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Hindi Section ( 28 Aug 2011, NewAgeIslam.Com)

Islamic Shariah on Ills of corruption करप्शन की लानत पर शरीअत की नज़र

मौलाना नदीमुल वाजिदी

(उर्दू से हिंदी अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम डाट काम)

करप्शन इस मुल्क की तकदीर बन चुका है। हर नई सुबह एक नये करप्शन का पर्दाफाश होता है, और देशभक्त और ईमानदार हिदुस्तानियों का सिर शर्म से झुक जाता है। अगर किसी के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगती तो वो है सत्ताधारी वर्ग, जो पिछले 60 बरसों से भी ज़्यादा से एक अरब हिंदुस्तानियों पर हुकूमत कर रहा है। इस वर्ग में सियासतदाँ भी शामिल हैं और नौकरशाह भी हैं। ये अहम नहीं है कि वो किस पार्टी के सियासी लीडर हैं और न हीं ये कि वो किस सतह के अफसर हैं। इस हमाम में सभी नंगे नज़र आते हैं।

करप्शन हर जगह है और ज़िंदगी के हर हिस्से पर इसने अपना असर छोड़ा है। अधिकार रखने वाला हर व्यक्ति मौका मिलते ही करप्शन की बहती नदी में डुबकी लगा लेता है। 60 साल में कितने करप्शन हुए, शायद सरकार के पास इसकी कोई लिस्ट भी मौजूद न हो। बहुत से करप्शन के मामले तो अब लोगों की याद्दाश्त से भी बाहर हो गये हैं। यूपीए सरकार के दौरान जितने करप्शन के मामले सामने आये इतिहास में उसकी मिसाल नहीं मिलती। अठारह हज़ार करोड़ रुपये की पनडुब्बी डील में बीच के लोगों ने सरकारी खज़ाने को जबर्दस्त चूना लगाया। मंत्री कमलनाथ की देखरेख में दो हज़ार पांच सौ करोड़ रुपये का अनाज विदेशों को भेजा गया, इसमें भी बिचौलियों ने खूब कमाई की। शशि थरूर, शरद पवार, प्रफुल्ल पटेल जैसे बड़े वज़ीरों ने आईपीएल को दागदार किया। कामनवेल्थ खेलों की तैयारी के दौरान हर व्यक्ति ने अपनी क्षमता के मुताबिक खूब दौलत बटोरी। मंत्री से लेकर चपरासी तक ने दिल खोल कर सरकार को कंगाल किया। अभी हाल ही में दो ऐसे घपले हुए हैं जिसने हर हिंदुस्तानी को ये सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर इस मुल्क का क्या होगा?

 एक घपला तो वो है कि शायद ही किसी देश में इतना बड़ा घपला हुआ हो। इस घपले को 2जी स्पेक्ट्रम के नाम से जाना जा रहा है। इसका सीधा सम्बंध संचार मंत्रालय से है, जो ए. राजा के पास था। राजा जी ने स्पेक्ट्रम के अधिकार को अपनी पसंद की कम्पनियों को बहुत ही कम दाम पर बेच दिया । हैरत की बात ये है कि हज़ारो करोड़ रुपये की ये डील सिर्फ 45 मिनट में हो गयी। देश की सर्वोच्च अदालत भी हैरान है कि इतनी बड़ी डील बगैर किसी खास सोच विचार के 45 मिनट में कैसे हो सकती है। कहते हैं कि जिस कम्पनी को ये अधिकार बेचे गये हैं, उसने 33 फीसद हिस्सा अपने पास रख कर बाकी 67 फीसद हिस्सा दूसरी कम्पनियों को बेच दिया, और इसमे भी हज़ारों करोड़ रुपये का फायदा कमा लिया। इससे देश के खजाने को एक लाख पचहत्तर करोड़ रुपये का भरपाई न हो सकने वाला नुक्सान हुआ है। इस बड़ी रकम से देश में हज़ारों स्कूल, अस्पताल और कल्याणकारी संस्थाएं बनायी जा सकती थीं। देश के एजुकेशन सिस्टम को मज़बूत किया जा सकता था। गरीबों के लिए घर बनाये जा सकते थे। मुम्बई में आदर्श सोसायटी के घपले ने करप्शन के तमाम रिकार्ड तोड़ दिये हैं। इस घपले

