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Hindi Section ( 18 Jun 2013, NewAgeIslam.Com)

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The Duty To Order Good And Prohibit Evil - Part 1 अच्छाई का हुक्म देने और बुराई से रोकने की ज़िम्मेदारी क़िस्त- 1

शरीयत को लागू करना तालिबान का मिशन है, मगर इस मिशन का अफसोसनाक पहलू ये है कि उनके विचार में शरीयत को लागू करने का मतलब शरीयत की उनकी व्याख्या यानि वहाबी इस्लाम को जबरन और हिंसक रूप से लागू करना है जिसमें धर्म के मामले में इंसान की निजी स्वतंत्रता जो कि कुरान में स्पष्ट रूप से मौजूद है, की कोई गुंजाइश नहीं है।

उनकी सरकार में हर मोड़, हर गली, बाजारों, मदरसों, स्कूलों यहां तक ​​कि घरों में लोग कोड़ों और बंदूकों के साथ घूमते मिलेंगे और लोगों को नेकी और बुराई के अपने विचार के अनुसार अमल करने पर मजबूर करेंगे। मिसाल के तौर पर गलियों में अच्छाई का हुक्म और बुराई से रोकने' वाले लोग लड़कियों को स्कूल जाने से रोकेंगे, क्योंकि उनके मज़हब में लड़कियों का तालीम हासिल करना गैर शरई काम है। इसलिए, इसी, अच्छाई का हुक्म और बुराई से रोकने के तहत इन्होंने पाकिस्तान में एक स्कूल जाने वाली लड़की पर जानलेवा हमला किया।

शरीयत को हिंसक और जानलेवा तौर पर लागू करने की मिसालें जीवन के दूसरे क्षेत्रों में भी दिखाई देंगी। इस लेख का आधार हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की एक हदीस है जिसमें मुस्लिम समाज में एक ऐसे समूह की वकालत की गई है कि जो लोगों को भले कामों के लिए कहे और बुरे कामों से मना करे। मगर इस हदीस को तालिबानी आलिम ने एक ऐसे समूह के गठन का आधार बनाया जो कानून हाथ में लेकर लोगों को सज़ा देने के लिए अधिकृत होगा और इस तरह से हर व्यक्ति समाज में पुलिस बन जाएगा। पाकिस्तान, अफगानिस्तान और सीरिया के गृहयुद्ध के शिकार क्षेत्रों में इस तरह की घटनाओं की खबरें आई हैं कि जिहादी संगठनों ने अच्छे काम का हुक्म देने' के नाम पर कानून अपने हाथ में लेकर मानवाधिकारों का उल्लंघन किया और शरीयत का 'उल्लंघन' करने वालों को सज़ा दी।

इसी तरह के समूह का एक सदस्य एक व्यक्ति के मकान में बिना इजाज़त घुस गया और उससे कहा कि तुमने इस्लामी शरीयत का उल्लंघन किया है इसलिए तुम्हें सज़ा दी जाएगी। जब मकान मालिक ने उससे पूछा कि आप बिना इजाज़त मेरे घर में कैसे दाखिल हुए तो इस खुदाई फौजदार ने फिल्मी अंदाज़ में जवाब दिया कि, हमें किसी की इजाज़त की ज़रूरत नहीं। इसलिए, तालिबान के ये खुदाई फौजदार लोगों के मकान में भी शरीयत के उल्लंघन की जांच करने के लिए बिना इजाज़त दाखिल हो जायेंगें और मुजरिमो को अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ सज़ा देंगे।

हम नीचे तालिबान के मुखपत्र नवाए अफगान जिहाद के मई 2013 अंक में छपे हुए लेख अच्छाई का हुक्म देने और बुराई से रोकने की ज़िम्मेदारी को पेश कर रहे हैं ताकि पाठकों को अंदाज़ा हो सके कि तालिबान और उनके जैसे आतंकवादी संगठन शरीयत लागू करने के नाम पर किस तरह की व्यवस्था स्थापित करना चाहते हैं ... न्यु एज इस्लाम एडिट डेस्क

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मौलाना अब्दुल्ल वहाब हाशमी हिफ़्ज़ुल्लाह

