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Hindi Section ( 27 May 2013, NewAgeIslam.Com)

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Educational planning imperative for Muslims मुसलमानों के लिये शैक्षिक योजना अतिआवश्यक

 

 

मौलाना असरारुल हक़ क़ास्मी

7 मई, 2013

(उर्दू से अनुवाद- न्यु एज इस्लाम एडिट डेस्क) 

हिंदुस्तानी मुसलमानों के पिछड़ेपन का सिलसिला बदस्तूर जारी है। हालांकि इस तरह की खबरें सामने आती रहती हैं कि मुसलमानों में शिक्षा को लेकर जागरूकता बढ़ रही है और सरकारें भी मुसलमानों की शिक्षा के सम्बंध में प्रयास करती रहती हैं, लेकिन स्थिति ये है कि अभी तक ऐसे हालात सामने नहीं आये हैं, जिसकी रोशनी में ये कहा जा सके कि मुसलमान शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं और वो पिछड़ेपन से जल्द बाहर निकल आएंगे। दरअसल मामला ये है कि जहां मुस्लिम समुदाय में शिक्षा के सम्बंध में जागरूकता बढ़ रही है, वहीं अब शिक्षा हासिल करने की समस्या भी जटिल हो गयी है।

जब शिक्षा का व्यवसायीकरण नहीं हुआ था, उस वक्त शिक्षा प्राप्त करने में इतनी दिक्कत नहीं थी। शिक्षक अच्छे छात्रों को निःस्वार्थ रूप से पढ़ाने के लिये हमेशा तैयार रहते थे, बल्कि उन्हें पढ़ाते हुए खुशी महसूस करते थे, कितने शिक्षक तो छात्रों को ढूंढते और उन्हें पढ़ाई हासिल करने का शौक दिलाते, लेकिन वो ज़माना भी अजीब था कि शिक्षा मुफ्त मिलती तब भी छात्र कम ही इस ओर आकर्षित होते और माँ बाप भी अपने बच्चों की शिक्षा पर खास ध्यान न देते थे। गिने चुने परिवारों में शिक्षा होती थी। अब जबकि माहौल बदला, शिक्षा की आवश्यकता और उपयोगिता को महसूस किया गया, शिक्षा विशिष्ट परिवारों से निकलकर सामान्य घरों तक पहुंची, स्कूल और कॉलेजेज़ खोले गए, तो तालीम हासिल करना एक बड़ा मसला बन गया।

अब से कुछ साल पहले तक सरकारी स्कूलों और कॉलेजों के द्वारा बच्चों को शिक्षा दी जाती थी, लेकिन बढ़ते वक्त का चलन आम होता जा रहा है। निजी स्कूलों व कालेजों की बढ़ती लोकप्रियता से शिक्षा के क्षेत्र में लाभ भी हुआ और नुकसान भी। फायदा ये हुआ कि शिक्षा का दायरा थोड़ा विस्तृत हुआ, और शिक्षा की गुणवत्ता में भी बेहतरी आई, लेकिन फायदे से बढ़ कर नुकसान ज़्यादा हुआ। पहला नुक़सान ये हुआ कि शिक्षा के सम्बंध में नज़रिया बदल गया। पहले शिक्षा को सेवा के लिए माना जाता था, अब शिक्षा को व्यापार के लिए माना जाता है। दृष्टिकोण के इस बदलाव ने शिक्षा के परिणाम पर गहरा प्रभाव डाला। इस बदलाव से पढ़े लिखे लोगों की संख्या तो बढ़ी मगर सेवा की भावना कम हो गयी और जिस तरह से शिक्षित लोगों को जनता के लिए नमूना होना चाहिए था, वो नमूना न बन सके।

जैसे शिक्षित व्यक्ति को न सिर्फ खुद ईमानदार होना चाहिए, बल्कि दूसरों को भी ईमानदारी का पाठ पढ़ाना चाहिए, इसी तरह शिक्षित लोगों को दयानतदार, इंसान दोस्त होना चाहिये, लेकिन ऐसा नज़र नहीं आता। आज के शिक्षित लोग पैसा कमाने पर अधिक ध्यान केंद्रित रखते हैं, वो चाहते हैं कि उनका जीवन विलासिता में गुज़रे, लोगों की समस्याओं और परेशानियों से उन्हें कुछ खास लेना देना नहीं होता। इस दृष्टिकोण को बढ़ावा मिलने के कारण शिक्षा और शिक्षित लोगों की उपयोगिता का दायरा सिकुड़ गया, क्योंकि अब शिक्षित व्यक्ति की शिक्षा केवल अपने लिए या अधिक से अधिक अपने बच्चों के लिए उपयोगी बन कर रह गई, जबकि अगर दृष्टिकोण लोगों की सेवा भाव का होता तो निश्चित रूप से एक शिक्षित व्यक्ति से न केवल एक परिवार या कुछ परिवारों को लाभ होता, बल्कि अनगिनत लोग उससे फायदा हासिल करते।

