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Hindi Section ( 17 Apr 2017, NewAgeIslam.Com)

The Sacred Life of Khawaja Ghareeb Nawaz ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ का मुबारक जीवन


कनीज़ फातिमा सुल्तानी सिद्दीकी

अल्लाह तआला ने जिन पवित्र हस्तियों का जिक्र अपने पवित्र कुरआन में निहायत ही सुनहरे तरीके से यानी पीड़ा और भय दोनों को नकारनें के साथ उन्हें अपना दोस्त बताते हुए लोगों को चेतावनी दी है कि  मानव जाति सुनो! अल्लाह का दोस्त और प्रेमी कौन है फरमाया, “अल्लाह के वलियों को किसी बात का डर और दुख नहीं होता”, ... क्यों कि वह जब जो चाहते हैं अल्लाह के हुक्म से उनके लिए हाज़िर होता है इसलिए न उन्हें इन चीजों के अधिग्रहण की पीड़ा है और न ही उनके विनाश का डर इसलिए यह दुनिया और उसकी चीजों से बिल्कुल बेनियाज़ और फना फिल्लाह होकर अपना जीवन व्यतीत करते  हैं।

उन्ही उक्त प्रशंसनीय हस्तियों में से एक वह हस्ती भी है जिसने पूरे भारत पर बड़ा एहसान फरमा कर सारे भारतीयों को नैतिक और आध्यात्मिक सभी रोग से शिफा बख्शा और उन्हें उनका खोया हुआ स्थान प्रदान किया और इतना नवाज़ा कि दुनिया आपको ग़रीब नवाज़ के नाम से पुकारने लगी और आपकी यह उदारता और दरिया दिली केवल उसी समय के भारतीयों पर नहीं बल्कि आज और रहती दुनिया तक सदैव के लिए बन्दा नवाज़ बनकर हम मँगतों के दस्तगीर, सुल्ताने हिन्द बन गए जिसकी मिसाल मिलना कठिन हैl  वे हमारी आत्मा के सुल्तान तब भी थे और आज भी हैं और हमेशा रहेंगे। आज कुर्सी चाहे किसी को मिल जाए सरकार तो ख्वाजा ही की है! (कुर्सी पर चाहे कोई बैठे ......... राजा तो हमारे ख्वाजा हैं)

हज़रत ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ का जन्म

प्राचीन उल्लेख करनें वालों ने जन्मतिथि का उल्लेख नहीं किया है। प्रोफेसर ख़लीक़ अहमद निज़ामी का कथन है कि हज़रत शेख अब्दुल हक़ मुहद्दिस देहलवी रहमतुल्लाह अलैहि ने आपके मृत्यु का साल 633 हिजरी स्वीकार किया है। (अखबारुल अख्यार, फारसी, पृष्ठ: 22) मौलाना जमाल ने लिखा ... '' ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ की उम्र शरीफ 97 साल हुई (सैरुल आरेफीन, फारसी, पृष्ठ: 16) इस आधार पर गणना से आपकी जन्म का साल 536 हिजरी करार पाता है। ''

ख्वाजा गरीब नवाज़ का जन्म स्थान

मौलाना अब्दुल बारी अजमेरी के कहने के अनुसार, हेरात के पास एक बहुत बड़ा क्षेत्र सीस्तान के नाम से मशहूर है इस क्षेत्र के निवासी अपनी भाषा में उसे सीतान कहते हैं और अरब के लोग सजिस्तान और सजिस्तानी को संक्षिप्त करके सजज़ी बोलते हैंl प्रोफ़ेसर ख़लीक़ अहमद निज़ामी स्वर्गीय ने मशाईखे चिश्त के इतिहास में पीराने चिश्त के हवाले से (जिसका प्राचीन क़लमी नुस्खा उनके पास था) लिखा है कि ख्वाजा साहब का वतन सजिस्तान था और इसी वजह से ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ को सजज़ी कहा जाता है, जो लेखक की गलती से संजरी हो गया।

