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Hindi Section ( 13 Aug 2014, NewAgeIslam.Com)

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Fatwas and Muslim Women फतवा और मुस्लिम महिलाएँ

 

 इरफान इंजीनियर

08/08/2014

उच्चतम न्यायालय ने 7 जुलाई 2014 को घोषित अपने एक निर्णय में कहा कि फतवों की कोई कानूनी वैधता नहीं है और फतवे किसी फौजदारी या दीवानी मामले में निर्णय का आधार नहीं बन सकते। स्वतंत्र भारत की संवैधानिक व्यवस्था में फतवों के लिए कोई जगह नहीं है। यद्यपि सुप्रीम कोर्ट ने इस्लामिक धार्मिक संस्थाओं जैसे दारूलउलूम, देवबंद, दारूलकज़ा या निजामेकज़ा द्वारा फतवे जारी करने पर प्रतिबंध नहीं लगाया है क्योंकि'फतवे अपने आप में गैरकानूनी नहीं हैं' परंतु न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि 'फतवे अदालती डिक्री नहीं है और ना ही वे न्यायालयों, राज्य अथवा व्यक्ति पर बंधनकारी हैं।' उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में संतुलित रूख अपनाया है। जहाँ उसने फतवों को प्रतिबंधित नहीं किया है वहीं यह स्पष्ट कर दिया है कि वे बंधनकारी नहीं होंगे और अदालतें उनका संज्ञान नहीं लेंगी। न्यायालय किसी भी व्यक्ति को अपनी धार्मिक राय व्यक्त करने से नहीं रोक सकता क्योंकि संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद का धर्म मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने का अधिकार देता है। परंतु ये विचार किसी तीसरे व्यक्ति पर लादे नहीं जा सकते और ना ही किसी को उन्हें मानने पर मजबूर किया जा सकता है।

मुस्लिम समुदाय में साक्षरता व शिक्षा का स्तर नीचा होने के कारण व सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन और सुरक्षा की भावना के अभाव के चलते, समुदाय के गरीब तबके के सदस्य आधा-अधूरा ज्ञान रखने वाले इमामों (वह व्यक्ति जो मस्जिदों में नमाज का नेतृत्व करता है) द्वारा जारी फतवों को भी ईश्वरीय कानून समझ बैठते हैं। इन लोगों के दैनिक जीवन में धार्मिक संस्थाएं और संगठन महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। वे उन्हें मदद और नैतिक सहारा उपलब्ध करवाते हैं जिसके कारण उन पर इन संगठनों का गहरा प्रभाव रहता है। लेकिन कई बार मुफ्ती और इमाम, परस्पर विरोधाभासी फतवे जारी कर देते हैं। सुन्नियों में चार विधिशास्त्र प्रचलित हैं जिसमें - हनफी, हनबली, शफी व मलिकी और शियाओं में तीन-जाफरी, इस्माइली व जैदी। जाहिर है कि जो इमाम या मुफ्ती इन सात विधिशास्त्रों में से जिसे मानता है, वह उसके हिसाब से फतवा जारी कर देता है। ऐसे में इन फतवों में परस्पर विरोधाभास स्वाभाविक है।

फतवों के बारे में कई तरह के भ्रम हैं। फतवे जारी करना और वैवाहिक विवादों में मध्यस्थता करना दो अलग.अलग चीजें हैं। फतवे जारी करने का काम दारूलइफ्ता द्वारा किया जाता है जबकि वैवाहिक विवादों में मध्यस्थता करने का काम दारूलकज़ा या निजामेकज़ा का है। कभी-कभी बिरादरी के सदस्य मिलकर भी इस तरह के विवादों का निपटारा करते हैं। दारूलकज़ा द्वारा की जाने वाली मध्यस्थता को ही शरिया अदालत कहा जाता है। इस मामले में याचिकाकर्ता एडवोकेट विश्वलोचन मदान ने उच्चतम न्यायालय से यह प्रार्थना की थी कि शरिया अदालतों पर प्रतिबंध लगाया जाए और काजियों और नायब काजियों को आम लोगों की जिंदगी में हस्तक्षेप करने के अधिकार से वंचित किया जाए।

