New Age Islam
Tue Jun 09 2026, 11:26 PM

Hindi Section ( 25 Jun 2012, NewAgeIslam.Com)

Comment | Comment

Growing Trend of Suicides: How and Why Islam Totally Prohibits Suicides ख़ुदकुशी का बढ़ता रुझानः किस तरह और क्यों इस्लाम खुदकुशी से मना करता है

 

जो कुछ भी एक मुसलमान मज़हबी आलिम या एक सहाफ़ी उर्दू प्रेस में लिखते हैं, इसमें इस्लाम फ़ौक़ियत और दीगर मज़हब के लिए नफ़रत की बू आना ज़रूरी है और जो अपने व साथ ही साथ दीगर मज़ाहिब की इल्म और इफ़्हाम व तफ़्हीम की कमी की बुनियादों के सबब है। हमारे नाम निहाद उल्मा काफ़िर बनाने वाली फ़ैक्ट्रियों से आते हैं जहां इस्लाम के अंदर मुख्तलिफ मक्तबे फिक्र, अहले किताब औक गैर मुसलमानों के ख़यालात व नज़रियात का एहतेराम नहीं सिखाया जाता है। उन्हें अपने महदूद नज़रिया के मुक़ाबले में दूसरे ख़यालात के किसी निज़ाम की तर्बियत नहीं दी जाती है। ऐसे में दूसरों के एहतेराम का सवाल ही नहीं पैदा होता है। इल्म सबसे पहले आता है।

फिर क्यों न्यु एज इस्लाम उर्दू प्रेस के उल्मा और सहाफ़ियों के मज़ामीन पोस्ट करना जारी रखे हुए है और यहां तक कि उन्हें अंग्रेज़ी और दीगर ज़बानों में तर्जुमा कराने की कोशिश और उन पर होने वाले अख़राजात को बर्दाश्त करता है? कुछ क़ारईन की हैरानी बजा है। एक, इस्लाम फ़ौक़ियत परस्ती और दीगर अहले किताब से नफ़रत को बेनकाब करना अपने आप में हमारे काम का लाज़िमी हिस्सा है। और मदीना में नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के आईन मीसाक़े मदीना के मुताबिक़ मुस्लिम उम्मत का हिस्सा थे। इस्लाम फ़ौक़ियत परस्ती के रुझानात तक़रीबन हर आलिम, तालिब और उर्दू सहाफ़ी (चंद मुस्तसनियात के साथ) के ज़हन में इस क़दर पुख़्ता हैं कि इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता कि जहां कहीं से भी और जो भी मौज़ू उठा लो आपको नफ़रत की बू ज़रूर मिलेगी। दूसरे, क्योंकि वो इस्लामी नज़रिए के मौज़ूआत पर बात करते हैं। इस मुआमला में इस्लाम मोकम्मल तौर पर हर तरह की ख़ुदकुशी के ख़िलाफ़ है और इसके लिए हमें ख़ुद हमारे इल्मे दीन के इन बेहतरीन नुकात से आगाह होना ज़रूरी है, हम इस लिटरेचर को इसमें शामिल इस्लाम फ़ौक़ियत परस्त ख़यालात को नज़रअंदाज कर पढ़ सकते हैं। एडीटर, न्यु एज इस्लाम

---------------------------------------------------------------

 

