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Vivekananda’s Legacy of Universalism विवेकानंद की आफाकियत की विरासत


के, एन पानकर

१० अप्रैल, २०१३

(उर्दू से अनुवाद, न्यू एज इस्लाम)

विवेकानंद का मानना था कि कोई धर्म एक दुसरे से बरतर नहीं है। उनके पैगाम और संघ परिवार के बीच कोई समानता का बिंदु नहीं हो सकता।

विभिन्न प्रकार की ऐसी गतिविधियाँ सामने हैं जो भारत को एक बनाने में विवेकानंद के महान सहयोग की याद दिलाती हैं। स्वामी जी की १५० वीं जयंती, सेमीनार, वर्कशाप, मतबूआत और उनके सहयोग के रूपों के महत्व का अंदाजा करने के लिए, जो कि प्रोग्रामों का हिसा है। आश्चर्य की बात है कि, इस प्रोग्राम में सबसे आगे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसके संगठन हैं। यह इस वजह से अजीब बात है, क्योंकि, पैदाइशी तौर पर हिन्दू होने के अलावा विवेकानंद और संघ परिवार के बीच मुश्किल से ही कोई बात एक जैसी होगी।

मुखलिस हिन्दू, फिरका परस्त नहीं

संघ परिवार के विचारों की जड़ें धार्मिक घृणा पर हैं, और स्वामी जी सामाजिक सद्भाव और अंतर्धार्मिक मुकालमे के अलमबरदार थे। इन दोनों के बीच कोई एकता का बिंदु नहीं हो सकता। फिर भी हिन्दू बुनियाद परस्त अपना नया नसब हिन्दू तहरीक से जोड़ते हैं, जिसमें विवेकानंद का व्यक्तित्व केन्द्रीय था। हिंदुत्वा पर उनके मुशाहेदे में से कोई भी, जब तक उन्हें प्रसंग से बाहर ना ले जाया जाए, उस दावे की पुष्टि नहीं करते कि वह एक फिरका वाराना दृष्टिकोण के हामिल शख्स थे। वह एक मुखलिस हिन्दू थे, जो कि लोगों की रूहानी और सकाफ्ती फलाह व बहबूद में दिल व जान से लगे थे। बेशक उन्हें इस बात का एहसास था कि परिवर्तन जरुरी हैं, लेकिन वह इस निसाब के संबंध में नाखुश थे, जिस पर इस्लाहात की तहरीकों ने अमल किया था। उन्होंने सामाजिक इस्लाहात की तहरीक के तसव्वुरात और तर्ज़े अमल में ज़ात से जुड़ी अफजलियत की निंदा की। उनका विश्वास था कि इसका एक हल तलाश करने की कोई भी कोशिश एक मुश्किल काम है इस लिए कि मज़हब सख्त और गैर लचक दार बन चुका था, “एक तरफ ज़ुल्मत पसंद और दूसरी तरफ तवह्हुम परस्त।

यह केवल प्रारम्भिक सुधारों की तहरीक की रौशनी में है, उनकी कामयाबी, नाकामी और सीमाओं की रौशनी में है। भारत को फिर से ज़िंदा करने के लिए विवेकानंद के संघर्ष का चुनाव किया जा सकता है। शताब्दी के अंत तक लगभग तमाम तहरीकें अपनी अक्सर क्षमता और विश्वासियों को खो चुकी थीं। सुधार के माहौल में गिरावट ने एक ताकतवर रूहानी रहनुमा के ज़हूर के लिए राह हमवार कर दिया। यह खालीपन स्वामी जी के माध्यम से, एक ऐसी तहरीक के आगाज़ से, किया गया, जिसकी बुनियाद, एक इज्तिमाई इबादत गाह में, इनफिरादी इबादत पर थी, राम मोहन राय और उनके समकालीनों ने इख्तियार किया था। एक संगठित धार्मिक सुधारों का आन्दोलन, उनके लिए एक मलउन चीज थी, हालांकि उन्होंने, विभिन्न तरीकों से, एक तहरीक शुरू की, जो दर्दमंदी सामाजिक सेवा और इंसान दोस्ती पर आधारित थी।

