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The Holy Prophet's Migration And Its Significance नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हिजरत और उसकी अहमियत

मौलाना नादीमुल वाजिदी

२६ फरवरी, २०२१

हिजरत की सफर के कुछ और वाकेआत

हिजरत के इस सफर में हज़रत बुरैदह बिन हसीब असलमी रज़ीअल्लाहु अन्हु के इस्लाम कुबूल करने का वाकेआ भी हुआ, यह और उनके कबीले के अस्सी अफ़राद किसी सफर से वापस हो रहे थे कि कुरउल गमीम के मुकाम पर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का सामना हो गया। हाफ़िज़ इब्ने अब्दुल बिर ने अल इस्तिआब में इस मुलाक़ात को अचानक मुलाक़ात करार नहीं दिया, बल्कि उनका कहना है कि हज़रत बुरैदह और उनके साथी भी सुराका बिन मालिक की तरह आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तलाश में निकले थे ताकि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को पकड़ कर कुफ्फार के हवाले कर दें और सौ ऊंट इनाम में हासिल कर लें। बहर हाल जब मुलाक़ात हुई तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बुरैदह से सवाल किया: तुम कौन हो? उन्होंने जवाब दिया मैं बुरैदह हूँ, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत अबू बकर रज़ीअल्लाहु अन्हु की तरफ मुतवज्जोह हो कर फरमाया हमारा काम तो ठंडा और अच्छा हो गया।

बुरैदह, बरद से बना है, जिसके मानी हैं ठंडा होना। यह बात आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बतौर तफाउल इरशाद फरमाई कि घबराने की या परेशान होने की कोई बात नहीं है। बुरैदह से मिल रहे हैं, इंशाअल्लाह यह मुलाक़ात अच्छी रहेगी। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनसे यह भी पूछा तुम किस कबीले से हो? उन्होंने कहा कबीला बनू असलम से। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत अबू बकर रज़ीअल्लाहु अन्हु से फरमाया: हम सलामत रहे, यह बात भी आपने बतौर तफाउल इरशाद फरमाई, इसके बाद आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने पूछा: तुम बनू असलम की किस शाख से संबंध रखते हो? उन्होंने जवाब दिया बनू सहम से, आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: ऐ बुरैदह! तुम्हारा हिस्सा निकल आया, अर्थात इस्लाम में तुम्हारा हिस्सा भी निकल आया जो तुम्हें मिलने वाला है। बुरैदह ने हैरतज़दा हो कर पूछा: आप कौन हैं? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया: मैं मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह, अल्लाह का रसूल हूँ।

यह सुन कर हज़रत बुरैदह ने कलमा तौहीद व रिसालत पढ़ा और मुसलमान हो गए, उनके साथ ही तमाम अस्सी साथी भी इस्लाम में दाखिल हो गए। उन्होंने इस्लाम के प्रचार की सरगर्मियों में भरपूर हिस्सा लिया और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ तमाम गजवों में शिरकत की। हज़रत बुरैदह रज़ीअल्लाहु अन्हु ने इस वाकए के पैंसठ साल बाद हज़रत मुआविया रज़ीअल्लाहु अन्हु के ख़िलाफ़त के जमाने में खुरासान में वफात पाई और वहीँ दफन हुए।

इस्लाम कुबूल करने के बाद उन्होंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत में अर्ज़ किया कि आपका एक झंडा होना चाहिए। जब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मदीने में दाखिल हों तो वह झंडा आपके आगे हो, आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह तजवीज़ पसंद फरमाई, अपना अमामा उतार कर बुरैदह को दिया, उन्होंने उसे अपने नेज़े पर बाँध लिया और काफिले के आगे आगे ले कर चले। यह ईमान वालों का काफला इस हाल में मदीने में दाखिल हुआ कि इस्लाम का झंडा हज़रत बुरैदह के हाथ में था और वह काफिले के आगे चल रहे थे। हज़रत बुरैदह रज़ीअल्लाहु अन्हु के वाकेआत में यह भी लिखा है कि इस्लाम कुबूल करने के बाद इशा की नमाज़ का वक्त हो गया, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जमात से नमाज़ अदा फरमाई। बुरैदह रज़ीअल्लाहु अन्हु ने मदीने में दाखिल होने से पहले अर्ज़ किया: या रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मेरे मेहमान बन जाएं। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: यह मेरी ऊंटनी अल्लाह की तरफ से मामूर है, यह जहां ठहरे गी वहीँ मेरा कयाम करूंगा। बुरैदह रज़ीअल्लाहु अन्हु के इस्लाम कुबूल करने का वकिया बड़ी अहमियत रखता है कि मदीने में दाखिल होने से पहले ही अल्लाह की मदद और नुसरत का ज़हूर शुरू हो गया और कामयाबी मिलने लगी। एक पूरा कबीला बल्कि बड़ा कबीला किसी दबाव और मेहनत के बिना इस्लाम के दामन से जुड़ गया। (अल इस्तिआब ७/५६, अल वफ़ा/ ३९०, शरह अल मुवाहिब, १/४०५)