सुल्ताने हिन्द और ज्ञान प्राप्ती के लिये यात्रा

ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ ज्ञान को प्राथमिकता देते हुए ज्ञान प्राप्ती के लिए यात्रा का इरादा किया और अपने घर से पैदल निकल पड़े। इस दौर में समरकंद और बुखारा अध्ययन और कला के केंद्र थे। आपने वहाँ रहकर ज़ाहिरी उलूम (ज्ञान) की प्राप्ती की। अधिक संभावित यह बात है कि पहले आप समरकंद में ठहरे। बहरहाल सभी लेखक सहमत हैं कि समरकंद और बुखारा मे आपने ज़ाहिरी उलूम का समापन किया। सबसे पहले कुरआने पाक याद किया। (सैरुल आरेफीन, फारसी, पृष्ठ: 5, उर्दू अनुवाद सैरुल अक़ताब, पृष्ठ: 137)

समरकंद में आप (कुरान और हदीस की ज़बान को समझने के लिए) सर्फ़, नहव,  उसूले फ़िक्ह, हदीस, उसूले हदीस, तफसीर और अन्य तर्कसंगत ज्ञान प्राप्त किये। (हमारे ख्वाजा, पृष्ठ: 1)

मौलाना अब्दुल बारी अजमेरी ने लिखा है '' विद्यार्थी काल में आप ने समरकंद और बुखारा में कई शिक्षकों से लाभ उठाया लेकिन चर्चा लेखकों ने आपके शिक्षकों की सूची में केवल एक मौलाना हेसामुद्दीन का नाम लिखा है। (हमारे ख्वाजा, पृष्ठ: 6)

किताब “अह्सनुस्सैर” के लेखक, “तारीख़े फरिश्ता” (जिल्द द्वितीय) और “ख़ज़ीनतुल असफिया” (जिल्द द्वितीय) के लेखकों ने मौलाना हेसामुद्दीन बुखारी के अलावा मौलाना मुशर्रफुद्दीन “शरउल इस्लाम” किताब के लेखक को भी आपका शिक्षक बताया है।

मदीना तैयबा में ख्वाजा गीरब नवाज़ का दरसे हदीस

मौलाना अब्दुल बारी अजमेरी ने लिखा है। '' मौलाना सैयद हाशिम फतेहपुरी मुझसे कहते थे कि उन्होंने आसफिया पुस्तकालय में पांचवीं या छठी शताब्दी हिजरी के एक मुहद्दिस (इल्मे हदीस में माहिर) का लिखा हुआ मुहद्देसीन का तजकेरा देखा है। इस पुस्तक में हमारे ख्वाजा के संबंध में लिखा है कि आप ने तीन साल तक मदीना तैयबा में रहकर हदीस का दर्स दिया है। अटकलें कहती हैं कि ज्ञान के पूर्ण होने के बाद आपनें यह दरसे हदीस (हदीस की तालीम) का वर्ग सजाया होगा ''। (हमारे ख्वाजा, पृष्ठ: 7)

बहरहाल यह स्वीकार करना होगा कि ख्वाजा हिन्द अपने जमाने के दिग्गज आलिम थे।

ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ और मुरशिद की तलाश

अल्लाह की सुन्नत जारी है कि कोई व्यक्ति चाहे माँ के पेट से ही वली बन कर पैदा हुआ हो या ना हो किसी मुर्शिदे तरीक़त का दामन पकड़ना आवश्यक है। हज़रत गौस पाक ने भी मादर ज़ाद वली होने बावजूद मुर्शिद का दामन पकड़ा, इसी प्रकार आप भी मुर्शिद की तलाश में निकल पड़े। कस्बा हरुन क्षेत्र के नीशापुर में रहने वाले हजरत ख्वाजा उस्मान हरूनी चिश्तिया संबंध के बहुत बड़े बुजुर्ग थे और आपकी विलायत की महानता के गीत लोगों की ज़ुबान पर था। आप उनकी खिदमते आली में 562 हिजरी में (ग़ौस पाक की मृत्यु के एक वर्ष बाद) हाज़िर हुए और आपसे मुरीद हो गए। मुरीद होने के बाद ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ बीस साल तक खिदमते मुर्शिद में व्यस्त रहे, यहां तक कि यात्रा में पीर व मुरशिद का बिस्तर सिर पर उठाकर बराबर उनके साथ रहे। (उर्दू अनुवाद सैरुल औलिया, पृष्ठ: 138, उर्दू अनुवाद सैरुल औलिया, पृष्ठ: 43, मुद्रित दिल्ली, 2007) किताब सैरुल औलिया हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के ज़मानें के आस पास की लिखी है।

