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Hindi Section ( 19 Dec 2018, NewAgeIslam.Com)

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Islamic Concept of Forgiveness अफ़ो व दरगुज़र का इस्लामी सिद्धांत

 

कनीज़ फातमा, न्यू एज इस्लाम

अफो अरबी भाषा का एक शब्द है जिसका अर्थ क्षमा करना, बख्श देना, दरगुजर करना, बदला ना लेना और गुनाह पर पर्दा डालने के हैंl शरीअत की इस्तेलाह में अफो से मुराद किसी ज़्यादती व बुराई पर बदला लेने की कुदरत व ताकत के बावजूद बदला ना लेना और माफ़ कर देना हैl

कुदरत व ताक़त  नहीं होने की वजह से अगर इंसान बदला ना ले सकता हो तो यह अफो (क्षमा करना) नहीं होगा बल्कि इसे असमर्थता का नाम दिया जाएगाl अफो तो तब होगा जब कोई व्यक्ति समर्थता व शक्ति रखने के बावजूद किसी को माफ़ कर देl गुस्से पर काबू पाने की वास्तविकता यह है कि किसी गुस्सा दिलाने वाली बात पर खामोश हो जाए और ग़ैज़ व ग़ज़ब के इज़हार और सजा देने और बदला लेने की क्षमता के बावजूद सब्र व सुकून के साथ रहेl नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने गुस्सा जब्त करने और जोश ए गज़ब ठंडा करने के तरीकों की हिदायत दी हैl

अफो के दो दर्जे हैं: पहला यह कि आदमी अपने दुश्मन या दोषी को माफ़ कर दे चाहे उसकी तबीयत इस पर आमादा ना हो, और दुसरा दर्जा यह है कि दिल की रज़ा व ख़ुशी के साथ माफ़ करे और अगर संभव हो तो उसके साथ कुछ भलाई व एहसान भी करेl

हज़रत अनस रज़िअल्लहु अन्हु से मरवी है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: जब मैंने जन्नत में ऊँचे ऊँचे महल देखे तो जिब्रील से फरमाया यह किन लोगों के लिए हैं! उन्होंने अर्ज़ किया या रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम यह उन लोगों के लिए हैं जो गुस्से को पी जाते हैं और लोगों से दरगुजर करते हुए उन्हें माफ़ कर देते हैंl

मनुष्य का अपने शत्रु से बदला ना लेना और गुस्से को पी जाना वास्तव में बड़े हिम्मत का काम है और इससे अधिक कमाल दर्जे की बात तो यह है कि उसे दिल से माफ़ भी कर देl

अफो व दरगुजर करना अल्लाह के नज़दीक पसंदीदा कार्य हैl इस अख़लाक़ को अपनाने वाले को अल्लाह पाक दुनिया व आखिरत में बहुत सारे इनामों से नवाजता हैl

पवित्र कुरआन में अफो व दरगुजर की शिक्षा देते हुए रब्बुल इज्जत ने इरशाद फरमाया: (الَّذِينَ يُنفِقُونَ فِي السَّرَّاءِ وَالضَّرَّاءِ وَالْكَاظِمِينَ الْغَيْظَ وَالْعَافِينَ عَنِ النَّاسِ ۗ وَاللَّهُ يُحِبُّ الْمُحْسِنِينَ) अनुवाद: “वह जो अल्लाह के रास्ते में खर्च करते हैं ख़ुशी में और गम में और गुस्सा पीने वाले और लोगों से दरगुजर करने वाले, और नेक लोग अल्लाह के महबूब हैंl” (सुरह आले इमरान ३, आयत १३३)

हज़रत इमाम हुसैन रज़िअल्लहु अन्हु का वाकेया है कि आपके खादिम के हाथ से आपके सर पर शोरबा (सालन) गिर गया यह आपको नागवार गुजरा तो खादिम ने यह आयत पढ़ी: अनुवाद “(वह लोग जो तंगी में और फराखी दोनों में अल्लाह की राह में खर्च करते हैं, गुस्से को पीने वाले और लोगों को माफ़ करने वाले हैं (यह नेक लोग हैं) और अल्लाह नेक लोगों को महबूब रखता है” (आले इमरान १३३)

