New Age Islam
Thu Jun 17 2021, 05:34 PM

Hindi Section ( 15 Jul 2012, NewAgeIslam.Com)

Comment | Comment

The Veil Was Not Meant For the Face पर्दे का संबंध चेहरे से नहीं है

 

महमूद आलम सिद्दीकी

8 जुलाई, 2012

(अंग्रेजी से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

ैं नाजिया जसीम के साथ सहमत हूँ कि "ज़ालिम इंसान है, इस्लाम नहीं है" (हिंदू, ओपन पेज, 27 मई, 2012) असल में ये इस्लाम है जिसने महिलाओं को पुरुष प्रधान समाज के अत्याचारी और क्रूर रिवाजों के बंधन से आज़ाद कराया जिसने उनके जीवित रहने के लिए आवश्यक और बुनियादी अधिकार छीन लिए थे। ये इस्लाम है जिसने उन्हें कई अधिकार प्रदान किए- विरासत का अधिकार, संपत्ति रखने का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, व्यापार करने का अधिकार, स्वतंत्र रूप से पति के चुनाव करने का अधिकार, पति की मृत्यु हो जाने पर दोबारा शादी करने का अधिकार और तलाक का अधिकार।

ये इस्लाम है जिसने महिलाओं को उस समय  बुलंद मर्तबा प्रदान किया जब उन्हें मिल्कियत मानकर वैसा ही बर्ताव किया जाता था और उन्हें पैदा होने के बाद ज़िंदा दफन कर दिया जाता था। ये इस्लाम है जिसने उन्हें खुदा की नेमत के तौर पर लिया और पत्नियों के रूप में पुरुषों के बराबर साझीदार बनाया और माओं के पैरों के नीचे जन्नत रखा और उन्हें हुक्म दिया कि वो अपना चेहरा ढँके बगैर अपनी गरिमा और पवित्रता की रक्षा के लिए हिजाब पहनें और मर्दों को उनका सम्मान करने और उनके साथ अच्छा बर्ताव करने का हुक्म दिया। जैसा कि हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने साफ तौर पर ऐलान किया है,'' तुम में से बेहतरीन इंसान वो है जो अपने परिवार की महिला सदस्यों के साथ अच्छा बर्ताव करता है और तुम्हारे बीच वो इंसान बुरा है जो अपने परिवार की महिला सदस्यों के साथ बदसुलूकी करता है।"(बुखारी)

लेकिन, अफसोस की बात ये है कि मुसलमानों के एक वर्ग  ने महिलाओं को उनके आवश्यक और बुनियादी अधिकारों सहित शिक्षा के अधिकार और स्वतंत्र रूप से अपनी पसंद का पति चुनने की स्वतंत्रता और वो दूसरे अधिकार भी जो उन्हें इस्लाम ने प्रदान किए हैं और वो भी जो इस्लामी पर्दा या हिजाब के नाम पर दिया है, से महरूम कर दिया है। मुसलमानों के इस वर्ग ने महिलाओं को सबसे पहले इस्लामी पर्दे के बारे में पुरुष प्रधान समाज के व्याख्या अनुसार उनके चेहरों को ढक कर महरूम किया, फिर उनके मौलिक अधिकारों को छीन लिया! यहां तक ​​कि उन्हें नमाज़ पढ़ने से रोक दिया गया। मौजूदा वक्त में इस धरती  पर इस्लाम ऐसा एकमात्र धर्म है जो अपनी पुरुष प्रधान व्याख्या के कारण महिलाओं को मस्जिद में आने से रोकता है। इस तथ्य के बावजूद कि हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने न सिर्फ मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में आने के लिए प्रोत्साहित किया है बल्कि मुसलमान मर्दों को निर्देश दिया है कि उन्हें अपनी पत्नियों को मस्जिद में नमाज़ के लिए जाने से नहीं रोकना चाहिए।" (बुखारी)। ऐसी पुरुष प्रधान विचारधारा के परिणामस्वरूप पर्दे के बारे में इस्लामी शिक्षाओं का गलत रूप सामने आया और जिसका शिकार खुद नाजिया जसीम बनीं और इस बात की वकालत की कि पर्दा (चेहरा ढँकने के लिए) महिलाओं को गुलाम बनाने के लिए मर्दों को प्रोत्साहित करता है। निस्संदेह इस बात ने मुझे यह संक्षिप्त स्पष्टीकरण लिखने की प्रेरणा दी।