मई, 2013

अल्हमदोलिल्लाहे रब्बिल आलिमीन वस्सलातो वस्सलामो अला रसूलेहिल करीम वआला आलेहि वसहबिहि अजमईन , अम्मा बाद:

अन अबी सईद रज़ियल्लाहू अन्हू काला समअत रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम यक़ूला: मन रॉई मिनकुम मुन्किर  अफालेगैरह बैदह, फइन लम यस्तते फबिलसानहू, फइन लम यसतते फबकलबा, वज़िल्का आदाफल ईमान (रवाह मुस्लिम)

प्यारे दोस्तो! नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की ये हदीस अमर बिल मारूफ नही अनिल मुन्कर (अच्छाई का हुक्म देने और बुराई से रोकने) के हवाले से है। इस विषय के बारे कुछ बातें हैं जिनकी व्याख्या ज़रूरी है ....

पहली बात ये है कि अमर बिल मारूफ़ नही अनिल मुन्कर यानी नेक काम का हुक्म देना और बुराई से रोकना अनिवार्य कर्तव्य है .... शरीयत के हुक्म के लिहाज़ से ये अनिवार्य कर्तव्य है ...... अनिवार्य कर्तव्य का मतलब ये होता है कि उसे अदा करने के लिए उम्मत में से अगर एक टोली, एक ऐसी जमात, एक ऐसा समूह, इतने लोग निकल आएं जो उम्मत के लिए काफी हों ..... तो पूरी उम्मत के ज़िम्मे हो जाता है, ये दायित्व अदा हो जाता है ...... और अगर उम्मत में कोई ऐसी टोली मौजूद न हो, कोई ऐसा समूह मौजूद न हो, इतने लोग कर्तव्य को अदा करने के लिए मौजूद न हों, तो पूरी उम्मत के ज़िम्मे ये दायित्व होता है ..... जब तक पूरी उम्मत इस दायित्व को अदा न कर ले तब तक सब इस बारे में गुनाहगार माने जाऐंगे ...... जिस तरह नमाज़े जनाज़ा है, नमाज़े जनाज़ा अनिवार्य कर्तव्य है ...... किसी गांव और किसी इलाक़े में मौत हो जाए तो इस मैय्यत के लिए कफ़न दफन और नमाज़े जनाज़ा की व्यवस्था करना अनिवार्य कर्तव्य है ...... इतने लोग अगर निकल आएं कि दफन कर दें, कफन की व्यवस्था भी कर दें, जनाज़ा भी करवा सकें तो फिर पूरे इलाक़े और पूरे गांव के लोग ज़िम्मे से बरी हो जाते हैं ..... और अगर इतने नहीं आए ..... जैसे हजारों लोग मौजूद हैं, लेकिन इन हजारों में कोई ऐसा नहीं जो कफन दफन और जनाज़े के मामलों को देख सके ..... तो हज़ार लोग बेशक मौजूद हैं लेकिन सब गुनाहगार हैं ....... इसके विपरीत अगर तीन चार ऐसे लोगों सामने आएं जो कफन दफन और जनाज़ा की व्यवस्था कर दें तो सभी लोग ज़िम्मे से बरी हो गये ......

अम्र बिल मारूफ़ नहीं अनिल मुन्कर (अच्छाई का हुक्म देने और बुराई से रोकने) भी इस तरह है ..... अम्र बिल मारूफ़ नहीं अनिल मुन्कर की ज़िम्मेदारी इस्लामी हुकूमत या इस्लामी अमीरात में खलीफा और अमीरुल मोमिनीन की ज़िम्मेदारी होती है कि वो ऐसे लोगों या ऐसे समूह को नामज़द करे यानी ऐसे लोग चुन लें और उनकी नियुक्ति हो जाए, एक संस्था इस तरह बन जाए जो संस्था अम्र बिल मारूफ़ नहीं अनिल मुन्कर के नाम से हो ...... और इन लोगों को मोहतस्बीन कहा जाता था ..... उन्हें नियमित रूप से गुज़ारा दिया जाता था इस्लामी अमीरात और इस्लामी ख़िलाफ़त की तरफ से ...... कि ये हर तरह से सम्पन्न हों और उनका काम यही हो कि ये सड़कों, गलियों, बाजारों, मस्जिदों में इस दायित्व को अदा करने के लिए लगातार काम करें....... ख़िलाफ़त के अधीन जितना भी क्षेत्र होता, उस पूरे क्षेत्र के लिए, क्षेत्र के विस्तार के अनुसार लोगों को निकाला जाता ...... फिर उनको ये ज़िम्मेदारी दी जाती और वो लोग अम्र बिल मारूफ नहीं अनिल मुन्कर (अच्छाई का हुक्म देने और बुराई से रोकने) का काम करते और इस तरह पूरी उम्मत इस दायित्व से बरी हो जाती है।