जीवन का उद्देश्य पूरा होने की खुशखबरी

अगरचे बीस साल की सेवा के बाद ग़रीब नवाज़ की बातिनी शिक्षा पूरी हो गई और खिलाफत मिली, लेकिन यहां यह स्पष्ट करना चाहिए कि बैअत होने के तुरंत बाद ही पीर व मुरशिद की मुबारक जबान से यह खुशखबरी सुनी कि '' मोईनुद्दीन तुम्हारा काम पूरा हो गया। '' (सैरुल अक्ताब, उर्दू अनुवाद, पृष्ठ: 138)

अंततः आपको ख्वाजा उस्मान हरूनी ने खिलाफत से सरफ़राज़ किया। (सैरुल आरेफीन, फारसी, पृष्ठ: 5) इसके अलावा जो तबर्रुकात सिलसिले के बुजुर्गों से पीर व मुरशिद को मिले थे सब गरीब नवाज़ को प्रदान कर दिए। (हमारे ख्वाजा पृष्ठ: 9, सैरुल अक्ताब, उर्दू अनुवाद, पृष्ठ: 138)

ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ का विभिन्न शहरों में यात्रा का लक्ष्य

प्रोफेसर खलीक अहमद निज़ामी ने हिन्दुस्तान आने से पहले ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ की यात्राओं का कारण इस तरह बयान किया है।

बुखारा और समरकंद की यात्रा तो ज्ञान प्राप्त करनें के लिए किए गए। फिर नीशापुर के कस्बे हरुन में आकर अपने पीरे तरीक़त से बीस साल लाभ प्राप्त किया और उनका बिस्तर मुबारक सर पर रख कर चलते रहे। फिर अकेले यात्रा की और उन अकाबिर, मशाईख और उलेमा से मुलाक़ातें कीं जो उस दौर के धार्मिक चिंता और प्रक्रिया पर गहरा प्रभाव रखते थे। (सैरुल औलिया, पृष्ठ: 45)

फिर उस दौर के मुस्लिम संस्कृति के अक्सर केन्द्र (जैसे बगदाद, नीशापूर, तबरेज़, ओश,अस्फहान, सब्ज़वार, महना, ख़रकान, इस्तर आबाद, बलख और गज़नैन) की यात्रा की ताकि मुसलमानों की धार्मिक जीवन के महत्वपूर्ण रुजहानात का गहराई से अध्ययन करें। आपके नैतिक और आध्यात्मिक विशेषताओं और मूल्यों नें कई मशाईख को आपकी ओर आकर्षित किया और आपनें सब्ज़वार और बलख में अपने खलीफा मुक़र्रर किये। शेख औहिदुद्दीन किरमानी और शेख शहाबुद्दीन सहरवर्दी की तरह और कई मशाईख ने आपकी आध्यात्मिक साहचर्य से लाभान्वित हुए। उन सभी क्षेत्रों का दौरा किया जो अब कराखताई और गज़ कबीलों के हमलों के घाव खानें वाले थे और अभी ठीक नहीं हुए थे और जो अभी मंगोलों की लाई हुई बर्बादी से दो चार होने वाले थे।

