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Hindi Section ( 31 March 2021, NewAgeIslam.Com)

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Importance of Ijtihad in the Eyes of Iqbal इकबाल की नज़र में इज्तेहाद की अहमियत

इब्ने आदम

०४ मई २०१२

इकबाल ने अपने ज़माने में यह अनुभव किया कि मुसलमान तकलीद और जुमूद की वजह से पतन का शिकार हैं जब कि दुनिया की दूसरी ताकतें अक्ल और तहकीक के आधार पर तरक्की करके बहुत आगे निकल गए हैं। इकबाल ने मुसलमानों में तहरीक पैदा करने के लिए इज्तेहाद (किसी मसले में परिवर्तन) की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है। इकबाल के इज्तेहाद के कल्पना पर फलसफियाना बहस करने की बजाए मुनासिब है कि इकबाल के अपने शब्दों में इज्तेहाद की अहमियत और आवश्यकता को बयान कर दिया जाए। उन्होंने इज्तेहाद का मफहूम इन शब्दों में बयान किया।

इज्तेहाद के अर्थ कोशिश करने के हैं लेकिन इस्लामी फिकह की इस्तेलाह में इसका अर्थ है वह कोशिश जो किसी कानूनी समस्या में स्वतन्त्रता पूर्वक राय कायम करने के लिए की जाए।“ (१)

इकबाल इस सोच के खिलाफ थे कि मज़हब से संबंधित अकीदा जितना समझा जाना था वह पूरा हो चुका। अब किसी को हक़ नहीं पहुंचता कि वह इसके बारे में और शोद्ध और इज्तेहाद करे। इकबाल ने कहा।

दीन पूरा होने के यह अर्थ नहीं हैं कि जिंदगी की जरूरतों के संबंध में सैंकड़ों वर्ष पहले एक ख़ास माहौल और ख़ास समाज के तकाज़ों के अनुसार जो विवरण संकलित हुई थीं वह हमेशा के लिए अपरिवर्तनीय रखी जाएंगी।” (२)

इकबाल ने १९०४ में कौमी ज़िन्दगीके शीर्षक से लेख लिख कर इज्तेहाद की अहमियत पर रौशनी डाली।

हालाते ज़िन्दगी में एक अजीमुशान इंक़लाब आ जाने की वजह से कुछ ऐसी तमद्दुनी आवश्यकताएं पैदा हो गईं हैं कि फुकहा के इस्तिदलाल, जिनके मजमुए को आम तौर पर शरीअते इस्लामी कहा जाता है, नज़रे सानी (दुबारा देखना) के मोहताज हैं। मेरा यह इंदीया नहीं कि मुसलमान मज़हब में कोई अन्दुरुनी नक्स है जिसके कारण वह हमारी मौजूदा तमद्दुनी जरूरियात पर हावी नहीं बल्कि मेरा यह मुद्दआ है कि कुरआन शरीफ व हदीसों के विस्तृत सिद्धांतों के नाम पर जो इस्तिदलाल फुकहा ने समय समय पर किये हैं उनमें से अक्सर ऐसे है जो ख़ास ख़ास ज़मानों के लिए बिलकुल मुनासिब और अमल के काबिल थे मगर हाल की जरूरियात पर काफी तौर पर हावी नहीं हैं। इस्लामी कानून की तजदीदे तफ़सीर के लिए एक बहुत बड़े फकीह की जरूरत है जिसके कारण और कल्पना की शक्तियों का पैमाना इतना बड़ा हो कि वह मुसलमान की बिना पर इस्लामी कानून को ना केवल एक आधुनिक पैराए में मुरत्तब व मुनज्जम कर सके बल्कि तखय्युल के रु से उसूल को ऐसी वुसअत दे सके जो हाल के तमद्दुनी तकाज़ों की तमाम मुमकिन सूरतों पर हावी हो। अगर इस बात की अहमियत को देखा जाए तो मालुम होता है यह काम एक से अधिक दिमागों का है और इसकी तकमील के लिए कम से कम एक शताब्दी की जरूरत है। (३)

इकबाल ४ जून १९२५ को आफताब अहमद खान के नाम एक ख़त में लिखते हैं।

फर्द की हैसियत, उसकी फिकरी आज़ादी और तबई उलूम की गैर मुतनाही तरक्की, उन चीजों में परिवर्तन स्थित हुई है, इसने जदीद ज़िन्दगी की असास को बिलकुल बदल दिया है। इसलिए जिस किस्म का इल्मे कलाम और इल्मे दीन अज मुंह मुतवस्सिता के मुसलमान की तस्कीने कल्ब के लिए काफी होता था। वह आज तस्कीन बख्श नहीं है। इससे मज़हब की रूह को सदमा पहुंचाना मकसूद नहीं है। अगर मुसलमानों की ज़िन्दगी को दुबारा ताज़ा और इज्तेहादी गहराइयों को दुबारा हासिल करना मकसूद है तो फिक्रे दीनी को फिर से तामीर करना बिलकुल लाज़मी है।“ (४)

