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Burning the Quran Cannot Eradicate It कुरआन करीम जलाने से मिट नहीं सकता


मौलाना नदीमुल वाजिदी

०७ मई २०१२

बदनामे ज़माना मलउन अमेरिकी पादरी टेरी जोंज़ ने एक बार फिर अपनी खबासत का मुजाहेरा करते हुए कुरआन करीम की बे हुर्मती की है, और इस मुकद्दस आसमानी सहिफे को नज़रे आतिश कर के दुनिया भर के मुसलमानों के दिलों में मजरुह किया है, उस शैतान सिफत पादरी ने इससे पहले भी २० मार्च २०११ को यह मकरूह हरकत की थी, और तीस पादरियों की मौजूदगी में कुरआन करीम के नुस्खे को आग के हवाले किया था, उस समय क्योंकि इसके खिलाफ अमेरिकी सरकार ने कोई कार्यवाही नहीं की थी, उससे हौसला पाकर उस कमबख्त ने दुबारा यह हरकत की है, इस घटना का सबसे अहम पहलु यह है कि उस शख्स ने यह बदबख्ताना कार्यवाही किसी बंद कमरे में अंजाम नहीं दिया, उसने यह गलीज़ हरकत खुलेआम की है, बल्कि अमेरीकी जरीदे क्रिस्चन पोस्टकी एक रिपोर्ट के अनुसार टेरी जोंज़ ने अपने नापाक मनसूबे पर मल करने से पहले अमेरिकी काउंटी गैन्सवायल फायर डिपार्टमेंट से बाकायदा इजाज़त तलब की थी, उस डिपार्टमेंट के चीफ आफीसर जीने प्रिंस ने यह इजाज़त दी थी कि पादरी, अपने चर्च डोर वर्ल्ड आउट एच सेंटर के बाहर कुरआन करीम आग के हवाले कर सकता है, हालांकि अब यह कहा जा रहा है कि यह इजाज़त केवल अलाव रौशन करने के लिए दी गई थी, यह इजाज़त किसी मज़हबी किताब को जलाने की नहीं थी मगर यह सिर्फ उजरे लंग है, अगर इजाज़त केवल अलाव रौशन करने की थी तो चर्च की तरफ जाने वाले तमाम रास्तों पर इंतेजामिया की सख्त निगरानी का क्या मतलब था, और अगर यह स्वीकार भी कर लिया जाए कि इजाज़त केवल अलाव रौशन करने की दी गई थी तो पादरी टेरी जोंज़ की हरकत से साबित हो जाता है कि उसने कुरआन पाक का नुस्खा जला कर कानून की खिलाफ वर्जी की है।

इस जुर्म की उस शख्स को सज़ा क्यों नहीं दी गई, उस पर केवल २७० डॉलर का मामूली जुर्माना किया गया है वह भी इसलिए कि उसने आग जला कर माहौलियात को नुक्सान पहुंचाने की कोशिश की है, कुरआन करीम को नज़रे आतिश करने के मंजर को सीधे इंटरनेट पर दिखलाया गया, ऐसी तस्वीरें भी सामने आई हैं जिन में बहुत से कैमरों बरदार लोग वाकिया से पहले के मंजर की वीडियों ग्राफी करते हुए नज़र आ रहे हैं, इन हालात में यह कहना कि पादरी ने यह काम अचानक किया है बिलकुल गलत है, इससे भी अधिक अफसोसनाक बात यह है कि इस घटना से पुरे इस्लामी दुनिया में इज़्तिराब की लहर दौड़ गई, अमेरिका में रहने वाले बीस लाख बेचैन हो उठे लेकिन अमेरिकी इंतेजामिया के कानों पर जूं तक ना रेंगी, पेंटा गौन ने केवल यह वार्निंग देने पर इक्तिफा किया कि टेरी जोंज़ की इस रकीक हरकत के नताएज अफगानिस्तान में अमेरिकी फौजों पर तालिबान के हमलों की सूरत में बार आमद होगे, अमेरिकी चर्च वाबिस्ता पादरियों ने टेरी जोंज़ की इस हरकत पर अपनी नापसंदीदगी ज़ाहिर की है मगर वेटिकन सिटी और उसके सरबराह पोप बेनीडिक्ट ने अब तक कोई शब्द भी निंदा का नहीं कहा, जिससे साबित होता है कि टेरी जोंज़ को अमेरिकी इंतेजामिया और मसीही मज़हब के मरकज़ की जेवफ़ कलफ का एक बयान अवश्य प्रकाशित हुआ है जिसमें उन्होंने मलउन पादरी के इस अमल को बैनुल मज़ाहिब सद्भाव और रवादारी के सिद्धांतों के खिलाफ करार दिया है, उन्होंने मुसलमानाने आलम से अपील की है कि वह इस स्वयम्भू पादरी की नापाक हरकत पर कोई ध्यान ना दें, क्योंकि इसाइयत से संबंध रखने वाले मज़हबी रहनुमाओं का टेरी जोंज़ से कोई संबंध नहीं है और वह कलीसा की नुमाइंदगी नहीं करता, माना कि कलीसा से वाबिस्ता शख्सियतें टेरी जोंज़ की निंदा कर रही हैं।