में मुख्यमंत्री से लेकर सत्ताघारी और विपक्ष दोनों पार्टियों के एमपी और एमएलए, सरकारी अफसर और यहाँ तक कि कुछ फौजी अफसर भी शामिल थे। समझ में नहीं आता कि इस देश के भ्रष्ट राजनीतिज्ञ और अफसर हज़ारों करोड़ रुपये का क्या करेंगे। एक बड़े परिवार को भी आलीशान ज़िंदगी गुज़ारने के लिए इतने रूपयों की ज़रूरत नहीं होती है। अफसोसनाक बात ये हैं कि हमारे देश के दौलतमंदों ने करप्शन के ज़रिए हासिल होने वाली रकम स्विटज़रलैण्ड के बैंकों में जमा करा रखी है। एक लेख में ये पढ़ कर हैरानी भी हुई और अफसोस भी कि स्विस बैंकों में दो सौ अस्सी लाख करोड़ रुपये हिंदुस्तानियों के जमा हैं। इस रकम के ज़रिए 60 करोड़ बेरोज़गारों को रोज़गार दिया जा सकता है।

 तीस बरस तक ऐसा बजट बनाया जा सकता है जिसमें कोई टैक्स न लगाया गया हो। लगातार 60 बरसों तक हर नागरिक को दो हज़ार रुपये हर महीना दिया जा सकता है। जिस देश की राष्ट्रीय सम्पत्ति का ये हाल हो उस देश के करोड़ो नागरिक गरीबी रेखा से नीचे जीवन जीने के लिए मजबूर हैं, जिन्हें दो वक्त की रोटी भी सही तरीके से नहीं मिलती, जिनके पास सिर छुपाने के लिए कोई ठिकाना नहीं है। करप्शन ने इस देश को खोखला कर के रख दिया है। आज अदालतें सरकारी वकील से ये सवाल कर रही हैं कि आप रिश्वत को कानूनी शक्ल क्यों नहीं दे देते। दूसरी तरफ खुद अदालतें भी करप्शन के दलदल से पाक नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के बारे में जो टिप्पणी की है वो सोचने पर मजबूर करती है कि जब अदालतों की योग्यता और निष्पक्षता भी शक के घरे में आ जायेगी तो फिर इसांफ के ताकाज़े किस तरह पूरे होंगे। सरकारों के भ्रष्टाचार पर लगाम कौन लगायेगा? आज देश के प्रधानमंत्री भी मगरमच्छ के आंसू बहा रहे हैं। यूपीए की सबसे ताकतवर महिला भी देश की नैतिक स्थिति की खराब सूरतेहाल पर शर्मिंदगी का इज़हार कर रही हैं।

राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति भी इस स्थिति में चिंतित हैं, लेकिन हल किसी के पास नहीं है। असल में इस देश को लीडरों ने जिस भौतिकता के रास्ते पर डाला है, उसने संकट का रूप ले लिया है। जब तक भौतिकता के इस सैलाब पर काबू नहीं पाया जायेगा उस वक्त तक भ्रष्टाचार के दलदल से निजात नहीं मिलेगी, बल्कि वक्त के साथ ये दलदल और गहरा होता जायेगा। देश में कितने घपले हुए हैं किसको कितनी सज़ा मिली है, कौन सत्ता से बाहर किया गया, किसको बेइज़्ज़त करके सार्वजिनक जीवन से निकाल दिया गया? ये वो सवालात है जिनका किसी के पास जवाब नहीं है। हम तो जानते हैं कि बड़े से बड़े घपले करने के बाद भी किसी को सज़ा नहीं मिलती, बल्कि

 वो अपने उसी अंदाज़ के साथ रहता है। ज़्यादा ये ज़्यादा ये होता है कि कुछ वक्त के लिए उसे उसके पद से हटा दिया जाता है। सुखराम की मिसाल हमारे सामने है, जिसके बाथरूम भी नोटों से भरे हुए थे और जो नोटो के बिस्तर पर सोया करता था, कुछ दिन सत्ता से महरूम रहे लेकिन फिर दोबारा कामयाब होकर वापस लौटा तो उसे फिर सत्ता की कुर्सी पर बिठा दिया गया। अगर कभी किसी मंत्री, एमपी या एमएलए को सज़ा भी दी जाती है तो वो इतनी मामूली होती है और इतने मुख्तसर वक्त के लिए होती है कि मुजरिम उसे सज़ा तसव्वुर ही नही करता, अगर उसे चंद रोज़ जेल में गुज़ारने भी पढ़ते हैं तो वो इतने आरामदेह होते हैं कि जेल से बाहर इसकी कल्पना भी नही की जा सकती है।

