती मुराद हैं। मगर आयत के साथ यह मानी समझना कुरआन मजीद के तर्ज़े ख़िताब व सियाके कलाम और खास उस्लुबे कलामे इलाही से ना आशना ज़ाहिर कराता है। (जारी)

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