इसके अलावा आज के शिक्षित लोगों की बड़ी संख्या भ्रष्टाचार, अश्लीलता, व्यभिचार करने, शराब पीने, वादा खिलाफी, वादा खिलाफी और धोखाधड़ी में शामिल हो गयी है। जैसे कि ऐसे लोगों ने शिक्षा के मकसद के खिलाफ विद्रोह का झंडा बुलंद कर रखा डाला।

सरकारी शिक्षा व्यवस्था के कमज़ोर होने और निजी शिक्षा व्यवस्था के मज़बूत होने के कारण एक बड़ा नुकसान ये हुआ कि शिक्षा महंगी हो गई। क्योंकि निजी स्कूल फीस के नाम पर अच्छी खासी रकमें लेने लगे। हिंदुस्तान में बहुत से स्कूल आज ऐसे हैं, जो छात्रों के माँ बाप से इतने रुपये लेते हैं, जितने गरीब लोग कमाते भी नहीं। ज़ाहिर सी बात है कि ऐसे स्कूलों में गरीब या मध्यम वर्ग के लोग अपने बच्चों को चाहने के बावजूद भी नहीं पढ़ा सकते। अब रहे वो स्कूल जो इतने महंगे नहीं हैं, यानी जो हजार पांच सौ रुपये मासिक की फीस है तो इतनी फीस अदा करने की क्षमता भी सभी माँ बाप  नहीं रखते हैं। जिन बच्चों के माँ बाप सिर्फ पांच हजार रुपये या उससे कुछ अधिक कमाते हैं, वो मासिक हजार पांच सौ रुपये कैसे अदा कर सकते हैं, अगर बच्चे दो, तीन, चार या उससे अधिक है तो सब की फीस दो हज़ार रूपये के आस पास होगी, जिसकी अदायगी कर पाना उनके बस की बात नहीं, फीस के अलावा ड्रेस, किताबों आदि का खर्च अलग है। अब रहे वो स्कूल जहां सौ पचास रुपये की फीस है तो इसमें कोई शक नहीं कि इतनी फीस तो गरीब लोग भी अदा कर सकते हैं, लेकिन समस्या ये खड़ी होती है कि इन स्कूलों में पढ़ाई का क्या स्टैण्ण्डर्ड है? जो स्कूल और कॉलेज महज़ सौ पचास रुपये बच्चे से लेंगे, क्या वो विशेषज्ञ और सक्षम शिक्षकों का प्रबंधन कर सकते हैं और शिक्षा से सम्बंधित अन्य सुविधाएं अपने छात्रों को प्रदान कर सकते हैं? ज़ाहिर सी बात है कि इस का जवाब न में ही होगा। सरकारी स्कूलों की हालत ये है कि  वहाँ शिक्षक पढ़ाने के लिए नहीं आते, यानी समय पर स्कूल नहीं पहुँचते या अगर पहुंचते हैं तो अपने कर्तव्य को ढंग से नहीं निभाते। बच्चे क्या कर रहे हैं? उनमें क्षमता पैदा हो रही हैं या नहीं? इससे कोई सरोकार नहीं होता।

विडंबना ये है कि मुसलमान अपने बच्चों को या तो ऐसे ही सरकारी स्कूलों में पढ़ाने के लिए भेज रहे हैं या फिर सौ पचास रुपये फीस वाले स्कूलों में भेज रहे हैं, जहां शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है। ये उनकी मजबूरी है, लेकिन ये बात ध्यान में रखनी चाहिए कि आजकल जिन स्कूलों में मुस्लिम बच्चों की संख्या पढ़ रही है, उनसे ये उम्मीद करना बेमतलब है कि उनके बच्चे बेहतरीन क्षमता वाले बन कर निकलेंगे। अगर कोई बच्चा अपनी स्वाभाविक बुद्धि के कारण अपनी क्षमता को उजागर करने में कामयाब हो जाये तो अलग बात। यानी कि मामला ज्यों का त्यों है। या तो मुसलमानों में शिक्षा को लेकर जागरूकता नहीं थी और अगर पैदा हो रही है तो उसका पर्याप्त परिणाम सामने नहीं आ रहा है। ऐसे में मुस्लिम बच्चे कैसे अपने भविष्य को बेहतर बनाने में कामयाब होंगे, कैसे लोगों की सेवा के योग्य होंगे, कैसे बेहतरीन नौकरियां और मर्तबे हासिल करेंगे? ये सवाल फिर भी बाकी है।

