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Hindi Section ( 22 May 2012, NewAgeIslam.Com)

Reshaping Islam for the Modern Age नए ज़माने के लिए इस्लाम की तश्कीले नौ (पुनर्गठन)


हसन सुरूर

18 मई, 2012

(अंग्रेजी से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

दक्षिण एशियाई मूल के फिक्रमंद ब्रिटिश मुसलमान अपने मजहब को तंकीदी तहकीकात और बहस के लिए कुशादा करना चाहते हैं।

"चलो ईमानदार हो जायें। इस्लाम से एक वाज़ेह राब्ता है।"

नौजवान और कमजोर ब्रिटिश लड़कियों के साथ जिंसी बदसुलूकी के कारण पिछले हफ्ते जेल में डाले गए मुसलमान मर्दों के एक ग्रुप के विवादित मामले पर, ये टाइम्स के संपादकीय की हेडिंग थी। एक सामाजिक उदार और पूर्व कम्युनिस्ट के अलावा लेखक डेविड ओरोनोविच ने तज्वीज़ दी कि इस्लाम वंशानुगत रूप से औरत से नफरत करने वाला धर्म थाछ एक संस्कृति जो अपनी औरतों को सिर्फ इस्तेमाल की चीज समझता है। लेकिन इसमें विडंबना हैः एक मुस्लिम चीफ क्राउन प्रासीक्युटर (मुख्य क्राउन अभियोजक) था जिसने इस मामले के बंद हो जाने के बाद भी मामले को फिर से खोलने पर ज़ोर दिया जिसके नतीजे में इन लोगों की सजा मिलने का रास्ता हमवार हुआ। बेशक ये उन लोगों के मुजरिमाना हरकत पर मुस्लिम तब्के की शर्मिंदगी के एख्लाक़ी एहसास को किसी भी तरह से कम नहीं करेगा लेकिन जब मिस्टर ओरोनोविच एक घिनौने जुर्म को एक विशेष समुदाय और संस्कृति से जोड़ते हैं तो वो मुद्दे से हटते हुए लगते हैं। बहरहाल, किसी ने भी (और बजा तौर पर) पूरी दुनिया में बच्चों के साथ बदसुलूकी के मामले में मुलव्विस पाए गए सैकड़ों पादरियों के अमल लिए ईसाईयत पर इल्ज़ाम नहीं लगाया है।

तो, क्या है जो इस्लाम के बारे में इस तरह के बे-लगाम मफरूज़ात (मान्यताओं) की इजाज़त देता है?

एक ख्याल की गूंज

हकीकत में, टाइम्स के लेखक इस्लाम के बारे में पाई जाने वाली एक व्यापक राय- वंशानुगत रूप से हिंसक और असहिष्णुता धर्म- को वो पेश कर रहे थे। इस्लाम के कुछ सख्त मनाही और परहेज़ गारी के सेट के तसव्वुर, जिसमें सब कुछ "अता किया" हुआ है और जिसमें संजीदा तंकीदी गौरो फिक्र को तो छोड़ दीजिए, किसी अगर या मगर की गुंजाइश नहीं है और ये बात अवाम के ज़हनों में गहराई से सरायत कर गए हैं।

इसके लिए मुस्लिम विरोधी पूर्वाग्रहो को जिम्मेदार ठहराना और इस्लामोफ़ोबिया के आलोचकों पर इल्ज़ाम लगाना आसान है। लेकिन सच तो ये है कि इस्लाम के बारे में अवामी गलतफहमी की एक बहुत बड़ी वजह मुसलमान खुद हैं। पड़ोस में रहने वाले मौलवी साहब का हर नज़र आने वाली चीज़ पर डरावने फतवे से लेकर कट्टरपंथी उलेमा के ज़रिए इस्लामी सहीफों के खुद के मफादात को हल करने वाली तशरीह तक, सभी को एक अच्छे मुसलमान का नज़रिया बनाने में मदद करनी चाहिए थी, जो ब्रिटिश सैनिकों की टेनीसन के ज़रिए बनाए गए कार्टून के जैसा होता, जिसने लाइट ब्रिगेड की विनाशकारी हमले की कयादत कीथी: जहां इलाही एहकाम के नाम पर "न जवाब दिया जाता है, ... किसी चीज़ की वजह नहीं पूछी जाती है.... लेकिन करना और मरना होता है"।