मौलाना नदीमुल वाजिदी

17 अगस्त, 2011

(उर्दू से तर्जुमा- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

ख़ुदकुशी भी इस दौर के समाजी मसाइल पर सरे फ़हरिस्त है, आज हिंदुस्तान ही में नहीं बल्कि पूरी दुनिया में लोग ख़ुदकुशी कर रहे हैं, और जान जैसी बेशकीमती चीज़ ख़ुद अपने हाथों ज़ाया कर रहे हैं। अगर हम हिंदुस्तान की बात करें तो ये मसला यहां कुछ ज़्यादा ही संगीन शक्ल इख़्तियार कर चुका है।  अभी तक अर्बाबे हल व अक़्द इसकी संगीनी की तरफ़ मुतवज्जा नहीं हो सके। आने वाले वक़्त में ये मसला पूरी शिद्दत के साथ उभरेगा, और उस वक़्त हुकूमत को कोई ना कोई सख़्त क़दम उठाना ही पड़ेगा।  अदायगी क़र्ज़ की कोई सबील ना निकल पाने की सूरत में ख़ुदकुशी करने वालों की बढ़ती तादाद ने हुकूमत के ज़मीर को झिंझोड़ा तो है, और महाराष्ट्र के दोरबा इलाक़े में ख़ुदकुशी करने वाले किसानों के कर्ज़ों की अदायगी के लिए हुकूमत ने कुछ रक़म मुख़्तस भी की है, लेकिन ये रक़म मुतास्सिरीन को मिल रही है या नहीं इसके बारे में यक़ीन के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता यूं भी यहां का नौकरशाही नेज़ाम सरकारी रक़ूम को सही जगह तक ना पहुंचने देने में माहिर समझा जाता है, इसलिए तवक़्क़ो ये है कि अभी तक हुकूमत अपने ऐलान के मुताबिक़ मक़रूज़ और मायूस काश्तकारों की कोई मदद नहीं कर पाई है। हिंदुस्तान में ख़ुदकुशी के अस्बाब व अवामिल और मुहर्रिकात दूसरे मुल्कों के मुक़ाबले में कुछ ज़्यादा ही हैं,  इनमें से बाज़ अस्बाब तो ऐसे हैं जो सिर्फ उसी मुल्क में पाए जाते हैं, जब तक ख़ुदकुशी के सही अस्बाब का पता लगा कर उसका तदारुक नहीं किया जाएगा और मर्ज़ को जड़ से ख़त्म करने की कोशिश नहीं की जाएगी उस वक़्त तक ख़ुदकुशी के वाक़ेआत पर क़ाबू पाना बेहद मुश्किल है।

 हिंदुस्तान में अभी तक नया इक़्तेसादी नेज़ाम पूरी तरह मुतआर्रिफ़ नहीं हो सका है आज भी क़सबात और देहात में ग़रीब लोग अपनी मआशी मजबूरियों की वजह से महाजनी नेज़ाम के पंजए इस्तेबदाद में जकड़े नज़र आते हैं, ये नेज़ाम यहां सदियों से चला आ रहा है और इस मुल़्क की रगों में ख़ून बन कर दौड़ रहा है, एक शख़्स आज भी अपनी मौरूसी ज़मीन पर सिर छिपाने के लिए घर बनवाने की ख़ातिर सूद ख़ोरों से ऊंची शरह सूद पर क़र्ज़ लेने के लिए मजबूर है, ये शरह सूद इतनी ज़्यादा होती है कि बेटी ख़ुद साहिबे औलाद हो जाती है, माँ बाप की हड्डियों को राख हुए सालों गुज़र जाते हैं और सिर छिपाने के लिए बनाया गया कच्चा पक्का घर तेज़ तुंद हवा या तूफ़ान बारिश की ज़द में आकर ज़मीन बोस हो जाता है, लेकिन क़र्ज़ लेने वाले का क़र्ज़ तो क्या उसका सूद भी अदा नहीं हो पाता, वो या तो ज़मीन गंवा देता है या क़र्ज़ मय सूद अपनी नस्लों के लिए बतौर विरासत छोड़ देता है।  अब हुकूमत ने कम शरह सूद वाले ग्रामीण बैंक खोले हैं और उनसे क़र्ज़ लेने की तर्ग़ीब जारी है, लोग कर्जे़ हासिल भी कर रहे हैं अव्वल तो इन बैंकों से हर ज़रूरतमंद घबरा कर इरादा ही मुल्तवी कर देता है, और अगर वो किसी तरह क़र्ज़ मंज़ूर  करा लेता है तो उसे रिश्वतों में इतनी रक़म मुताल्लिक़ा अफ़सरों को देनी पड़ती है कि क़र्ज़ से हासिल होने वाली रक़म का एक माक़ूल हिस्सा उसके हाथ से निकल जाता है, बहुत से लोग क़र्ज़ लेते हैं लेकिन जिस मक़सद के लिए वो क़र्ज़ लेते हैं उसमें नाकाम रह जाते हैं, नतीजा ये होता है कि वो क़र्ज़ की अदायगी नहीं कर पाते, हमारे मुल्क में ख़ुदकुशी करने वालों की अच्छी ख़ासी तादाद ऐसे लोगों की है जो किसी महाजन या किसी बैंक से लिया हुआ क़र्ज़ अदा नहीं कर पाते और मायूस होकर ख़ुदकुशी का रास्ता अपना लेते हैं।

