New Age Islam
Thu Jun 24 2021, 05:19 PM

Hindi Section ( 12 Sept 2014, NewAgeIslam.Com)

Comment | Comment

Who Bothers, Everything is Just OK कौन पूछता है, यहां सब चलता है

 

अमीर हुसैन फ़रहाद

इब्ने इंशा कहते है कि किसी देश को अगर देखना हो तो उन की सब्ज़ि मंडी जाकर देख लो। मैं चीन में सब्ज़ी मंडी गया तो मैं ने देखा कि पाक साफ कपड़े में पाक साफ महिलाएं सेमेंट के पत्थरों पर बैठी सब्ज़ी बेच रही है। हर चीज़ धुली हुई, फर्श पर कहीँ एक पिला पत्ता या सड़ा गला टमाटर नजर नहीं आया, इसके लिए ड्राम रखे हैं वह उनमें डालते हैं। सब्जी ऐसी कि मानो मुफ्त बिक रही है। दरअसल चीन में तीसरा हाथ नहीं है वह तीसरा हाथ (आढ़ती) का काट दिया है। महिलाएं डायरेक्ट खेत से गधा गाड़ी में धुली धुलाई सब्जियों लाती है। टाइल लगे पथड़ों पर सजा कर बेचती हैं और चलती बनती हैं।

एक कराची सब्जी मंडी थी जिसमें कोई सज्जन चल नहीं सकता था, पैरों के नीचे गले सड़े टमाटर आलू प्याज आते तो उनकी धार से सारी पैंट का सत्यानाश हो जाता था। कई साल हुए कराची सब्जी मंडी पीर कॉलोनी से शिफ्ट हो गई है और सरकार ने सब्जी मंडी की जगह एक सुंदर (सैन्य पार्क) बना दिया है। मगर प्याज आलू टमाटर की बदबू वहां से अब तक नहीं गई।

बर्नार्ड शाने बिल्कुल सच कहा था के क़ानून अंक़बूत (मकड़ी का जाला) है। जिस में मक्खी मच्छर झीगुर इत्यादी फंस कर जीवन से हाथ धो बैठते है और छिपकिली चुहा इत्यादी जाल को तोड़ कर निकल जाते है।कानून के जाल में भी सोसाईटी के हलके लज्जित लोग फंस जाते हैं, और भारी व्यक्ति निकल जाते है। वह कानून खरीद भी सकते हैं अगर कभी इत्तेफ़ाक़न फंस भी जाएं तो देश के मशहूर वकीलों की फौज उनके बचाव के लिए मैदान में आ जाते है। अगर बीमार हो तो यूके और अमेरिका जाकर मौत को हरा देते हैं। वे अपने पैसे से नहीं सरकार के खजाने से। जब देश के बड़े इलाज बाहर करते हैं, जब बड़ों की औलाद बाहर पढ़ाई करता है।तो शिक्षा और इलाज पर ध्यान कौन दे? क्यों दे? जिस कोएँ का पानी नहीं पीना है उसकी सफाई पर ध्यान देना बेकार है।

पाकिस्तान में तीन तीन बातों पर सोचने से दिल डूब जाता है। दिलेर आदमी भी कदम नहीं बढ़ाता, हर आदमी इससे बचने की कोशिश करता है।