सवाल यह है कि निंदा से उन ज़ख्मों का इंदिमाल हो जाएगा जो दुनिया भर में फैले हुए अरबों मुसलमानों के दिल जिगर में पेवस्त हो गए हैं, हकीकत यह है कि अगर मुसलमानों का यह अकीदा ना होता कि कुरआन करीम आसमानी किताब है, इसकी हिफाज़त खुद अल्लाह करने वाला है और यह कि इस तरह की हरकतों से कुरआन करीम का तकद्दुस पामाल नहीं होता, आसमान पर थूकने का खुद अपने मुंह पर गिरता है अगर मुसलमानों में सब्र व तहम्मुल ना होता तो दुनिया भर में आग लग जाती और खुद अमेरिका आग के जहन्नम में बदल जाता, मुसलमानों ने विरोध तो किया, अपने गम और गुस्से का इज़हार भी किया, लेकिन ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे इस्लाम के दुश्मनों को उंगली उठाने का मौक़ा मिले। अलबत्ता मुस्लिम देशों के सरबराहों की खामोशी और बेहिसी पर जरुर अफ़सोस होता है, क्या उनमें इतना भी हौसला नहीं कि वह अमेरिकी हुकूमत के सफ़ीरों को तलब कर के यह बतला देते कि पादरी की हरकत माफ़ी के काबिल नहीं है अगर उसे गिरफ्तार ना किया गया और उस पर मुकदमा ना चलाया गया तो हम अमेरिका से सिफारती संबंध खत्म करने पर मजबूर होंगे, क्योंकि उन्हें कुरआन अज़ीज़ से अज़ीज़ तो वह कुर्सी है जिस पर वह बैठे हुए हैं और उस कुर्सी का इस्तेह्काम अमेरिका की खुशनूदी पर आधारित है।

कुरआन करीम ने चौदा सौ साल पहले ही यह हकीकत सामने कर दी थी कि यहूद व नसारा कभी मुसलमानों के दोस्त नहीं हो सकते, इसी लिए समय समय पर इस तरह के घटना रोनुमा (घटित) होते रहते हैं, इन दोनों धर्मों के शिद्दत पसंदों को कुरआन करीम से जिस कद्र दुश्मनी है उतनी दुश्मनी उन्हें किसी चीज से नहीं है, ब्रिटेन के एक पूर्व मंत्री ग्लैड स्टोन ने अपनी पार्लियामेंट में कुरआन करीम का निस्खा हात में ले कर कहा था कि जब तक यह किताब दुनिया में मौजूद है लोग सभी नहीं हो सकते, अखंड भारत के राज्य यूपी के गवर्नर विलियम म्योर पादरी भी कहा करता था कि दुनिया में इंसानियत की दुश्मन दो चीजें हैं एक मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तलवार और दुसरा कुरआन, पश्चिमी दुनिया आज भी इस बदगुमानी में मुब्तिला है, और इस ज़माने में भी जब कि इस्लाम एक मज़हब की हैसियत से लगातार विकास कर रहा है और खुद मगरिब इसकी आगोशे रहमत में पनाह ले रहा है इंसानियत के दो महान मददगारों, सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और किताबे हिदायत कुरआने अज़ीम से अजली दुश्मनी बांधे हुए है, हालांकि इस दुश्मनी से ना सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बे गुबार ज़ात पर कोई हर्फ़ आ सकता है और ना कुरआन कुरआन करीम का तकद्दुस मजरुह हो सकता है।