बगदाद में आतिश परसस्तों को दावते इस्लाम

साहबे सैरुल अक्ताब का बयान है कि बगदाद में सात आतिश परसस्त थे, जो अपनी साधना के कारण विशेष रूप से प्रसिद्ध थे। छह-छह महीने में एक लुकमा खाते थे। इस आधार पर बहुत अधिक लोग उनके मानने वाले थे। एक दिन यह सातों सज्जन ख्वाजा साहब से मुलाक़ात के लिए आए। हजरत ख्वाजा की जैसे ही उन पर नजर पड़ी वह सब भय से काँपने लगे और चेहरे का रंग पीला पड़ गया। वह कदमों पर गिर पड़े। हज़रत ख्वाजा ने उनसे कहा कि ऐ बे दीनों! अल्लाह से तुम्हें शर्म नहीं आती कि उसे छोड़ कर दूसरी चीज को पूजते हो। इन लोगों ने कहा, हे ख्वाजा! हम लोग डर कर आग को पूजते हैं कि शायद कल यह हमको ना जलाए। हजरत ख्वाजा ने कहा कि मूर्ख! जब तक खुदा की पूजा ना करोगे, आग से छुटकारा नहीं पा सकते। इन लोगों ने कहा कि हज़रत आप तो अल्लाह को पूजते हो अगर यह आग आपको ना जलाए तो हम लोग आपके आकाश वाले खुदा पर ईमान ले आएंगे। हजरत ख्वाजा ने कहा कि अल्लाह का हुक्म होगा तो यह आग मोईनुद्दीन के जूते नहीं जला सकती। आग वहाँ पर मौजूद था। आपने उसी समय अपने जूते में डाल दिए और कहा, हे आग मोईनुद्दीन के जूते की रक्षा करना। तभी आग ठंडी हो गई और गैब से आवाज आई जिसे दर्शकों ने भी सुना कि आग की क्या मजाल जो मेरे दोस्त के जूते को जला दे। उन पारसियों की जमाअत हज़रत की महिमा और गरिमा से प्रभावित होकर उसी समय मुशर्रफ ब इस्लाम हुई और उन लोगों ने हज़रत की नौकरी साध ली और फिर कुछ ही समय में औलिया ए कामिल में से हो गए। (सैरुल अक्ताब उर्दू अनुवाद, पृष्ठ: 139 से 140)

तथ्य यह है कि हज़रत ख्वाजा मदीना तैयबा से भारत की यात्रा के लिए अंतिम नबी के सफीर बनकर चले तो इन कदमों की छाप से तब्लीगे इस्लाम की राहें रोशन हो गईं और कुफ्र का अन्धेरा दूर होने लगा।

भारत में ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ से पहले मुसलमानों की आबादी

प्रोफेसर खलीक अहमद निजामी ने लिखा है। '' आम तौर पर यह ख़याल है कि भारत में मुसलमानों की आबादी मुहम्मद ग़ौरी के हमलों के बाद शुरू हुई। यह विचार गलत नहीं भ्रामक भी है। मोहम्मद गौरी के हमले से पहले (यानी हिन्दू राजाओं के राज में) भारत में कई जगह मुसलमानों की नई आबादियाँ थीं जहां उनके मदरसे, खानकाह और धार्मिक संस्थान स्थापित थे। जो लोग धार्मिक संस्थानों के गठन और निर्माण की हतोत्साहित कठिनाइयों का थोड़ा सा भी अनुभव रखते हैं वही उनके दुख का भी अनुमान लगा सकते हैं जिनसे उनके बड़ों को दो चार होना पड़ा। अजमेर के अलावा जहां ख्वाजा मोईनुद्दीन ने पृथ्वीराज के ज़माने में अपनी खानकाह बनाई थी, बदायूं, कन्नौज, नागौर और बिहार के कुछ शहरों में मुसलमानों की खासी आबादी थी। बनारस (हिंदू) विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर डॉ आरयस त्रिपाठी ने कन्नौज से संबंधित एक पुस्तक प्रकाशित की है जिसमें बताया है कि कन्नौज में मुसलमानों की सरकार स्थापित होने से पहले मुसलमान मौजूद थे। बिहार के बारे में भी आधुनिक जांच यही है कि मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी की जीत (1199 ई।) से पहले वहाँ सोफिया और बुज़ुर्गाने दीन पहुँच चुके थे।' (तारीखे मशाईख चिश्त, पृष्ठ: 144)