(1) सरकारी स्कूल में बच्चों को एडमिशन कराना।

(2) सरकारी अस्पताल में इलाज करवाना।

(3) चोरी, डाके या बलात्कार की रिपोर्ट थाने में दर्ज कराना।

हमारा गांव पाकिस्तान भर में एक आदर्श गांव है। इस पर डाकू कोमनटरी फिल्म भी बनी है। वहां एक बार सरकारी स्कूल जाना पड़ा। बाहर आवाज आ रही थी सराजदीन शिक्षक बच्चों को पढ़ा रहे थे। मुहम्मद बिन कासिम को देखकर राजा दाहर के हौसले पस्त हो गए। बच्चों ने दोहराया हौसले पस्त हो गए तो पश्तो में समझाया मुहम्मद बिन कासिम को देखकर राजा दाहर के हथियार पस्त हो गए। फिर कहा मोहम्मद बिन कासिम ने राजा दाहर की रीढ़ की हड्डी तोड़ दी। बच्चों ने दोहराया, रीढ़ की हड्डी तोड़ दी। फिर पश्तो अनुवाद में समझा रहे थे। मुहम्मद बिन कासिम ने राजा दाहर के रीढ़ का दोहरा तोड़ दिया। बच्चों ने सबक भी दोहराया। अंदर जाकर मैं सर अजदीन से पूछा कि तुम क्या पढ़ा रहे थे? यह राजा दाहर के रहड़े का धरा कहा से आया?

कहा फ़रहाद भाई जैसे हम पढ़ा है वैसे ही तो पढ़ा रहा हूं। मैंने कहा यार यह गलत नहीं है कि माता पिता अपने बच्चों को शिक्षा के लिए भेजा है और एक मेरे लिए कुर्सी मंगाई दूसरे चाय के लिए भेजा? कहा फ़रहाद भाई आप को क्या पता यह वहाँ घर में माँ बाप को शांति से रहने नहीं देते, वह उन से तंग हो जाते हैं, वह अपनी जान छुड़ाने के लिए उन्हें हमारे पास भेज देते हैं कि यह पढ़ाई करे या न करें। हमारा यह दायित्व क्या कम है कि हम उन्हें छह घंटे तक रख कर उन के मां बाप को शांति और आराम पहुंचाया है। इतने में एक लड़का आया। शिक्षक को दरांती पकड़ाई कहा आप की भैंस को चारा डाल आया हूँ। शिक्षक ने कहा शाबाश। यह होनहार शिष्य है।

मैं इस लड़के मुनव्वर के माता पिता के पास गया, मैंने कहा आप अपने बच्चे से पूछते हैं कि उस ने स्कूल में क्या काम किया है? उसके शिक्षक से पूछा है कि वह उसे क्या सिखाया है? आदि। कहा भाई साहब आप को क्या पता यह कैसा बदमास है लड़कों को मारता पीटता है। किसी का सिर फोड़ता है किसी के कपड़े फाड़ता है रोज़ाना मेरे लिए एक नई मुसीबत पैदा करता है। कुछ घंटे स्कूल में रहता है तो मुझे आराम मिलता है। पढ़े न पढ़े मुझे क्या। बड़े होकर तो इसे खेतों में बाप का हाथ बटाना है। कोई अधिकारी बनना नहीं है।ग़ौरतलब है कि नसीरुल्लाह बाबर साहब का संबंध भी इसी गांव (पिर पीआई)से था।

यह एक आदर्श गांव की तस्वीर है। ग़ैरमिसाली गांव कैसे होंगे? आप खुद अनुमान लगाए। दो तीन शिक्षक प्रतिदिन गायब होते हैं। मैं हेडमास्टर से पूछा कैसे सहन कर लेते हैं? कहा फ़रहाद साहब मैं भी तो इंसान हूँ मेरे भी पचासों काम होते हैं सप्ताह में दो तीन दिन गायब रहता हूँ इसके लिए उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं करता। फिर एक ही गांव के हैं। भाई बन्धु है, में रिटायर होकर खेती करूंगा बच्चों को भी यहां से निकल कर खेती करनी है और खेती के लिए शिक्षा जरूरी नहीं है।बस अल्लाह का फ़ज़ल है दूसरे से पत्र लिखवाने से बच गए खुद लिखते है, अब तो उस की भी जरुरत नहीं रही मोबाईल हर एक के पास मौजूद है।

मैंने पूछा मियां गुल साहब डायरेक्टर आदि यहाँ का दौरा नहीं करते? कहा इस राज्य में परेशानी है कि गर्मी बहुत है और सर्दियों में ठंड बहुत होता है। इसलिए वे अपने कार्यालयों से कम निकलते हैं हालांकि विभाग द्वारा प्रत्येक को वाहन मिली हैं। यहाँ एक व्यापार जोरों पर चलता है। शिक्षक और कलर्कों के तबादले। इससे क्या होता मैंने पूछा?