ज़्यादातर लोग तो बीमारी के बहाने से फाइव स्टार होटलों जैसे अस्पताल में दाखिल होकर मुफ्त के मज़े लूटते हैं। इस सूरते हाल पर कैसे काबू पाया जा सकता है। मेरे ख्याल से तो इसका वाहिद हल ये है कि देश के हर नागरिक के लिए धर्म और नैतिक शिक्षा अनिवार्य कर देनी चाहिए और उसे बतलाया जाय कि जिंदगी सिर्फ इस दुनिया तक सीमित नहीं है, ये तो एक मुख्तसर वक्फा है, इसके बाद की ही जिंदगी असल जिंदगी है। जहाँ हर काम का हिसाब देना होगा, और उसके मुताबिक सज़ा भुगतनी होगी। नैतिक शिक्षा से खाली ये समाज उस वक्त सुधर सकता है जब उसे बतलाया जाय कि रिश्वत एक सामाजिक गुनाह ही नहीं बल्कि एक नैतिक और धार्मिक अपराध भी है।

मेरे ख्याल में दुनिया के धर्मों में इस्लाम ऐसा अकेला धर्म है जिसने इस गुनाह के नुक्सानात से पूरी इंसानियत को आगाह किया है। हज़रत अबु होरैरा (रज़ि.) से रवायत है कि नबी सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम एक दिन खिताब फरमाने के लिए खड़े हुए। आपने माले ग़नीमत में खयानत का तज़किरा फरमाया और उसे बहुत बड़ा जुर्म करार देते हुए फरमाया कि क़यामत के रोज़ मैं तुम में से किसी को इस हाल में न पाऊँ कि उसकी गर्दन पर बकरी सवार हो और मिनमिना रही हो, उसके सिर पर घोड़ा सवार हो जो हिनहिना रहा हो, और वो मुझ से फरियाद करे और पुकारे कि ऐ अल्लाह के रसूल मेरी फरियादरसी कीजिए, मैं कहुँगा कि अल्लाह की पकड़ से बचाने के लिए कुछ नहीं कर सकता, मैंने तुम्हें अल्लाह का हुक्म पहुँचा दिया था। ऐसा न हो कि उसकी गर्दन पर ऊँट सवार हो और बड़बड़ा रहा हो और वो मुझे पुकारे कि ऐ अल्लाह के रसूल मेरी फरियादरसी फरमाइये तो मैं कहुँगा कि मैं तुझे अल्लाह की पकड़ से बचाने के लिए कुछ नहीं कर सकता, मैंने तो तुम्हे बात पहुँचा दी थी।

 ऐसा न हो उसकी गर्दन पर सोना चांदी सवार हो, और वो मुझे पुकारे और कहे कि ऐ अल्लाह के रसूल मेरी मदद फरमाइये, तो मैं कहुँगा कि अल्लाह की पकड़ से बचान के लिए तेरी कोई मदद नहीं कर सकता, मैंने तो बात पहुँचा दी थी। ऐसा न हो उसकी गर्दन पर कपड़े हो, जो लहरा रहे हैं, और वो मुझे पुकारे और कहे कि ऐ अल्लाह के रसूल मेरी मदद फरमाइये, तो  कहुँगा कि तेरी किसी किस्म की मदद नहीं कर सकता, मैंने तो बात पहुँचा दी थी। (सही बुखारी, रक़म अलहदीस 3073)। आजकल खयानत आम है, हुक्मरान से लेकर आम आदमी तक हर शख्स करप्शन में डूबा हुआ है, छोटे छोटे भष्टाचार से लेकर बड़े बड़े घपले हर रोज़ देखे जा रहे हैं। बड़े पैमाने पर सरकारी खज़ाने लूट कर अपनी जेबें भरी जा रही हैं। याद रहे कि खयानत चाहे छोटी हो या बड़ी क़यामत के दिन खयानत करने वाले की गर्दन पर सवार रहेगी और उसके गले का फंदा बन कर उसको जहन्नम की ओर घसीटेगी और कहेगी कि मैं तेरा माल हूँ, मैं तेरा खज़ाना हूँ। (बुखारीः किताब अलज़कात, रक़म अलहदीस 1403)। 