मेरे प्यारों! आज ख़िलाफ़त कायम नहीं है, इस लिए पूरी उम्मत विभिन्न इलाक़ों में बँटी है ...... टुकड़ों की शक्ल में उम्मत बँट चुकी है ..... अब सवाल ये है कि अम्र बिल मारूफ़ नहीं अनिल मुन्कर का ये कर्तव्य कौन निभाएगा? उस हालत में जब ख़िलाफ़त मौजूद न हो तो हर वर्ग जहां वो मौजूद हैं वहां के प्रमुख और सक्रिय लोगों की ये ज़िम्मेदारी है ..... जैसे घर के अंदर पिता बतौर परिवार का मुखिया होता है ..... अब इस परिवार में इतने लोगों का होना बहुत ज़रूरी है कि वो अम्र बिल मारूफ़ नहीं अनिल मुन्कर (अच्छाई का हुक्म देने और बुराई से रोकने) की ज़िम्मेदारी उठाएं ...... कोई ऐसा व्यक्ति जो इस घर के अंदर जिसकी बातों का पालन अनिवार्य हो, लोग उसकी बात को सुनते और अमल करते हों , उसको अधिकार हासिल हो, कोई इंकार करें तो वो उसे मना भी कर सके ..... उसका ये दायित्व है कि अम्र बिल मारूफ़ नहीं अनिल मुनकर अपने घर में करे।

इसी हवाले से ये भी कहता हूँ कि एक दायित्व है अम्र बिल मारूफ नहीं अनिल मुन्कर और एक काम है नेक काम करने की दावत देना और बुराई न करने की दावत देना .... इन दोनों में फर्क़ है ..... अमर' होता है हुक्म, आर्डर ..... बतौर आदेश कहा जाए कि इस काम को ज़रूर और ज़रूर करो ..... अगर वो न हो तो आपके पास अधिकार मौजूद हो जिसके आधार पर आप उससे बलपूर्वक वो काम करवा सकें .... नहीं का मतलब होता है कि मना करना यानी मत करो ..... दोनों में फर्क़ है ..... दावत ये है कि हम लोगों के पास जाएं और कहें कि भाई! नमाज़ पढ़ो, रोज़ा रखो, अच्छा काम कर लो, बुराई न करो ..... ये दावत है .... एक होता है काम नही करना ..... हुक्म देना कि चलो नमाज़ की तरफ चलो ..... नमाज़ पढ़ो, नमाज़ क़ायम करो .... ये अमर 'वाला काम वो व्यक्ति कर सकता है जिसके पास अधिकार मौजूद हों ......

मेरे प्यारों! अब चूंकि ख़िलाफ़त मौजूद नहीं है ..... इसलिए ख़िलाफ़त के अभाव में उम्मत के हर वर्ग के लिए उसके अधिकार का दायरा मौजूद है और यही दायरा उसकी ज़िम्मेदारी है ...... पिता और घर के बुज़ुर्ग की ज़िम्मेदारी उसका घर है ...... उसका ये दायित्व है कि उस घर के अंदर कोई ऐसा ज़रूर खड़ा करे जो अम्र बिल मारूफ नहीं अनिल मुन्कर करे ..... नमाज़ का वक्त हो जाए तो ऐसा व्यक्ति हो कि घर के जिन जिन लोगों पर नमाज़ फर्ज़ (अनिवार्य) है ..... औरतें हैं या मर्द हैं ...... उन सबसे नमाज़ पढ़वाए ..... ऐसा करना अनिवार्य कर्तव्य है ...... अगर ऐसा कोई व्यक्ति भी मौजूद न हो तो परिवार के अंदर जितने भी लोग मौजूद हैं, सब के सब  गुनाहगार होंगे ..... इस कर्तव्य के छोड़ने का जो गुनाह होगा उसमें परिवार का एक एक व्यक्ति शामिल होगा ......