फिर लोग परेशान होते हैं सुबह पांच बजे घर से चलते हैं दो बसें बदलकर और पैदल पहाड़ी का रास्ता तय करके काम पर पहुंचते हैं फिर भी लेट होते हैं। वापस अपनी जगह ट्रांसफर कराने का दस पन्द्रह हज़ार रुपये है हर शिक्षक को देना पड़ता है चाहे पुरुष हो या महिला। और आप यकीन नहीं करेंगे कि शिक्षा विभाग के बाबू लोग और अधिकारी महिला शिक्षकों के वेतन पर पल रहे हैं। कई महिलाएं तो काम छोड़ देती हैं क्योंकि रिश्वत के पैसे दे नहीं सकती हैं और दूर सुनसान कच्चे रास्तों पर अकेले जाने में वह सम्मान जिसे सुरक्षित रखने के लिए वह नौकरी करती हैं वह सुरक्षित नहीं रहती। और पशतोन लड़की के लिए यह एक ही दरवाजा खुला है यानी शिक्षा। यहां यह सुविधा है कि रिश्वत को रिश्वत ही कहते हैं सुना था कराची में तो इसका नाम बदल दिया है वहाँ डोनेशन कहते हैं, इस के बिना एडमिशन कॉलेज और युनिवर्सिटी में असंभव है?

हां मगर तुम्हारा घाव देखकर अपना घाव को खराश लगता है। मुझे अंदाज़ा हुआ कि सरकारी शिक्षा पर सरकार बेकार पैसा बर्बाद कर रही है। इस से कुछ प्राप्त होने वाला नहीं है। अगर यह खत्म कर दिया जाए तो सरकार को बहुत लाभ होगा। जो शिक्षा के मद में सहायता मिलती है वह बंद हो जाएगी उसी गांव में सरकारी अस्पताल है जिसमें आठ डॉक्टर हैं दो तीन डाक्टर हमेशा गायब रहते हैं उनके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज नहीं हो सकता क्योंकि कोई किसी विधानसभा सदस्य का बेटा है कोई किसी मंत्री का साला बहनोई है। रोगी को रंगीन पानी देते हैं जो कोई बीमार आदमी ठीक नहीं होता, दवा तो अस्पताल में होती नहीं। बड़े अस्पताल राज्य में दो हैं। लेडी रीडिंग और शेर पाउ। जो लोग अपने किसी बुजुर्ग माता पिता से तंग आ जाते हैं वह वहाँ एडमिट करा देते हैं फिर जल्दी जल्दी कफन दफन का इंतजाम भी कर लेते हैं। क्योंकि वहाँ से फिर उसकी लाश ही आती देखी है। अपने पैरों पर कम ही कोई आता देखा है।

गांव वाले अस्पताल में एक बार जाना हुआ देखा कि हमेश गुल दांत के डॉक्टर की कुर्सी पर बैठा था यह पहले ठेले पर सब्जी बेचा करता था। मैंने पूछा यहाँ क्या कर रहे हो? डॉक्टर मारेगा रोगियों की कुर्सी पर बैठ जा। कहा में ही डॉक्टर हूँ, असली डॉक्टर तो अपने गाँव नगरह में रहता है कभी कभी आता है मुझे यह काम सिखाया गया है यह अफगानी शिविर वाले पुरुषों महिलाएं आती हैं उन्हीं पर सीखाया गया हैँ दांत निकालते समय कई मामले खराब भी होते हैं, लेकिन यह अच्छे लोग होते है कहते हैं यह अल्लाह को मंज़ूर होगा बेटे तुम तो कोशिश की थी।