 आज वो ज़माना आ गया है कि खयानत एक कारोबार की शक्ल ले चुकी है और समाज से इसकी संगीनी का ऐहसास जाता रहा है। सरकारे दो आलम सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम ने चौदह सौ साल पहले ही ये भविष्यवाणी की थी कि एक ज़माना आयेगा कि लोग इसकी परवाह न करेंगे कि उनके पास जो माल आया है वो हलाल है या हराम। (सही बुखारी, रक़म अलहदीस 2083)। इस्लाम ने रोज़ी रोटी के लिए हलाल व हराम और जायज़ व नाजायज़ का जो मेयार (मानदण्ड) कायम किया है, वो किसी इंसान का बनाया हुआ नहीं है बल्कि पूरी तरीके से वहीये इलाही से लिया गया है। यही वजह है कि इसमें इंसान के निजी और सार्वजिनक जीवन के तमाम पहलुओं की रिआयत की गयी है। इस मेयार पर अमल करने में ही लोगों की भलाई शामिल है। इसमें शक नहीं कि ज़िंदगी गुज़ारने के लिए माल की ज़रूरत है। चाहे ये माल कमा कर जमा किया जाये या मांग कर या किसी और तरीके से। दुनिया की तमाम क़ौमें इस बात पर मुत्तफिक़ (सहमत) कि माल के बगैर ज़िंदगी नहीं गुज़ारी जा सकती है, मगर ये माल कैसा और किस तरह हासिल किया जाये, इस सिलसिले में क़ुरान करीम की दो बुनियादी तालिमात हमारे भौतिकतावादी समाज और लोगों के लिए रहनुमा बन सकती है।

 पहली तालीम ये है कि हलाल और पाक चीज़ें खाओ और दूसरी तालीम ये कि एक दूसरे का माल झूठ और नाहक़ तरीके से मत खाओ। पहली तालीम का ज़िक्र कई आयतों में आया है। मिसाल के तौर पर फरमायाः याअय्योहन्नसो कोलु मिम् फिल अरदे हलालन तय्येबा वला तत्तबेऊ ख़ुतवातिश शैताने इन्नहो लकुम अदुवुम मोबीन (सूरे बक़राः168)- "ऐ लोगों ज़मीन की चीज़ो में से पाक हलाल और तैय्यब चीज़े खाओ और शैतान की इत्तेबा (पालन) न करो, बिला शुब्हा (शक) वो तुम्हारे लिए खुला दुश्मन है।" इस आयत में खिताबे आम है, यानि सिर्फ मुसलमानों को ही इसकी तलक़ीन नहीं की गयी है बल्कि दुनिया के तमाम लोगों को इस काम की ताकीद की गयी है कि वो हलाल, पाक और तैय्यब चीज़े ही खाया करें। क़ुरान करीम तमाम इसांनों की भलाई के लिए नाज़िल किया गया है।

 इसके आदेश सबके लिए आम हैं। इसलिए खिताब सब लोगों को है सिर्फ मुसलमानों को नहीं। फिर सिर्फ हलाल चीजों के इस्तेमाल पर ही संतोष नहीं किया गया है बल्कि इसी सूरत की बीस आयतों में मुख्तलिफ एहकाम बयान करने के बाद उस हुक्म को दूसरे अंदाज़ में इस तरह पेश किया गया हैः वला ताकोलु अमवालोकुम बैनकुम बिलबातेले वतदलू बिहा ऐलल हुक्कामे लेताकोलु फरीकम मेनल अमवालिन्नासे बिलइस्मे वअन्तुम तालमून (सूरे बक़राः188) और न खाओं माल एक दूसरे का आपस में नाहक और न पहुँचाओ इनके हुक्काम तक कि तुम लोगों के माल में से नाहक तरीके पर (ज़ुल्म से) खाओ और (तुम) ये बात अच्छी तरह जानते हो।

