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Hindi Section ( 5 Jun 2022, NewAgeIslam.Com)

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The Importance and Virtue of Dua, as well as the Wisdom of Delay in Its Acceptance दुआ की अहमियत, फ़ज़ीलत और कुबूलियत दुआ में ताखीर की हिकमत

कनीज़ फातमा, न्यू एज इस्लाम

उर्दू से अनुवाद न्यू एज इस्लाम

3 जून 2022

कुरआन पाक में अल्लाह पाक ने जिस तरह दुसरे तमाम इबादतों का ज़िक्र करते हुए उनकी फर्ज़ियत और अहमियत को जगह जगह बयान फरमा कर लोगों को उनके अदा करने का हुक्म और पूरा होने पर जज़ा का वादा फरमाया है ऐसे ही दुआ जो कि इबादत की जान है उसका ज़िक्र भी कभी इस तरह यकीन दिलाते हुए फरमाया है कि اُجِیْبُ دَعْوَةَ الدَّاعِ اِذَا دَعَانِۙ: मैं दुआ करने वाले की दुआ कुबूल करता हूँ जब वह मुझसे दुआ करे और कभी दुआ का सलीका बताते हुए फरमाता है اُدْعُوْا رَبَّكُمْ تَضَرُّعًا وَّ خُفْیَةًؕ- अपने रब से दुआ करो गिड़गिड़ाते और आहिस्ताऔर साथ ही उसकी रहमत से उम्मीद भी रखो وَ ادْعُوْهُ خَوْفًا وَّ طَمَعًا: और उससे दुआ करो डरते और तमा करते।} इस आयत में दुआ मांगने का एक अदब यह बयान फरमाया गया है कि जब भी दुआ मांगो तो अल्लाह पाक के अज़ाब से डरते हुए और उसकी रहमत की तमा करते हुए दुआ करो।

इसी तरह और भी कई आयतें ज़िक्र की गई हैं जो हमें यह सिखाती है कि दुआ की कितनी अहमियत और फज़ीलत है।

दुआ मांगने के फजाइल में कुछ हदीसें

(1) हज़रत अबू हुरैरा रज़ीअल्लाहु अन्हु से रिवायत है, नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया: अल्लाह पाक के नज़दीक कोई चीज दुआ से बुज़ुर्ग तर नहीं। (तिरमिज़ी, किताबुददावात, बाब मा जाआ फी फज्लुददुआ,5/243, अल हदीस: 3381)

(2) हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ीअल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जिस शख्स के लिए दुआ का दरवाज़ा खोल दिया गया तो उसके लिए रहमत का दरवाज़ा खोल दिया गया। अल्लाह पाक से किये जाने वाले सवालों में से पसंदीदा सवाल आफियत का है। जो मुसीबतें नाज़िल हो चुकीं और जो नाज़िल नहीं हुईं उन सब में दुआ से नफ़ा होता है, तो ई अल्लाह के बंदों! दुआ करने को (अपने उपर) लाज़िम कर लो। (तिरमिज़ी, किताबुद्दावात, बाब फी दुआ नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम, 5/321, अल हदीस: 3559)

(3) हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ीअल्लाहु अन्हु से रिवायत है, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया: क्या मैं तुम्हें वह चीज न बताऊँ जो तुम्हें तुम्हारे दुश्मन से निजात दे और तुम्हारे रिज्क को वसीअ कर दे रात दिन अल्लाह पाक से दुआ मांगते रहो कि दुआ मोमिन का हथियार है। (मुसनद अबू याअला, मुसनद जाबिर बिन अब्दुल्लाह, 2/201, अल हदीस: 1806)

दुआ इतनी अफज़ल इबादत है कि इंसान एक दुआ मांग कर पांच फायदे हासिल कर लेता है।

(1)...दुआ मांगने वाला इबादत गुज़ारों के गिरोह में शुमार होता है कि दुआ अपने आप में खुद इबादत बल्कि इबादत का मगज़ है।

(2)...जो शख्स दुआ करता है वह अपने आजिज़ और मोहताज होने का इकरार और पाने परवरदिगार की कुदरत और कर्म का एतेराफ करता है।

(3)....दुआ मांगने से शरीअत के हुक्म की बजा आवरी होगी कि अल्लाह पाक ने इसका हुक्म दिया और दुआ न मांगने वाले पर हदीस में वईद आई।

(4) सुन्नत की पैरवी होगी कि हुज़ूरे अकदस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दुआ माँगा करते और औरों को भी ताकीद फरमाते।

(5)...दुआ से आफतें और बालाएं दूर होती हैं और मकसद हासिल होता है। (फ़ज़ाइले दुआ, फसल अव्वल, पेज 54-55 मुख्लिसन)

दुआ की कुबूलियत

जिस तरह दुसरे इबादतों और आमाल के अदायगी के कुछ अहकाम व शर्तें हैं उसी तरह दुआ भी एक ऐसा अमल है जिसकी कुबूलियत के लिए कुछ आदाब मज़कूर हैं: जैसा कि खुद अल्लाह पाक ने फरमाया: " وَ ادْعُوْهُ خَوْفًا وَّ طَمَعًا"

अर्थात अगर बंदा अपनी आजज़ी मोहताजी और अब्दियत को मानते हुए अपने खालिक के सामने हाथ फैला ही लिया है तो साथ ही कुबूलियत की उम्मीद भी दिल में लिए रहे सवाल करने का समय कितना ही लम्बा हो लेकिन निराशा को हरगिज़ जगह न दे क्योंकि सुरह यूसुफ में बहुत ही स्पष्ट अंदाज़ में फरमाया गया है कि  "لَا تَیاسُوْا مِنْ رَّوْحِ اللّٰهِؕاِنَّهٗ لَا یَیاْسُ مِنْ رَّوْحِ اللّٰهِ اِلَّا الْقَوْمُ الْكٰفِرُوْنَ(87" अल्लाह की रहमत से निराश ना हो बेशक अल्लाह की रहमत से ना उम्मीद नहीं होते मगर काफिर लोग।