मैंने पुलिस महानिरीक्षक साहब (यूसुफ खान) से मुलाकात की थी। मैंने कहा कि क्या आप इस बात पर विचार किया कि कोई पुलिस वाला अगर मारा जाता है। दुर्घटना में या डाकुओं लीटरों के हाथ से, और उसकी लाश सड़क या मैदान में पड़ी हो तो उस पर कोई आंसू नहीं बहाता, सिवाए उसके परिवार के। इसका कारण क्या है? हालांकि किसी आम आदमी की लाश को देख कर आम इंसान की आँखें नम हो जाती है। पुलिस वाला भी इंसान है उस के भी पत्नी बच्चे, बहन भाई माँ बाप इंतेज़ार करते होंगे, पर अब प्रधान कार्यालय में किसी थाने में किसी गली किसी रोड नाके पर कहीं नजर नहीं आएगा, मानों मिट्टी के नीचे सो जाएगा। यह दुख की बात नहीं? फिर क्या कारण है कि लोगों के दिल में उस के लिए सहानुभूति नहीं होती? लेकिन अक्सर लोगों को यह कहते सुना है कि चलो एक मोज़ी तो कम हुआ। अगर किसी फिल्म में किसी पुलिस वाले को मार पड़ती है तो देखने वाले कहते है और मारो हरामखोर को। ऐसा क्यों है? आईजी साहब! क्या पुलिस के लिए जनता के दिलों से नफरत खत्म करके सहानुभूति पैदा कर सकते हैं?

आईजी ने कहा मेरी समझ में नहीं आता कि यह कैसे होगा।? आप बताएं। मैंने कहा चूंकि स्कर्ट लैंड यार्ड  तक चक्कर लगा चुका हूँ, 18 साल मेरी विदेशी पुलिस की सर्विस है। वहाँ अगर कोई पुलिस में भर्ती की इच्छा रखता है तो वह कहता है पुलिस सेवा में आना चाहता हूं। यहां अगर कोई पुलिस में भर्ती होने की इच्छा रखता है तो कहता है पुलिस बल में आना चाहता हूँ। बस इन दो शब्दों में सब कुछ छिपा है। सर्विस। यानी सेवा। बल यानी शक्ति। अगर पुलिस ने सर्विस का रास्ता अपनाया तो जनता के दिलों में सहानुभूति का दरिया देखेंगे। और अगर सेना की राह अपनाली तो नफरत और बढ़ जाएगी।

जनता चाहती है कि हम कुछ भी करें, हमारी पुलिस मक्के मदीने जैसी होनी चाहिए। जैसा दूध होगा वैसी ही दही बनेगी। हमारी पुलिस हमसे बनी है जाहिर है हम जैसी ही होगी। निजी लाभ के लिए हम सब कुछ कर लेते। कोई मौका जाने नहीं देते। पुलिस क्यों मौका बर्बाद करे। इसलिए मुर्दा घर से बेटे का शव भी बिना रिश्वत दिए नहीं मिलती।

टीवी ने कई बार बताया कि कराँची में जगह जगह ग़ैर क़ानूनी ज़बह खाने खुले है। बीमार जानवर ज़बह किये जाते है डॉक्टर रिश्वत ले कर गोश्त पर मुहर लगा देते है इत्यादी तथ्य यह है कि यह तो पाकिस्तान में जगह जगह हो रहा है, लेकिन मामूली फर्क के साथ। सिर्फ छावनी की मार्केट में मुहर लगाने का रिवाज है। लेकिन इस तरह की मुहर हर क़साई के पास होती है। रानें लटकाने के बाद उन पर जगह जगह मुहर लगा देता है यह मुहर डॉक्टर ने दी है और हमें निर्देश दिया है की देख भाल कर लगाना। डॉक्टर का बयान है कि यह उन हरामखोरों ने खुद बनवाई होगी। किसी दुसरे देश में किसी संस्थान की मुहर बनवाने कि लिए प्रधिकरण पत्र ले जाना पड़ता है। हमारे यहाँ भी यही क़ानून है, मगर तीस रुपय अधिक दो तो जहाँ से चाहो मुहर बनवालो। प्रधिकरण पत्र की कोई जरुरत नहीं।