हाँ यह हकीकत भी सामने रहनी चाहिए कि मगरिब कुरआन करीम के खिलाफ कितना ही प्रोपेगेंडा क्यों ना कर ले इस पर तंग नज़री, तशद्दुद पसंदी, और दहशतगर्दी के कितने ही आरोप क्यों ना लगाए वह इस किताब की ना असर अंगेजी को प्रभावित कर सकता है और ना इसको हर्फे गलत की तरह मिटा सकता है, या बाइबिल, इंजील या ज़बूर नहीं है जिनको लफ्ज़ी और मानवी तहरीफात के जरिये नाकाबिले एतिबार बना दिया गया है, यह कुरआन है जिसकी हिफाज़त का वादा खुद अल्लाह पाक ने किया है, अगर इसकी हिफाज़त की जिम्मेदारी इंसानों पर दाल दी जाती तो इस्लाम के दुश्मन कब के अपनी साजिशों में सफल हो चुके होते, मगर चौदा सौ साल से यह किताब अपने एक एक शब्द, एक एक हर्फ, एक एक नुक्ते, अपने प्रसंग, अपनी सूरतों की तरतीब के साथ इसी तरह बाकी है जिस तरह नाज़िल हुई थी, दुश्मनों ने हर दौर में इसकी हिफाज़त के खुदाई निज़ाम को चैलेंज किया है लेकिन हमेशा मुंह की खाई है।

जिस समय कुरआन करीम नाज़िल हो रहा था, और लोग इसकी पाकीज़ा आयतें सुन सुन कर इस्लाम में दाखिल हो रहे थे उस समय भी मुशरेकीने मक्का की ख्वाहिश बल्कि कोशिश यह रहती थी कि लोग इस किताबे हिदायत की तरफ आकर्षित ना हों, इसकी तरफ कान ना लगाएं, क्योंकि ऐसा संभव ही नहीं है कि कोई शख्स दिल लगा कर कुरआन सुने और उसकी असर अंगेजी से महफूज़ रह जाए, मुशरेकीने मक्का कहा करते थे: और यह काफिर कहते हैं कि इस कुरआन को सुनों ही मत और इसके बीच में शोर मचा दिया करो शायद तुम ही ग़ालिब रहो (हा मीम सजदा:२६) वह हमेशा इस कोशिश में रहते थे कि कुरआन में परिवर्तन हो जाए, किसी तरह इसके अलफ़ाज़ और कलेमात में तहरीफ़ हो जाए ताकि अल्लाह का सहीह सहीह पैगाम लोगों तक ना पहुँच सके।

और जब उनके सामने हमारी आयतें पढ़ी जाती हैं जो बिलकुल साफ़ साफ़ हैं तो यह लोग जिनको हमारे पास आने की उम्मीद नहीं है यूँ कहते हैं कि इसके सिवा कोई दुसरा कुरआन लाइए या इसमें कुछ तरमीम कर दीजिये आप कह दीजिये कि मुझसे यह नहीं हो सकता कि मैं अपनी तरफ से इसमें तरमीम कर दूँ बस मैं तो उसी का इत्तेबा करूँगा जो मेरे पास वही के माध्यम से पहुंचा है (युनुस:१५) आज भी यह कोशिशें की जा रही हैं, कुरआन करीम के खिलाफ इस दुश्मनी का सिलसिला ना खत्म हुआ है और ना खत्म होगा, सदियाँ गुज़र गईं और बहुत सी सदियाँ गुजरेंगी, मगर कुरआन करीम का एक एक शब्द इसी तरह रौशन, पाएदार, और असर अंगेज़ रहे गा जिस तरह कल था और जिस तरह आज है, कुरआन महफूज़ है, उसे ना पानी में बहा कर मिटाया जा सकता है और ना आग में जला कर खत्म किया जा सकता है, जिस समय कुरआन करीम नाज़िल हो रहा था उसी वक्त यह आयत भी नाज़िल हुई थी: इन्ना नहनु नज्ज़ल्नज्ज़िकरा व इन्ना लहू लहाफिज़ून (अल हुज्र:९) हम ही ने कुरआन को नाज़िल किया है और हम ही इसकी हिफाज़त करने वाले हैं।

