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Hindi Section ( 3 Feb 2014, NewAgeIslam.Com)

Islamic Economy During Khilafat-e-Rasheda Part 1: The Age of Abu Bakr Siddique (r.a.) ख़िलाफ़ते राशिदा के समय में इस्लामी अर्थव्यवस्था (भाग 1): अबु बकर सिद्दीक़ का दौर

 

ख़िलाफ़ते राशिदा

की

आर्थिक समीक्षा

द्वारा

खुर्शीद अहमद फ़ारिक़

प्रोफेसर अरबी, दिल्ली विश्वविद्यालय

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

मुक़दमा

बीस साल तक मुझे एक ऐसी किताब की तलाश रही जिसने इस्लाम के बुनियादी आर्थिक सिद्धांत और इस्लामी समाज की आर्थिक व्यवस्था की समीक्षा की हो लेकिन अफसोस है कि अरबी, अंग्रेज़ी, उर्दू और फारसी भाषा में इस तरह की कोई किताब मुझे उपलब्ध नहीं हुई। इस कमी को देखकर मेरे दिल में खुद ऐसी किताब लिखने का रुझान पैदा हुआ और ये किताब उसी रुझान का नतीजा है। इसकी तैयारी में हाथ आने वाले उन सारे पुराने अरबी स्रोतों से मदद ली गई है जिनमें नब्वी दौर और ख़िलाफ़ते राशिदा के आर्थिक मामलों से सम्बंधित सूचना या संकेत मिलते हैं। मैंने इन सबका तुलनात्मक अध्ययन कर और शोध की कसौटी पर कस कर क्रम के साथ पेश किया है।

ये समीक्षा कई साल हुए मासिक बुरहान दिल्ली में छपा था। इसे पढ़कर कुछ लोगों ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम और सहाबा रज़ियल्लाहू अन्हा के नामों के साथ कई जगह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम और रज़ियल्लाहू अन्हा के शब्द न देखकर मेरी साहित्यिक समझ की शिकायत की थी। सच ये है कि मेरे दिल में बिल्कुल भी बेअदबी नहीं थी और न है। मैंने कागज़, किताबत और मुद्रण के बढ़ते खर्च में बचत की खातिर रसूलुल्लाह के साथ सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम और सहाबा के साथ रज़ियल्लाहू अन्हा लिखने पर संतोष किया था। ये दोनों अलामतें लिखने से कातिब का क़लम अक्सर जगहों पर चूक गया। कुछ तो इस ख़याल से कि सम्मान व्यक्त करने के लिए मैंने दोनों के लिए ही एक वचन की जगह बहुवचन का इस्तेमाल किया और कुछ अरबी किताबों की नज़ीर सामने रखकर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम और सहाबा रज़ियल्लाहू अन्हा के नामों के साथ दोनों अलामतें लिखने का न तो पालन किया जाता है, न उन्हें किसी दूसरे सम्मान वाले उपनाम से याद किया जाता है। वर्तमान समीक्षा में दोनों अलामतें लिखने की  कातिब को बार बार ताकीद की जाती रही है। उम्मीद है कि पाठकों को अब पिछली शिकायते पैदा नहीं होंगी।

खुर्शीद अहमद फ़ारिक़

10 अक्टूबर, 1974

अबु बकर सिद्दीक़ के दौर की आर्थिक समीक्षा

अबु बकर रज़ियल्लाहू अन्हा का चुनाव

अबु बकर सिद्दीक़ रज़ियल्लाहू अन्हा आम सहमति से खलीफा चयनित नहीं हुए थे। बनू हाशिम ने जिनका प्रतिनिधित्व अली हैदर रज़ियल्लाहू अन्हा कर रहे थे और अंसार ने जिनका नेतृत्व साद बिन ओबादा रज़ियल्लाहू अन्हा ख़ज़रजी और कुछ दूसरे अंसारी लीडरों के हाथ में था। अबु बकर सिद्दीक़ के चुनाव को नियम विरुद्ध और अवैध करार देकर खारिज कर दिया था। बनू हाशिम का दावा था कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से खूनी रिश्ते के कारण ख़िलाफ़त के हक़दार हम हैं। अंसार की मांग थी कि चूंकि हमने इस्लाम के लिए जान व माल का असाधारण बलिदान देकर उसे स्थिरता प्रदान की, इसलिए ख़िलाफ़त हमारा हक़ है। अबु बकर सिद्दीक़ रज़ियल्लाहू अन्हा और दूसरे गैर हाशमी कुरैशी समान विचार वाले लोग जिनमें उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहू अन्हा सबसे अहम थे, न तो हाश्मियों की मांग मानने को तैयार थे न अंसार को। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की विशेष कृपा से हाशमी परिवार खूब अमीर हो गया था और उसमें अहंकार आ गया था। अबु बकर सिद्दीक़ रज़ियल्लाहू अन्हा, उनके दाहिने हाथ उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहू अन्हा और दूसरे मुहाजिर महसूस कर रहे थे कि मौजूदा अहंकार के साथ अगर ख़िलाफ़त की बागडोर भी हाश्मियों के हाथ आ गई तो समाज में धन और सम्मान का बहुत अधिक असंतुलन पैदा हो जाएगा और गैर हाशमी कुरैश, बनू हाशिम के अधीन और मोहताज होकर रह जाएंगे।

