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Hindi Section ( 16 Oct 2013, NewAgeIslam.Com)

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Monotheism, Tawheed Is the Essence of Islam तौहीद (एकेश्वरवाद) इस्लाम का सार है

 

के.एम. ज़ुबैर

20 जुलाई, 2013

(उर्दू से अनुवाद- न्यु एज इस्लाम)

तौहीद (इस्लामी एकेश्वरवाद) इस्लामी आस्था का सबसे बड़ा आधार है। दरअसल उस व्यक्ती को मुसलमान समझा जाता है जब वो ये स्वीकार कर लेता है कि ''अल्लाह के सिवा कोई माबूद (इबादत के लायक़) नहीं और मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम अल्लाह के बन्दे और पूरी इंसानियत के लिए पैग़म्बर हैं''

अल्लाह क़ुरान में फरमाता हैः ''अल्लाह के जिसके सिवा कोई पूज्य-प्रभु नहीं, वह जीवन्त-सत्ता है, सबको सँभालने और क़ायम रखनेवाला है। उसे न ऊँघ लगती है और न निद्रा। उसी का है जो कुछ आकाशों में है और जो कुछ धरती में है। कौन है जो उसके यहाँ उसकी अनुमति के बिना सिफ़ारिश कर सके? वह जानता है जो कुछ उनके आगे है और जो कुछ उनके पीछे है। और वे उसके ज्ञान में से किसी चीज़ पर हावी नहीं हो सकते, सिवाय उसके जो उसने चाहा। उसकी कुर्सी (प्रभुता) आकाशों और धरती को व्याप्त है और उनकी सुरक्षा उसके लिए तनिक भी भारी नहीं और वह उच्च, महान है।'' (2- 255)

इन शानदार आयतों में अल्लाह, खुद को सिर्फ एक, सबसे अधिक ताक़तवर, हमेशा रहने वाले, हमारे ईश्वर के रुप में बयान करता है। तौहीद (एकेश्वरवाद) इस्लाम का मुख्य सिद्धांत है और ये बयान करता है कि अल्लाह वो है जिसने ब्रह्मांड को पैदा किया और उन तमाम चीज़ों को जो उसमें है और वो उनकी व्यवस्था को भी देखता है। हम ब्रह्मांड की क्रियाकलाप से जो परिणाम निकालते हैं और जिन्हें 'प्राकृतिक नियम' कहते हैं, वो दरअसल चीज़ों और घटनाओं की रचना  और ब्रह्माड की व्यवस्था करने का अल्लाह का नियमित तरीका है।

इस्लाम के मुताबिक़ सभी धर्म नबियों पर उतारे गए, अल्लाह उनकी चर्चा को और बढ़ाए। उनमें तौहीद और अल्लाह के एक होने का सार और ज्ञान एक ही है, लेकिन वक्त के साथ साथ संदेश की गलत व्याख्या की गई, उसे अंधविश्वास के साथ मिला दिया गया और जादुई प्रथाओं और कुछ रस्मों के रूप में उन्हें बिगाड़ दिया गया। ये वही पैगाम था जिसके साथ आदम अलैहिस्सलाम को ज़मीन पर भेजा गया था, और ये वही ज्ञान था जिसे अल्लाह ने नुह, इब्राहीम, मूसा और ईसा अलैहिस्सलाम और इंसानियत के लिए आख़री नबी मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम पर उतारा गया था।

इस्लाम किसी भी इंसानी शक्ल में अल्लाह को पेश करने या माल व दौलत, ताक़त, या नस्ल की बुनियाद पर कुछ लोग या कौमों के हित में पक्ष लेने वाले के रूप में चित्रण करने को अस्वीकार करता है। हालांकि इंसानी दिमाग़ अक्सर अल्लाह की कल्पना को भौतिक रूप में समझने की खोज में रहता है, यद्यपि हम पूरी तरह इस कल्पना को समझने में सक्षम नहीं हैं।

जब नबी करीम मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के समकालीन लोगों ने अल्लह के बारे में उनसे प्रश्न किया तो अल्लाह ने सुरे इख़लास (क़ुरान की सुरे न. 112) को उतारा जिसे तौहीद का प्रतीक समझा जाता हैः " कहो, "वो अल्लाह यकता है, अल्लाह निरपेक्ष (और सर्वाधार) है, न वह जनिता है और न जन्य, और न कोई उसका समकक्ष है।"