मुफ़स्सेरीन ने लिखा है कि कुरआन की ने लिखा है कि कुरआन की हिफाज़त का वादा अल्लाह ने खुद किया है, जबकि तौरात और इंजील की हिफाज़त की ज़िम्मेदारी खुद उन लोगों पर डाली है जिनके पैगम्बरों पर यह किताब नाज़िल की गईं, कुरआन करीम में है: بِما استحفِظُوْ امِنْ کِتٰبِ اللہِ وَکاَ نوا­­­­­ عَلَیہِ شہَدَ آउनको इस किताबुल्लाह की हिफाज़त का हुक्म दिया गया था और वह इसके इकरारी हो गए थे (अल मायदा: ४४) अर्थात यहूद व नसारा को किताबुल्लाह तौरेत व इंजील की हिफाजत की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है और खुद ही इस पर गवाह भी हैं, यह यहूद व नसारा अपनी ज़िम्मेदारी पुरी तरह अदा नहीं कर सके, और धीरे धीरे यह किताबें तहरीफ़ के मरहलों से गुजरती हुईं मस्ख व मोह्तरिफ हो कर बेकार हो गईं, इसके उलट कुरआन करीम के बारे में अल्लाह ने खुद फरमाया कि हम इसकी हिफाज़त करने वाले हैं, अल्लाह ने अपने इस वादे की इस तरह पास दारी की कि आज चौदा सौ सदियाँ गुज़र गईं मगर मुसलमानों की अमली कोताही और गफ़लत के बावजूद यह किताब किसी छोटे परिवर्तन के बिना जूँ की तूँ मौजूद है, हर ज़माने में लाखों मुसलमान जवान, बूढ़े, औरत और मर्द ऐसे मौजूद रहते हैं जिनके सीनों में कुरआन करीम महफूज़ रहता है, किसी बड़े दे बड़े आलिम की यह हिम्मत नहीं होती कि कुरआन करीम को गलत पढ़ दे, अगर किसी ने गलती से भी गलत पढ़ा तो उनको टोकने वाले कोई रिआयत किये बिना फ़ौरन टोक भी देते हैं, कुरआन करीम की हिफाज़त का यह निज़ाम इसी तरह कायम है, और इसी तरह कायम रहेगा।

अगर हम हिफाजते कुरआन के मामले में गौर करें तो इसके कुछ और काबिले गौर पहलु हैं, सबसे पहली बात तो यह है कि अल्लाह पाक ने कुरआन कर्मम एक ऐसी उम्मत पर नाज़िल किया जो अपना अदबी और तारीखी सरमाया दिल व दिमाग में महफूज़ रखने की आदी थी, कुरआन की आयतें दफअतन नाज़िल नहीं की गईं, क्योंकि इस तरह उनको सीने में महफूज़ करना दुश्वार होता बल्कि इनका नुज़ूल धीरे-धीरे हुआ, यहाँ तक कि तेईस साल में सिलिसला नुज़ूल मुकम्मल हुआ, हालांकि कुफ्फारे मक्का को इस तदरीजी नुज़ूल पर एतेराज़ भी हुआ, मगर कुरआन करीम में उनके एतेराज़ का हकीमाना जवाब दिया गया, फरमाया: और काफिर लोग यूँ कहते हैं कि उन पैगम्बरों पर यह कुरआन एक ही मर्तबा क्यों नहीं नाज़िल किया गया इसे तदरीजन हमने नाज़िल किया है ताकि हम इसके जरिये से आपके दिल को कवी रखें और इसी लिए हम ने इसको बहुत ठहरा ठहरा कर उतारा है (अल फुरकान:32) एक जगह फरमाया: और कुरआन में हमने जाबजा फज़ल रखा ताकि आप इसको लोगों के सामने ठहर ठहर कर पढ़ें और हमने इसको उतारने में भी तदरीजन उतारा (अल इसरा: १०६) अल्लाह पाक ने कुरआन करीम की आयतों को इतना आसान, मीठा और आकर्षक बनाया कि लोगों के लिए उन्हें याद करना, याद रखना आसान हो गया, यहाँ तक कि छोटे छोटे बच्चे भी बिना तकल्लुफ इसे याद कर लेते हैं, और जब चाहते हैं फर फर पढ़ देते हैं, कुरआन करीम की यह विशेषता बार बार बयान की गई: और हमने कुरआन को नसीहत हासिल करने के लिए आसान कर दिया है सो क्या कोई नसीहत हासिल करने वाला है