ये आयत रोज़ी रोटी हासिल करने के उन तमाम तरीकों की मुमानिअत है जो नापसंदीदा और नाजायेज़ हैं, जैसे चोरी, डाका, धोका फरेब, खयानत व रिश्वत फरेब, यहाँ तक कि कोई भी नाजायेज़ तरीका ऐसा नहीं है जिससे परहेज़ के बारे में न कहा हो। ये आयत एक खास पसेमंज़र (पृष्ठभूमि) में नाज़िल हुई। दौरे रिसालत सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम में दो सहाबियों के बीच ज़मीन के किसी मामले का मसला पैदा हुआ, जब बात आपस में नहीं सुलझी तो दोनें हज़रात तसफ़िये (निपटारे) के लिए सरकारे दो आलम सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम की अदालते आलिया में हाज़िर हुए और जो सहाबी जमीन की मिल्कियत के मुद्दई थे उनके पास कोई सुबूत मिल्कियत का नहीं था, कोई गवाह भी ऐसा नहीं था जो गवाही देता कि ज़मीन उनकी है।

 जब मुद्दई के पास गवाह और सुबूत न हों तो शरई ज़ाब्ते के मुताबिक मुद्दा अलैह से मुताल्बा किया जाता है कि वो क़सम खाए, मुद्दा अलैह ने क़सम खाने का इरादा किया, उस वक्त सरकारे दो आलम सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम ने उनको ये आयत सुनाईः इन्नल लज़ीना यशतरूना बेअहदिल्लाहे वअयमानेहिम समानन क़लीला (सूरे आलइमरानः 77)। मक़सद ये था कि दोनों सहाबी झूठी क़सम थाने से बाज़ रहें। उन्होंने जब ये आयत सुनी तो कसम खाने का इरादा छोड़ दिया और जमीन पर अपने दावे से पीछे हट गये (तफ्सीर मोआलिम तंज़ीलुल लुग़्वी 210-1) क़ुरानी ताबीरात में इंसानी मिजाज़ की बड़ी रिआयत की जाती है और वो अंदाज़ अख्तियार किया जाता है जो बड़े से बड़े मफ्हूम को इंसान के दिलो दिमाग़ में  निहायत सादा तरीके से पेवस्त कर देता है।

 अब इस आयत में देख लीजिए इसमें लफ्ज़ अमवालोकुम फरमाया गया है, जिसके मानी हैं अमवाल, इसमें इस हकीकत की तरफ इशारा है कि तुम दूसरे के माल में नाजायेज़ तरीके से खर्च करने से पहले सोच लिया करो, जिस तरह तुम्हें अपने माल से मोहब्बत है उसी तरह दूसरी शख्स भी अपने माल से मोहब्बत रखता है। ये सोचो अगर तुम नाजायेज़ तरीके से उसका माल हथियाओगे तो उसे तुम्हारी इस हरकत से तक्लीफ होगी। इसी तरह अगर ये हरकत उसने तुम्हारे साथ की तो क्या तुम उस तक्लीफ को महसूस नहीं करोगे। किसी का माल बेजा खर्च करने से पहले सोच लिया करो कि वो तुम्हारा माल है जिसमें तुम नाजायेज़ खर्च के भागीदार बन रहे हो। फिर इसका दूसरा पहलू ये भी हो सकता है कि जब तुम किसी के माल में से बेजा खर्च करोगे तो दूसरा भी मजबूर होकर ऐसा ही करेगा। इस तरह तुम दूसरे को अपने माल के बेजा खर्च की दावत दे रहे हो। हम खुली आंखों से रात दिन इस बात को देख रहे हैं कि एक शख्स दूध में मिलावट का कारोबार करता है।

 अपनी इस हरकत से वो कुछ ज्यादा फायदा कमा लेता है, लेकिन वो इस फायदे को हासिल करने के लिए मिलावटी सामान खरीदने में बर्बाद कर देता है। दूसरा शख्स नक़ली दवाएं बेच रहा है उसे नक़ली दवाए खरीदनी पड़ती हैं। कुछ दूसरे लोग घी तेल में चर्बी मिलाकर नाजायेज़ कारोबार कर रहे हैं। उसे मिलावटी घी तेल खरीदना पड़ रहा है। उस तरह उसने जितना माल मिलावटी दूध बेच कर कमाया था, उतना ही या उससे कुछ कम रुपया खर्च करके वो दूसरी मिलावटी चीज़े खरीद कर बर्बाद कर देता है और नुक्सान उठाता है। आपस में एक दूसरे का माल इसलिए कहा गया ताकि क़ौम और वतन की एकता का एहसास बाकी रखा जाये और ये ज़हन नशीन किया जाये कि एक दूसरे के माल की हिफाज़त मुश्तरका (साझा) ज़िम्मेदारी है और आपसी सहयोग के लिए सबसे अहम शर्त की हैसियत रखती है। क़ुरान करीम इंसानी दिलों में ये जज़्बा पैदा करना चाहता है कि वो जिस तरह अपने माल का आदर करते हैं और उससे मोहब्बत रखते है उसी तरह दूसरे के माल का आदर करें और मोहब्बत करें।