कतर की बात है कि रसम खान गुलाब खान से कहा कि नकली ड्राइविंग लाइसेंस तो मैं बनवा लिया अब मुहर की कसर रह गई हैरान हूँ कि मुहर का क्या करूँ? गुलाब खान ने कहा कि यह कौन सी मुश्किल  बात है वह सामने टोकरी में से एक आलू और चाकू देना। यह दोनों चीज़िए पकड़ाई। गुलाब खान ने आलू को काटा फिर चाकू की नोक से गोलाई में कटे हुए आलू पर निशान लगाए। कहा अब ठीक है। उसने पहले आलू से कागज पर मुहर लगाई, फिर नकली लाइसेंस पर लगाई, कहा अब ठीक है। बिल्कुल अपने देश की सरकारी मुहर बन गई। कमाल की बात है कि रुस्तम खान आलू वाली मुहर लगा दी लाइसेंस मिल गया। इसका कारण यह है कि हमारे यहां अक्सर मुहरें पढ़ी नहीं जाती। अनुमान लगाने पड़ते हैं कि यह मुहर होगी।

कुवैत में हमारी कम्पनी के मिस्री चौकिदार से उस के रिश्तेदार ने पासपोर्ट मांगा कहा देश जाना है मगर मेरा पासपोर्ट अक़ामा के लिए गया है। अपना पासपोर्ट चार पाँच दिन के लिए दे देना। उस ने दे दिया मिस्री ने अपने रिश्तेदार के फोटो पर अपना फोटो लगा लिया, उसे खरुज में एमिग्रेशन वालों ने पकड़ लिया, हमारा चौकिदार भी गिरफ्त में आया क्योंकि पासपोर्ट उस का था।

 मैं कंपनी का प्रतिनिधि था उसे छुड़ाने गया तो अमरीगेशन अधिकारी उसे कह रहा था। तेरा खाना खराब हो, ऐ गधा, अगर तूझे यह मूर्खता करनी थी तो किसी पाकिस्तानी की सेवा ली होती। यह विदेशों में हमारी पहचान।

इस विषय पर बहुत कुछ लिखने का दिल चाहता है। लेकिन डर यह है कि जो लोग देश से बाहर गए हैं और समय समय पर उनके मन में देश की याद नदी की मौज की तरह उठती है और वह वापस आना चाहता है कहीं वह इरादा बदल कर वहीं का न हो जाएं। मुझे बद बख्त (सरफराज खान) ने धोखा दिया था, कहा तुम वापस आजाओ, अब हालात पहले जैसे नहीं हैं, सोना हवा में उछालते हुए बाजार से गुज़रिए कोई पूछता तक नहीं। अगर सोना गिर पड़े तो सप्ताह तक वहीं पड़ा रहेगा। लोग दुकानें खुली छोड़ कर नमाज़ पढ़ने जाते हैं, सोने से लदी हुई महिलाएं पेशावर से कराँची तक जाए तो कोई खतरा नहीं।