हिंदुस्तान में ज़ात पात का नेज़ाम हर चीज़ पर हावी है, यही वजह है अगर वो मुख़्तलिफ़ ज़ातों और बिरादरियों के लड़के लड़की में इश्क़ हो जाए और वो शादी करके एक साथ ज़िंदगी गुज़ारना चाहें तो उनके वालदैन, सरपरस्त, गांव के मुखिया और समाज के कर्ता धर्ता उन्हें इस बात की इजाज़त नहीं देते, अगर उनके पास वसाइल होते हैं या हिम्मत होती है तो वो घर से फ़रार होकर रिश्तए अज़्दवाज में मुंसलिक हो जाते हैं, वर्ना मायूस होकर ज़हर खा लेते हैं, या रेल के नीचे आकर अपनी ज़िंदगी ख़त्म कर लेते हैं, या गले में फांसी का फंदा डाल कर छत के पंखे में या किसी दरख़्त की शाख़ पर झूल जाते हैं।

ख़ुदकुशी के मिनजुम्ला अस्बाब में से एक बड़ा सबब घरेलू मसाइल भी हैं। आम तौर पर औरतें जहेज़ के नाम पर सताई जा रही हैं, और उनके वाल्दैन का इस्तेहसाल किया जा रहा है, बाज़ औक़ात कम जहेज़ लाने वाली ख़वातीन को ज़िंदा जला दिया जाता है, और कभी वो इस क़दर मजबूर हो जाती हैं कि उनके सामने ख़ुदकुशी के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं रहता, जहेज़ के नाम पर ख़वातीन को हेरासाँ करने की कोशिश हिंदुस्तानी तहज़ीब की पेशानी पर बदनुमा दाग़ बन चुका है, अख़बारात के सफ़े के सफ़े अज़ियत रसानी की ख़बरों से भरे रहते हैं, शरह ख़वांदगी में इज़ाफे़ के बावजूद अभी तक हिंदुस्तानी समाज जहालत की तारीकियों में डूबा हुआ है।

तालीम का मेयार बढ़ रहा है, और इससे ज़्यादा ज़िंदगी का मेयार बुलंद से बुलंद तर होता जा रहा है, ख़ानदान को उभरने के लिए पैसे की ज़रूरत है, जो किसी अच्छी मुलाज़िमत या वसी तेजारत के ज़रिए ही हासिल हो सकता है, ज़िंदगी की दौड़ में बरपा इस मुसाब्क़त ने बच्चों से उनका बचपन छीन लिया है, वाल्दैन से तालीमी मैदान में आला कारकर्दगी की तवक़्क़ो करते हैं,  बसाऔक़ात बच्चे उनकी तवक़्क़ुआत पर पूरा नहीं उतर पाते उनमें से कुछ बच्चे हालात से समझौता कर लेते हैं और कुछ कम हौसला बच्चे हिम्मत हार बैठते हैं और अपनी ज़िंदगी का ख़ात्मा कर लेते हैं। ख़ुदकुशी का ये रुझान ताज़ा है और तेज़ी के साथ बढ़ रहा है। इनके इलावा भी कुछ ऐसे अस्बाब हैं जो आदमी को ख़ुदकुशी की तरफ़ ले जाते हैं। मआशी और इक़्तेसादी तरक़्क़ी की वजह से अगरचे ख़ुशहाली बढ़ी है मगर मुल्क का हर शहरी ख़ुशहाल हो गया है ऐसा नहीं है आज भी एक बड़ी आबादी मआशी तरक़्क़ी के फ़वाइद व समरात से उसी तरह महरूम है जिस तरह साठ बरस पहले थी जब मुल़्क आज़ाद हुआ था। जो लोग अभी तक ग़रीब हैं, या मोतवस्त तब्क़े में शुमार किए जाते हैं वो तरक़्क़ी की चकाचैंध में अपना मुस्तक़बिल तलाश करते हैं और जब उन्हें मायूसी हाथ लगती है तो बहुत से कम हिम्मत लोग हालात से नबरदआज़मा होने के बजाय मौत की आग़ोश में चले जाने को तर्जीह देते हैं इंसान की घरेलू उलझनें बढ़ रही हैं, इसमें अमीर व ग़रीब की भी तख़्सीस नहीं है, अमीर की परेशानियां दूसरी नौईयत की हैं, ग़रीब की मुश्किलात किसी और तरह की हैं।