अगर किसी ने दूसरे के माल में हाथ डाला, उसे ग़ज़ब किया, चोरी से ले लिया, या धोका फरेब देकर हथिया लिया या किसी ऐसी चीज के ऐवज़ में ले लिया जो चीज़ उसका बदला होने की हैसियत नहीं रखती थी वो ऐसा है जैसे उसने पूरी क़ौम और पूरे मुल्क पर ज़ुल्म किया। वो खुद क़ौम का एक हिस्सा है और वतन का हिस्सा है, उसने जो गुनाह किया वो उसकी ज़ात तक महदूद रहे ऐसा मुमकिन नहीं है, यक़ीनन ये गुनाह मुतैदी (संक्रामक) होगा, और समाज के दूसरे लेग भी इसमें शामिल होंगे। आज इसने किसी का माल हड़प लिया, कल को वो उसका या उसके भाई का माल हड़प कर इस गुनाह को मुतैदी बनाने में अपना रोल अदा करेगा। क़ुरान करीम की इस आयत में लफ्ज बेबातेला लाया गया है। ये लफ्ज अपने माने के ऐतबार से बड़ा वसी (विस्तार वाला) है और नाजयेज़ तरीके से हासिल किया गये माल के तमाम तरीके शामिल हैं। चोरी, डाका, ज़ुल्म जब्र व तशद्दुद (हिंसा) के ज़रिए माल का हासिल करना सूद, कॉमार ,रिश्वत और वो तमाम मामलात जो शरई इजाज़त नहीं है, लफ्ज़ बातिल में दाखिल हैं। हद ये कि फरीकैन की रज़ामंदी से भी कोई मामला अगर हो रहा है तो भी जायेज़ नहीं, अगर इसमें शरीअत की पासदारी नहीं है। माले हराम में मेहनत भी माकूल वजह नहीं हैं। माले हराम मेहनत से हासिल हो या बगैर मेहनत के हराम ही रहेगा अगरचे इस आयत में लाताकोलु का लफ्ज़ आया है, जिसके मानी हैं कि मत खाओ, मगर इसका मतलब ये नहीं कि सिर्फ माले हराम खाने की मुमानेअत है, पहनने , ओढ़ने या रहने सहने में माले हराम इस्तेमाल किया जा सकता है, ऐसा नही है। जिस तरह खाने पीने में माले हराम के इस्तेमाल की मुमानेअत है उसी तरह दूसरी चीज़ों में भी है, इस सिलसिले में क़ुरान करीम ने भी मना किया है।

क़ुरान करीम ने सिर्फ इसी पर संतोष नहीं किया है बल्कि दूसरे तरीकों से भी इंसान को हलाल रोज़ी कमाने के लिए अमादा करने की कोशिश की है। एक आयत में हलाल रोज़ी को अमले स्वालेह के बराबर बता कर ये वाज़ेह किया गया है कि अमले स्वालेह बगैर हलाल रोज़ी के मुमकिन नहीं। और अगर किसी ने जाहिर तौर पर अमले स्वालेह किया भी तो वो नताएज के ऐतबार से मुफीद हो ही नहीं सकता, न इस पर किसी तरह के अजर व सवाब की उम्मीद रखनी चाहिए, फरमायाः या अय्योहर्र रोसोलो कुलु मिनत्तैय्येबाते वाआमलू स्वालेहा (अलमोमेनूनः 51)। ऐ गिरोह अंम्बिया हलाल और पाक चीज़ें खाओ और नेक अमल करो। अगरचे इसमें खिताब अम्बिया कराम अलैहिस्सालाम से फरमाया गया है, मगर एक हदीस में वाज़ेह तौर पर फरमाया गया है कि ये हुक्म आम है सिर्फ अम्बिया कराम के साथ ही मख्सूस नहीं है। इस हदीस में ये भी है कि हराम माल खाने वाले की दुआ क़ुबूल नहीं होती। फरमाया बहुत से