निश्चित रूप से अगर हम नाउम्मीदी छोड़ कर कामिल यकीन रखते हुए किसी भी दुआ को मांगते रहें तो इंशाअल्लाह कभी न कभी अवश्य कुबूल होगी जैसा कि सुरह युनुस में हज़रत मुसा और हज़रत हारून अलैहिस्सलाम को खुशखबरी देते हुए अल्लाह का इरशाद हुआقَالَ قَدْ اُجِیْبَتْ دَّعْوَتُكُمَا: अल्लाह ने फरमाया: तुम दोनों की दुआ कुबूल हुई। इस आयत में दुआ की निस्बत हज़रत मूसा और हज़रत हारून अलैहिस्सलाम दोनों की तरफ की गई हालांकि हज़रत मुसा अलैहिस्सलाम दुआ करते थे और हज़रत हारून अलैहिस्सलाम आमीन कहते थे। इससे मालुम हुआ कि आमीन कहने वाला भी दुआ करने वालों में गिना जाता है। यह भी साबित हुआ कि आमीन दुआ है इसलिए इसके लिए इख्फा ही मुनासिब है। (मदारक, युनुस, तहतुल आयह: 89, पेज 483) याद रहे कि हज़रत मुसा अलैहिस्सलाम की दुआ और उसकी मकबूलियत के बीच चालीस साल का फासला हुआ। (खाज़िन, युनुस, तहतुल आयह: 2, 89/330) इसी लिए इस आयत में आगे फरमाया गया कि उन लोगों में से न होना जो दुआ के कुबूल होने में देरी की हिकमतें नहीं जानते।

दुआ कुबूल होने में देर होना भी हिकमत है

इससे यह भी मालुम हुआ कि दुआ की कुबूलियत में यह जरूरी नहीं कि तुरंत ही इसका असर हो जाए बल्कि कभी कभी अल्लाह की हिकमत से इसमें एक अरसे की देरी भी हो जाती है, और उस शख्स की दुआ वैसे ही कुबूल नहीं होती जो शोर मचाए कि उसने बड़ी दुआ की मगर कुबूल नहीं हुई इसलिए हदीस में है, हज़रत अबू हुरैरा रज़ीअल्लाहु अन्हु से रिवायत है, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया बंदे की दुआ कुबूल होती है जब तक कि वह गुनाह या कता रहमी की दुआ न मांगे और जब तक कि जल्द बाज़ी से काम न ले। अर्ज़ किया गया: या रसूलुल्लाह! सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम, जल्द बाज़ी क्या है? इरशाद फरमाया यह कहे कि मैंने दुआ मांगी और मांगी मगर मुझे उम्मीद नहीं कि कुबूल हो, इसलिए इस पर दिल तंग हो जाए और दुआ मांगना छोड़ दे। (मुस्लिम, किताबुज्ज़िक्र वल दुआ व तौबतु वल इस्तिग्फार, बाब बयानु इन्नहु यस्तजाबू लील दाई मालम यजअल फयकूल: दावत फलम यस्तजिबू ली, पेज 1463, अल हदीस: 92 (2735)

इसलिए दुआ के आदाब में से यह भी बयान किया गया है कि कुबूलियत के यकीन से दुआ मांगो जैसा कि हज़रत अबू हुरैरा रज़ीअल्लाहु अन्हु से रिवायत है, नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया तुम अल्लाह पाक से कुबूलियत के यकीन के साथ दुआ माँगा करो और जान लो कि अल्लाह पाक गाफिल दिल से (दुआ करने वाले की) दुआ कुबूल नहीं फरमाता। (तिरमिज़ी, किताबुद्दावात, 65-बाब, 5/292, अल हदीस: 3490)

इसलिए हमें कुबूलियत की उम्मीद से लगातार दुआ करते रहना चाहिए क्योंकि अगर हमें वही चीजें अता नहीं भी हुई फिर भी तीन बातों से खाली नहीं होती है कोई भी दुआ जिनका अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ज़िक्र किया है। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: कोई भी मुसलमान जब दुआ करता है तो अगर उसमें किसी गुनाह और कता रहमी की दुआ नहीं होती, तो अल्लाह उसको तीन चीजों में से कोई चीज अता करता है। या तो बंदा ने जो मांगा उसको पूरा कर देता है, या उनको आखेरत के लिए ज़खीरा बना देता है, या उस पर आने वाली मुसीबत को  टाल देता है। (अहमद: 11133)

इसलिए हम सब को चाहिए कि अपनी हर हाजत रवाई के लिए अपने हकीकी मालिक से पुख्ता उम्मीद के साथ सवाल करते रहें ताकि हमारी इबादत भी होती रहे और हाजत रवाई भी। अल्लाह पाक अपने हबीब के सदके हम सब पर अपनी रहमत की नज़र फरमाते हुए मुश्किलों को आसान फरमाए।

Urdu Article: The Importance and Virtue of Dua, as well as the Wisdom of Delay in Its Acceptance دعا کی اہمیت ،فضیلت اور قبولیت دعا میں تاخیر کی حکمت

URL: https://www.newageislam.com/hindi-section/importance-virtue-dua-wisdom-acceptance/d/127179

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