जब यह काफिला मदीने के करीब हुआ तो दो डाकू भी आकर मिले, आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन दोनों को इस्लाम की दावत दी, दोनों ने लब्बैक कहा और इस्लाम कुबूल कर लिया, इन दोनों से नाम दरियाफ्त किये गए, उन्होंने कहा कि हम मुहानान कहलाते हैं, इसके मानी हैं ज़लील व ख्वार, आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया: नहीं! तुम तो मुकरमान हो, यानी मुकर्रम व मुअज्ज़ज़। (मजमउल ज़वाइद ६/५८)

इस सफर में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मुलाक़ात हज़रत जुबैर और हजरत तलहा से भी हुई। जुबैर बिन अवाम एक तिजारती काफिले के साथ शाम से वापस हो रहे थे। हज़रत जुबैर रज़ीअल्लाहु अन्हु ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत में सफेद कपड़े पेश किये जो आप रज़ीअल्लाहु अन्हु ने पहने हुए थे, इसी तरह के कपड़े उन्होंने हज़रत अबुबकर रज़ीअल्लाहु अन्हु को भी पहनाए। (सहीह बुखारी, पेज ३९०६) हज़रत तलहा बिन उबैदुल्लाह भी शाम से वापसी में आपसे मिले, उन्होंने भी कुछ कपड़े हदिये के तौर पर पेश किये।

(सीरतुन्नब्विया इबने शिहाब, ४९५/१)

हिजरत के वाकए का एक और ईमान अफरोज़ और सबक आमोज़ वाकेआ इतिहास व सीरत की किताबों में मिलता है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और सहाबा की हिजरत के बाद मक्का मुकर्रमा ईमान वालों से लगभग खाली हो गया था, केवल कुछ मुसलमान बाकी रह गए थे, जो अपने बुढ़ापे, कमजोरी या बिमारी की वजह से हिजरत नहीं कर सके थे, उनमें एक सहाबी थे हज़रत ज़मरा बिन जुन्दुब। माशाअल्ल्लाह बड़े खानदान वाले थे, खुद उनके चालीस बेटे थे, भाई भतीजे भी बड़ी तादाद में थे, जब हिजरत का सिलसिला शुरू हुआ तो यह काफी बूढ़े हो चुके थे, इतने बूढ़े कि उनके लिए सफर करना बहुत मुश्किल था। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हिजरत के बाद मक्का मुकर्रमा की फिजा में उनका दम घुटने लगा था, वाइज भी हिजरत का हुक्म नाज़िल होने के बाद वह मक्के से निकलना अपना फर्ज़ समझ रहे थे, लेकिन वह अपने उज्र की वजह से इस हुक्म पर अमल करने के लायक नहीं थे। एक रोज़ उन्होंने अपने बेटों से कहा कि मेरे लिए दो कदम चलना हालांकि दुश्वार है, मगर मैं यहाँ मुशरिकीन के बीच रहना नहीं चाहता, तुम लोग मेरी चारपाई उठा कर ले चलो और इसी तरह मुझे यसरब पहुंचा दो। बेटे भी वालिद के फरमाबरदार थे, फ़ौरन अपने बाप की चारपाई उठा कर चल दिए, अभी मक्के से निकल कर तनईम तक ही पहुंचे थे कि मौत का वक्त आ पहुंचा और हिजरत की आरजू दिल में लिए वह अल्लाह की बारगाह में हाज़िर हो गए। उनकी वफात के बाद हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत में हाज़िर हो कर हज़रत ज़मरा रज़ीअल्लाहु अन्हु के इन्तेकाल की खबर दी, कुरआन करीम की यह आयत उन्हीं सहाबी के बारे में नाज़िल हुई:

और जो शख्स अपने घर से अल्लाह और उसके रसूल के लिए हिजरत करने के लिए निकले, फिर उसे मौत आ पकड़े, तब भी इसका सवाब अल्लाह के पास तय हो चुका और अल्लाह बहुत बख्शने वाला, बड़ा मेहरबान है।“ (सुरह निसा: १००)