अबु बकर सिद्दीक़ रज़ियल्लाहू अन्हा और उनके साथी अंसार की मांग को मानने को तैयार नहीं थे, उनके ख़याल में क़ुरैश के अलावा कोई दूसरा अरब क़बीला हुकूमत और खिलाफ़त के सम्मान के योग्य नहीं था। इसलिए उन्होंने अंसारों का संशोधित प्रस्ताव भी खारिज कर दिया जिसमें  था कि एक बार खलीफा कुरैशी हो और एक बार अंसारी।  

अबु बकर सिद्दीक की ख़िलाफ़त से बनू हाशिम और अंसार दोनों नाराज़ हो गए। बनू हाशिम के प्रत्याशी ख़िलाफ़त के लिए 32- 33 वर्षीय अली हैदर रज़ियल्लाहू अन्हा और दूसरे हाशमी बुज़ुर्गों ने अबु बकर सिद्दीक़ की बैअत नहीं की और अंसार के लीडर साद बिन ओबादा ख़ज़रजी साथ ही उनके परिवार और उनके ताबेईन ने भी नए खलीफा की वफादारी का हलफ़ लेने से इंकार कर दिया। मदीना के क्षितिज पर तीन राजनीतिक दल सामने आये। पहला और सबसे बड़ा और शक्तिशाली शासकों या गैर हाशमी कुरैश और उन ख़ज़रजी अंसार का था जो साद बिन ओबादा रज़ियल्लाहू अन्हा से ईर्ष्या करते थे और उन्हें ख़िलाफ़त के आला ओहदे पर देखना गवारा नहीं करते थे और जिसके सक्रिय लीडर अबु बकर सिद्दीक़ रज़ियल्लाहू अन्हा के विश्वासपात्र उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहू अन्हा थे। दूसरी पार्टी हाश्मियों और उनके हमदर्द अंसारी घरानों की थी जिसके प्रमुख अली हैदर रज़ियल्लाहू अन्हा थे और तीसरी उन अंसारियों की थी जिनके लीडर साद बिन ओबादा रज़ियल्लाहू अन्हा थे। मुल्क में हर तरफ बगावतों के होने और मदीना पर सशस्त्र नज्दी क़बीलों की चढ़ाई के अल्टीमेटम से जो आम तौर पर खतरा पैदा हो गया था उसके प्रभाव में हाशमी पार्टी कोई आक्रामक कार्रवाई न कर सकी न अंसारी, उनकी नाराज़गी ने बातचीत न करने और बुरा भला कहने की शक्ल अख्तियार कर ली।

अबु बकर पहले तर्क और फिर सख्ती और आर्थिक दबाव डालकर दोनों पार्टियों के बुज़ुर्गों को अपने साथ करने की कोशिश की लेकिन वो पूरी तरह कामयाब नहीं हुए। अली हैदर रज़ियल्लाहू अन्हा की बीवी फातिमा रज़ियल्लाहू अन्हू बिंत रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम, अबु बकर रज़ियल्लाहू अन्हा से सख्त नाराज़ थीं और अली हैदर की बैअत की राह में रुकावट थीं। उनकी नाराज़गी की एक वजह ये थी कि अबु बकर सिद्दीक़ रज़ियल्लाहू अन्हा इस महान पद पर नियुक्त हो गए थे जो उनकी राय में उनके शौहर का हक़ था और दूसरी वजह ये थी कि अबु बकर सिद्दीक़ रज़ियल्लाहू अन्हा ने उन्हें रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के खालिसा इम्लाक (संपत्ति) देने से इंकार कर दिया था, जिसमें मदीना से निकाले हुए यहूदियों, खैबर और क़ुदक के कृषि फार्म और नखलिस्तान शामिल था और जिनका बीबी फातिमा खुद को स्वाभाविक वारिस मानती थीं। अबु बकर सिद्दीक़ रज़ियल्लाहू अन्हा की ख़िलाफ़त के कुछ महीने बाद जब उनका निधन हो गया और बदलते हालात में अली हैदर रज़ियल्लाहू अन्हा के अंसारी समर्थकों का वो जोश ठंडा पड़ गया, जिससे शुरू में उन्होंने अली हैदर रज़ियल्लाहू अन्हा की ख़िलाफ़त के लिए संघर्ष करने का वादा किया था और दूसरी तरफ अबु बकर सिद्दीक़ रज़ियल्लाहू अन्हा की डगमगाती ख़िलाफ़त के पैर मज़बूत हो गये तो अली हैदर रज़ियल्लाहू अन्हा ने बुरे दिल से उनकी बैअत कर ली लेकिन अंसारी लीडर साद बिन ओबादा रज़ियल्लाहू अन्हा जीते जी नए खलीफा की वफादारी से दूर रहे। वो इतने नाराज़ थे कि कुरैश से रिश्ते तोड़कर अपने घर पर ही रहे और कुछ दिन बाद मदीने की रिहाइश तक छोड़कर सीरिया चले गए।

अली हैदर रज़ियल्लाहू अन्हा ने हालात से मजबूर होकर बैअत तो कर ली लेकिन उनका दिल साफ नहीं हुआ। वो और उनके हाशमी क़रीबी पहले की तरह उसी ख़याल पर जमे रहे कि ख़िलाफ़त उनका हक़ है जिस पर ग़ैर ज़बरदस्ती काबिज़ होकर उसकी बरकतों से फायदा उठा रहे हैं। बनू हाशिम के तेवर बदल गए, चोट खाकर उनका व्यवहार और ज़्यादा बेबाक हो गया। सरकार की कमिया बताना और उससे असहयोग उनका व्यवहार बना रहा।

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