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Violence Is Not an Option हिंसा कोई रास्ता नहीं है


मौलाना वहीदुद्दीन खान

१० सितंबर २०१३

एक रिवायत में हज़रत आयशा सिद्दीका (रज़ीअल्लाहु अन्हा) ने इस्लाम के पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के आम व्यवहार के बारे में इस तरह उल्लेख किया: जब भी नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को दो रास्तों में से किसी एक को चुनने की आवश्यकता पेश आई उन्होंने हमेशा सख्त के बजाए आसान रास्ता चुना।“ (बुखारी) अब यह बात पुरी तरह स्पष्ट हो गई कि अमन का रास्ता सबसे आसान रास्ता है इसी लिए नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हमेशा अमन का रास्ता चुनने की कोशिश की। उन्होंने कभी भी अमन और जंग चुनने के दौरान जंग को नहीं चुना।

जब मैं नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की जिंदगी पर गौर करता हूँ तो मैं यह पाता हूँ कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के लिए आक्रामक जंग का कोई प्रश्न ही नहीं था। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़िंदगी के बारे में अपने विस्तृत अध्ययन में, मैंने कोई भी घटना ऐसी नहीं पाई जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने आक्रामक युद्ध को चुना हो। इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार हिंसा जैसी किसी चीज का अस्तित्व नहीं है। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मज़बूरी के अलावा कभी भी खुद को जंग में व्यस्त नहीं किया। इसके अलावा इस तरह के युद्धों में उनकी शमूलियत बहुत सीमित थी। मेरी समझ के अनुसार, रक्षात्मक युद्ध और आक्रामक युद्ध के बीच एक अंतर है। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के लिए रक्षात्मक युद्ध में व्यस्त होने के लिए कोई बहाना नहीं था। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हमेशा हिंसा से बचने की कोशिश की है। मैंने अपनी किताब (The Prophet of Peace) ‘पैगम्बर अमन व आश्तीमें उन मौकों की मिसालें पेश की हैं जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जंग से बचने की कोशिश की है। कुछ ऐसे मौके हैं जब उन्होंने मजबूरन एक सीमित युद्ध का चुनाव करना पड़ा। ऐसी ही एक मिसाल गजवा ए हुनैन है।

जिन जंगों में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम शामिल रहे उनकी मुद्दत केवल एक दिन है। यह वास्तविकता है कि गजवा ए खैबर पचीस दिन तक जारी रहा। लेकिन वह एक गजवा (जंग) नहीं था बल्कि एक घेराव था। यह सच है कि बज़ाहिर कुरआन की कुछ आयतों ने रक्षात्मक जंग को कानूनी औचित्य प्रदान किया है। लेकिन वह पूर्ण रूप से शब्द के अस्थायी अर्थों में हैं। एक ऐसे समय में जब जनजातीय संस्कृति अरब में फैली हुई थी। अल्लाह पाक ने जनजातीय संस्कृति का खात्मा करना चाहा। इसलिए, एक अस्थाई समय के लिए कुरआन ने कुछ सीमित प्रकार की रक्षात्मक युद्ध की अनुमति दी। वास्तव में वह रक्षात्मक नहीं बल्कि अनिवार्य युद्ध थी। इसके बाद खुदा ने एक इंक़लाब पैदा करने का प्रयास किया जो जनजातीय दौर और दुसरे ऐसे सभी संस्कृतियों का खात्मा कर दे जो हिंसा की अनुमति देते हैं। आज हम शांति के एक ऐसे दौर में रह रहे हैं जिसकी कल्पना कुरआन ने पेश की है। मौजूदा दौर में मुसलमानों को किसी भी जंग में भाग लेने या हिंसा में मशगूल होने की आवश्यकता नहीं है। वह पूर्ण स्वतंत्रता और सभी मौकों से आनंदित हो रहे हैं। उनके मानवीय अधिकार सुरक्षित हैं, और जहां तक राजनीति का संबंध है वह लोकतंत्र के दौर में रह रहे हैं। उन सभी कारणों ने जंग और हिंसा को फरसुदा बना दिया है। आज हम मुस्लिम देशों में जो तथाकथित जिहाद देख रहे हैं वह जिहाद नहीं है, बल्कि इसे जिहाद विरोधी कहा जा सकता है। इन हिंसक गतिविधियों के लिए कोई वास्तविक औचित्य नहीं है।

नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ज़माने में रक्षा अनिवार्य था। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम कभी कभी जंग में व्यस्त हुए लेकिन वह उनके माध्यम से चुने हुए नहीं थे। ऐसे सभी मौकों पर उनकी प्राथमिकता बात चीत या किसी और रणनीति के माध्यम से युद्ध से बचना थी। इसके बाद उन्होंने जंग को सीमित करने का प्रयास किया। इस निति के कारण नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जीवन में कोई पुरी जंग नहीं हुई। उस समय सारी जंगें झडप थीं और शब्द के वास्तविक अर्थों में वह जंगें नहीं थीं। अब मौजूदा दौर में हमारे पास अमन का एक विश्वसनीय रास्ता है और वह विवादों को संयुक्त राष्ट्र के हवाले करना है। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ज़माने में संयुक्त राष्ट्र की तरह ऐसी कोई संगठन नहीं थी इसलिए किसी के पास अपने तौर पर निर्णय लेने के अलावा और कोई चारा नहीं था।

