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Hindi Section ( 22 March 2015, NewAgeIslam.Com)

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Bhagat Singh's Secular Legacy भगतसिंह की सेक्युलर विरासत

 

 

 

केसी त्यागी

23 मार्च, 2015

तेईस मार्च डॉ राममनोहर लोहिया का जन्म दिवस है लेकिन समाजवादी इसे उत्साह के साथ नहीं मनाते। स्वयं डॉ लोहिया ने इस दिन को बलिदान दिवस के रूप में मनाने का निर्णय किया था। भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को इसी दिन लाहौर जेल में फांसी दी गई थी। समूचे देश में अंगरेजों के विरुद्ध आक्रोश का उफान था। संयुक्त भारत में शहरों, कस्बों, गांवों में उनके बलिदान की ही चर्चा थी।

लाहौर षड्यंत्र केस के दौरान अपने मुकदमों की पैरवी भगतसिंह स्वयं करते थे। यह बहस इतनी प्रसिद्ध और रोचक हो चली थी कि मोतीलाल नेहरू, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, पंडित जवाहरलाल नेहरू और रफी अहमद किदवई सरीखे नेता भी कई अवसरों पर लाहौर कचहरी में दर्शक तथा श्रोता बने।

भारत नौजवान सभा का घोषणापत्र और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी के समय-समय पर प्रकाशित दस्तावेज भगतसिंह और उनके साथियों की विचारधारा की स्पष्टता बयान करते हैं। वे न सिर्फ बलिदान, साहस और वीरता के प्रतीक थे बल्कि प्रखर समाजवादी भी थे, और धार्मिक संकीर्णता के कट्टर विरोधी थे।

संयुक्त पंजाब, बंगाल और बिहार प्रांत के दंगों की हृदय विदारक कहानियां अब अतीत का हिस्सा हो गई हैं। उसी दौरान भारत विभाजन की नींव और आजाद भारत के सामाजिक ताने-बाने की बुनियाद में घृणा व वैमन्सय का मलबा जमा होता रहा। भगतसिंह और उनके साथी उस समय और बाद की परिस्थितियों पर नजर रखे हुए थे। उनके लेखों पर नजर डालने पर सांप्रदायिकता पर उनकी समझ की जानकारी हासिल होती है। भगतसिंह और साथियों द्वारा लिखित जून 1928 में प्रकाशित लेख में उनके विचारों की प्रखरता जाहिर है।

‘‘भारतवर्ष की दशा इस समय बड़ी दयनीय है। एक धर्म के अनुयायी दूसरे धर्म के अनुयायियों के जानी दुश्मन हैं। अब तो एक धर्म का होना ही दूसरे धर्म का कट््टर शत्रु होना है। यदि इस बात का अभी यकीन न हो तो लाहौर के ताजा दंगे ही देख लें। किस प्रकार मुसलमानों ने निर्दोष सिखों, हिंदुओं को मारा है और किस प्रकार सिखों ने भी वश चलते कोई कसर नहीं छोड़ी है।

यह मार-काट इसलिए नहीं की गई कि फलां आदमी दोषी है, वरन इसलिए कि फलां आदमी हिंदू है या सिख है या मुसलमान है। बस किसी व्यक्ति का सिख या हिंदू होना मुसलमानों द्वारा मारे जाने के लिए काफी था और इसी तरह किसी व्यक्ति का मुसलमान होना ही उसकी जान लेने के लिए पर्याप्त तर्क था। जब स्थिति ऐसी हो तो हिंदुस्तान का ईश्वर ही मालिक है।

ऐसी स्थिति में हिंदुस्तान का भविष्य बहुत अंधकारमय नजर आता है। इन धर्मोंने हिंदुस्तान का बेड़ा गर्क कर दिया है। और अभी पता नहीं कि ये धार्मिक दंगे भारतवर्ष का पीछा कब छोड़ेंगे। इन दंगों ने संसार की नजरों में भारत को बदनाम कर दिया है। और हमने देखा है कि इस अंधविश्वास के बहाव में सभी बह जाते हैं।

कोई बिरला ही हिंदू, मुसलमान या सिख होता है, जो अपना दिमाग ठंडा रखता है, बाकी सब के सब धर्म के यह नामलेवा अपने नामलेवा धर्म के रौब को कायम रखने के लिए डंडे-लाठियां, तलवारें-छुरें हाथ में पकड़ लेते हैं और आपस में सर-फोड़-फोड़ कर मर जाते हैं। बाकी कुछ तो फांसी चढ़ जाते हैं और कुछ जेलों में फेंक दिए जाते हैं। इतना रक्तपात होने पर इन धर्मजनोंपर अंगरेजी सरकार का डंडा बरसता है और फिर इनके दिमाग का कीड़ा ठिकाने आ जाता है।’’