वास्तव में, चेहरा पर्दा में शामिल नहीं है, क्योंकि बड़ी संख्या में कुरानी आयात और नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के फरमान है जिनसे स्पष्ट रूप से साबित होता है कि इस्लाम में चेहरा छिपाने की जरूरत नहीं है। जैसा कि कुरआन का फरमान है "आप मोमिन मर्दों से फ़रमा दें कि वो अपनी निगाहें नीची रखा और अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त किया करें, ये उनके लिए बड़ी पाकीज़ा बात है। बेशक अल्लाह इन कामों से खूब आगाह है जो ये अंजाम दे रहे हैं, और आप मोमिन औरतों से फरमा दें कि वो (भी) अपनी निगाहें नीची रखा करे और अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त किया करें और अपनी आराइश व जेबाइश को जाहिर न किया करें सिवाय (उसी हिस्सा) जो उसमें से खुद जाहिर होता है"(24 :30-31)

ये आयत साफ तौर पर इशारा करती है कि चेहरा ढँकने की ज़रूरत नहीं है, वरना नज़रें नीची रखने का क्या फायदा है? दूसरी और अहम बात कि मध्यकालीन और आधुनिक दौर के कुरान के ज़्यादातर (मुस्तनद मोबस्सिर) प्रमाणिक टिप्पणीकारों ने इस आयत के निम्नलिखित हिस्से " अपनी आराइश व जेबाइश को जाहिर न किया करें सिवाय (उसी हिस्सा) जो उसमें से खुद जाहिर होता है" का अर्थ चेहरा और पांव लिया है। इनमें से सबसे प्रमुख व्याख्या में "तफ्सीरे जलालैन " है जो देवबंद के पाठ्यक्रम में शामिल है और देवबंद के शब्बीर उस्मान द्वारा लिखी गई "तफ्सीरे उस्मान" इसमें शामिल है।

पर्दा की इस व्याख्या को नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की पत्नी हज़रत आइशा रज़ियल्लाहू अन्हा से मरवी हदीस से भी समर्थन प्राप्त है। उनके अनुसार, "एक बार उनकी बहन हज़रत आस्मा रज़ियल्लाहु अन्हा उनके घर आईं, उन्होंने बहुत महीन कपड़ा पहना हुआ था जिससे उनका शरीर नज़र आ रहा था। जब नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने उन्हें देखा तो आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अपने चेहरे का रुख दूसरी ओर मोड़ लिया और कहा कि "ऐ अस्मा जब एक औरत बालिग़ हो जाती है, तो उसे चेहरा और पैर छोड़कर अपने शरीर को ढकना चाहिए।"

संक्षेप में, चेहरे को हिजाब से ढँकने की जरूरत नहीं है, ये चौथी शताब्दी में इस्लामी पाठ के पुरुष प्रधान व्याख्या के बाद किया गया जिसने महिलाओं को उनके अपने कर्तव्यों को अंजाम देने से रोक दिया। वास्तव में, नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के ज़माने का समाज एक संयुक्त समाज था जिसमें मर्द और औरतें अपने सामान्य काम, जंग के मैदान में, मस्जिदों में नमाज़ें पढ़ने में, पढ़ाई और शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्र में अपना बहुमूल्य योगदान देने में भागीदार थे। जब इस्लाम हमसे चेहरा ढँकने की मांग नहीं करता है, तो हम उसके बारे में इतने सख्त क्यों हैं?

महमूद आलम सिद्दीकी, सेंटर ऑफ अरेबिक एंड अफ़्रीकन साइंसेज़, जवाहर लाल नेहरू युनिवर्सिटी, नई दिल्ली में असिस्टेंट प्रोफेसर (अतिथि) हैं।

URL for English article:

http://newageislam.com/islam,-women-and-feminism/mahmood-alam-siddiqui/the-veil-was-not-meant-for-the-face/d/7865

URL for Urdu article: http://www.newageislam.com/urdu-section/veil-is-not-connected-to-face--پردے-کا-تعلق-چہرے-سے-نہیں-ہے/d/7919

URL for this article:http://www.newageislam.com/hindi-section/the-veil-was-not-meant-for-the-face--पर्दे-का-संबंध-चेहरे-से-नहीं-है/d/7939


Loading..

Loading..