(अलकमर:१७) कुरआन करीम की हिफाज़त का पहला ज़रिया इसे अल्लाह ने अपने फरिश्ते हज़रत जिब्राइल अलैहिस्सलाम के जरिये अपने आखरी पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर नाज़िल किया और इसका एक एक शब्द आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सीने में महफूज़ कर दिया, जिस वक्त कुरआन करीम नाज़िल हो रहा था आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की यह कोशिश रहती थी कि किसी तरह आप जल्दी से इसे जुबान से अदा कर लें और याद कर लें, इस खौफ से की कहीं कोई शब्द याद करने से ना रह जाए, आप जल्दी जल्दी जुबान मुबारक को हरकत दिया करते थे, इस पर अल्लाह पाक ने सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को यह इत्मीनान दिला दिया कि और ऐ पैगम्बर आप कुरआन पर अपनी जुबान ना हिलाया कीजिये ताकि आप इसको जल्दी ज्स्ल्दी लें कि हमारे जिम्मे है आपके कल्ब में इसका जमा कर देना और आप की जुबान से इसका पढ़वा देना (अल कुबामा: १६-१७) हाफ़िज़ इब्ने कसीर ने लिखा है कि इस आयत के जरिये सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को शिक्षा दी गई कि वही किस तरह ली जाए, किस तरह इसे सुनाया जाए, गोया आपका काम गौर से सुनना है, अल्लाह पाक खुद आपके सीने मुबारक में इसको महफूज़ कर देगा, और आपकी जुबान मुबारक से इसकी अदायगी आसान बना देगा, और आपको इसकी तफ़सीर व तशरीह पर कादिर कर देगा, (तफ़सीर इब्ने कसीर: ५७७/४) सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का सीना मुबारक हालांकि मोहब्बते वही ए कुरआनी था और दुनिया में सबसे पहले आप बाकायदा किसी मकतब में पढ़े हुए नहीं थे, और ना किसी उस्ताद के शागिर्द थे, अल्लाह ही आपके मुअल्लिमे हकीकी थे, और अल्लाह ही ने आप को सीने मुबारक हिफ्ज़े कुरआनी के लिए कुशादा कर दिया था, इसके बावजूद आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हर साल रमजानुल मुबारक में हज़रात जिब्राइल अलैहिस्सलाम के साथ कुरआन करीम का विर्द किया करते थे, एक हदीस में है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम लोगों में सबसे ज़्यादा सखी थे और आप की यह सखावत रमजान में उस वक्त और बढ़ जाती थी जब आपकी मुलाक़ात हज़रात जिब्राइल अलैहिस्सलाम से होती थी, आप रमज़ान की हर शब में हज़रत जिब्राइल अलैहिस्सलाम से मुलाक़ात फरमाते और कुरआन करीम का दौर फरमाते (सहीह बुखारी: ४७०/६, रक्मुल हदीस :१७६९) जब तक आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दुनिया में तशरीफ फरमा रहे, कुरआन करीम के साथ आपके इश्तिगाल का यही आलम रहा, आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम बजाते खुद सहाबा रज़िअल्लाहु अन्हु को कुरआन करीम पढ़ाया करते थे, हज़रात अब्दुल्लाह इब्ने मसूद रज़ीअल्लाहु अन्हु रिवायत फरमाते हैं कि मैं ने सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़ुबाने मुबारक से सुन कर कुरआन करीम की सत्तर सूरतें हिफ्ज़ की हैं (मुसनद अहमद बिन हम्बल रहमतुल्लाह अलैह: ४५२/७, हदीस नम्बर:३४१७)।