ख़ुदकुशी के जो वाक़ेआत पेश आते हैं उनमें दस फ़ीसद के पीछे घरेलू मसाइल होते हैं, और अब लोगों ने इज़हारे अक़ीदत व मुहब्बत के लिए भी ख़ुदकुशी करनी शुरू कर दी है, अब एक नया रुझान ये पैदा हुआ है कि बाज़ लोग सरकारी हुक्काम की बद्दियानतियों के ख़िलाफ़ बतौर एहतेजाज अपने आपको आग के हवाले कर रहे हैं। बहैसियत मजमूई हमारे मुल्क में ख़ुदकुशी के वाक़ेआत बढ़ते जा रहे हैं। एक जायज़े के मुताबिक़ हिंदुस्तान में ख़ुदकुशी के ज़रीये मरने वालों की सालाना तादाद सात लाख से तजावुज़ कर चुकी है, इसमें मर्द भी हैं, औरतें भी हैं और बच्चे भी।  ये तादाद लगातार बढ़ रही है, और आने वाले सालों में इस रुझान के ख़त्म होने के कोई आसार नहीं हैं। इन हालात में ज़रूरी है कि ख़ुदकुशी के पीछे मौजूद हक़ीक़ी सबब का पता लगाया जाय और इसके तदारुक की कोशिश की जाय जहां तक अख़बारात वग़ैरा के मुताले से पता चलता है ख़ुदकुशी के वाक़ेआत मुसलमानों से ज़्यादा हमवतनों में पाए जा रहे हैं। ( यहां खुदकुश हमलों की बात रहने दीजिए, ये मौज़ू एक अलग बहस का मोताक़ाज़ी है) ऐसा लगता है कि हमारे हमवतन भाई इंसानी जान की क़द्रो क़ीमत से सही तौर पर वाक़िफ़ नहीं हैं, उन्हें ये भी पता नहीं कि ज़िंदगी ख़ुदा की दी हुई अमानत है, हमें उसे ख़त्म करने का कोई हक़ नहीं, उन्हें ये भी मालूम नहीं कि मरने के बाद भी एक ज़िंदगी है जो दाइमी और अब्दी है, जहां इंसान को उसके किए का फल मिलेगा, वो ये भी नहीं जानते कि मायूसी इंसान की बहुत बड़ी कमज़ोरी है।  सही मानी में इंसान वही है जो बुलंद हौसला रखता हो, मसाइब और मुश्किलात का मुक़ाबला करने की सलाहियत रखता हो, और किसी भी हालत में मायूस ना होता हो, हालात कितने ही मुख़ालिफ़ क्यों ना हों सब्र व तहम्मुल का दामन हाथ से ना छोड़ता हो, ऐसा लगता है कि इस्लाम ही एक ऐसा मज़हब है जो इंसान को अज़्म व हिम्मत और सब्र व बर्दाशत के साथ जीने का सलीक़ा सिखाता है, ज़रूरत है कि हम इस्लामी तालिमात के इस पहलू को अपने हमवतन भाईयों को रोशनास कराएं।