विवेकानंद के अमल की मंसुबाबंदी मज़हबी दायरे तक सीमित नहीं थी। वह सामाजिक और आर्थिक समस्याओं पर बराबर संवेदनशील थे। दूसरे शब्दों में, हिन्दुओं को पूर्ण परिवर्तन और व्यापक तरक्की की दिशा में संघर्ष करनी चाहिए। ज़ात पात के निज़ाम का भारतीय समाज में गहरा प्रभाव था लेकिन उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के उसे रद्द कर दिया। उन्होंने ब्राह्मो समाज के काम का अवलोकन किया था, और ऐसा लगता है कि इस अनुभव ने, उनके आम व्यवहार पर तमाम सुधारों की तहरीकों का रंग चढा दिया था। जब विवेकानंद मंजर पर आए, केरल और पंजाब की कुछ इलाकों के सिवा, सुधार ने अपनी हया की कुव्वत खो दी थी। उनका यकीन था कि इस्लाह ने पहले ही अपना निसाब चला दिया था, 19 वीं शताब्दी की आखरी चौथाई तक, मज़हबी तहरीकें लगभग लापता हो चुकी थीं, यहाँ तक कि मकबूल मज़हब भी पादान पर थे। औसत वर्ग के भारतीय लोगों के लिए, वह आला अलकाब रखते थे जिन्होंने इन तहरीकों की सामाजिक बुनियाद कायम कीं, “तकसीम के पहियों से पिसे हुए, अंधविश्वासी, सदका के एक जर्रा के बिना, मुनाफिकाना, मुल्हिदाना बुजदिल, आदि।

यह कहने की बात नहीं है, विवेकानंद ने, इस्लाहात की फज़ा पैदा करने में, मद्ध्यम वर्ग के सहायता की अहमियत को स्वीकार नहीं किया। इसके बजाए, उन्होंने इस पर बड़े फख्र का इज़हार किया, जो पहले ही, ब्रह्मों समाज ने लोगों की सामाजिक और धार्मिक जीवन के लिए कारनामा अंजाम दिया था।

केवल रूहानियत ही विवेकानंद की तश्वीश का मौजुअ नहीं थी। उन्होंने अपनी ज़िन्दगी का एक बड़ा हिस्सा सफर करते हुए गुज़ारा है, जिसने निःसंदेह दुनिया के बारे में उनके दृष्टिकोण को प्रभावित किया। वह ग़ुरबत और ज़ात पात के गैर इंसानी मामूलात के बारे में ख़ास तौर पर हस्सास थे। उन्होंने पेशन गोई की थी कि एक शुद्र राज करेंगे। केरल में ज़ात पात के ज़ुल्म व सितम ने उनके दिमाग पर एक देर पा असर छोड़ा।

भारतीय सुधारों के मल के तीन पहलु थे। पहला मरहला लिबरल जिद्दत कारी का था, जिसमें राम मोहन राय की तरह सुधार वादियों ने कुछ रिवायती मामूलात को तब्दील करने की कोशिश की। दुसरा मरहला उन तमाम चीजों को अस्वीकार करना था जो समाज के लिए नागवार थे, और वह मुल्की सुरत में जिद्दत कारी की एक कोशिश थी। तीसरा मरहला आधुनिकता के एक हतमी माडल की तामीर था, जो रिवायती और जदीद दोनों को कुबूल करता था। विवेकानंद का मुन्तखब रास्ता तीसरा था। पहला ग्रुप इन सुधारवादियों के तौर पर रद्द करते हुए, उनकी स्पष्ट तौहीन की थी। कदामत पसंदों और रिवायत परस्तों ने दुसरे ग्रुप की बुनियाद रखी। इस ग्रुप के अरकान अंधविश्वासी और रसूम परस्ती में फंसे हुए थे। स्वामी जी के सुधारों का तरीका कार केवल सुधारों की वकालत करने वाला नहीं था, बल्कि तामीरी समाजी काम के जरिये भी था।

विवेकानंद की ज़िन्दगी और तालीम का अहम दृष्टिकोण मज़हबी आफाकियत था। उनकी नज़रों में जो आफाकियत में यकीन रखते हैं, विभिन्न धर्मों के अनुयायियों के बीच कोई फर्क नहीं है। तमाम धर्म आफाकी हैं बराबर और दुरुस्त हैं। तथापि, विवेकानंद, ने कहा कि हिन्दू मत में, आफाकियत की मिसाली तर्ज़े गुफ्तार का पता चलता है। और इस वजह से रूहानी मामलों में वह एक लीडर थे। उतना ही अहम समाजी खिदमत के लिए उनका तसव्वुर भी था, जिस के लिए उन्होंने रामकृष्ण मिशन कायम किया। इस मिशन ने इस्लाह के लिए पूर्ण रूप से एक नया माहौल पैदा किया।