इकबाल को इस बात की शदीद कलक रही कि लोगों की मज़हबी शिक्षा व तरबियत की जिम्मेदारी जिन मौलवी हज़रात पर है वह पूरी तरह से तालीम याफ्ता ना होने और बेशतर सूरतों में अपने हकीकी मंसब के अहल नहीं होते। अपने लेख कौमी ज़िन्दगीमें ऐसे ही मौलवी साहिबान का ज़िक्र करते हुए लिखते हैं।

मौलवी साहिबान की यह हालत है कि अगर किसी शहर में इत्तेफाक से दो जमा हो जाएं तो मसीह की हयात या नासिख व मंसूख आयतों पर बहस करने के लिए बाहमी नामा व पयाम होते हैं और अगर बहस छिड़ जाए और साधारणतः बहस छिड़ जाती है तो ऐसी जूतियों में दाल बटती है कि खुदा की पनाह। पुराना इल्म व कज़ल जो उलेमाए इस्लाम का गुण था, नाम को भी नहीं रहा। हाँ मुसलमान काफिरों की एक फेहरिस्त है कि अपने दस्ते ख़ास इसमें रोज़ बरोज़ इजाफा करते रहते हैं।“ (५)

जदीद तकाज़ों के अनुसार आज़ादाना राय कायम करने के उसूल की वजाहत के लिए इकबाल एक हदीस पेश करते हैं जिसकी रिवायत के अनुसार जनाब रिसालत मआब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत मुआज़ बिन जबल रज़ीअल्लाहु अन्हु को यमन का आमिल मुकर्रर किया तो फरमाया मुकामलात का फैसला कैसे करोगे? उन्होंने कहा। किताबुल्लाह के अनुसार लेकिन अगर किताबुल्लाह ने उनमें तुम्हारी रहनुमाई नहीं की तो फिर? फिर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत के अनुसार। लेकिन अगर सुन्नते रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम भी अपर्याप्त ठहरी तो? इस पर हज़रत मुआज़ रज़ीअल्लाहु अन्हु ने कहा तो फिर मैं खुद ही कोई राय कायम करने की कोशिश करूंगा।“ (६)

इकबाल बताते हैं कि एहतिरामे माजी के गलत तसव्वुर और अफ़राद का अपनी बसीरत पर अदमे एतिमाद पैदा करने का कारण बेजा नज्म व जब्त कि जो इस्लाम की अन्दुरुनी रूह के खिलाफ था, एक बड़े रद्दे अमल का मुतकाज़ी था और यह प्रतिक्रिया हुआ। इस संदर्भ में इकबाल इमाम इब्ने तैमिया रज़ीअल्लाहु अन्हु ने मज़ाहिबे अरबा की कतईयत से इनकार करते हुए उनके पैदा किये हुए जमूद पर जर्ब लगाई और फिकह के बुनियादी स्रोत अर्थात कुरआन व सुन्नत की तरफ रुजूअ कर के अपने इज्तेहाद के हक़ को इस्तेमाल किया। (७)

इकबाल इरान के जम्हूरी सियासी निज़ाम के हक़ में नहीं थे। वह लिखते हैं।

इरान के १९०६ के संविधान में यह दफा शामिल था की उलेमा की एक अलग दीनी आला कमेटी हो जो दुनयावी मामलों से आगाही रखती हो। इस कमेटी को मजलिस की कानून साजी की कार्रवाइयों पर निगरानी का हक़ होगा। मेरी राय में यह खतरनाक इंतज़ाम गालिबन इरान के आईनी नजरिये के पेशे नज़र किया गया है। मेरा खयाल है कि इस नजरिये के अनुसार बादशाह उस इलाके का केवल अमानतदार है जो हकीकत में इमामे गायब की मिलकियत है। इमाम के नुमाइंदों की हैसियत से उलेमा को उम्मत की जिंदगी के तमाम हयात के शोबे की निगरानी का हक़दार समझते हैं। हालांकि मैं यह समझने से कासिर हूँ कि जब तक नबूवत की जांनशीनी साबित ना हो वह इमाम की नुमाइंदगी का दावा किस तरह साबित कर सकते हैं तथापि इरानी आईन का नजरिया कुछ भी हो यह इंतज़ाम खतरे से खाली नहीं और सुन्नी देशों में इसे केवल आरज़ी तौर पर आजमाया जाए।“ (८)