तो इस पर हज़रत इमाम हुसैन रज़िअल्लहु अन्हु ने फरमाया तुझे माफ़ करता हूँ, आज़ाद करता हूँ और तेरा निकाह अपनी फलां लौंडी से करता हूँ और तुम दोनों का खर्च आजीवन मेरे जिम्मे हैl (तफसीर नुरुल इरफ़ान पृष्ठ २०५ जिल्द ५)

कुरआन मजीद ने दूसरी जगह इससे अधिक वजाहत से बुराई करने वालों के साथ एहसान करने का हुक्म दिया और यह बतलाया कि इसके जरिये दुश्मन भी दोस्त हो जाते हैं, इरशाद ए बारी है: (ادْفَعْ بِالَّتِي هِيَ أَحْسَنُ فَإِذَا الَّذِي بَيْنَكَ وَبَيْنَهُ عَدَاوَةٌ كَأَنَّهُ وَلِيٌّ حَمِيمٌ) अनुवाद: “ बुराई से बचाव भलाई और एहसान के साथ करो जो जिसके साथ दुश्मन है वह तुम्हारा गहरा दोस्त बन जाएगाl” (हा मीम सजदा ३४,४१)

इस आयत ए मुबारक में यह शिक्षा दी गई है कि मोमिन का तरीका यह होना चाहिए कि बुराई का उत्तर बुराई से ना दे बल्कि जहां तक हो सके बुराई के मुकाबले भलाई से पेश आए, अगर उसे सख्त बात कहे या बुरा मामला करे तो उसके मुकाबले वह शैली अपनाना चाहिए जो उससे बेहतर हो, जैसे गुस्से के जवाब में बुर्दबारी, गाली के जवाब में सभ्यता, सख्ती के जवाब में नरमी व मेहरबानी से पेश आएl इस अख़लाक़ से दुश्मन ढीला पद जाएगा और एक समय ऐसा आए गा वह दोस्त की तरह बर्ताव करने लगेगाl अल्लाह पाक का इरशाद है:

(عَسَى اللَّهُ أَن يَجْعَلَ بَيْنَكُمْ وَبَيْنَ الَّذِينَ عَادَيْتُم مِّنْهُم مَّوَدَّةً ۚ وَاللَّهُ قَدِيرٌ ۚ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ) अनुवाद: “करीब है कि अल्लाह तुममें और उनमें जो उनमें से तुम्हारे दुश्मन हैं दोस्ती कर दे और अल्लाह कादिर है और बख्सने वाला मेहरबान हैl” (सुरह मुम्तहेना ७)

अल्लाह पाक इरशाद फरमाता है:

(आयत) “واذا ما غضبوا ھم یغفرون” (अल शुरा: ३८) अनुवाद: और जब वह गज़बनाक हों तो माफ़ कर देते हैं:

وجزآء سیئۃ سیئۃ مثلھا فمن عفا واصلح فاجرہ علی اللہ” (अल शुरा:३९) अनुवाद: और बुराई का बदला उसकी तरह बुराई है’ फिर जिसने माफ़ कर दिया और इस्लाह कर ली तो इसका अज्र अल्लाह (के जिम्मे) पर हैl

(आयत) “ولمن صبر وغفران ذالک لمن عزم الامور” (अल शुरा: ४३) अनुवाद: और जिसने सब्र किया और माफ़ कर दिया तो अवश्य यह हिम्मत के कामों में से हैl

इमाम अबू ईसा मोहम्मद बिन ईसा तिरमिज़ी मृतक 279 हिजरी रिवायत करते हैं:

हज़रत आयशा (रज़िअल्लहु अन्हुमा) ब्यान करती हैं कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) बेहयाई की बातें ना तबअन करते थे ना तकल्लुफ़ में और ना ही बाज़ार में बुलंद आवाज़ से बातें करते थे और बुराई का जवाब बुराई से नहीं देते थे लेकिन माफ़ कर देते थे और दरगुजर फरमाते थेl

हज़रत आयशा (रज़िअल्लहुअन्हुमा) बयान करती हैं कि नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर जो ज़्यादती भी की गई मैंने कभी आपको इस ज़्यादती का बदला लेते हुए नहीं देखा शर्त यह है कि अल्लाह की हुदूद पामाल ना की जाएं और जब अल्लाह की हद पामाल की जाती तो आप इस पर सबसे अधिक क्रोधित होते, और आपको जब भी दो चीजों का विकल्प दिया गया तो आप उनमें से आसान को विकल्प करते शर्त यह है कि वह गुनाह ना होl (जामेअ तिरमिज़ी पृष्ठ, ५९६)

