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Hindi Section ( 24 Aug 2014, NewAgeIslam.Com)

The Partition Memories Have Started Blurring विभाजन की सोच धुंधली हो चली है

 

कुलदीप नैयर

13 अगस्त 2014

भारत की आजादी या हिंदुओं और मुसलमानों का धर्म के आधार पर विस्थापन अब 57 साल पुराना पड़ चुका है। मैं 14 अगस्त को सियालकोट शहर में अपना घर छोड़ने की याद करता हूं क्योंकि उसी दिन पाकिस्तान के नए राष्ट्र ने गैर-मुसलमानों को स्वीकार करने से उसी तरह मना कर दिया था जिस तरह पूर्वी पंजाब अपने यहां किसी मुसलमान को नहीं देखना चाहता था। मैंने जवाहरलाल नेहरू का 'नियति से मिलन' वाला प्रसिद्ध भाषण पाकिस्तान में ही सुना था, अपने शहर सियालकोट में।

लेकिन मैंने 17 सितम्बर, यानि आजादी के 32 दिन बार सरहद पार किया। तब तक हत्या और लूट का तांडव कम हो चुका था। मैंने हिंदुओं और मुसलमानों को वास्तव में आपस में लड़ते-झगड़ते नहीं देखा। लेकिन मैंने दर्द भरे चेहरे, औरतों और मर्दों को अपनी छोटी-मोटी चीजों से भरी गठरियां माथे पर उठाए और उनके पीछे डर से सहमे बच्चों को जाते देखा। हिंदू और मुसलमान, दोनों अपने चूल्हा-चक्की, घर-बार, दोस्त और पड़ोसियों को छोड़कर आए थे। दोनों समुदाय को इतिहास की यातना ने तोड़ दिया था। दोनों रिफ्यूजी थे।

विभाजन का दुःख शब्दों में बयान करना मुश्किल है। लेकिन इसे हिंदु और मुसलमान का सवाल बना देना इसका राजनीतिकरण होगा। दंगों ने 10 लाख लोगों की जानें ली और दो करोड़ हिेंदु, सिख और मुसलमानों को अपनी जड़ों से उखाड़ दिया। पाकिस्तान के कुछ एकतरफा विचार रखने वाले पटि्टयां लगाकर दंगों को 'मुसलमानों पर अत्यचार' के रूप में पेश करना चाहते हैं। दुर्भाग्य से यह हिंदुओं के खिलाफ नफरत बढ़ाएगा जो पाकिस्तान में उतना ही सहने को मजबूर थे जितना भारत में मुसलमान।

निर्मम हत्या की कहानियों के बावजूद मुसलमानों द्वारा हिंदुओं को और हिंदुओं द्वारा मुसलमानों की रक्षा करने की बहादुरी और साहस दिखाने के उदाहरण भी भारत में हैं। भारत के एक मशहूर बुद्धिजीवी आशीष नंदी के एक शोध के अनुसार दोनों समुदाय के लोगों के विपरीत समुदाय के 50 प्रतिशत लोगों को क्रूरता का शिकार होने से बचाया।

सदियों से साथ रहने वाले लोगों ने एक दूसरे की हत्या क्यों की? इससे ज्यादा बेकार कोशिश कुछ नहीं होगी कि यह ढूंढा जाए कि उपमहाद्यीप के विभाजन के लिए कौन जिम्मेदार था। करीब छह दशकों तक फैली घटनाओं के क्रम को ध्यान में रखने पर यह एक सिर्फ किताबी कोशिश ही होगी। लेकिन इतना साफ है कि चालीस के दशक की शुरूआत में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच मतभेद इतना बढ़ गया था कि विभाजन जैसा कुछ करने के अलावा कोई उपाय नहीं बचा था। पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना यह सिद्ध करने में लगे रहे कि हिंदु और मुसलमान दो राष्ट्र हैं और यह बात दोनों को एक दूसरे से लगातार दूर करती गई।

जो लोग अभी भी विभाजन को लेकर अफसोस करते हैं उनसे मैं इतना ही कह सकता हूं कि अंग्रेज उपमहाद्वीप को इकट्ठा रख सकते थे अगर 1942 में वे उस समय ज्यादा अधिकार देने को तैयार होते जब सर स्टैफर्ड क्रिप्स भारत जनता की आकांक्षाओं का समाधान करने की सीमित जिम्मेदारी के साथ भारत आए थे। कांग्रेस पार्टी भी यह कह सकती थी अगर उसने 1946 में कैबिनेट मिशन के इन प्रस्तावों को स्वीकार कर लिया होता कि तीन विषयों-विदेश विभाग, रक्षा और संचार केंद्र के पास होता और चार राज्यों के क्षेत्रों में जोड़ दिया जाता।

