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Hindi Section ( 27 Feb 2015, NewAgeIslam.Com)

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Companionship of the Prophet हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ होने का मतलब

 

 

 

मौलाना वहीदुद्दीन ख़ान न्यू एज इस्लाम के लिए

16 फरवरी, 2015

एक विद्वान ने सही कहा है कि "अगर किसी व्यक्ति के घर में हदीस की एक किताब मौजूद हो तो यह ऐसा ही है जैसे कि स्वयं नबी सल्लल्लहो अलैहे वसल्लम उस से बात कर रहे हों"।

इसका मतलब यह है क़ि अगर आप पूरी संजीदगी के साथ हदीस की कोई किताब खोलते है और उसमें नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जो कहा है उस पर विचार करते हैं तो आप को ऐसा लगेगा कि वो स्वयं आप से बात करके आप का मार्गदर्शन कर रहे हैं।

कुछ ऐसी ही बात उनके साथ होने का है। यदि आप के अंदर असली आत्मा ज़िंदा है और यदि आप सच्चे मन से उनके बताए रास्ते पर चलने की इच्छा रखते है तो आज भी आप उनके साथ होने का एहसास कर सकते है।

उदाहरण के लिए वे कभी भी अपने दुश्मनो से नफ़रत नहीं करते थे बल्कि आप उनके साथ सब से अच्छा व्यवहार करते थे और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उनके मार्गदर्शन के लिए अल्लाह से दुआ करते थे। अतः यदि आप का कोई दुश्मन है और आप उसके साथ दुश्मनी का व्यवहार नहीं करते बल्कि आप सोचते हैं कि आप को अपने दुश्मन के साथ वही व्यवहार करना चाहिए जो नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपने दुश्मनो के साथ करते थे" और अगर आप उनके साथ वैसा ही करते हैं तो उस समय आप नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ एक अलग प्रकार का लगाव महसूस करेंगे।

नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ लगाव की यह अनुभूति इतनी ज़्यादा हो जएगी कि आप यह महसूस करेंगे के वक़्त का फासला ख़त्म हो गया है और आप नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ हो गये हैं। यह एक वास्तविकता है जिसकी अनुभूति कोई भी कहीं भी कर सकता है।

पैगंबरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के विरोधी उनके साथ बहुत ही बुरा बर्ताव करते थे। उदाहरण के लिए वे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम  को पागल और जादूगर कहते थे। फिर भी नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनके विरुध्द कभी कोई नकरात्मक विचार अपने मन में नहीं आने दिया। उन्होने उनकी शिकायत नहीं की और न ही कोई ऐसा करने का दिखावा किया इतना ही नहीं नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उनके लिए अल्लाह से दुआ करते थे।

यदि आपका कभी ऐसी किसी नकारात्मक परिस्थियों से सामना होता है और आप अपनी प्रतिक्रिया में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सुंदर विचारों पर चलते हैं तो उस समय आपके दिल में एक अत्यंत सुंदर अनुभूति पैदा होगी आपको उस समय नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ एक खास संबंध होने का एहसास होगा और आप को अनुभव होगा जैसे कि आप नबी सल्लल्लहो अलआहे वसल्लम के साथ हैं।

नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ को अलग-अलग तकरीकों से समझा जा सकता है, एक शारीरिक और दूसरा मनोवैज्ञानिक या रूहानी। जो मोमिन नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के समकालीन थे उन्हें आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के शारीरिक सोहबत का सौभाग्य प्राप्त हुआ और बाद के लोगों को रूहानी या मनोवैज्ञानिक सोहबत नसीब हो सकती है यद्यपि वो उन आवश्यक शर्तों को पूरा करते हों जो नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के रूहानी सोहबत के लिए आवश्यक है।

सोहबत के लिए शारीरिक रूप से किसी के साथ होना आवश्यक नहीं है। यह पूर्णतः मनोवैज्ञानिक निकटता पर निर्भर करता है। इस्लाम के बुरे दिनों में इस्लाम क़बूल करने वाले नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से मनोवैज्ञानिक लगाव रखते थे। जो लोग नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ मनोवैज्ञानिक लगाव नहीं रखते थे वे शारीरिक रूप से भी उनके साथ होने के बावजूद उन के करीब होने का फायदा नहीं उठा पाए।

नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सच्चे सहाबा और मुनाफिक (दिखावा करने वाले मुसलमान) के बीच केवल यही एक फ़र्क़ था की उनके सच्चे सहाबा मनोवैज्ञानिक रूप से हमेशा उनके साथ होते थे और इस तरह नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सोहबत से फायदा उठाने में सक्षम थे। दूसरी ओर मुनाफिक नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से मनोवैज्ञानिक रूप से अलग थे इसलिए आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से शारीरिक रूप से नज़दीक होने के बाद भी उन के सोहबत का फायदा नहीं उठा पाए।

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