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Hindi Section ( 11 Jun 2021, NewAgeIslam.Com)

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What is the Islamic system of Adl (Justice) between Muslims and Non-Muslims? मुसलमानों और गैर मुस्लिमों के बीच न्याय का इस्लामी निज़ाम क्या है?

कनीज़ फातमा, न्यू एज इस्लाम

उर्दू से अनुवाद, न्यू एज इस्लाम

२ जून २०२१

किस तरह इस्लाम मुस्लिम और गैर मुस्लिम के बीच न्याय को यकीनी बनाता है?

महत्वपूर्ण बिंदु

·         लोगों के बीच न्याय करते समय इस्लाम अदल व इंसाफ की शिक्षा देता है

·         मुस्लीम और गैर मुस्लिम न्याय अधिकार के बराबर के हक़दार हैं

·         सहाबा की ज़िन्दगी में न्याय के उदाहरण (सहाबा किराम)

·         अल्लाह उन न्यायाधीशों को पसंद करता है जो लोगों के बीच न्याय करतें हैं।

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इस्लाम ने बिना मज़हब और कौम के फर्क के तमाम लोगों और कौमों के साथ न्याय संगत व्यवहार करने का आदेश दिया है। इस्लाम ने गुंडा गर्दों और कानूनविहीन लोगों के साथ नरमी बरतने को समाज के लिए बहुत ही हानिकारक और नुक्सान पहुंचाने वाला कार्य बताया है। इसलिए इस्लाम ने न्याय और इंसाफ के मामले में सामान व्यवहार की कदम कदम पर तलकीन की है। अल्लाह पाक ने अपने हबीब रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को मदीने में इस्लाम के सबसे बड़े दुश्मन यहूदियों के बारे में आदेश दिया कि जब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उनके बीच फैसला करें तो पूरा न्याय खातिर में रखें।

अल्लाह पाक का इरशाद है: و ان حکمت فاحکم بینھم بالقسط ان اللہ یحب المقسطین (سورہ نساء: ۵۸) अर्थात अगर आप उनके बीच फैसला करें तो इंसाफ के साथ करें, बेशक अल्लाह इंसाफ करने वालों को पसंद फरमाता है।

इस आयते करीमा में अल्लाह पाक ने अपने रसूल के जरिये तमाम इंसानों को इंसाफ करने का आदेश दिया है। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इस आदेश को अपनी अमली ज़िन्दगी में बरत कर दिखाया और यही मिजाज़ आप से आपके सहाबा ने पाया।

हजरत उमर रदी अल्लाहु अन्हु की अदालत में एक मुसलमान और यहूदी का मुकदमा आया तो आप रदी अल्लाहु अन्हु ने निजामे अदल को नाफ़िज़ करते हुए यहूदी के हक़ में फैसला फरमाया (अल तरगीब वल तरहीब: ३,५४४)

हज़रत जाअद बिन हुबैरा रज़ीअल्लाहु अन्हु ने हज़रत अली रदी अल्लाहु अन्हु से अर्ज़ किया कि आपके पास दो शख्स आते हैं, जिनमें से एक आपसे अपनी जान से बढ़ कर मोहब्बत रखता है और यह दुसरा शख्स आपसे इतना बुग्ज़ रखता है कि अगर बस चले तो आप रदी अल्लाहु अन्हु को ज़बह कर दे, लेकिन आप उस मोहब्बत रखने वाले के मुकाबले बुग्ज़ रखने वाले के हक़ में फैसला करते हैं, हज़रत अली रदी अल्लाहु अन्हु ने फरमाया कि अगर यह फैसला मेरे इख्तियार की चीज होती तो मैं वही करता जो तुम ख्याल कर रहे हो, लेकिन यह अल्लाह के इख्तियार की चीज है: لو کان لی فعلت، انما ذا شیء للہ। (मुख़्तसर हयातुस्सहाबा: ३४२)