विवेकानंद के किरदार के मकबूल और तालीमी तसव्वुरात दी वर्ल्ड कांग्रेस आफ रिलिजन में की गई उनकी तकरीर और उन मज़हबी गुफ्तगू से अत्यंत प्रभावित है, जो उन्होंने बड़े पैमाने पर सफर के दौरान की है, जो उन्होंने भारत में शुरू किया था। कांग्रेस में उन्होंने अपनी इस तकरीर में, जिसकी बहुत अधिक की थी, तमाम मज़ाहिब में आफाकियत की फितरत को उजागर करने की कोशिश की थी, और इसके बाद इस बात की वजाहत करने की कोशिश की कि इसकी बेहतरीन मिसाल हिन्दू मत में बयान की गई है। इस तरह का अंदाज़ उन्होंने वेदांत में अपने अकीदे से हासिल किया था, जिसके बारे में उन्होंने कहा था कि वह किसी भी ख़ास मज़हब या सकाफती रिवायत की सीमा से उपर है। हक़, केवल मेरा खुदा है, पूरी दुनिया मेरा देश है,” विवेकानंद ने इसे बरकरार रखा। इसलिए इस तरह उन्होंने आफाकियत के मुताल्लिक अपनी इफ्हाम व ताफ्हीम की हिन्दू फलसफियाना निज़ाम के साथ मसालेहत करने की कोशिश की शायद उनके पास आफाकियत के सबसे अधिक तख्लिकी ताफ्हीम थी। इसलिए कि उन्होंने कहा कि तमाम मज़ाहिब आफाकी हैं, और किसी को दुसरे पर कोई बरतरी हासिल नहीं है। उन्होंने कहा कि हर मज़हब एक इज़हार, एक ही हकीकत को ज़ाहिर करने के लिए एक जुबान है, और हम में से हर एक को अपनीजुबान में एक दुसरे से बात करनी चाहिए

रामकृष्णा की जुबान

उनकी जुबान हिंसक हिन्दुइज्म की जुबान नहीं थी, “बल्कि रामकृष्ण की जुबान थी। लोगों को इसे हिन्दू मज़हब कहने दें, इसी तरह लोगों को वह नाम देने दें (जो वह पसंद करते हैं)। क्या हमारे देश का संबंध केवल भारत से था? “विवेकानंद ने पूछा। भारत का पिछड़ापन इन तंग रवय्यों का नतीजा है, जिसके खिलाफ उन्होंने बात की। जब तक उनको तबाह ना कर दिया जाए, कोई भी लाभदायक नतीजा हासिल होना असंभव है। मजहबी आफाकियत का तसव्वुर जिसकी उन्होंने तबलीग की, वह यह था कि, तमाम धर्म सच्चे हैं, और ऐसा नहीं है कि तमाम मज़ाहिब में हकीकत है, यह हिन्दू और मुसलमान दोनों के हर सुधारक की सोच में केन्द्रीय हैसियत का हामिल था। वह इस इस्लाह की वकालत नहीं कर रहे थे, जो उनके गुमान में, समाज से कटे हुए, मध्यम वर्ग के शिक्षित लोगों के बेकार खयाल में थी। इस वर्ग की जानिब से किसी काबिले बयान चीज की उम्मीद नहीं थी। वह तकसीम के पहियों से पिसे हुए, अंधविश्वासी, सदके के एक जर्रे के बिना, मुनाफिकाना, मुल्हिदाना बुजदिल, आदिथे।

उनके पास इस वर्ग के लिए तौहीन के अलावा कुछ नहीं था, जिसने सामाजिक बुनियाद पर सुधार की तशकील की। उनकी इस तनकीद का मतलब यह था कि उन्होंने राम मोहन राय के समय से माज़ी में सुधारों के कोशिशों से वाज़ेह तौर पर कता ताल्लुक कर लिया था। इसका विकल्प उन्होंने एक ऐसी सामाजिक परिवर्तन की अवधारणा को समझा था जो शिक्षा और सामाजिक सुधारों के जरिये प्रभावित हो। यही वजह थी कि उन्होंने रामाकृष्णा आन्दोलन की तशकील के लिए कदम उठाया, जिसने शिक्षा और समाजी खिदमत के मैदान में उसकी गतिविधियों को संगठित किया।

अंत में, क्या हिन्दू तहरीकों ने उनके खयालात से फायदा प्राप्त किया? बदकिस्मती से, उन्होंने नहीं किया। लेकिन अगर वह इस दौर के भारत में वापस आते, तो इस बात का इमकान बहुत कम है कि वह फिरका वाराना कैम्प में होते।

के एन पानकर, जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली में इतिहास के पूर्व प्रोफेसर हैं।

स्रोत:

http://www.thehindu.com/opinion/lead/vivekanandas-legacy-of -universalism/article4599118.ece

URL for English article:  http://www.newageislam.com/spiritual-meditations/k-n-panikkar/vivekananda’s-legacy-of-universalism/d/11088

URL for Urdu articlehttp://www.newageislam.com/urdu-section/k-n-panikkar--کے،-این-پانکر/vivekananda’s-legacy-of-universalism---ویویکانند-کی-آفاقیت-کی-وراثت/d/11914

URL: https://www.newageislam.com/hindi-section/k-n-panikkar-tr-new-age-islam/vivekanandas-legacy-of-universalism-विवेकानंद-की-आफाकियत-की-विरासत/d/124340


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