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Hindi Section ( 9 Feb 2022, NewAgeIslam.Com)

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How Do We Deal With The Oppressed People Today, And How Should We Treat Them In The Future? समाज के दबे कुचले वर्गों के साथ हमारा तर्ज़े अमल क्या है और कैसा होना चाहिए?

मौलाना खालिद सैफुल्लाह रहमानी

उर्दू से अनुवाद न्यू एज इस्लाम

4 फरवरी 2022

कुरआन मजीद के अध्ययन से मालूम होता है कि अंबिया जब भी किसी कौम में आए, तो आम तौर पर उनका साबका दो वर्गों से पेश आया, एक मलाए कौमअर्थात कौम के सरबराह लोग, जिनको सम्मानित और बुलंद मर्तबत समझा जाता, दूसरे वह लोग जिनको कुरआन ने अराज़ले कौमया मुसतज़अफीनसे ताबीर किया है, अर्थात कौम के मामूली और कमज़ोर लोग, जिनको समाज में बेवज़न और कम हैसियत ख्याल किया जाता है। हर नबी की दावत अपनी कौम में एक अजनबी दावत की हैसियत से उभरती थी, कौम के सर बरआवुर्दा लोग इसके विरोध पर कमर बस्ता हो जाते थे; अलबत्ता उनमें जो लोग हकीकत पसंद और नेक खू होते थे, वह अपनी बड़ाई को कुर्बान कर के नबी की दावत पर लब्बैक कहते थे; लेकिन शुरू में उनकी संख्या बहुत कम होती थी। जो लोग मामूली समझे जाते उनको दावते हक़ कुबूल करने में कोई आर न होता, वह पहल करते और फिर ज़ुल्म व जोर की भट्टी में तपाए भी जाते, गालिबन यह भी निज़ामे गैबी के तहत होता। चूँकि वह पहले से ज़ुल्म व सितम का निशाना होते या उनकी कैफियत मज़लूम व सितम रसीद की होती; इसलिए उनके लिए ज़ुल्म व ज़्यादती और तह्कीर व तजलील का रवय्या किसी दर्जे में काबिले बर्दाश्त होता।

मुसलमानों को दूसरी कौमों के साथ एकजुट हो कर अन्याय का मुकाबला करने की जरूरत

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हक़ की दावत को स्वीकार करने में कौम के सरदार ही असल रुकावट बनते हैं, मक्का वालों ने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का कितना विरोध किया, इसलिए ग़ैबी निज़ाम के तहत गजवा ए बद्र में तमाम मक्का के सरदार जमा कर दिए गए, और वह सब बद्र में हलाक हुए, इसी को रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सहाबा से फरमाया कि मक्का ने अपने जिगर के टुकड़े तुम्हारे सामने डाल दिए हैं। बद्र के बाद अहले मक्का के दो ही काबिले ज़िक्र सरदार बाकी रह गए, अबू सुफियान बिन हर्ब और सफवान बिन उमय्या, और उन दोनों ने मक्का फतह होने के बाद इस्लाम के सामने सर झुका दिया। मदीना में जो इस्लाम की इशाअत आसानी के साथ और तेज़ रफतारी से हुई, तो इसकी वजह वही थी, जिसकी तरफ आयशा रज़ीअल्लाहू अन्हा ने इशारा फरमाया है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बेअसत से पहले ओस व खज़रज की खाना जंगी में अब्दुल्लाह बिन उबई के अलावा पहले सफ के तमाम कायदीन अजल का लुकमा बन चुके थे; इसलिए यहाँ इस्लाम के खिलाफ झड़प करने वाली कोइ संगठित ताकत मौजूद नहीं थी। अब्दुल्लाह बिन उबई ने अपने अंदरूनी निफाक के जरिये मुसलमानों को नुक्सान पहुंचाने की कोशिश की; लेकिन मदीने के अंसार पर ईमान का नशा चढ़ चुका था कि वह किसी और चीज को खातिर में नहीं लाते थे, गोया खुदा के ग़ैबी निज़ाम के तहत बेअसे मुहम्मदी से पहले ही मदीने के सरदार रुखसत हो चुके थे और मदीना की सरज़मीन इस्लाम के लिए नर्म हो चुकी थी। यही सूरते हाल विभिन्न नबियों के साथ पेश आई है।