अगर मुसलमान शिक्षा के मैदान में तरक्की हासिल करना चाहते हैं तो उन्हें ठोस योजनाएं बनानी होगी और ये योजनाएं व्यक्तिगत स्तर पर भी होनी चाहिए और सामूहिक स्तर पर भी। व्यक्तिगत स्तर पर ये कि माँ बाप अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाने के लिये स्कूलों और संस्थानों को चुनें, जहां गुणात्मक शिक्षा दी जाती हो। अगर ये संस्थान महंगे हैं तो फीस अदा करने का कोई बंदोबस्त करने की कोशिश करें। अगर माँ बाप गरीब हैं, लेकिन पढ़े लिखे हैं तो वो अपने बच्चों को स्कूलों और संस्थानों में भेजें ही, मगर खुद ज़रूर पढ़ाएँ। गरीब माँ बाप शिक्षा के मामले में दूसरे लोगों से भी मदद ले सकते हैं, लेकिन इसके लिये मुसलमानों में एक दूसरे की मदद के जज़्बे को बढ़ावा देना चाहिए। सामूहिक प्रयासों के तहत मुसलमानों को चाहिए कि ऐसे स्कूल और संस्थाओं की स्थापना करें, जहां शिक्षा बेहतर से बेहतर हो और वहाँ फीस इतनी कम हो जिसे गरीब और मध्यम वर्ग के लोग आसानी से अदा कर सकें। स्कूल और संस्थान के खर्चों के लिए वो लोगों से मदद लेंगे, यानि कि ये स्कूल और संस्थान मुसलमानों के परस्पर सहयोग से चलने चाहिए। एक तरीका ये भी है कि मुसलमानों में जो लोग पैसे वाले हैं, वो अपनी हैसियत के अनुसार गरीब बच्चों की शिक्षा का खर्च उठाएं और जहां उनके अपने बच्चे पढ़ते हैं वहीं उन्हें भी पढ़ाने की कोशिश करें। इसमें कोई शक नहीं कि मुसलमानों की बड़ी संख्या गरीबी की शिकार है, लेकिन ये भी अपनी जगह सच है कि मुसलमानों के बीच अच्छे खासे लोग ऐसे हैं जो पैसे वाले हैं और जो दर्जनों बच्चों की शिक्षा को प्रायोजित कर सकते हैं। ऐसे लोगों को आगे आना चाहिए। इस तरह कई गरीब माँ बाप के बच्चों को शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ाया जा सकता है। इसके अलावा अन्य तरीके भी हो सकते हैं, जिनके बारे में सोच विचार किया जाना चाहिए। ये बात बड़ी महत्वपूर्ण है कि शिक्षा के क्षेत्र में जो कुछ किया जाए, वो योजना के तहत किया जाए। अंधाधुंध या यूं ही बिना सोचे समझे बच्चों को शिक्षा दिलाने से बेहतर परिणाम की उम्मीद नहीं की जा सकती, क्योंकि आम तौर पर देखा जाता है कि माँ बाप बिना योजना के बच्चों को शिक्षा दिलाते हैं, वो किसी विशेष परिणाम पर पहुंचने में कामयाब नहीं होते। एक और ये चीज़ होनी चाहिए कि हर शहर व बस्ती में शिक्षित लोगों की एक जमात हो, जो बच्चों के माँ बाप से, बच्चों की शिक्षा के बारे में बातचीत करें, उन्हें बेहतर सलाह दें और ज़रूरत हो तो उनके बच्चों के लिए शैक्षिक योजना भी बनायें। शिक्षा क्षेत्र में जो जिस तरह का सहयोग कर सकता है, उसे देना चाहिए। इसी तरह मिल जुल कर ही मुसलमान अपने शैक्षिक पिछड़ेपन को दूर कर सकते हैं।

7 मई, 2013 स्रोत: रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा, नई दिल्ली

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