इतिहास के ये दोनों 'अगर' मुख्य रूप से काल्पनिक और ज्यादातर अवास्तविक हैं। विभाजन किसी ग्रीक दुखांत कथा की तरह है। सभी को पता था कि क्या होने वाला है। इसके बावजूद इसे रोकने के लिए वे कुछ नहीं कर सकते थे। देश का माहौल इतना दूषित हो चुका था कि नरसंहार और पलायन जिस तरह सामने आया उससे बचा नहीं जा सकता था। कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना, जो उपाधि महात्मा गांधी ने उन्हें दी थी, का 11 अगस्त 1947 को दिया गया भाषण था- आप या तो पाकिस्तानी हैं या हिंदुस्तानी, और धर्म का राजनीति से कोई संबंध नहीं है। लेकिन यह संकीर्ण भावनाओं को शांत नहीं कर सका। इसे और तेज किया गया ताकि पाकिस्तान के संविधान को उचित ठहराया जा सके। देश में धर्मांधों का मूड इसी से समझा जा सकता है कि उन्होंने जिन्ना के भाषण को ही दबा दिया।

क्या विभाजन के मुसलमानों को उद्देश्य पूरा हुआ? मुझे नहीं पता। उस देश की यात्रा के दौरान मैंने लोगों को कहते सुना कि वे खुश हैं कि चलो, एक जगह तो है जहां वे हिंदुओं के प्रभाव से या हिंदुओं के 'आक्रमण' से सुरक्षित महसूस कर सकते हैं। लेकिन मैं समझता हूं मुसलमानों को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। वे आज तीन देशों- भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में बंटे हैं। कल्पना कीजिए उनकी संख्या, उनका वोट, अविभाजित उपमहाद्वीप में कितना असर करता। वे कुल आबादी के एक तिहाई होते।

सीमा पर इन पटि्टयों से दोनों देशों के बीच दूरी हो बढ़ेगी। एक-दूसरे पर दोष लगाने के बदले बेहतर यही होता कि दुश्मनी और नफरत, जो बंटवारे का नतीजा है, से निबटने की कोशिश की जाती। इसने दोनों देशों को बेचैन कर रखा है।

मैं वाघा-अमृतसर सीमा से निराश होकर लौटा हूं, इसलिए नहीं कि वहां सूर्यास्त के परेड के समय सैनिक रीति में कमी आई है बल्कि नई तरह की राक्षसी प्रवृत्ति वहां उभर आई है। पाकिस्तान के अधिकारियों ने वहां 10 पटि्टयां लगा दी हैं जिनके बोर्ड पर यह लिखा है कि विभाजन के समय किसी तरह हिंदुओं और सिखों ने मुसलमानों को लूटा। इन स्तंभों को इस तरह प्रदर्शित किया जा रहा है कि वे सिर्फ भारत की ओर से ही दिखाई देते हैं। पाकिस्तान की तरफ से वे दिखाई नहीं देते क्योंकि इसके पीछे बड़े-बड़े बोर्ड हैं।

जो दर्शाया गया है वह आक्रमक है और अपने उद्देश्यों में दुष्टतापूर्ण। उन्हें पिछले दो महीनों के दरम्यान वहां लगाया गया है। शायद भारत में शांति के स्वर को पाकिस्तान में भी ताकत मिलने लगी है और पिछले साल करीब 50 लोग सरहद पर, जीरो प्वांयट, मोमबत्ती जलाने के लिए आए, आजादी के साठ साल बाद।

और यह भी कि जो स्तंभ सरहद पर लगे हैं वे तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश रहे हैं। जिस तरह की वारदातें बताई गई हैं। वे दोनों तरफ हुए थे। पाकिस्तान में हिंदु और सिख इसके शिकार हुए और भारत में मुसलमान। नए बने दोनों देशों में एक ही तरह का 'शर्मनक नजारा था, न तो क्रूरता में कोई कमी थी और न करूणा में। औरत और बच्चे इसके शिकार थे।

अगर कोई मुझ से कहे कि हिंदु धर्म ज्यादा उदार है या इस्लाम ज्यादा मोहब्बत पैदा करती है तो मैं इस राय से अपना मतभेद प्रकट करना चाहूंगा। मैंने दोनों ही धर्म मानने वालों का धर्म के नाम पर हत्या करते देखा है। वे हर-हर महादेव या अली का नारा लगाकर एक दूसरे के शरीर में तलवार या भाले घुसेड़ रहे थे।

उस समय लिखी गई कुछ किताबों में तत्कालीन घटनाओं को ब्योरा दिया गया है। रामानंद सागर की प्रसिद्ध किताब 'और इंसान जाग उठा' और प्रसिद्ध उर्दू लेखक कृष्णचंदर की 'पेशावर-एक्सप्रेस' इसका ब्योरा देती है कि कब आदमी के भीतर का शैतान जाग उठता है और इंसान मर जाता है। सआदत हसन मंटो की उर्दू लघु कथाएं भी हैं जो बताती है कि दोनों समुदायों में अपराध और क्रूरता कितना नीचे तक पहुंच गई थीं।

स्रोतः http://www.prabhasakshi.com/ShowArticle.aspx?ArticleId=140813-113741-330010

URL:  http://newageislam.com/hindi-section/kuldeep-nayar/the-partition-memories-have-started-blurring--विभाजन-की-सोच-धुंधली-हो-चली-है/d/98722

 

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