फतवा अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है राय या मत। दूसरे शब्दों मेंए फतवा, शरियत से जुड़े किसी मसले पर फतवा जारी करने वाले की राय है। चूंकि इस्लाम में पुरोहित वर्ग नहीं है अतः फतवा जारी करने वाला चाहे कितना ही विद्वान क्यों न हो, फतवा कभी किसी पर बंधनकारी नहीं हो सकता। दारूलइफ्ता द्वारा जारी हर फतवे की अंतिम पंक्ति यह होती है,'परंतु अल्लाह बेहतर जानता है'। इन शब्दों से ही यह स्पष्ट है कि फतवा जारी करने वाला यह स्वीकार कर रहा है कि उसने अपने ज्ञान के हिसाब से जो भी कहा है वह बंधनकारी नहीं है क्योंकि'अल्लाह बेहतर जानता है'

फतवा तब जारी किया जाता है जब कोई व्यक्ति अपनी रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े किसी मसले पर शरियत के अनुरूप राय मांगे। इस तरह की राय कोई भी व्यक्ति मांग सकता है और यह आवश्यक नहीं है कि मुद्दा उससे ही संबंधित हो। कई बार पत्रकार,मस्जिदों के इमामों से किसी भी मुद्दे पर उनकी राय पूछ लेते हैं। इन इमामों को इस्लामिक धर्मशास्त्र का बहुत अल्प ज्ञान होता है। इनकी राय को बाद में फतवे के रूप में अखबारों में छापा जाता है या टीवी चैनलों पर प्रसारित किया जाता है। इसका उद्देश्य अखबार की बिक्री या चैनल का टीआरपी बढ़ाना होता है। दूसरे अखबार व चैनल भी इन फतवों पर महीनों चर्चा करते हैं। इमराना के मामले में फतवा एक पत्रकार के अनुरोध पर जारी किया गया था ना कि इमराना या उसके पति या उसके बलात्कारी ससुर के कहने पर।

फतवे केवल इस्लामिक विद्वानों द्वारा इस्लामिक कानून के आधार पर, जारी किए जा सकते हैं। जो व्यक्ति फतवे जारी करने के लिए अधिकृत होता है उसे मुफ्ती कहा जाता है। जो व्यक्ति फतवे जारी करता है उसका एकमात्र उद्देश्य फतवा मांगने वाले को सही रास्ता दिखाना होना चाहिए। उसे धर्मशास्त्र का गहरा ज्ञान होना चाहिए। उसे संतुलित व शांत तबियत का होना चाहिए और उसे समकालीन मुद्दों और सामान्य लोगों के जीवन की जानकारी होनी चाहिए। अल्लामा इकबाल ने अपनी पुस्तक 'रिकन्सट्रक्शन ऑफ रिलीजियस थॉट इन इस्लाम' में लिखा है कि मुसलमानों की हर पीढ़ी को सभी मुद्दों पर पुनर्विचार करना चाहिए और अपनी बदली हुई आवश्यकताओं के अनुरूप नए नियम और कानून बनाने चाहिए। गांवों की मस्जिदों में बहुत कम वेतन पर काम करने वाले इमामों को न तो धर्मशास्त्र का ज्ञान होता है और ना ही वे इतने बुद्धिमान व समझदार होते हैं कि किसी मुद्दे पर ठीक राय दे सकें। जो कुछ लिखा है वे उसे यंत्रवत दोहरा देते हैं। इससे कई तरह की समस्याएं उत्पन्न होती हैं और वे उपासना, अर्थव्यवस्था, परिवार, राजनीति, सरकार आदि किसी भी मुद्दे पर अपनी अधकचरी राय को फतवे के रूप में प्रस्तुत कर देते हैं।