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सहाबा को जमा फरमाया और उन्हें ज़मरा की हिजरत और वफात के बारे में बतलाया। उस मौके पर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की जुबान मुबारक से वह जूमला भी निकला जिससे इमाम बुखारी ने अपनी किताब का आगाज़ फरमाया है अर्थात इन्नमल आमालु बिन्नियात आमाल का दारोमदार नीयतों पर है।“ (अल इस्तिआब ३०१/२) उन सहाबी की खुश बख्ती का क्या ठिकाना कि उनके बारे में एक आयत भी नाज़िल हुई और एक हदीस नबवी भी उनकी निस्बत से मशहूर हुई।

हिजरत के वाकए की अहमियत

हिजरत का वाकेआ इस्लामी इतिहास का अज़ीम वाकेआ है, अगर इसे इस्लाम के प्रचार का प्ररम्भिक बिंदु करार दिया जाए तो गलत नहीं होगा, हिजरत से पहले मुसलमान मक्का मुकर्रमा की वादियों में जुल्म व सितम सहने पर मजबूर थे, हिजरत के बाद मदीना मुनव्वरा पहुंचे तो इस्लाम के लिए यह सरजमीन निहायत सरसब्ज़ व शादाब बन गई और कुछ ही वक्त गुजरा था कि इस्लाम का वह चाँद जो फारान की चोटियों से निकला था यसरब की बुलंदियों पर जगमगाने लगा और अक्सा ए आलम में इसकी किरणें रौशनी करने लगीं, यह सूरते हाल हिजरत के वाकए से पैदा हुई, देखने में हिजरत का मतलब यह है कि इंसान मायूस, मजबूर बल्कि हार कर वतन छोड़ रहा है, लेकिन हज़रत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और उनके सहाबा के लिए हिजरत का सफर गलबा व ज़हूर की तरफ पेश कदमी साबित हुआ, जो दीन मक्का मुकर्रमा में मग्लूब और महसूर था वह मदीना मुनव्वरा की वुसअतों में इतना फैला कि आज चौदा सौ साल गुजरने के बाद भी वह लगातार फ़ैल रहा है, इस वक्त स्थिति यह है कि इस्लाम दुनिया के एक सौ निन्यानवे देशों में फैला हुआ है, एक सर्वे के अनुसार दुनिया का हर चौथा आदमी मुसलमान है।

यह अजीमुश्शान वाकेआ वास्तव में इस काबिल था कि इसे हमेशा हमेशा बल्कि हर लम्हा याद रखा जाता, अमीरुल मोमिनीन हज़रत उमर फारुक के दौरे खिलाफत में यह तय हुआ कि हिजरत के वाकए को यादगार बनाने के लिए इस्लामी पंचांग की इब्तिदा मुहर्रम महीने से की जाए। इस्लाम से पहले ईसवी साल और महीनों से तारीख लिखी जाती थी, मुसलमानों में तारीख लिखने का दस्तूर नहीं था, हज़रत अबू मूसा अशअरी ने जब कि वह बसरा के गवर्नर थे हज़रत उमर बिन खत्ताब को लिखा कि आप की तरफ से विभिन्न इलाकों के गवर्नरों और फ़ौजी कमांडरों को समय समय पर ख़त लिखे जाते हैं, मगर उन पर कोई तारीख दर्ज नहीं होती, हालांकि तारीख लिखने के अनेकों लाभ हैं, रिकार्ड के लिए भी खतों पर तारीख का होना बहुत आवश्यक है, हज़रत उमर को यह खयाल बे हद पसंद आया, मजलिसे शूरा तक बात पहुंची, गौर व फ़िक्र हुआ, विभिन्न ताजावीज़ सामने आईं, किसी ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की विलादत बा सआदत से इस्लामी साल के आगाज़ का मशवरा दिया, किसी ने नबूवत के साल से आगाज़ करने की तजवीज़ रखी, किसी ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की वफात से नया साल शुरू करने के लिए कहा। एक जमात की राय यह थी कि हिजरते इस्लाम और मुसलमानों के लिए अत्यंत महत्व का हामिल वाकेआ है। इस वाकए के बाद मुसलमानों को उरूज मिला और मुसलमान आलमी सतह पर एक बड़ी ताकत बन कर उभरे। (जारी)

nadimulwajidi@gmail.com

URL for Urdu article: https://www.newageislam.com/urdu-section/maulana-nadeemul-wajidee/the-holy-prophet-s-migration-and-its-significance-نبی-کریم-صلی-اللہ-علیہ-وسلم-کی-ہجرت-کا-واقعہ-اور-اس-کی-اہمیت/d/124407

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