इसी तरीके से इस दायरे को बढ़ा कर किसी गांव के अंदर भी यही रूप दिया जा सकता है ...... गांव में भी कुछ ऐसे लोग अवश्य होने चाहिए, कोई कमेटी होनी चाहिए, कोई समूह होना चाहिए कि वो अम्र बिल मारूफ़ नही अनिल मुन्कर (अच्छाई का हुक्म देने और बुराई से रोकने) का काम करे ..... इतने लोग हों कि वो संयम बर्तें ..... एक गांव में हो सकता है कि पांच लोगों की ज़रूरत हो, और ये भी संभव है कि एक गांव बड़ा हो और उसमें पचास लोग भी इस काम के लिए कम हों .... तो इलाक़े की जितनी आवश्यकता हो, उसी आवश्यकता के मुताबिक उतने लोगों को निकलना चाहिए, नामित होना चाहिए, इस काम के लिये वो गलियों कूचों में फिरें, बाजारों में जाएं, मस्जिदों में जाएं, मदरसों में जाएं और अम्र बिल मारूफ़ नही अनिल मुन्कर का दायित्व अदा करें ..... अगर ऐसा नहीं किया गया तो इस स्थिति में गांव के सारे लोग गुनाहगार हैं ......

इसी तरह काम के अन्य क्षेत्र भी मौजूद हैं ..... जिस तरह संगठन हैं ..... इस्लामी संगठन हैं, केंद्र हैं, मदरसे हैं ..... मदरसे के अंदर जिसे अधिकार हासिल हो वो मदरसे का प्रबंधक है, मदरसे का बुजुर्ग होता है ....... अब इसके ऊपर फर्ज़ (अनिवार्य) है कि वो अम्र बिल मारूफ़ व नही अनिल मुन्कर के लिए किसी को नामित करे ....... कि वो मदरसे में जितने भी छात्र हैं, हजारों में हैं या सैकड़ों में ..... उनमें अम्र बिल मारूफ़ व नही अनिल मुन्कर का काम करें .... संगठन के अंदर, चाहे वो जिहादी संगठन है या दावती (धर्म की ओर बुलाने वाले) संगठन है ..... इस संगठन के अंदर अमीर को अधिकार हासिल होता है ..... उसके ऊपर अनिवार्य है कि वो खुद ये काम करे या किसी को नामित करे कि वो 24 घंटे अम्र बिल मारूफ़ व नही अनिल मुनकर करता रहे ...... नमाज़ का वक्त है तो सबको जगाया जाए ..... कोई संगीत सुन रहा है, कोई टीवी और फिल्म देख रहा है, उसे मना किया जाए कि गुनाह मत करो ...... ये अम्र बिल मारूफ़ नहीं अनिल मुन्कर है ..... ये आदेश शरई है .........

अब अम्र बिल मारूफ़ नहीं अनिल मुन्कर के तरीक़े से इस दायित्व को अंजाम देना है ..... तो मेरे प्यारो! ये बँटवारा है हाथ, ज़बान ..... इसकी प्रक्रिया को दो बातों के आधार पर अपनाया जाता है ...... पहली बात अधिकार के लिहाज़ से ..... जिसके पास अधिकार है और जो इसके तहत हैं तो वो कोई इनमें मुन्किर देखेगा तो उसे हाथ से रोकेगा ....... जहां ज़बान की ज़रूरत है और ज़बान का अधिकार मौजूद है, वहां ज़बान से उसे रोकेगा .... मानव की प्रकृति को देखते हुए, उसके अधिकार को देखते हुए, उसकी प्रभुसत्ता को देखते हुए, उनमें से किसी एक तरीके को चुना जाता है .... जैसा कि घर के एक बुजुर्ग हैं जो अपने बीवी बच्चों के अंदर अम्र बिल मारूफ़ नहीं अनिल मुन्कर का दायित्व निभाते हैं ..... मरकज़ (केंद्र) के अंदर अमीर है तो अमीर हाथ से मना करेगा .....

(जारी)

मई, 2013 स्रोत: नवाए अफगान जिहाद

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URL for Urdu article: https://newageislam.com/urdu-section/the-duty-order-good-prohibit-part-1/d/11770 

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