हज़रत नूह ने जब अपनी कौम को हक़ की तरफ बुलाया तो यही (कमज़ोर और मज़लूम लोगों का) तबका उनकी दावत पर ईमान लाया। जो लोग उनके दुश्मन थे, वह कहते थे कि: क्या हम तुम पर ईमान ले आएं हालांकि तुम्हारी पैरवी (समाज के) बहुत निचले और तुक्ष (वर्ग के) लोग कर रहे हैं। (अशशुअरा: 111) शैखुल हिंद मौलाना महमूद हसन देवबंदी ने अरजलूनका अनुवाद कमीनासे किया है, इससे अंदाज़ा किया जा सकता है कि यह लोग उस वर्ग को कितनी हिकारत की नजर से देखते थे। कुरआन ने एक और जगह कौमे नूह की इस मज़ाक उड़ाने वाली बातचीत का उल्लेख किया है कि कौम के सरदारों ने हज़रत नूह से कहा: हमें तो तुम हमारे अपने ही जैसे एक इंसान दिखाई देते हो और हमने किसी (इज्जतदार व्यक्ति) को तुम्हारी पैरवी करते नहीं देखा सिवाए हमारे (समाज के) सतही राय रखने वाले पस्त व हकीर लोगों के। (हूद: 27) हम जिस देश में रहते हैं, उसमें कुछ लोगों ने अपने आपको मलाए कौमबना रखा है, और लोगों के जहन में यह अकीदा बसा दिया है कि वह फरमां रवाई और हुक्मरानी ही के लिए पैदा किये गए हैं; क्योंकि उनकी पैदाइश खुदा के सरों और बाजुओं से हुई है, वह खुदा और बंदा के बीच वास्ता हैं। एक बहुत बड़ी कौम को उन्होंने पैदाइशी गुलाम बना रखा है, और उनके दिल व दिमाग में यह बात बिठा दी है कि वह नीच और कमतर हैं, वह दूसरों की खिदमत के लिए पैदा किये गए हैं।

पहला समूह ब्राह्मणों और ऊँची जात के लोगों का है जिनकी संख्या का अनुपात बहुत कम है; लेकिन वह देश में 65 प्रतिशत से भी अधिक प्रमुख पदों पर कब्ज़ा कर लेते हैं और सत्ता के दरो बाम पर उनका ऐसा कब्ज़ा है कि कोई पत्ता उनकी मर्ज़ी व मंशा के बिना हरकत नहीं कर पाता। यही कुरआन की इस्तेलाह में इस देश के मलाए कौम हैं, जिन का उमूमी मिजाज़ यही है कि जब तक हालात के हाथों मजबूर न हो जाएं न्याय और सच्चाई के सामने सर खमीदा नहीं होते। दूसरा वर्ग दलितका है। यह वही लोग हैं जिनके बारे में कुरआन में अर्जले कौमकी ताबीर आई है कि लोग उन्हें कमतर ख्याल करते थे। भारत में यह कौम हज़ारों साल से ज़ुल्म व जोर की चक्की में पिसी जा रही है और अत्यंत गैर इंसानी रवय्ये का शिकार है। अब जबकि राजनितिक मस्लेहतों के तहत किसी कदर उनकी आवभगत हो रही है, उन्हें सुरक्षा दिए जा रहे हैं, इलेक्शन के मौके पर उन्हें मनाने की कोशिश की जाती है, फिर भी सामाजिक ज़िन्दगी में वह एक सम्मानित कौम के मुकाम व मंसब हासिल करने में नाकाम हैं। अगर वह घड़े को हाथ लगा दें तो उस पानी को फेंक दिया जाता है, वह ऊँची जात के किसी व्यक्ति के बराबर बैठ कर खा नहीं सकते, इस देश में आला तरीन इन्तेज़ामी काबिलियत रखने के बावजूद जग जीवन राम देश के प्रधानमन्त्री नहीं बन सके; इस पुरी तफसील से हमारे पाठक आगाह हैं। पाठक यह भी जानते हैं कि उनके ताल्लुक से कितनी हिकारत का मुज़ाहेरा आम तौर पर किया जाता है और उनकी कितनी तजलील की जाती है।