अफसोस आया तो पता चला कि सब झूठ है। यहाँ तो मुंह में सोने दांत नहीं छोड़ते, सोने से लदी हुई औरत छोड़ दे किताबों के साथ कोई लड़की स्कूल कॉलेज तक नहीं जा सकती, दुकानें खुली छोड़कर नमाज़ पढ़ने जाए कितना बड़ा झूठ और फरेब ...... यहाँ हर दुकान के आगे हथियार से लैस वर्दीवाले सीक्योरेटी गार्ड बैठा होता है और दुकान फिर भी लुट जाता है।हर गली में दो वर्दीवाले गार्ड ड्यूटी दे रहे हैं। रोज़ाना नौ सौ, हजार मोबाइल फोन छीने जाते हैं अनगिनत मोटरसाइकिलें और मोटर्स छीनी जाती हैं। नकदी और गहने से लोगों को वंचित होना पड़ता है। कितना बड़ा धोखा दिया खाना खराब सरफराज़ खान ने। में पिस्तौल लेकर धोखेबाज को ढूंढ़ता रहा, लेकिन पता चला कि वह दुबई गया है।

किसी रोग का इलाज नहीं है? इलाज है अगर सरकार प्रत्येक नागरिक को अपनी रक्षा के लिये हथियार रखने की अनुमति दे। जहां बस लूटने वालों में से दो को मार गिराया जाए तो सब ठीक हो जाएगा। मगर यहाँ कानून है कि डाकू बेचारे को क्यों मारा, पिस्तौल लाइसेंस वाला है या बिना लाइसेंस वाला, अगर लाइसेंस वाला है तो बाहर कैसे लाए? हथियार प्रदर्शनी क़ानूनन अपराध है। इसे कहते हैं पत्थरों को बांध कर रखना और कुत्तों को खुला छोड़ना। डाकू, लुटेरे को मारने पर सरकार को पुरस्कार देना चाहिए।

लोडिगं और धुआं देने वाली वाहन चलाना क़ानूनन अपराध है। लेकिन हालत यह है कि कराची के जिस बस को देखो तो छत पर पीछे की ओर, दाएँ बाएँ, पायदान पर आदमी इस तरह लटके और चिपके हुए हैं जैसे गुड़ की डली पर मक्खियाँ बैठी होती हैं। यह स्थिति 1952 से हैं जब कराची की आबादी नदी के पार नहीं थी। जो बदलाव ला सकते हैं, वे और उनके परिवार वाले बसों में यात्रा नहीं करते, उनके बच्चों के पास वाहन होते हैं। और बसों में फिरते हैं, गिरते हैं, मरते हैं उन बेचारों के हाथ में परिवर्तन की कुंजी नहीं है। ऊपर वाले जानकर अनजान हैं। यह भी शायद परिवार नियोजन की विफलता की वजह से है। जनसंख्या कम नहीं होती।

जब मैं पेशावर में था तो बालों की सफेदी कम करने के लिए काला कोला लगाया करता था, अब उसकी जरूरत नहीं पड़ती, किसी भी बस स्टॉप पर दस पंद्रह मिनट खड़े हो जाएं बसें इतना धुआं छोड़ती हैं कि बाल स्वाभाविक रूप से काले हो जाते हैं। अफसोस कि बसों की छतों पर तीस चालीस आदमी और गाढ़ा गाढ़ा धुआं व्यक्ति को नजर नहीं आता। पुलिस का बुनियाद हज़रत उमर (रज़ि) ने रखी थी। और भेष बदल कर रिआया का हाल मालूम करते थे। अगर आईजी और डीआईजी साहिबान कभी कभी सफेद कपड़ों में बसों में यात्रा करते तो उन्हें यह भी पता चल जाता कि यातायात पुलिस जब किसी बस को रुकवा कर ड्राइवर और कंडैक्ट्रर को बस के पिछे कागज़ात लाने को कहते हैं तो वह किस प्रकार के कागजात हैं? और ड्राइवर कंडैक्ट्रर जब वापस आते हैं तो बड़बड़ा कर गालियां किसे देते हैं?