उपरोक्त इबारत में निज़ामी साहब ने खानकाह बनाने की बात मंसूब की है जबकि बाबा फरीद गंज शकर के अनुसार, ख्वाज्गाने चिश्त में खानकाह बनाने का रिवाज नहीं थाl  गरीब नवाज ने अजमेर में स्थायी प्रवास किया था। ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ तुर्कों की जीत से पहले भारत में आ चुके थे और सिलसिला चिश्तिया का गठन प्रक्रिया में आ गया था।

जब ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ भारत आये तो शहर के पास जंगल में पहुंच गए जहां इस समय अजमेर बसा है। इस जंगल के एक बड़े पेड़ की छाया में आपनें अपने चालीस साथियों के साथ आराम फरमाया, और आपके आदेश पर ऊंट के बैठकर न उठने वाली मशहूर घटना इसी जगह घटी। इस शहर की जिस पहाड़ी पर ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ ने कयाम किया वहाँ एक गुफा भी था जो अब तक मौजूद है और ख्वाजा साहब का चिल्ला कहलाता है। इसी गुफा में या उसी से बाहर पृथ्वी तल पर आसमानी शामियाने के नीचे ख्वाजा साहब ने अपने सभी हमराहियों के साथ स्थायी रूप से रहना अपनाया और अल्लाह सर्वशक्तिमान की पूजा में हर समय व्यस्त रहने लगे। (स्रोत: हमारे ख्वाजा, पृष्ठ 20)

क्योंकि वहाँ के लोगों के लिए एक खुदा जिसका कोई साझी नहीं की पूजा का यह तरीका नया था, इसलिए उन्होंने अपनी नाराजगी को विरोध के रूप में व्यक्त किया। कुछ लोगों ने ख्वाजा साहब पर हमला भी किया, लेकिन अल्लाह सर्वशक्तिमान की कृपा से आप सुरक्षित रहे। अजमेर के विरोधियों ने ग़रीब नवाज़ का पूजा का नया तरीका देखकर जो आक्रोश व्यक्त किया वह उनकी अपने धर्म अपने धर्म के बारे में अनजान होने का नतीजा था। ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ की यह प्रक्रिया हमारे लिए नमूना है कि आप अपने प्रतिद्वंद्वी के हर हमले और पीड़ा के बावजूद धैर्य के दामन को हाथ से छूटने न दिया। लोग आपके ज्ञान और प्रक्रिया और करामत व बुज़ुर्गी ज़ुहद और शील को देखकर खुद इस्लाम स्वीकार करने को तैयार होने लगेl ख्वाजा गरीब ने दावत का सबसे अच्छा नमूना पेश किया,  उन्होंने कभी किसी को जबरन इस्लाम की दावत नहीं दी। वह जबरन मुसलमान बना नहीं सकते थे क्योंकि कुरआन ने निम्नलिखित आयत में जबरन मुसलमान बनाने से सख्ती से रोका है।

क़ुरआन की आयतें:

1। لا اكراه في الدين .... यानी धर्म में कोई बाध्यता नहीं (सूरःअलबक़रा, आयत: 256)

2। لكم دينكم ولي دين ..... तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन और मेरे लिए मेरा दीन। (सुराः काफेरून: पारा: 30)

पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम जब मक्का से हिजरत फ़रमाकर मदीना आए तो आपने यहूद से जो अनुबंध किया उसमें भी यही शब्द थे ....