लेकिन अब ज़्यादतर दक्षिण एशिया के फिक्रमंद ब्रिटिश मुसलमानों के एक ग्रुप ने इस्लाम के इस तसव्वुर पर मोबाहिसों की हौसला अफज़ाई करने का फैसला किया है जो, नेक मुसलमानों को तहक़ीक़ करना मना है, जैसे मसाएल के इर्द गिर्द हों। अहम बात ये है कि इस पेशकदमी के पीछे के मर्द और औरतें स्पष्ट तौर पर वामपंथी स्वतंत्र विचार वाले लोग नहीं हैं, ये एक ऐसा लेबल है जो आमतौर से "गैरमुनासिब" समझे जाने वाले मुसलमानों पर लगाया जाता है, लेकिन ये लोग गहरी इस्लामी आस्था के साथ ही बाआमल मुसलमान हैं। ये तब्के के ही अंदर की आवाज़ें हैं और इनमें से कई इस्लामी फिकहा का अच्छा इल्म रखते है ताकि अपनी दलील के लिए इस्लामी सहीफों के बाब (अध्याय) और आयात की हिमायत हासिल कर सकें।

लंदन में वाके एक मुस्लिम इंस्टीट्यूट की तरफ से जारी नयी अंतर्राष्ट्रीय तिमाही पत्रिका, द क्रिटिकल मुस्लिम,  कट्टरपंथियों से दानिशवराना तौर से इस्लाम को हासिल करने और नए जमाने के लिए तश्कीले नौ (पुनर्गठन) की कोशिश है, क्योंकि ये उन लोगों का रद्देअमल है जिनका मानना ​​है कि उदारवादी मुसलमान या उदारवादी मुसलमानों का दृष्टिकोण जैसी कोई चीज नहीं है। ये मुस्लिम दानिशवराना तहक़ीक़ की बेहतरीन रवा.त के ज़रिए "अस्रे हाज़िर के जमाने के अज़ीम मुबाहिसों" पर मुस्लिम नज़रिये को को सामने लाने की यकीन दहानी करता है। मिडिलसेक्स युनिवर्सिटी के कानून और समाजशास्त्र के प्रोफेसर ज़ियाउद्दीन सरदार और क्रिटिकल मुस्लिम के सह संपादक का मानना ​​है कि खास तौर से हिंदुस्तान और पाकिस्तान में मुसलमानों को तंकीदी नज़रिये से गौरो फिक्र करने की फौरी ज़रूरत है।

ज़ियाउद्दीन सरदार का कहना है कि, "सदियों से तंकीदी खयालात की कमी ने इंतेहा पसंदी और जहेल पसंदी को हमारे समाज में ज़ाती बनने की इजाज़त दे दी है। तंकीद और वसीतर (व्यापक) दुनिया को गले लगाने के लिए कुशादगी के बग़ैर, इस्लाम और मुसलमान बेमानी हो गए हैं, जो नए और असल खयालात को पैदा करने, हमारे समाजो को दरपेश समस्याओं को हल करने और दुनिया पर अपना असर छोड़ने के काबिल नहीं रहे हैं।"

ताजा शुमारे (अंक) का मौज़ू इस्लाम का तसव्वुर' है जिसमें सहयोग करने वालों की दलील है कि इस्लामी सहीफों (शास्त्रों) के ज़्यादा मोतानाज़े तशरीहात पर जुर्रतमंदाना नज़रे सानी की जरूरत है जिन्हें खुदादाद बताया जाता है और जिन पर कोई सवाल नहीं किया जा सकता है। वो अफसोस करते हैं कि इस्लाम को ममनूआ इलाके में बदल दिया गया है, जिस पर मुसलमानों को तो छोड़ दीजिए, गैर मुसलमानों को तहकीक करना मना हैَ