समाचार पत्रों की भूमिका पर भी खबरों में भेदभाव के आरोप लगते हैं। सांप्रदायिक दंगों के दौरान तो तटस्थ पत्रकारों और अखबारों का मानो अकाल पड़ जाता है। भगतसिंह और उनके साथियों समेत गांधीजी तक को उसका दंश झेलना पड़ा। बापू की शहादत की तो वजह ही यही थी; उनका जीवन सांप्रदायिकता की भेंट चढ़ गया।

लेकिन धर्मांधता को लेकर क्रांतिकारी आंदोलन के नेताओं के विचार स्पष्ट थे और वे समाचार पत्रों पर भी तंज कसने से परहेज नहीं करते थे। हालांकि उस समय पाबंदी और काले कानूनों के कारण ज्यादा पत्रों का प्रकाशन नहीं होता था, लेकिन धार्मिक घृणा उस समय भी पत्रकारिता का अंग थी, जिसका उल्लेख अपने लेखों में भगतसिंह और उनके साथियों ने साफगोई से किया है।

‘‘दूसरे सज्जन जो सांप्रदायिक दंगों को भड़काने में विशेष हिस्सा लेते रहे हैं, वे अखबार वाले हैं।

पत्रकारिता का व्यवसाय, जो किसी समय बहुत ऊंचा समझा जाता था, आज बहुत ही गंदा हो गया है। यह लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर लोगों की भावनाएं भड़काते हैं और परस्पर सिर-फुटौव्वल करवाते हैं। एक-दो जगह ही नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए हैं कि स्थानीय अखबारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे हैं। ऐसे लेखक, जिनका दिल और दिमाग ऐसे दिनों में भी शांत रहा हो, बहुत कम हैं।

अखबारों का असली कर्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना, सांप्रदायिक भावनाएं हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था, लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, सांप्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगड़े करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है। यही कारण है कि भारतवर्ष की वर्तमान दशा पर विचार कर आंखों से रक्त के आंसू बहने लगते हैं और दिल में सवाल उठता है कि भारत का बनेगा क्या?’’

आज उस पर तुर्रा यह है कि कुछ खुद को राष्ट्रभक्त कहने वाले, जिन्होंने भगतसिंह के व्यक्तित्व को बिना जाने, मात्र अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए और मीडिया के एक हिस्से का ध्यान अपनी तरफ बनाए रखने के लिए भगतसिंह के व्यक्तिव को छोटा करने का प्रयास कर रहे है, जैसे भगतसिंह मात्र उस व्यक्ति का नाम है, जो जुनून में इक्कीस साल की उम्र में संसद में बम फेंक कर फांसी चढ़ गया, पर अपना चेहरा चमकाने की उनकी भूख में भगतसिंह के उस व्यक्तित्व की ओर उनकी नजर नहीं जाती जो गणेश शंकर विद्यार्थी की पत्रकारिता, उनकी लेखनी और विचारों से प्रेरित था।

भगतसिंह महज एक क्रांतिकारी नहीं बल्कि धर्मनिरपेक्षता की मिसाल, समाजवादी और एक बड़े विचारक थे। पर हमेशा गांधी बनाम भगतसिंह की बहस चला कर ये लोग शहीदे-ए-आजम के व्यक्तित्व के उस शानदार पहलू को छिपाने की कोशिश करते हैं जो कि करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। भगतसिंह के इस आयाम को आज कहीं ज्यादा शिद्दत से याद करने की जरूरत है, क्योंकि ऐसी ताकतें जो न भगतसिंह में आस्था रखती हैं न गांधी में, बस उन्हें अपने सांप्रदायिक एजेंडे से मतलब है, आज जितना सक्रिय हैं उतना पहले कभी नहीं थीं। यह भी गौरतलब है कि इन ताकतों ने अपने को आजादी की लड़ाई से दूर रखा था और केवल फसाद फैलाने में मुब्तिला थीं।