لنا ديننا ولكم دينكم यानी हमारे लिए हमारा धर्म है और तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन।

(3) (ऐ नबी) बुलाइए लोगों को अपने रब की ओर ज्ञान और अच्छी सलाह के साथ और यदि वे चर्चा और विवाद करें तो भी उनके साथ बेहतर तरीका अख्तियार करें । (सूरः नख्ल, आयत: 125, पारा: 14)

एक आयत में तो कुराने हकीम ने गैर मुसलमानों के खुदाओं को भी बुरा कहने से मना किया। (सूरः इनआम आयत 108 पारा 7)

यानी वे परमेश्वर के अलावा जिन्हें पुकारते हैं आप उन्हें यानी उनके खुदाओं को बुरा ना कहो, अन्यथा वे अल्लाह को अपनी अज्ञानता के कारण बुरा कहने लगेंगे।

ग़रीब नवाज़ बेशक वास्तविक दाई ए इस्लाम बनकर आए लेकिन उनका तबलीग करने का तरीका ऐसा न था कि किसी की दिल आज़ारी हो या किसी को किसी प्रकार की मानसिक पीड़ा पहुंचे। आप अंधाधुंध धर्म व मिल्लत के बेसहारों को सहारा दे रहे थे, कमजोर लोगों, गरीबों और समाज के पिछड़े वर्गों को कल्याण का रास्ता दिखला रहे थे। आपके अच्छे आचरण, विशेषताओं और फयूज़ बातिना से प्रभावित होकर लोग स्वतः बड़ी तादाद में इस्लाम में प्रवेश कर रहे थे। यहाँ केवल यह निवेदन करना है कि जो ज़ाते गिरामी सरजमीं हिन्द को मानवता के उच्च मूल्यों से अवगत करा रही थी और भारत के वासियों को उनका भूला हुआ सबक यानी कल्पना एकेश्वरवाद याद दिलाकर उनमें मानव समानता, भाईचारे और पारस्परिक मदद का संदेश आम कर रही थी इससे पुजारियों का “आमादह पैकार” होना एक निंदनीय प्रक्रिया थी। हिन्दुओं की धार्मिक पुस्तक महाभारत में ऐसे लोगों के धर्म की निंदा की गई है, जो दूसरे के धर्म प्रचार को रोकते हैं, महाभारत के श्लोक ये है:

धर्म यो बाधते धर्मो न स धर्म: कुधर्म तत-|

अवीरोधात तु यो धर्म: स धर्म: सत्यविक्रम वन १३१.११

यानी वह धर्म जो दूसरे के धर्म प्रचार को रोकता है वह अच्छा धर्म नहीं है बल्कि बुरा मज़हब है, जो धर्म दूसरे धर्म के प्रचार में बाधा नहीं डालता वही सच्चा धर्म है।

सुल्ताने हिंद का अंतिम समय और सफरे आख़िरत की तैयारी

632 हिजरी के शुरू होते ही ख्वाजा बुजुर्ग को ज्ञान हो गया कि यह जीवन का आखिरी साल है और जल्द ही संसार से विदा होकर आख़िरत की ओर यात्रा करना है। इसलिए आपने अपने गुलामों को आवश्यक निर्देश और वासीयतें करना शुरू कर दीं। जिन लोगों को खिलाफत नहीं दी थी उन्हें इस धन से सम्मानित किया और सिलसिला ए चिश्तिया के बुजुर्गों से जो तबर्रुकात आपको मिले थे वह अपने उत्तराधिकारी बाबा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी को इनायत किए और रब के पास पहुँचने के शौक में आपकी जिज्ञासा दिन प्रति दिन बढ़ती गई। (हमारे ख्वाजा, पृष्ठ: 83)

हुजुर ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ का मुबारक विसाल

रजब के पांचवीं तारीख (632 हिजरी) को इशा की नमाज़ के बाद जब ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ दिनचर्या के अनुसार हुजरे का दरवाजा बंद करके अल्लाह की याद में संलग्न हुए और हुजरे के पास रहने वाले ख़ुद्दाम (जिनकी औलादे अमजद आज खिदमत कर रही है) रात भर आपके दर्द और ज़िक्र की आवाज सुनते रहे। सुबह होने से पहले यह आवाज बंद हो गई। सूरज निकलने के बाद भी जब दरवाजा नहीं खुला तो ख़ुद्दाम ने दस्तकें दीं। फिर आखिर में मजबूरन दरवाजा तोड़कर अन्दर प्रवेश किया और देखा कि आप खुदा के पास पहुंच गए हैं। (सैरुल अक्ताब, उर्दू अनुवाद, पृष्ठ:155 क, हमारे ख्वाजा, पृष्ठ: 39)