जब कोई शख्स इस्लाम कुबूल करता तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इसको कभी खुद से कुरआन सिखाते और कभी अपने असहाब को हुक्म फरमाते और वह यह खिदमत अंजाम देता, हज़रात उबादा इब्ने सामित रज़ीअल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि एक बार रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक शख्स को कुरआन सिखलाने के लिए मेरे हवाले किया वह शक्स हमारे साथ रात का खाना खाता और मैं इसे कुरआन करीम पढ़ता (मुसनद अहमद बिन हम्बल रहमतुल्लाह: २४९/४६, रकमुल हदीस: २१७०३) कुरआन करीम के हिफ्ज़ के लिए सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इस एहतिमाम और दिलचस्पी को देख कर खुद सहाबा रज़ीअल्लाहु अन्हु भी हिफ्ज़ कुरआन में एक दुसरे से सबकत ले जाने की कोशिश फरमाते थे, हर रोज़ कुरआन करीम जितना भी नाज़िल होता वह सब सहाबा किराम रज़ीअल्लाहु अन्हु फ़ौरन याद कर लेते, दुनिया की कोई मश्गुलियत इस राह में माने ना होती, हज़रत उमर इब्ने खत्ताब रज़ीअल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि मैं और मेरे एक पड़ोसी ने एक एक दिन की बारी मुकर्रर कर ली थी, एक दिन में हाज़िर हो कर इस दिन नाज़िल होने वाली आयतें याद कर के इसको सूना देता, और दुसरे दिन व इसी तरह करता (मुसनद अहमद बिन हम्बल रहमतुल्लाह अलैह: २२१/१, रकमुल हदीस: २१७) कुरआन करीम से सहाबा कराम रज़ीअल्लाहु अन्हु को इतना शगफ़ था कि बहुत से सहाबा रज़ीअल्लाहु अन्हु रात रात भर कुरआन करीम की तिलावत करते रहते थे, ऐसे ही एक सहाबी थे हज़रात अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन आस रज़ीअल्लाहु अन्हु, उनकी अहलिया ने सरकार दो आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत में हाज़िर हो कर शिकायत की तो सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन सहाबी रज़ीअल्ल्लाहू अन्हु से पूछा कि तुम किस तरह करते हो, फरमाया मैं हर रोज़ एक कुरआन शरीफ खत्म कर लेता हूँ आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि महीने में तीन रोज़े रखो, और महीने में एक खत्म करो, अब्दुल्लाह बिन उमर बिन आस रज़ी अल्लाहु अन्हु हिम्मत वाले इंसान थे, उन्होंने सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत में अर्ज़ किया कि मैं इससे ज़्यादा कर सकता हूँ आप ने उन्हें एक दिन छोड़ कर रोज़ा रखने की और हफ्ते में एक कुरआन खत्म करने की इजाज़त दे दी (सहीह बुखारी:४७७/१५), हदीस नम्बर: ४६४६)।

हज़रत उस्मान ज़ुन्नुरैन रज़िअल्लहु अन्हु की अहलिया हज़रात नायला फरमाती हैं कि वह रोजाना रात को इबादत करते और एक ही रिकात में पूरा कलाम पाक खत्म कर देते (अल मुअज्मुल कबीर लिल तिबरानी : १/५५) हज़रात उबई बिन काब सात रातों में एक कलाम पाक खत्म किया करते थे, इसी तरह हज़रात तमीम दारी रज़ीअल्लाहु अन्हु सात दिन में एक बार और कभी कभी एक रात में भी कुरआन करीम खत्म कर लेते थे । (फ़ज़ाइले अल कुरआन इब्ने कसीर: १/१६५) सहाबा किराम रज़ीअल्लाहु अन्हु के सीनों में कुरआन करीम के अलफ़ाज़ व मुआनी पुरी तरह रासिख हो जाएं इस सिलसिले में सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का मनहज दरासी यह था कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सहाबा किराम रज़ीअल्लाहु अन्हु के सामने दस दस आयत तिलावत फरमाते और जब तक वह दस आयतें सहाबा रज़ीअल्लाहु अन्हु को याद ना हो जातीं और जब तक उन दस आयतों की तशरीह सहाबा किराम रज़ीअल्लाहु अन्हु के सामने ना आ जाती उस समय तक आगे ना बढ़ते (किताबुल सोअबा फिल किरात, पृष्ठ: ६९) कभी कभी आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सहाबा कराम रज़ीअल्लाहु अन्हु से कुरआन करीम सूना भी करते थे, हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने मसूद रज़ीअल्लाहु अन्हु रिवायत करते हैं कि मैं एक मर्तबा सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया हमें कुछ पढ़ कर सुनाओ मैंने अर्ज़ किया या रसूलुल्लाह! मैं आपको सुनाऊं हालांकि कुरआन तो आप पर नाज़िल हुआ है, फरमाया मेरा दिल चाहता है कि मैं कुरआन करीम दूसरों से भी सुनूँ हुक्म की तामील में मैंने सुरह निसा की तिलावत शुरू की जब मैं इस आयत पर पहुंचा: فَکَیْفَ اِ ذَا جِئنَا مِن کُلِّ أُ مَّتہِ بِشَھِیدِِ وَ جِئْنَا بِکَ عَلَیٰ ھَؤُ لآَ شَھِیدًا۔(النسا :41 तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया बस रुक जाओ, उस वक्त आपकी आँखों से आंसू बह रहे थे (सहीह बुखारी: १४/७६, हदीस नम्बर: ४२१६)।

बशुक्रिया: रोज़नामा सहाफत, नई दिल्ली

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