अल्लामा इकबाल समझते थे कि उलेमा को इस तरह का इख्तियार देने से एक तरफ तो पापाइयत या मज़हबी पेशवाइयत की राह खुलेगी। दुसरे इससे इस्लामी राजनीतिक ढाँचे की जम्हूरी रूह ख़त्म हो जाएगी। इसके बजाए वह उलेमा को जम्हूरी अमल का हिस्सा बनाना चाहते थे इसलिए उलेमा की अलग अलग मजलिसों के कयाम की बजाए उनकी तजवीज़ थी कि उलेमा को मुस्लिम कानून साज़ असेम्बलियों का लाजमी हिस्सा बनाना चाहिए ताकि वह कानून से संबंधित हालात में अजादाना बहस में मदद और राहनुमाई मुहय्या कर सकें।“ (९)

लाहौर में मुस्लिम लीग के वार्षिक इजलास २१ मार्च १९३२ को सदारती खुतबे में उन्होंने फरमाया।

मैं तजवीज करता हूँ कि उलेमा की एक मजलिस तशकील दी जाए जिसमें मुस्लिम और कानून दानों को भी शामिल किया जाए जिन्होंने जदीद उसूले कानून की शिक्षा प्राप्त की हो। इसका उद्देश्य यह है कि इस्लामी कानून की हिफाज़त और तौसीअ और अगर जरूरत हो तो जदीद हालात की रौशनी में इसकी ताबीरे नौ की जाए। इसमें इस रूह के करीब रहा जाए जो इस्लामी कानून के बुनियादी उसूलों में कार फरमा है। इस मजलिस को आईनी सुरक्षा हासिल होना जरूरी है ताकि मुसलमानों के शख्सी कवानीन के सिसिले में कोई बिल उस समय तक असेम्बली में पेश ना हो सके जब तक वह मजलिस की नज़रों से गुजर ना जाए। (१०)

इकबाल अपने आर्टिकिल मिल्लते बैज़ा पर एक इमरानी नज़रमें एक बार फिर खैरुल उमम के इत्तेहाद और एकता के लिए आर्थिक बहबूद के साथ साथ, फिकह की तद्वीने नव के हवाले से इमाम अबू हनीफा रज़ीअल्लाहु अन्हु के इज्तेहादी काम को ज़बरदस्त खराजे तहसीन पेश करते हैं और ज़मान व मकान के अहवाल व ज़ुरुफ़ में अतीत से रिश्ता ख़त्म किये बिना जदीद मसाइल के हल के खातिर फिकह पर फिर से गौर की अहमियत उजागर करते हुए मोअतकेदाते मज़हबी की वजूहातको इस्लामी तहज़ीब की यकरंगी के लिए लाज़मी करार देते हैं। (११)

इकबाल इस्लामी यूनिवर्सिटी के कयाम की तजवीज़ देते हुए लिखते हैं-

भारत में इस्लामी यूनिवर्सिटी की स्थापित होना एक और लिहाज़ से भी अत्यंत आवश्यक है। कौन नहीं जानता कि हमारी कौम के अवाम की अखलाकी तरबियत का काम ऐसे उलेमा और वाइज़ अंजाम दे रहे हैं जो इस खिदमत की अंजाम दही के पूरी तरह अहल नहीं हैं। इसलिए कि उनका मुबल्लिगे इल्मी इस्लामी इतिहास और इस्लामी उलूम के संबंध में अत्यंत सीमित है। अख़लाक़ और मज़हब के उसूल व फरोग की तलकीन के लिए वर्तमान काल के वाइज़ को इतिहास, अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र के तथ्यों से आशना होने के अलावा अपनी कौम के लिट्रेचर और तखय्युल में पुरी दस्तरस रखनी चाहिए। अल नदवा, अलीगढ़, मदरसा देवबंद और इसी प्रकार के दुसरे मदरसे जो अलग अलग काम कर रहे हैं इस बड़ी जरूरत को रफा नहीं कर सकते। इन तमाम बिखरी हुई तालीमी ताकतों का शीराज़ाबंद एक वसीअ तर गर्ज़ का दारुल उलूम होना चाहिए जहां अफ़रादे कौम ना केवल ख़ास काबिलियतों को नशों नुमा देने का मौक़ा हासिल कर सके बल्कि तहज़ीब का वह उस्लुबी साँचा तैयार किया जा सके जिसमें मौजूदा जमाने के हिन्दुस्तानी मुसलमानों को ढलना चाहिए, जिसके लिए आला तखय्युल, ज़माने के रुझानात का लतीफ एहसास और मुसलमानों की तारीख और मज़हब के मफहूम की सहीह ताबीर लाजमी है।“ (१२)