कुरआन मजीद की एक आयत में है अल सुल्हो खैर” (४:१२८)। इसका अर्थ यह है कि अमन सबसे बेहतरीन रास्ता है। इस आयत के अनुसार, खुद का बचाव कोई रास्ता नहीं है। जंग में केवल अनिवार्य शराकत ही जायज है वह भी इस शर्त के साथ कि तमाम कोशिशें अमन कायम करने और असफल समझौतों को सफल बनाने के लिए होंगी।

मेरे अनुभव में, एकतरफा हमले जैसी कोई चीज नहीं है। सभी हमले कुछ उकसावे के बाद होते हैं। यदि आप दूसरों को उकसाने से बचते हैं, तो कोई हमला नहीं होगा। लेकिन बहुत ही दुर्लभ मामलों में, बिना रोक टोक हमले होते हैं, अगर कभी दो तरीके होते हैं तो पहला तरीका बहुत बुरा है और दूसरा कम बुरा होता है। मुझे लगता है कि रक्षा चुनना सबसे बुरा तरीका है और सुलह का रास्ता चुनने मे बुराई नहीं है। इस मामले में, सवाल यह नहीं है कि आपको बचाव क्यों नहीं करना चाहिए। समस्या यह है कि आप रक्षा के नाम पर एक बड़ी बुराई को चुन रहे हैं। और जब सबसे खराब और कम खराब के बीच चयन करने की बात आती है, तो उस रास्ते को चुनना बेहतर होता है जो कम खराब है।

हमले के समय, लोगों को आमतौर पर केवल एक ही रास्ता दिखता है और यह बचाव का तरीका है। लेकिन वास्तव में ऐसी स्थिति में एक और तरीका है और वह समझौता और सुलह का तरीका है। ऐसी स्थितियों में सामंजस्य स्थापित करने का अर्थ है समय लेने वाली नीति अपनाना। एक बार जब आपके पास एक अनुबंध होता है, तो आपके पास अपनी रणनीति की योजना बनाने का दूसरा मौका होता है। इस्लाम के पैगंबर के इस व्यवहार से हमें पता चलता है कि ऐसी नीतियां हमेशा नई सफलताओं का रास्ता खोलती हैं। पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ज़ाहिरी जीवन में सुलह हुदैबिया की रणनीति इसी पर आधारित थी। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दूसरे पक्ष की सभी शर्तों को स्वीकार किया और सुलह और समझौते को चुना। जाहिर तौर पर यह घुटने टेकने की बात थी, लेकिन वास्तव में यह समय लेने वाली नीति चुनने की बात थी। और इसलिए, समझौते को अंतिम रूप देने के बाद, पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को अपनी ऊर्जा को पहचानने और शांतिपूर्ण दावत का फिर से योजना बनाने का अवसर मिला, जिसके परिणामस्वरूप एक बड़ी सफलता मिली।

जैसा कि मैंने पहले उल्लेख किया कि कुरआन मजीद में अस्सुल्हो खैर (४:१२८) के शब्द में एक रहनुमा सिद्धांत है। इसका अर्थ यह है कि परिणाम के लिहाज़ से अमन सबसे बेहतर है। मेरे अध्ययन के अनुसार, इस्लामी रणनीति हमेशा से फलदायक रही है। अगर प्रयोगों से यह ज़ाहिर होता हो कि रक्षात्मक जंग भी लाभ से अधिक हानि का कारण होगी, तो अत्यंत मजबूरी के स्थिति को छोड़ कर, रक्षात्मक जंग के बजाए समझौते का रास्ता चुनना बेहतर है। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़ाहिरी हयात में जंगे हुनैन इसकी एक मिसाल थी। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सहाबा के लिए एक आखरी रास्ता यही था। अगर ऐसी कोई मज़बूरी ना हो तो बचाव चुनने के बजाए इंसान को सुलह का चुनाव करना चहिये।

सहीह बुखारी में एक हदीस इस तरह है दुश्मन के साथ आमने-सामने होने की इच्छा मत रखो। हमेशा खुदा से अमन की दुआ करो।जिसका अर्थ यह है कि हिंसा और जंग कोई रास्ता नहीं है। आपको हर कीमत पर अमन कायम करने की कोशिश करनी चाहिए। केवल एक अस्थायी समय तक जंग के लिए मजबूर होना ही एक अपवाद है।

(उर्दू से अनुवाद: न्यू एज इस्लाम)

URL for English article: http://www.newageislam.com/islam-and-spiritualism/maulana-wahiduddin-khan/violence-is-not-an-option/d/13434

URL for Urdu article: http://www.newageislam.com/urdu-section/maulana-wahiduddin-khan/violence-is-not-an-option--تشدد-کوئی-راستہ--نہیں-ہے/d/13473

URL: https://www.newageislam.com/hindi-section/maulana-wahiduddin-khantr-new-age-islam/violence-is-not-an-option-हिंसा-कोई-रास्ता-नहीं-है/d/124170


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