भगतसिंह के अनुसार ‘‘समाज का वास्तविक पोषक श्रमजीवी है। जनता का प्रभुत्व मजदूरों का अंतिम भाग्य है। इन आदर्शों और विश्वास के लिए हम उन कष्टों का स्वागत करेंगे, जिनकी हमें सजा दी जाएगी। हम अपनी तरुणाई को इसी क्रांति की वेदी पर होम करने लाए हैं, क्योंकि इतने गौरवशाली उद््देश्य के लिए कोई भी बलिदान बहुत बड़ा नहीं है।

समाज का सबसे आवश्यक अंग होते हुए भी उत्पादन करने का या मजदूरों से शोषकगण उनकी मेहनत का फल लूट लेते हैं। एक ओर जहां सभी के लिए अनाज पैदा करने वाले किसानों के परिवार भूखों मरते हैं, वहीं सारे संसार को सूट जुटाने वाला बुनकर अपना और अपने बच्चों का तन ढकने के लिए पर्याप्त कपड़ा नहीं पाता, शानदार महल खड़ा करने वाले राजमिस्त्री, लेबर और बढ़ई, झोपड़ियों में ही बसर करते और मर जाते हैं। और दूसरी ओर पूंजीपति, शोषक अपनी सनक पर करोड़ों बहा देते हैं।’’

उन्होंने कहा था कि ‘‘क्रांति से हमारा आशय यह है कि समाज में एक ऐसी व्यवस्था की स्थापना की जाए, जिसमें इस प्रकार के हड़कम्प का भय न हो और जिसमें मजदूर वर्ग के प्रभुत्व को मान्यता दी जाए और उसके फलस्वरूप विश्व पूंजीवाद के बंधनों, दुखों तथा युद्धों से मानवता का उद्धार कर सकें।’’

जैसे-जैसे भगतसिंह समाजवादी सिद्धांतों का अध्ययन करके उनके मूल तथ्य को हृदयंगम करते गए उनका यह दृढ़ मत होता गया कि क्रांति का वास्तविक मार्ग मेहनतपेशा लोगों को जोड़ना तथा संगठित करना ही है। अपनी फांसी से कुछ ही पहले लाहौर सेंट्रल जेल के अधीक्षकके नाम लिखे गए एक पत्र में उन्होंने कहा था-

‘‘यह मेरा दृढ़ विश्वास है कि हमको बमों और पिस्तौलों से कुछ हासिल नहीं होगा। हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्रीय सेनाके इतिहास से यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है। बम चलाना निरर्थक ही नहीं, अक्सर हानिकारक भी होता है, हालांकि कुछ परिस्थितियों में उसकी अनुमति दी जा सकती है जिसका मुख्य उद्देश्य मजदूरों और किसानों को संगठित करना ही होना चाहिए।’’

भगतसिंह से पहले बंगाल और पंजाब में बड़े-बड़े साहसी और प्राणों को तिनके की भांति समर्पित कर देने वाले क्रांतिकारी उत्पन्न हो चुके थे। पर अधिकांश लोग राजनीतिक और क्रांतिकारी आंदोलन का यही उद्देश्य समझते थे कि देश के शोषक अंगरेजों को हटा कर भारतीयों का शासन स्थापित हो जाए। पर वह शासन कैसे हो और उसमें जनता के क्या अधिकार हों, इस संबंध में अधिकांश लोग कुछ चिंतन नहीं करते थे।

वे यही विचार कर संतोष कर लेते थे कि जब विदेशी राज हट जाएगा और उसकी जगह भारतीयों का राज स्थापित हो जाएगा तो सब त्रुटियां और शिकायतें अवश्य ही दूर हो जाएंगी। उनके सामने क्रांति की सफलता के बाद नवीन समाज की रचना का कोई स्पष्ट चित्र नहीं था। उनकी अवधारणा बहुत ही अस्पष्ट और भ्रमपूर्ण थी, जिसे भगतसिंह ने बड़ी हद तक दूर करने की चेष्टा की थी। यह एक बड़ी प्रशंसा की बात है कि भगतसिंह ने बम और पिस्तौल को ही मुख्य आधार मानने वाले क्रांति आंदोलन को कम ही समय में समाजवादी विचारों का अनुयायी बना दिया।

Source: http://www.jansatta.com/politics/bhagat-singh-secular-heritage/22031/#sthash.uli12QBp.dpuf

URL: http://newageislam.com/hindi-section/kc-tyagi/bhagat-singh-s-secular-legacy--भगतसिंह-की-सेक्युलर-विरासत/d/102061

 

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