अदल में बराबरी के सुलूक का हाल यह था कि खुद हज़रत उमर रदी अल्लाहु अन्हु अपने खिलाफत के दौर में हज़रत ज़ैद बिन साबित रदी अल्लाहु अन्हु के यहाँ मुकदमे के फरीक बन कर आए, हज़रत ज़ैद ने उनके सम्मान में हज़रत उमर को अपने करीब बैठाना चाहा, हज़रत उमर को यह बात पसंद नहीं आई और फरमाया कि यह तुम्हारा पहला ज़ुल्म है, मैं अपने फरीक के साथ ही बैठूंगा। (कंजुल आमाल: ३,२७१)

इंसाफ को यकीनी बनाने और बराबरी का सुलूक बरकरार रखने के लिए फुकहा ने क़ाज़ी के लिए इस बात को भी मना किया कि वह मुकदमे के पक्षों या जिन लोगों की मुकदमें में आने की उम्मीद हो उनसे हदिया कुबूल करे।

इंसाफ के साथ फैसला करना

निजामे अदल व अदालत की रूह ही यह है कि बिना मज़हब व मिल्लत के फर्क के इंसाफ के साथ फैसला किया जाए। दोनों पक्षों में से असल में किसी की रिआयत ना की जाए। उलेमा ने फरमाया कि हाकिम को चाहिए कि पांच बातों में से दोनों पक्षों के साथ बराबर सुलूक करे:

१- अपने पास आने में जैसे एक को मौक़ा दे, दुसरे को भी दे।

२- बैठने की जगह दोनों को एक जैसी दे

३- दोनों की तरफ बराबर ध्यान दे

४- कलाम सुनने में हर एक के साथ एक ही तरीका रखे

५- फैसला देने में हक़ की रिआयत करे जिसका दुसरे पर हक़ हो पूरा पूरा दिलाए।

हदीसे पाक में है कि इंसाफ करने वालों को कुर्बे इलाही में नूर के मिम्बर अता किये जाएंगे। (मुस्लिम १८२७) (खजाइनुल इरफ़ान, सुरह निसा आयत ५८)

इस्लाम ने अदल व इंसाफ के कयाम पर बहुत जोर दिया है और इसको बरकरार रखने वालों को बशारत व खुशखबरी सुनाई है। हज़रत इब्ने अब्बास से मरवी है कि जब कोई कौम समझौतों की खिलाफ वर्जी  करने लगती है तो अल्लाह उनके दिलों में दहशत डाल देता है। जब वह वज़न और नापने में धोका देना शुरू कर देते हैं तो उनका रिजक कम हो जाता है। जब नाहक फैसले होने लगते हैं तो खून खराबा फ़ैल जाता है और समझौतों की खिलाफवर्जी करने वालों पर दुश्मन ग़ालिब हो जाता है। (मौता इमाम मालिक) नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपनी उम्मत को शिक्षा दी हैलोगों के बीच फैसला करो तो ठीक उसी तरह जिस तरह तुम चाहते हो कि तुम्हारे बीच फैसला हो (मिश्कातुल मसबीह पृष्ठ ३२२)

लेकिन आज हम देखते हैं कि फैसला उन लोगों के हक़ में दे दिया जाता है जो फैसला करने वाले के करीबी हों या किसी तरह का रब्त हो। इस्लाम ने स्पष्ट कर दिया है कि, उन लोगों के लिए आखिरत में एक खौफनाक अज़ाब मुन्तजिर है जो नाजायज़ फैसले करते हैं, अदल व इंसाफ नहीं करते और जालिमों की मदद करते हैं। अदल व इंसाफ अगर ना हो तो लोग अपने अधिकार से वंचित हो जाते हैं और केवल वही लोग जो सबसे अधिक रिशवत देने के अहल होते हैं इसका लाभ उठाते हैं। यह चीजें आज इस दुनिया में काफी देखने को मिल रही हैं और लोग इन कार्यों को अंजाम देते वक्त आखिरत के खौफनाक अंजाम व परिणाम से गाफिल हैं।

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