अल्लाह ताला ने इंसान को पैदा किया और उसे शरफ़ व फ़ज़ीलत अता फ़रमाई, जैसा कि क़ुराने करीम में है: और हम ने इज़्ज़त दी है आदम की ओलाद को और सवारी दी उनको जंगल और दरिया में और रोज़ी दी उनको पाकीज़ा चीज़ों से, और फ़ज़ीलत दी इनमें से बहुतों पर जिन्हें हमने पैदा किया (बनी इसराईल:70)। इस आयत में अल्लाह ताला ने अक्सर मख़्लूक़ात पर इंसान की फ़ज़लीत का ज़िक्र फ़रमाया है। ये फ़ज़ीलत इन ख़ुसूसियात की वजह से है जो सिर्फ इंसान में पाई जाती हैं इसके अलावा दूसरी मख़्लूक़ात में नहीं पाई जातीं, मसलन ये कि उसे हुस्न सूरत, एतेदाल जिस्म एतेदाल कद व क़ामत और एतेदाल मिज़ाज अता किया, सब से बढ़ कर ये कि उसे अक़्ल व शऊर बख्शा गया, जिसके ज़रीये वो कायनात में फैली हुई दूसरी मख़्लूक़ात से अपने काम निकालता है, बाज़ मख़्लूक़ात को वो अपनी सवारी के लिए इस्तेमाल करता है, बाज़ मख़्लूक़ात के ज़रीए वो अपनी ग़िज़ा और लिबास तैय्यार करता है, उसे अक़्ल व शऊर के साथ नुत्क़ और गोयाई भी अता की ताकि अपना माफी अलज़मीर दूसरों तक पहुंचा सके, और दूसरों के ख़यालात आसानी के साथ समझ सके, ये इम्तेयाज़ात व ख़ुसूसियात हैं जिनमें इंसान का कोई शरीक व सहीम नहीं है, क्या ये दानिशमंदी होगी कि इस क़दर बेशक़ीमत जिस्म और इतनी ख़ुसूसियात का हामिल व वजूद ख़त्म कर लिया जाय, और उसे मौत के हवाले कर दिया जाय।

ये सही है कि मौत एक अटल हक़ीक़त है, और एक दिन हर ज़िंदा वजूद को मौत की आग़ोश में जाना है, लेकिन ये इख़्तेयारात सिर्फ़ ख़ुदा ताला को है, सी ने पैदा किया है और वही मौत देगा, इंसान को सिर्फ जीने का इख़्तेयार दिया गया है, मौत का इख़्तेयार नहीं दिया गया।  यही वजह है कि इस्लाम ने ख़ुदकुशी को हराम क़रार दिया है और उलमाए किराम ने इसकी हुर्मत की वजह से उसे कबीरा गुनाहों में शुमार किया है कबीरा गुनाह की मुख़्तलिफ़ तारीफ़ें की गई हैं। इनमें सब से ज़्यादा जामे और मुकम्मल तारीफ़ ये है कि जिस गुनाह पर कोई वईद या हद या लानत बयान की गई हो, या वो गुनाह किसी ऐसे गुनाह के बराबर हो जिस पर कोई वईद या लानत आई हो, हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहू अन्हा फ़रमाते हैं कि जिस गुनाह पर अल्लाह ताला ने दोज़ख़ के अज़ाब की धमकी दी हो या उसे अपने ग़ज़ब और लानत का इज़हार फ़रमाया हो, कबीरा है, अल्लामा इब्न क़ियम का ख़याल है कि जो गुनाह बज़ात ख़ुद ममनू हों और कबीरा हैं और जिनसे इसलिए मना किया गया हो कि वो किसी बुराई का सबब बनते हैं वो सगीरा हैं, बहरहाल कबीरा गुनाहों पर बड़ी वईदें वारिद हैं, और उनके मुर्तकबीन को सख़्त तरीन सज़ाओं का मुस्तहिक़ क़रार दिया गया है। वैसे तो अल्लाह ताला क़ादिरे मुतलक़ है वो चाहे तो बड़ा से बड़ा गुनाह अपने फ़ज़ल व करम से माफ़ कर सकता है, और चाहे तो छोटे से छोटे गुनाह पर गिरफ़्त कर सकता है, लेकिन क़ुरान व सुन्नत के कबाइर के सिलसिले में जो कुछ मालूम होता है वो ये है कि कबीरा गुनाह या तो कफ़्फ़ारात (हुदूद व क़सास) के ज़रिए माफ़ होते हैं या तौबा के ज़रिए।

इस रौशनी में देखा जाय तो ख़ुदकुशी ऐसा गुनाह है कि इसके मुर्तक़िब पर कोई हद वग़ैरा जारी नहीं हो सकती और ना वो तौबा कर सकता है, क्योंकि ख़ुदकुशी करने के बाद वो इस काबिल ही नहीं रहता कि इस पर ताज़ीरी कार्रवाई की जा सके या वो तौबा कर के अपना गुनाह माफ़ करा सके। क़ुराने करीम की मुंदरजा ज़ैल दो आयतों से ख़ुदकुशी की हुर्मत पर रौशनी पड़ती है। एक जगह इरशाद फ़रमाया गया: और तुम अपने आप को क़त्ल करो, बिलाशुबा अल्लाह ताला तुम पर मेहरबान है, और जो शख़्स ज़ुल्म व जोर से ऐसा करेगा तो हम उसे ज़रूर आग में डालेंगे (अलनिसाः 29-30)।