जो लोग मज़लूम, दबे कुचले और दबाए हुए हों, उनकी मदद करना मुसलमानों के लिए केवल राजनितिक मसलेहत नहीं बल्कि दीनी और मिल्ली फरीज़ा है; अल्लाह पाक का इरशाद है: तुम्हें क्या हुआ कि तुम अल्लाह की राह में और उन लोगों के वास्ते नहीं लड़ते, जो मग्लूब हैं, मर्द, औरतें और बच्चे। (अन निसा: 75) कुरआन ने यहाँ मग्लूबों के लिए मुसतज़अफीनका शब्द प्रयोग किया है, अर्थात वह लोग जिनको दबाया गया है। अगर यह कहा जाए कि दलित भी इस देश के मुसतज़अफीनहैं तो शायद गलत नहीं हो; इसलिए उनको साथ लेना और उनके साथ साथ समाज के दूसरे कमज़ोर वर्ग के साथ हकीकी इंसाफ न करने वालों को साझा तदबीर के जरिये ज़ुल्म से बाज़ रखना हमारा इस्लामी फरीज़ा है। बदकिस्मती से हमने इस पर गंभीरता के साथ ध्यान नहीं दिया; बल्कि समाज के आला तबकात से प्रभावित हो कर उनके साथ कम या ज्यादा वही रवय्या इख्तियार किया; बल्कि हमने खुद अपनी कौम में भी कई दीवारें खड़ी कर लीं। कभी कभी यह दीवारें इतनी ऊँची हो जाती हैं कि पास का आदमी नज़र नहीं आता। इस स्थिति ने हमें दोहरा नुक्सान पहुंचाया है, एक तो इस देश में इस्लाम की दावत का काम न होने के दर्जे में है, अगर हम इस वर्ग से करीब होते तो दावत के बड़े मौके पैदा हो सकते थे। हर कौम में दावते हक़ की फितरी तरतीब यही रही है कि पहले ऐसे मुसतज़अफीन ने इस पर लब्बैक कहा है, फिर जब उनकी बहुत बड़ी संख्या ने इस्लाम कुबूल कर लिया तो आखिर में जो वर्ग उन्हें हकीर गर्दानता था, उसके लिए भी इस्लाम में दाखिल होने के सिवा चारा नहीं रहा। पहले मक्का के गुलामों ने इस्लाम कुबूल किया, फिर मदीना वालों ने, आखिर एक समय ऐसा आया कि मक्का के सरदार भी इस्लाम लाने पर मजबूर हुए।

इस्लाम की बुनियादी तालीम एक खुदा और वहदते इंसानियत है, अर्थात खुदा एक है और तमाम इंसानियत एक है। काले गोर, अरबी, अजमी की कोई तफरीक नहीं। एक ही मस्जिद में सबको खुदा की इबादत करनी है। जो शख्स दीन से ज़्यादा वाकिफ और अमल के एतिबार से ज़्यादा तकवे वाला हो, वह नमाज़ में इमाम होगा, चाहे किसी खानदान का हो उसकी चमड़ी का रंग कैसा भी हो। यह इंसानी बराबरी का तसव्वुर इतना फितरी और इंसाफ पर मबनी है कि जिन कौमों को नीच समझा जाता है वह उसको अपने लिए बड़ी रहमत बावर करती हैं। अगर इस अज़ीम इस्लामी उसूल को उन महरूम व मज़लूम लोगों के सामने पेश किया जाता तो संभव नहीं था कि वह इससे प्रभावित होते और इस अबरे रहमत के साए में आने से इनकार करते, मगर अफ़सोस कि हमने कभी गंभीरता से इस काम की तरफ ध्यान नहीं दिया। इससे दूसरा नुक्सान राजनितिक हुआ। आज राजनितिक एतिबार से हम खुद अछूत हो गए हैं, हमारी आबादी के अनुपात और कौमी इदारों में हमारी संख्या के बीच कोई निस्बत नहीं है।