फतवा किसी व्यक्ति विशेष से संबंधित हो सकता है या फिर पूरे समुदाय से। मौलाना हुसैन अहमद मदनी ने विभिन्न पंथों के उलेमा द्वारा भारत के विभाजन के विरूद्ध जारी सौ से अधिक फतवों को संकलित कर एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया था। जिस नये मुस्लिम देश को बनाने की मांग की जा रही थी उसका नाम पाकिस्तान रखा जाना प्रस्तावित था। मदनी का कहना था कि किसी भी भौगोलिक इलाके को 'पाक' अर्थात पवित्र कहना गुनाह है। उनका यह भी तर्क था कि इस्लाम के पैगम्बर ने जिस पहले राज्य की स्थापना की थी वह समग्र राष्ट्रवाद पर आधारित था। मदीना के समझौते के अनुसार मुसलमानों, ईसाईयों और यहूदियों ने यह प्रण किया था कि मदीना पर यदि उसके शत्रु हमला करेंगे तो वे एकसाथ मिलकर शत्रु से मुकाबला करेंगे परंतु साथ ही मदीना के सभी रहवासी अपने-अपने धर्म का पालन करने के लिए स्वतंत्र होंगे। भारत का राष्ट्रवाद भी समग्र राष्ट्रवाद था जिसमें सभी धर्मों को फलने-फूलने का मौका उपलब्ध था और मुसलमानों को अपने धर्म का पालन करने की आजादी थी। मदनी ने देश के एक कोने से दूसरे कोने तक यात्राएं कीं और सार्वजनिक सभाओं में मुसलमानों से यह अपील की कि पाकिस्तान के निर्माण का विरोध करना उनका धार्मिक कर्तव्य है।

इसी तरह निर्दोषों को निशाना बनाने वाले आतंकवाद के खिलाफ भारत और दुनिया के अन्य कई देशों के उलेमा ने फतवे जारी किए हैं। तुर्की के मर्दिन में हुई बैठक में सऊदी अरब, तुर्की, भारत, सेनेगल, कुवैत, ईरान, मोरक्को व इंडोनेशिया से आए इस्लामिक विद्वान इकट्ठा हुए। इनमें बोस्निया के बड़े मुफ्ती मुस्तफा सेरिक, मोरिटीनिया के शेख अब्दुल्ला बिन बया और यमन के शेख हबीब अली अल.जिफ़री शामिल थे। इस बैठक में इन सभी विद्वानो ने इमाम इब्न तैमिया के उस फतवे को खारिज किया जिसका इस्तेमाल ओसामा बिन लादेन और उसके समर्थक अपनी तथाकथित जिहाद को उचित ठहराने के लिए कर रहे थे। इमाम इब्न तयमिया के फतवे में यह कहा गया था कि किसी अन्यायी शासक के खिलाफ हिंसा का इस्तेमाल औचित्यपूर्ण है यदि अन्याय से लड़ने का वही एकमात्र रास्ता बचा हो। इमाम हनबल ने अन्यायी शासक के खिलाफ भी विद्रोह को प्रतिबंधित किया था क्योंकि इससे खून-खराबा और अराजकता होती। मर्दिन सम्मेलन में नागरिकों और निर्दोषों के खिलाफ अकारण हिंसा को गलत ठहराया गया और उसकी निंदा की गई। यह कहा गया कि आज की दुनिया में अन्यायी शासक से मुक्ति पाने के लिए भी हिंसा के अतिरिक्त अन्य तरीके उपलब्ध हैं। परंतु यह दुःख की बात है कि इस तरह के सकारात्मक फतवों को मीडिया पर्याप्त महत्व नहीं देता। इसका एक कारण तो जानकारी का अभाव है और दूसरा यह कि मीडिया इस्लाम को पिछड़ा हुआ, हिंसक व आक्रामक धर्म मानता है और इसलिए जब इस्लामिक विद्वान शांति, रहम और करूणा की बात करते हैं तो मीडिया उसे महत्व नहीं देता।

स्रोतःhttp://visfot.com/index.php/comentry/11304-fatwa-aur-kanoon.html

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https://www.newageislam.com/islam,-women-and-feminism/irfan-engineer/fatwas-and-muslim-women/d/98034

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