एक बार कराँची से बस के द्वारा पेशावर जाना हुआ, मियाँ वाली के नज़दीक़ ड्राइवर ने एक बेकार होटल के सामने गाड़ी रोकी, जिस ने दाल रोटी का हर यात्री से 60-70 रुपय लिए। गाड़ी के ड्राइवर को पर्दें के पिछे बैठाया उन्हें भुना मुर्ग, एक एक जूस और सिगरेट का पैकेट दिया दो ज़िन्दा मुर्गीयाँ दीं। ड्राइवर ने कहा कि इस की किया जरुरत है। होटल वाले ने कहा यार घर जाकर खा लेना, रास्ते में किसी भी होटल वाले बस वालों से पैसा नहीं लिया जाता। यह उस का इंआम होता है कि बस वाले ने उस के होटल को चुना बस रोकी होटल वाले को डेढ़ पौने दो हजार रुपये की कमाई हुई।ज़िन्दा मुर्गीयों के पैर बंधे थे मेरे सामने वाली सीट के निचे वह हिल रही थीं। आगे शहर के क़रीब ट्रेफिक पुलिस वालों ने गाड़ी रोकी, ड्राइवर और कंडक्टर को काग़ज़ात लाने को कहा ......... जब वह वापस आए तो यह तेज़ आवाज़ से कहा यारो! यह कैसा अन्याय है।हम उन को हफ्ता भी देते है फिर भी 50-50 रुपये हम से ले लिया। मैं ने कहा अन्याय तो है, यही बात मुझ से उन मुर्गीयों ने कही। कंडक्टर ने हैरान हो कर मुर्गीयों की ओर देखा फिर मेरी तरफ देखा, कहा किया कह रहे हो भाई साहब?  मैंने कहा देखो तुम ने हमको उस फटीचर होटल वाले के हाथ बेचा, उस ने 15 रुपये के खाने का हम से 80 रुपये वसूल किए उस के बदले में तुम्हें खाना पिना जूस, सिगरेट और ज़िन्दा मुर्गीयाँ मिली। यह तुम ने ज़ुल्म किया, तुम ज़ालिम हो। तो अल्लाह ने हर ज़ालिम फिरऔन के लिए एक मुसा का इंतेज़ाम कर रखा है, पुलिस वाले ने तुम्हारा गला दबाया और होटल में खाया पिया उगलवाया। जो कुछ पुलिस वाले ने तुम से लिया, उस के पास भी नहीं रहेगा। उस के पत्नी के गुर्दें में अचानक दर्द उठेगा। तुम से लिए हुए राशि से दुगनी तीनगुनी राशि डॉक्टर ले लेगा? यहाँ हर एक का हाथ दूसरे के जेब में है। हमारा समाज भेंड़ियों का समाज बन चुका है। बरटैंड रसेल कहते हैं कि हमारा समाज बिल्कुल भेड़ियों का समाज बन गया है। कनाडा में बर्फ़ीले मौसम में सभी जानवर अपने अपने आश्रयों में छुप जाते हैं, भेड़िये मारे फिरते हैं शिकार नहीं मिलता।तब यह दायरें में बैठ कर हांपते है और लार बहती रहती है, इन में जो भूख प्यास से निढ़ाल हो कर ऊंघ जाता है सब ही उस पर छपट कर उस की बूटी बना देते है। फिर इंतेज़ार करते है जब दूसरे की आँख बंद होने लगती है उस पर छपट्टा मारते है। हू बहू यही हालत हमारी हो गई है। रसल साहब अपने समाज का ज़िक्र करते है उन्होंने हमारा समाज देखा ही नहीं।