इकबाल ने इस्लामी कानून के चार बुनियादी स्रोत बयान किये, कुरआन मजीद, हदीस शरीफ इज्मा ए उम्मत कयास, इकबाल ने सूफी तबस्सुम के नाम ख़त में तहरीर किया।

मेरा अकीदा यह है कि जो व्यक्ति इस वक्त कुरआनी दृष्टिकोण से वर्तमान काल के ज्यूरिस प्रुडेंस पर एक तन्कीदी निगाह डाल कर अहकाम ए कुरानिया की अब्दियत को साबित करेगा, वही इस्लाम का मुजद्दिद होगा और बनी नौए इंसान का सबसे बड़ा खादिम भी वही शख्स होगा। (१३)

इकबाल ने अपने छठे खुतबे में तहरीर किया:

अगर इस्लाम की निशाते सानिया एक हकीकत है और मेरा ईमान है कि इस्लाम का अहया एक हकीकत है तो हमें भी किसी ना किसी दिन तुर्कों की तरह अपने वरसे की कद्र व कीमत का फिर से जायजा लेना होगा। पहली शताब्दी के तकरीबात आधे से ले कर चौथी सदी के आगाज़ तक उन्नीस फिकही मज़ाहिब मौजूद थे। इस हकीकत से हमें बखूबी मालुम होता है कि हमारे कदीम उलेमा ने इर्तेका पज़ीर इस्लामी तहज़ीब के तकाज़ों को पूरा करने के लिए किस कदर जां फ़िशानी से काम लिया था। इस्लामी फुतुहात के नतीजे में इस्लामी निगाह के नुक्ते की उंचाई और इस्लाम कुबूल करने वाली नई कौमों की आदतों और मुकामी हालात की बिना पर उलेमा को मज़हब की ताबीर और तशरीह करना पड़ी। आज कल आलमे इस्लाम नई नई शक्तियों से दो चार है जो इंसानी हालात के गैर मामूली तरक्की के बिना पर सरगर्म ए अमल हैं। इस हालात में फिकह की खात्मियत पर यकीन रखना माकूल बात नहीं। क्या फिकही मज़ाहिब के बानियों ने कभी अपने दलीलों और ताबीरों को हर्फ़ ए आखिर मानने का मुतालबा किया? हरगिज़ नहीं। (१४)

इकबाल ने अपने अशआर में इज्तेहाद के बारे में कहा:

हर नई तामीर को लाज़िम है तखरीब ए तमाम

है इसी में मुश्किलाते जिंदगानी की कशुद

आइन तौ से डरना तर्ज़े कुहन पुराना

मंजिल यही कठिन है कौमों की ज़िन्दगी में

हिन्द में हिकमते दीन कोई कहा से सीखे

ना कहीं लज्जते किरदार ना फिकरे अमीक

हल्का ए शौक में वह जुरते अंदेशा कहाँ

आह महकूमी व तकलीद व ज़वाले तहकीक

खुद बदलते नहीं कुरआन को बदल देते हैं

हुए किस दर्जे फकिहान हरम बे तौफीक

उन गुलामों का यह मसलक है कि नाकिस है किताब

कि सिखाई नहीं मोमिन को गुलामी के तरीक

हवाला जात

१ मोहम्मद इकबाल: तशकील जदीद सफहा २२९

२ परवेज़: इकबाल और करा सफहा ८२

३ जावेद इकबाल: खुतबाते इकबाल सफहा २०४

४ शैख़ अताउल्लाह: मकातीबे इकबाल सफहा ५२४

५ मोहम्मद इकबाल: तश्कीले जदीद सफहा २८८

६ मोहम्मद इकबाल:तश्कीले जदीद सफहा २५५

७ मोहम्मद इकबाल: तश्कीले जदीद सफहा १७६

८ मोहम्मद इकबाल: इस्लाम की तश्किले नव सफहा १७६

९ एज़न

१० ए आर तारिक Speeches and Statements of Iqbal: सफहा १४

११ एज़न सफहा २२८

१२ इकबाल के नसरी इफ्कार सफहा २३६

१३ शैख़ अताउल्लाह: इकबाल नामा सफहा ९८

१४ मोहम्मद इकबाल: तश्कीले जदीद

बशुक्रिया: एतेदाल, पाकिस्तान

URL for Urdu article: http://www.newageislam.com/urdu-section/importance-of-ijtihad-in-the-eyes-of-iqbal--اقبال-کی-نظر-میں-اجتہاد-کی-اہمیت/d/7231

URL: https://www.newageislam.com/hindi-section/importance-ijtihad-eyes-iqbal-/d/124631


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