इमाम अबू दाउद सुलेमान बिन अशअस मृतक २७५ हिजरी रिवायत करते हैं:

हज़रत आयशा (रज़िअल्लहु अन्हुमा) बयान करती हैं कि जब भी रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को दो चीजों का विकल्प दिया गया तो आपने उसमें से आसान को विकल्प किया शर्त यह है कि वह गुनाह ना हो, अगर वह गुनाह होती तो आप सबसे अधिक उससे दूर रहते’ रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने कभी अपनी ज़ात का बदला नहीं लिया’ हाँ अगर अल्लाह की हुदूद पामाल की जातीं तो आप उनका बदला लेते थेl (सुनन अबू दाउद जिल्द ६ पृष्ठ ३०४ मतबुआ मतबा मुज्ताबाई १४०५ हिजरी)

इमाम अहमद बिन हम्बल मृतक २४१ हिजरी रवायत करते हैं:

हज़रत उक्बा बिन आमिर (रज़िअल्लहु अन्हु) बयान करते हैं कि मैं रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से मिला’ मैंने शुरू में आपका हाथ पकड़ लिया’ और मैंने अर्ज़ किया या रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) मुझे फजीलत वाले कार्य बताइये, आपने फरमाया: ऐ उक्बा’ जो तुमसे संबंध तोड़े उससे संबंध जोड़ो’ जो तुमको वंचित करे’ उसको प्रदान करो’ और जो तुम पर अत्याचार करे उससे एराज़ करो’ (मुसनद अहमद जिल्द ४ पृष्ठ १४८’ मतबुआ दारुल फ़िक्र बैरुत)

हाफ़िज़ इब्ने असाकिर मृतक ५७१ हिजरी ने भी इस हदीस को रवायत किया है’ उसमें यह शब्द हैं जो तुम पर अत्याचार करे उसको माफ़ कर दोl (तहज़ीब तारीखे दमिश्क जिल्द ३ पृष्ठ ६१, मतबुआ दारुल फ़िक्र बैरुत’ १४०४ हिजरी)

अल्लामा अबू अब्दुल्लाह मोहम्मद बिन अहमद मालकी कुर्तुबी मृतक ६६८ हिजरी लिखते हैं:

मैमून बिन मेहरान रवायत करते हैं कि एक दिन उनकी बांदी एक प्याला ले कर आई जिसमें गरम गरम सालन था’ उनके पास उस समय अतिथि बैठे हुए थे’ वह बांदी लड़खड़ाई और उन पर वह शोरबा गिर गया’ मैमून ने उस बांदी को मारने का इरादा किया’ तो बांदी ने कहा ऐ मेरे आक़ा’ अल्लाह पाक के इस कौल पर अमल कीजिये (आयत) “والکاظمین الغیظ” मैमून ने कहा मैंने इस पर अमल कर लिया (गुस्सा ज़ब्त कर लिया) उसने कहा इसके बाद की आयत पर अमल कीजिये (आयत) “والعافین عن الناس”l मैमून ने कहा मैंने तुम्हें माफ़ कर दिया’ बांदी ने इस पर उस भाग की तिलावत की: (आयत) “واللہ یحب المحسنین”l मैमून ने कहा मैं तुम्हारे साथ नेक सुलूक करता हूँ और तुमको आज़ाद कर देता हूँl (अल जामेउल अहकाम अल कुरआन जिल्द ४ पृष्ठ २०७ मतबुआ इन्तेशारात नासिर खुसरो इरान हिजरी)

और अल्लामा कुर्तुबी ने इमाम मुबारक के हवाले से बयान किया है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया जब कयामत का दिन होगा तो अल्लाह पाक के सामने एक मुनादी आवाज़ लगाएगा जिसने अल्लाह के पास कोई भी नेकी भेजी हो वह आगे बढ़े तो केवल वह व्यक्ति आगे बढ़े गा जिसने किसी की खता माफ़ की होगीl

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