इस आयत में बित्तेफ़ाक़ मुफ़स्सिरीन ख़ुदकुशी भी दाख़िल है। इस्लाम ने हर तरह की ख़ूँरेज़ी को हराम क़रार दिया है, चाहे ख़ुद को क़त्ल करना हो या दूसरे को क़त्ल करना हो, और इसकी ये सज़ा भी मुतय्यन फ़रमा दी है कि हम उसे आख़िरत में दोज़ख़ के अज़ाब की दर्दनाक सज़ा देंगे। एक आयत में फ़रमाया गयाः वला तुल्क़ू बेअयदीकुम एलत्तोहलकते (अल-बक़राः 195) और अपने आप को अपने हाथों से हलाकत में मत कर डालो। इस आयत के मुफ़स्सिरीन ने आम मानी पर महमूल किया है यानी वो तमाम इख़्तियारी सूरतें नाजायज़ हैं जो तबाही, बर्बादी और हलाकत की तरफ़ पहुंचाने वाली हों, फ़ुज़ूल ख़र्ची, हथियार के बगै़र मैदाने जिहाद में कूद पड़ना, दरिया में डूब कर, आग लगाकर, ज़हर खाकर, चाक़ू मार कर या दूसरे तरीक़ों से ख़ुद को हलाक करना यानी ख़ुदकुशी करना, जिन इलाक़ों में वबाई अमराज़ फैल रहे हों वहां जाना वग़ैरा, क़ुराने करीम में ख़ुद को हलाक करने की क़तई तौर पर मुमानेअत है, इस मुमानेअत का हदीस से भी सबूत मिलता है, इसके पहले जो आयत ज़िक्र की गई है सहाबा किराम इससे यही मफ़हूम मुराद लेते थे, चुनांचे हज़रत उमर बिन अलआस रज़ि. फ़रमाते हैं कि ग़ज़वए ज़ात अल्सिलासिल के दौरान एक निहायत सर्द रात मैंने ग़ुस्ल किया तो मैं सर्दी की शिद्दत से मर जाऊँगा, ये सोच कर मैंने तयम्मुम कर लिया और रुफ़्क़ा के साथ सुबह की नमाज़ में शरीक हो गया, बाद में मैंने ये वाक़ेआ सरकारे दो आलम की ख़िदमत में अर्ज़ किया, आपने फ़रमाया क्या तुम ने नापाकी की हालत में नमाज़ पढ़ ली, मैंने अर्ज़ किया कि ग़ुस्ल के बजाय मैंने तयम्मुम कर लिया था, क्योंकि मैंने अल्लाह ताला का ये इरशाद सुना है ला तक़्तुलू अनफ़ोसाकुम ये सुन कर आप मुस्कुराए और कुछ ना फ़रमाया, हाफ़िज़ शमसुद्दीन ज़हबी रह. ने किताब अल-कबाइर में लिखा है कि इस वाक़ए से मालूम होता है कि हज़रत उमर बिन अलआस रज़ि ने लफ़्ज़ क़त्ले नफ़्स से ख़ुदकुशी मुराद ली है और आपने इस पर कोई नकीर भी नहीं फ़रमाई, इस किताब में अल्लामा ज़हबी ने ख़ुदकुशी की मज़म्मत में मुतअद्दिद रवायात नक़ल की हैं जिनमें से चंद यहां दर्ज हैं:

हज़रत जनदब बिन अब्दुल्ला रज़ि. रिवायत करते हैं कि सरकारे दो आलम ने फ़रमाया कि बनी इसराईल में एक शख़्स के (हाथ में) कोई ज़ख़्म हो गया था वो शख़्स उसकी तकलीफ़ से इस क़दर परेशान हुआ कि छुरी लेकर उसने अपना हाथ काट डाला जिसमें ज़ख़्म था, कटे हुए हाथ से इस क़दर ख़ून बहा कि वो शख़्स मर गया। अल्लाह ताला ने फ़रमाया! मेरे बंदे ने अपनी जान के सिलसिले में जल्दी की (अब) इस पर जन्नत हराम है। एक हदीस में है कि किसी शख़्स ने ज़ख़्मों की शिद्दत से बेचैन होकर ख़ुद को तलवार से हलाक कर लिया, आपने इरशाद फ़रमाया कि वो शख़्स जहन्नुमी है एक हदीस में है कि मोमिन पर लानत करना ऐसा है जैसे उसे क़त्ल कर दिया जाय। अगर कोई शख़्स ख़ुदकुशी करेगा तो जिस चीज़ से उसने ख़ुदकुशी की है उसी चीज़ से उसे क़यामत के दिन अज़ाब दिया जाएगा, इस सिलसिले में कुछ तफ़्सील दूसरी हदीस में है। फ़रमाया! जिस शख़्स ने अपने आप को तलवार से हलाक किया उसे दोज़ख़ में तलवार दी जाएगी कि वो उसे अपने पेट पर मारता रहे, जिस शख़्स ने ज़हर खा कर ख़ुदकुशी की उसे जहन्नुम में ज़हर दे दिया जाएगा कि वो उसे खाता रहे और जिस शख़्स ने पहाड़ से कूद कर ख़ुद को हलाक किया उसे जहन्नुम में पहाड़ के ऊपर से गिराया जाता रहेगा।

आदमी ख़ुदकुशी क्यों करता है?  इसका जवाब सिर्फ ये है कि वो हालात के सामने हौसला हार देता है  और मुश्किलात व मसाइब से घबरा कर राहे फ़रार इख़्तियार करने लगता है इस्लाम ने एक तरफ़ ख़ुदकुशी की मज़म्मत करके लोगों को ये बतलाया कि ज़िंदगी जीने के लिए होती है, ख़त्म करने या ज़ाए करने के लिए नहीं होती, दूसरी तरफ़ इस दुनिया को दारुल इम्तेहान और दारुल अमल क़रार दिया गया हैदारुल इम्तेहान इस मानी में हर इंसान आज़माईशों की कठिन घड़ी से गुज़रता है, अगर इस मरहले से कामयाबी के साथ गुज़र गया तो उसने अपनी ज़िंदगी बामुराद बना ली वर्ना नाकाम रहा दारुल अमल इस मानी में कि ये ज़िंदगी सिर्फ़ अमल के लिए है।  दारुल जज़ा या दारुल मकाफ़ात वो दूसरा जहां है जो मरने के बाद हमारे सामने आने वाला है। अच्छे आमाल होंगे तो अच्छा सिला मिलेगा, और बुरे आमाल होंगे तो बुरे नताइज सामने आयेंगे।  अच्छे आमाल के लिए ज़रूरी है कि आदमी अल्लाह ताला की बख़्शी हुई ज़िंदगी उसके हुक्म के मुताबिक़ और उसकी रज़ा के लिए जीए। जहां तक मसाइब और मुश्किलात का ताल्लुक़ है अल्लाह ताला अपने बाज़ बंदों को अपनी हिक्मत के तहत मुसीबतों और परेशानियों में मुब्तेला करता है। लेकिन इस का ये मतलब नहीं कि आदमी घबरा जाय, मायूस हो जाए, और ज़िंदगी से राहे फ़रार इख़्तियार कर के मौत की आग़ोश में चला जाय। क़ुराने करीम ने मसाइब के वक़्त सब्र की तलक़ीन की है, सब्र एक ऐसी हक़ीक़त है जिसके ज़रीए इंसान बड़ी से बड़ी मुसीबत को ज़ेर कर सकता है और बड़ी से बड़ी मुश्किल पर क़ाबू पा सकता है।