अगर मुसलमान इस वर्ग को अपने साथ लेने में सफल हो जाते, जिनकी संख्या देश में साठ, पैसठ प्रतिशत है, तो अगर हम बादशाह नहीं होते तो बादशाह गर जरुर होते। जो लोग इस देश में मुसलमानों के खिलाफ फसाद कराते हैं और फसादात की मंसूबा बंदी करते हैं, वह कमज़ोर और सितम रसीदा वर्गों को ही अपना हथियार और आला कार बनाते हैं। अगर हम उन्हें करीब कर लें तो स्थिति बिलकुल अलग हो। वक्त अभी भी गया नहीं है, और हमें इस पहलु पर पूरी गहराई के साथ सोचने और गौर करने की जरूरत है। मौजूदा हालात में एक मंसूबे के साथ इस वर्ग को करीब करना चाहिए, मुसलमान नेताओं और राजनितिक संगठनों को चाहिए कि दलित राजनितिक और सामाजिक कायदीन के साथ बात चीत करें, उन्हें करीब करें और उनकी जहन साज़ी करें। यह वक्त की बहुत अहम जरूरत है। हमारा उद्देश्य अपने साथ उनका मफाद और उनके मफाद के साथ अपना मफाद जोड़ना हो कि दोनों ही कौमें आर्थिक तौर पर बेहद कमज़ोर और सामाजिक और राजनितिक एतिबार से हाशिये पर हैं। सामाजिक स्तर पर भी दलित वर्ग से राबता उस्तवार करना जरूरी है। मुसलमान ख़ुशी व गम के मौकों पर ऐसी तकरीब रखें, जिनमें उन्हें दावत दें, शादी ब्याह के मौके पर उन्हें तोहफा दें और मुसलमानों के ज़ेरे इंतजाम स्कूलों में उन्हें दाखले दिया करें। इसके अलावा, और कुछ मुमकिन हो उनके साथ रिआयत करें, दावतों में उनके साथ खाएं, पियें, उनको भाई, बहन, चचा, खाला कह कर मुखातिब करें। ऐसे अलफ़ाज़ के साथ उनसे खिताब न करें, या उनका ज़िक्र न करें जिनसे तजलील व तह्कीर की बू आती हो। मौक़ा ब मौका इस्लाम की बराबरी की शिक्षा को उनके सामने रखें, अगर हम अपने रवय्ये को उनके साथ दुरुस्त कर लें, तो इंशाअल्लाह वह जल्द और बहुत आसानी से करीब आ सकते हैं। एक ऐसी कौम जो इंसान तस्लीम किये जाने के लिए संघर्ष कर रही है और अपने साथ अदल व इंसाफ का मामला चाहती है, उससे थोड़ी सी मोहब्बत भी दिल जितने के लिए काफी होती है। इसलिए जरूरी है कि हम इस मामले की अहमियत को समझें और ठुकराई हुई कौम को सीने से लगाएं और उसे मोहब्बत, अपनाइयत और इज्जत व एहतिराम की सौगात दें। इसमें हमारी जान व माल, इज्जत व आबरू और राजनितिक अधिकारों की सुरक्षा है। इसमें दीन की दावत के भरपूर इमकानात भी हैं।

Urdu Article:  How Do We Deal With The Oppressed People Today, And How Should We Treat Them In The Future? سماج کے دَبے کچلے طبقات کے ساتھ ہماراطرز عمل کیسا ہے اور کیسا ہونا چاہئے؟

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