किताब “सैरुल औलिया” के लेखक का बयान है कि जिस रात ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन संजरी ने मृत्यु पाई थी कुछ बुजुर्गों ने हुजूरे पाक सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को सपने में देखा कि हुजुर फ़रमा रहे हैं खुदा का दोस्त मोईनुद्दीन आ रहा है। हम उसके स्वागत के लिए आए हैं। जब आप वफ़ात पा तो आपके मुबारक माथे पर यह लेख दिखाई दिया खुदा के दोस्त ने उसकी मुहब्बत में मौत पाई। (सैरुल औलिया, फारसी, पृष्ठ: एफ 48) انا لله وانا اليه راجعون

ऐसी अबकरी व्यक्तित्व जिनकी पवित्र जीवन के हर एक पल खुदा की याद में खर्च हुआ हो भला उनकी प्रशंसा और तौसीफ हम नाचीज़ों से कहाँ अदा हो सकती है संक्षेप में उनके इस जीवन से हमें जो कुछ मिला वही हमारे लिए मिसाल बन सकती है| अल्लाह पाक सभी मुसलमानों को अपनी मुहब्बत करने वालों की तरह जीवन बिताने की समझ अता फरमाए और महशर के दिन हमारी गिनती भी उनके सच्चे पक्के गुलामों में करेl  आमीन

स्रोत:

1. सैरुल अक्ताब (फारसी) शैखुल्लाह दिया चिश्ती, नवल किशोर 1881

2. सैरुल अक्ताब उर्दू अनुवाद द्वारा मुहम्मद मुईनुद्दीन दरदाई, प्रकाशक फरीद बुक डिपो दिल्ली

3. सैरुल औलिया फारसी: सैयद मोहम्मद मुबारक अल्वी किरमानी उर्फ अमीर खुर्द, उर्दू अनुवाद डॉक्टर अब्दुल लतीफ, मुद्रित दिल्ली 1990

4. सैरुल आरेफीन फारसी: हामिद बिन फजलुल्लाह जमाली देहलवी

5. सैरुल आरेफीन उर्दू अनुवाद द्वारा मुहम्मद अय्यूब कादरी

6. सैर आलामुल नबला, अल्लामा ज़हबी जिल्द 3

7. सीरत ख़्वाजा ग़रीब नवाज़: अब्दुल रहीम कादरी, मकतबा रहीमया

8. अवारिफुल मआरिफ अरबी: शेख शहाबुद्दीन सहरवर्दी, दारुल क़ुतुब अरबिया, बेरूत 1966

9. अवारिफुल मआरिफ उर्दू अनुवाद: शम्स बरेलवी

10. अखबारुल अखियार, शेख अब्दुल हक़ मुहद्दिस देहलवी

11. तारीख मशाईख चिश्त, नदव्तुल मुसंनेफीन, उर्दू बाज़ार दिल्ली

12. हमारे ख्वाजा: मौलाना अब्दुल बारी मअना अजमेरी अलैहिर्रहमा, दसवां प्रकाशन, 1998

13. तारीख ख्वाजा ख्वाज्गान: प्रोफेसर हाफिज सैयद मोहम्मद ज़िया उद्दीन शम्सी तेहरानी

मोहतरमा कनीज़ फातिमा सुल्तानी सिद्दीकी देहलवी आलिमह और फ़ाज़िलह और उर्दू की लेखक हैं,  वह फ़िलहाल जामिया मिलिया इस्लामिया में बीए अरबिक (ऑनर्स) की छात्रा हैं।

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