गिरफ्तार कैदी

ज़ियाउद्दीन सरदार की दलील है कि, "इस्लाम के तसव्वुर को कैद में डाल दिया गया है और एक नहीं बल्कि कई जेलों में डाल दिया गया है"। और उनके मुताबिक विदेशियों से नफरत, औरतों से नफरत और समलैंगिकों से नफरत समेत, इनमें से सबसे बड़ी "जेल" शरीयत या इस्लामी कानून हैं जिनका इस्तेमाल "अल्लाह की जमीन पर किसी भी नाइंसाफी" के जवाज़ तौर पर किया जाता है।

पाकिस्तानी आप्रवासियों की बेटी और एक लेखक सामिया रहमान, इस्लाम में औरतों से नफरत के बारे में लिखती हैं कैसे मर्द उलेमा लोगों ने इस्लामी शास्त्रों से चुनकर उन भागों को निकाल बाहर किया ताकि पुरष प्रधान मुस्लिम समाज में औरतों को कमतर हैसियत दिए जाने का जवाज़ पेश किया जा सके। वो बताती हैं कि इस्लाम औरतों को मर्दों के बराबर हुकूक नहीं देता है, ये तसव्वुर इस कदर लोगों के मन में बस गया है कि आज़ाद खयाल वाले पश्चिमी देशों में पैदा हुई और वहीं पर परवरिश पाई नौजवान और पढ़ी लिखी औरतें भी इस पर यकीन करती हैं, उसी तरह जैसे तथाकथित स्टॉकहोम सिंड्रोम, जिसमें कैदी बंधक बनाने वाले के साथ अपनी पहचान को देखने लगता है।

वो लिखती हैं कि "औरतों से नफरत को ज़्यादातर कुरान और हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की रवायात की बुनियाद पर जायज़ ठहराया जाता है... सवाल ये है कि कैसे इस्लाम को औरतों से नफरत के अमल और इसकी तशरीह के दलदल से बाहर निकाला जाए और औरतों की हिमायत करने वाले मिजाज़ को बहाल किया जाए।"

दूसरे मुद्दों जिन पर पत्रिका में चर्चा की गई है उनमें इस्लाम में जिहाद का तसव्वुर, मुस्लिम रूढ़िवादिता के बारे में सवालात, आलमियत पसंदी (विश्वबंधुत्व) जिसे बहुत से लोग मानते हैं कि इसका वजूद नहीं है,  करीब तरीन "कज़िन" होने के बावजूद मुसलमानों और यहूदियों के बीच "दुश्मनी की हालत", शामिल है। और अगर आप सोचते हैं कि जाज़ पूरी तरह अमेरिकी चीज़ है, तो एंडी साइमन को पढ़ें जो ज़ोर देते हैं कि जाज़ उतना ही मुसलमान है जितना कि ये अमेरिकी है।

क्रिटिकल मुस्लिम में बहस का नतीजा ये है कि इस्लाम को एक इंक़लाब की जरूरत ताकि जदीद दौर के लिए तसकील नौ किया जा सके।

ज़ियाउद्दीन सरदार का कहना है कि "ये शरीयत की कैद को छोड़ने का ... रवायती नज़रियात से आज़ादी और इस्लामी रियासत के तसववुर को दफन करने का वक्त है...."।

चाहे ये होता है या नहीं, कम से कम एक बहस तो शुरू हो गई है और ये देखना दिलचस्प होगा कि ये यहां से कहां जाती है। अगला शुमारा पाकिस्तान पर है। क्या मोतदिल (उदारवादी) पाकिस्तानी इस बहस में शामिल होंगे?

18 मई, 2012, स्रोतः द हिंदू

URL for English article:

http://www.newageislam.com/ijtihad,-rethinking-islam/reshaping-islam-for-the-modern-age/d/7374

URL for Urdu article: http://www.newageislam.com/urdu-section/creating-islam-for-the-new-age--نئے-زمانے-کے-لئے-اسلام-کی-تشکیل-نو/d/7405

URL for this article:http://www.newageislam.com/hindi-section/reshaping-islam-for-the-modern-age--नए-ज़माने-के-लिए-इस्लाम-की-तश्कीले-नौ-(पुनर्गठन)/d/7408


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