 लोग इबादत में मशक्कत बर्दाश्त करते हैं फिर दुआ के लिए अल्लाह के सामने हाथ फैलाते हैं और या रब या रब पुकारते हैं, मगर उनका खाना भी हराम होता है, पीना भी हराम होता है और लिबास भी हराम होता है, इस सूरत में उनकी दुआ कैसे कुबूल हो सकती है। रवायत में हलाल रोज़ी के बड़े फज़ायेल (फायदे) और हराम रोज़ी की बेशुमार मज़म्मते वारिद हैं, जिनसे साबित होता है कि समाज की पाकीज़गी बगैर हलाल रोज़ी के मुमकिन नहीं। यहाँ तक कि नमाज़ रोज़ा जैसी बुनियादी इबादतें भी दर्जए कुबूलियत से सरफराज़ नहीं हो सकतीं और न सदक़ा व खैरात से नापाक कमाई पाक बन सकती है। एक मरतबा सहाबीये रसूल सअद बिन वक़ास (रज़ि.) ने सरकारे दोआलम सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम की खिदमत में अर्ज़ किया कि मेरे लिए मुस्तजबुल दावात होने की दुआ फरमा दीजिए। फरमाया ऐ सअद अपना खाना हलाल और पाक कर लो, तुम मुस्तजबुल दावात बन जाओगे। उस ज़ात की क़सम जिसके क़बज़े में मोहम्मद की जान है, बंदा जब अपने पेट में हराम लुक़्मा डालता है तो चालीस रोज़ तक उसका कोई अमल कुबूल नहीं होता है और जिस शख्स का गोश्त हराम माल से बना हुआ हो, तो वो गोश्त तो जहन्नम के लायक़ ही है।(अलमोजमुल वस्तुत तिबरानी 261-14, रक़मुल हदीसः6683)।

 हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ि.) की रवायत में है कि सरकारे दो आलम सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम ने फरमाया उस ज़ात की क़सम जिसके क़ब्ज़े में मेरी जान है, कोई बंदा उस वक्त तक मुसलमान नहीं हो सकता जब तक उसका कल्ब (हृदय) और ज़बान मुस्लिम न हो जाये और जब तक उसके पड़ोसी उसकी तकलीफों से महफूज़ न रहें, और जब कोई बंदा माले हराम खाता है तो, फिर उसको सदक़ा करता है तो वो कुबूल नहीं होता, इसमें से खर्च करता है तो बरकत नहीं होती और वारिसों के लिए छोड़ता है तो वो जहन्नम के लिए ले जाने का ज़रिआ बन जाता है।(मसनद बिन हम्बल 25-8, रक़मिल हदीसः3491)।

 हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ि.) की रवायत में है कि सरकारे दो आलम सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम ने फरमाया उस ज़ात की क़सम जिसके क़ब्ज़े में मेरी जान है, क़यामत के रोज़ कोई बंदा अपनी जगह से नहीं हटेगा, जब तक उससे चार सवालों का जवाब न ले लिया जाये, एक ये कि उसने अपनी उम्र को कहाँ ज़ाया किया, दूसरे ये कि अपनी जवानी किस शगल में बर्बाद की, तीसरे ये कि अपना माल कहाँ से कमाया और कहाँ खर्च किया औऱ चौथे अपने इल्म पर कहाँ तक अमल किया ।(अलमोजमुल वस्तुत तिबरानी 367-16,रक़मुल हदीसः7791)। आज हमारा मुल्क गले तक भ्रष्टाचार के दलदल में डूबा हुआ है। इससे निकलने के लिए इस्लाम जैसे मुकम्मल और फितरी मज़हब की जामे और हक़ीक़ी तालिमात की ज़रूरत है।

आमतौर पर लोग इस वजह से भ्रष्टाचार में शामिल होते है कि उनके दिल में न तो इंसानी कानून का खौफ है और न ही खुदाई कानून का। इंसानी कानून के बारे में तो उनका ख्याल ये है कि वो जब चाहे पैसे से खरीद कर अपने हक़ में कर सकते हैं और खुदाई कानून को वो मानते ही नहीं। हालांकि खुदाई कानून का मानना और उस पर दिल से अमल करना ही करप्शन के इस तूफान से देश को बाहर निकाल सकता है। काश हमारे देश के रहनुमा किसी वक्त इस पहलू से भी गौर कर लेते वरना ये आर्थिक और समाजी नासूर लगातार फैलता ही रहेगा और आखिर में देश की अर्थव्यवस्था को तबाह व बर्बाद कर देगा।

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