दुनिया बनाने वाले (निर्माता) का दुनिया (बंदों) से अलग होना ज़रुरी है, इसलिए कि अगर वो (निर्माता) बंदों ही की तरह हो तो वो भी नश्वर होगा और इस वजह से एक निर्माता का मोहताज होगा, क्योंके अगर निर्माता अस्थायी नहीं है तो ज़रुर वो अनन्त होना चाहिए। अगर वो अनन्त है तो वो प्रभावित नहीं हो सकता। अगर उसका अस्तित्व उसको खारिज नहीं करता है तो वो ज़रुर आत्मनिर्भर और खुद से मौजुद होगा। अगर वो अपने अस्तित्व के लिए किसी पर निर्भर नहीं है, तो उस के अस्तित्व का कोई अन्त नहीं हो सकता। इसलिए पैदा करने वाला अनन्त है, अल्लाह का फरमान हैः "वही आदि है और अन्त भी"- क़ुरान 57-3

दुनिया बनाने वाला (निर्माता) सिर्फ अस्तित्व के ही अर्थों में रचना नहीं करता, दूसरे शब्दों में वो केवल आरम्भक है, हर चीज़ के अस्तित्व को बरकरार रखता है, उन्हें उनके अस्तित्व से बाहर लाता है और उनको जो कुछ भी होता है वो उनका परम कारण है।

मुसलमानों के चौथे ख़लीफ़ा हज़रत अली इब्ने अबु तालिब रज़ियल्लाहू अन्हा ने कहा किः उसका अस्तित्व है मगर अस्तित्व में आने की घटना के द्वारा नहीं। वो अस्तित्व रखता है मगर अस्तित्व न रखने वालों से नहीं। वो हर चीज़ में है लेकिन वो शारीरिक निकटता नहीं। वो हर चीज़ से भिन्न है लेकिन वो भौतिक भिन्नता के द्वारा नहीं। वो अमल करता है लेकिन बिना किसी उपकरण या गति के। वो अकेला है, और दुनिया में ऐसा कोई नहीं है जिसका वो साथ करता हो या उसकी मौजुदगी न होने पर उसकी कमी महसूस करता हो।"

इस्लाम में अल्लाह अपने नामों और गुणों और ब्रह्मांड में अपने नामों की अभिव्यक्ति के द्वारा जाना जाता है।

इस्लाम में तौहीद (एकेश्वरवाद) का एक और पहलू ये है के अल्लाह के साथ अपने सम्बंध में तमाम लोग समान और एकजुट हैं। इसलिए विभिन्न समाजिक वर्गों के लोगों को विभिन्न स्तर की शक्ति के साथ विभिन्न खुदाओं के द्वारा नहीं पैदा किया गया है, क्योंकि ये उनके बीच बाधाएं डालेगा और ये तौहीद का उल्लंघन होगा। इसके बजाए, तौहीद का सामाजिक पहलू ये बताता है कि एक ही खुदा ने सबको पैदा किया है और इसलिए सभी लोगों में एक ही सार तत्व है। दरअसल अल्लाह की नज़र में सबसे श्रेष्ठ व्यक्ति वो है जो अल्लाह के प्रति सबसे ज़्यादा सजग हो।

हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमायाः  "तुम्हारा खुदा एक ही है। तुम आदम से पैदा किए गए हो और आदम को मिट्टी से पैदा किया गया है। सिवाए नेकी और परहेज़गारी के किसी अरबी को किसी गैर अरबी पर और किसी गोरे को किसी काले पर कोई श्रेष्ठता हासिल नहीं है।" (अहमद)

स्रोतः  http://www.khaleejtimes.com/kt-article-display-1.asp?xfile=/data/opinion/2013/July/opinion_July39.xml&section=opinion

URL for English article:

http://www.newageislam.com/islamic-ideology/k-m-zubair/monotheism,-tawheed-is-the-essence-of-islam/d/12704

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http://www.newageislam.com/urdu-section/k-m-zubair,-tr-new-age-islam---کے-ایم-زبیر/monotheism,-tawheed-is-the-essence-of-islam--توحید-اسلام-کی-روح-ہے/d/12822

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