एक बार रेल गाड़ी से पेशावर से कराँची जाना हुआ। हालत यह थी के कोरिडोर और सिटों के बीच आदमी ही आदमी भरे थे शौचालय में और दरवाज़ों के आगे भारी भारी संदूक़ रखे थे न कोई बाहर जा सकता था न अंदर आ सकता था। मर्द और औरतें सब परिशान। एक जियाले ने गार्ड को पकड़ा कहा श्रीमान यह किया ज़ुल्म है हमें शौचालय जाना है? गार्ड ने कहा जाओ किस ने मना किया है?। यात्री उसे शौचालय ले गया कहा देखो जनाब शौचालय में संदूक़ और अन्य सामान भरा था कहा देखो कहाँ जाएं और इस में पानी भी नहीं है। गार्ड ने कहा आप थोड़ा सा इंतेज़ार करें आगे जंगल आ रहा है वहाँ हम गाड़ी खड़ी करेंगें आप लोग उतर जाएं वहाँ आप को बरसात का पानी भी मिल जाएगा।

जियाले ने कहा अगर आप ने इंतेज़ाम नहीं किया तो हम रेल मंत्री बजारानी से आप की शिकायत करेंगें। मुझे आश्चर्य हुआ कि आगे जगह मिल ही गई गार्ड वादे के अनुसार गाड़ी रुकवाई और लोग उतर गए, बरसात का पानी भी था लोग अपना काम कर के वापस आए तो गाड़ी चल पड़ी। लाहौरी जेयाला कह रहा था हरामखोर कहीं के गाड़ी हम ने रुकवाई थी सौ डेढ़ सौ लोग उतर कर काम कर के आए है। यह 1930 की घटना है।किस किस संस्थान का उल्लेख किया जाए, आवे का आवा ही बिगड़ा हुआ है। मुझे गार्ड नज़र आया तो मैं ने उसे ठहराया मैने कहा हूज़ुर किया आप को ज्ञात था के आगे शौचालय का प्रबंध है? वह बहुत ही अच्छा आदमी था। उस ने मुस्कुरा कर कहा प्रतिदिन का आना जाना है यहाँ का चप्पा चप्पा मैं जानता हूँ बरसात के पानी का भी ज्ञात था और यह कि यहाँ खेत भी हैं स्त्री के शौचालय का भी प्रबंध है। हर डब्बे का यही हाल है। हर हफ्ते मैं यहीं गाड़ी रुकवाता हूँ मजबूरी है। खेत वाले का भी फायदा हो जाता है उसे मुफ्त में शक्तिशाली खाद मिल जाती है।

दिलदार परवेज भट्टी ने बताया कि मेरा क्लास साथी जो अब पुलिस इंस्पेक्टर है हम दोनों को एक समारोह में जाना था उसने बाइक थाने के पास रोक दी कहा दो मिनट में आया जरूरी काम है। मैंने देखा कि पुलिस ने एक आदमी के हाथ चार पाई के पायों के नीचे दबाए और चार पाई पर चार पुलिसकर्मी बैठे हैं और उसे मुक्कों से मार रहे हैं कि बता तेरे पास 500 रुपये कहां से आए। जब मेरा दोस्त आया तो मैंने पूछा यह क्या मामला है? कहा यह एक फिल्म निर्देशक का नौकर है उसकी जेब से 500 रुपये निकाल लिए गए हैं उसने रिपोर्ट दर्ज कराई है अब उससे पूछा जा रहा है। मगर पुलिस वाला तो थाने दार को कह रहा था उस का अपनी भाभी से अवैध संबंध हैं? ओ यार इन झमेलों में मत पड़ उसका कोई भाई नहीं है तो भाभी कहाँ से आई। मगर वह तो मान गया। अगर तुम्हें मार पड़ेगी तुम भी मान जाओगे।

अगस्त, 2014 स्रोतः मासिक सुतुल हक़, कराँची

URL for Urdu article:

https://newageislam.com/urdu-section/hussain-amir-farhad/who-bothers,-everything-is-just-ok--کون-پوچھتا-ہے-،-یہاں-سب--چلتا-ہے/d/98578

URL for this article: https://newageislam.com/hindi-section/hussain-amir-farhad/who-bothers,-everything-is-just-ok--कौन-पूछता-है,-यहां-सब-चलता-है/d/99045

 

Loading..

Loading..