इरशाद फ़रमायाः हम ज़रूर तुम्हारी आज़माईश करेंगे किसी क़दर ख़ौफ़ में, और माल व जान और फलों के नुक़्सान में मुब्तेला करके, आप ख़ुश ख़बरी सुना दीजिए ऐसे सब्र करने वालों को कि जब उन पर कोई मुसीबत पड़ती है तो वो कहते हैं कि हम अल्लाह के हैं और अल्लाह की तरफ़ हमें वापिस जाना है (अल-बक़राः 155-156)। क़ुराने करीम में नव्वे जगहों पर सब्र का ज़िक्र आया है और सोला तरीक़ों से इसकी तलक़ीन की गई है, जिससे इसकी अहमीयत का अंदाज़ा होता है।  ये आयत जो अभी आपने पढ़ी आज़माईश और सब्र की दो हक़ीक़तों को मुनकशिफ़ करती है, एक तरफ़ तो अल्लाह ताला ये फ़रमाते हैं कि हम अपने बंदों को मुख़्तलिफ़ तरीक़ों से आज़माईश में मुब्तेला करेंगे, किसी को दहशत और ख़ौफ़ में मुब्तेला करेंगे, किसी को जानी व माली नुक़्सानात की आज़माईश से गुज़ारेंगे, किसी को खेतों और बाग़ों में पैदावार की कमी की मुसीबत का सामना करना पड़ेगा, दूसरी तरफ़ ये इरशाद है कि कामयाब वही होंगे जो सब्र करेंगे, हर मुसीबत को अल्लाह ताला की तरफ़ से समझ कर राज़ी बरज़ा रहेंगे। ऐसे ही लोगों के लिए रहमतें हैं, हिदायत और मग़फ़िरत है।  सब्र को कामयाबी की कुंजी क़रार दिया गया है, इसके बगै़र आदमी किसी मक़सद में कामयाब नहीं हो सकता।  सब्र से मुसीबत हल्की पड़ जाती है। सब्र के वाजिब होने पर इजमाए उम्मत है एक हदीस में सब्र को निस्फ़ ईमान क़रार दिया गया है। बुख़ारी शरीफ़ की एक हदीस में है:

सईलर रसूलल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम अनल ईमान फ़क़ालस सब्र वलसमाहतः (मस्नद अबी यअलीः 3/80, रक़मुल हदीसः 1854) सरकारे दो आलम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की ख़िदमत में अर्ज़ किया गया कि ईमान क्या है, फ़रमाया सब्र और सख़ावत।

इस हदीस को जो उम्मुल कलम में से क़रार दिया गया है, क्योंकि इसमें ईमान की हक़ीक़त बहुत ही जामईयत और इख़्तेसार के साथ वाज़ेह की गई है। आदमी के नफ़्स पर दो ही चीज़ों की पाबंदी हो सकती है, एक तवज्जो कि जो कुछ उससे मांगा जाय उसको पेश कर दे और जिस चीज़ से मना किया जाय उस से रुक जाय। बहरहाल सब्र एक ऐसा हथियार है जिसके ज़रिए आदमी ज़िंदगी में पेश आने वाली बड़ी से बड़ी मुसीबत का आसानी के साथ मुक़ाबला कर सकता है उल्मा ने लिखा है कि मसाइब व शदाइद के मुक़ाबले सब्र करने में तीन चीज़ें मुआविन साबित हो सकती हैं, एक ये कि आदमी को आख़िरत की बेहतर जज़ा का यक़ीन हो, ये यक़ीन जितना बढ़ेगा उसी क़दर मुसीबतों को बर्दाश्त करना आसान हो जाएगा, दूसरे ये कि उसके अंदर इतना हौसला होना चाहिए कि वो मसाइब के ख़ात्मे और राहत व कुशादगी हासिल होने का इंतेज़ार कर सकता हो, इंतेज़ार जिस क़दर ज़्यादा होगा उसी क़दर सब्र करने में लज़्ज़त हासिल होगी, तीसरे ये कि उसके दिल में अल्लाह ताला की बेशुमार नेमतों का इस्तेहज़ार हो, और वो सोचे कि अगर कुछ मसाइब उसकी तक़दीर में हैं तो क्या हुआ बे शुमार नेमतें भी मयस्सर हैं, ये भी हो सकता था कि मुसीबतें ही मुसीबतें होतीं राहतों का नामोनिशान भी ना होता, अगर आदमी सब्र करे और ये तदबीरें इख़्तियार करे तो उम्मीद ही नहीं यक़ीन है कि वो ख़ुदकुशी का रास्ता अपनाने के बजाय ज़िंदगी के हुस्न व जमाल से लुत्फ़ अंदोज़ होना ज़्यादा पसंद करेगा।

URL for English article: http://newageislam.com/islamic-sharia-laws/growing-trend-of-suicides--how-and-why-islam-totally-prohibits-suicides-/d/5261

URL for Urdu article: https://newageislam.com/urdu-section/growing-trend-suicides-how-islam/d/5272

URL for this article: https://newageislam.com/hindi-section/growing-trend-suicides-how-islam/d/7739


Loading..

Loading..