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Hindi Section ( 9 Apr 2021, NewAgeIslam.Com)

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This is Madness not Jihad जिहाद नहीं यह जूनून है


हारून रशीद

जिहाद नहीं यह जुनून है कि जिहाद की अखलाकी शर्तें हैं। दायमी और अबदी कि कुरआन करीम का कोई फरमान और अल्लाह के आखरी रसूल का कोई इरशाद, वक्ती, सतही और स्थानीय नहीं होता। दिन और रात की गर्दिश में वह दायम और बरकार रहता है। जहां दूसरों की सांस टूटने लगती है, भुल्ले शाह वहाँ से इब्तिदा करता है, यह उसी का मिसरा है।

सच आख्याँ भांभड़ मचदा ए

सच बोली जाए तो शोले भड़क उठते हैं, सच केवल यह नहीं कि अफगानिस्तान और उसके चचा ज़ाद कबायली क्षेत्रों में फ़ितनों का दरवाज़ा अमेरिकी हमले से खुला। सच यह भी है कि सफ्फाक सोवियत यूनियन की सुर्ख अफवाज ने अफगानिस्तान में ढाई सौ बरस से चले आते, अहमद शाह अब्दाली दौर के इमरानी समझौते का तार व पौद बिखेर दिया था। यह भी जंग के मैदान में दस दिन तक ख़म ठोंक कर खड़े रहने वाले अफगानी मुजाहेदीन के रहनुमा नया इमरानी समझौता तखलीक ना कर सके जो इज्तिमाई ज़िन्दगी को दरकार कम से कम रवादारी के लिए अनिवार्य होता है। इतनी ही बड़ी सदाकत यह भी है कि सोवियत यूनियन की पसपाई के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान पर अपनी मर्ज़ी की हुकूमत मुसल्लत करने की कोशिश की। ऐसी हुकूमत जिसका अफगान अवाम की उमंगों और एहसास से दूर का वास्ता भी ना हो और यह कि इस मरहले पर अव्वल बेनज़ीर भुट्टो और फिर मियाँ नवाज़ शरीफ की हुकूमत ने कमाल दर्जे के अखलाकी इफ़्लास का प्रदर्शन किया। यह भी ना सिर्फ अमेरिका, रूस, यूरोपीय यूनियन और ईरान बल्कि पाकिस्तानी शासकों ने अफगानिस्तानी अवाम की बजाए अपने हितों को सामने रखा। उन सब ने भुला दिया कि दूसरों की तरह अफगानिस्तान की धरती पर बसने वाले भी जीते जागते हैं और सबसे अधिक कड़वा सच यह है कि इस्लाम के नाम पर जिहाद करने वाले तमाम अफगान हालांकि मुखलिस थे मगर उनके रहनुमा अपने गिरोही और कबायली नफरत से रिहाई नहीं पा सके।

गृह युद्ध के खिलाफ तालिबान और प्रतिक्रियाएं थीं लेकिन केवल प्रतिक्रियाएं वह रुढ़िवादी मज़हबी लोग थे मगर अपने जमाने के तथ्यों से अनभिज्ञ डॉक्टर असरार अहमद से ले कर डॉक्टर जावेद इकबाल तक और जनरल हमीद गुल से लेकर क़ाज़ी हुसैन अहमद तक, सभी ने उनकी मदद की मगर एक सच यह भी है कि जब तक मुल्ला उमर सत्ता में रहे, एकतरफा समर्थन के बावजूद क़ाज़ी हुसैन अहमद, तूर ख़म के उस पार ना जा सकते थे। २००० में ओसामा के कैम्प पर हमले के बाद अफगान राजनयिकों ने दुसरों के अलावा इस ना चीज से राबता किया तो उन्हें पेशावर में अमेरिका के खिलाफ कुल जमाती कांफ्रेंस का मशवरा दिया गया। वह दूसरों को आमंत्रित करने पर तयार थे मगर हैरत की इंतिहा की जब अफगानी दूतावास के फर्स्ट सेक्रेटरी फौजी ने इमरान खान और क़ाज़ी हुसैन अहमद को कुबूल करने से इनकार कर दिया। आश्चर्य के साथ मैंने उनसे सवाल किया कि क्या समर्थन स्वीकार करने पर भी वह शर्त लगाएंगे। क़ाज़ी हुसैन अहमद के बारे में उनका इरशाद यह था कि अमीरुल मोमिनीन इसकी अनुमति अता ना करेंगे और इमरान खान के बारे में यह कहा था कि वह गोल्ड स्मिथ का दामाद है। मैंने कहा फौज़िया साहब! गोल्ड स्मिथ का दामाद, अमेरिकी उपनिवेशवाद से पाकिस्तान की रिहाई चाहता है और वह मैच फिक्स करने वाला आदमी नहीं। एक दोस्त के यहाँ, उनकी मुलाक़ात का एहतिमाम किया कि उसका घर दूतावास और इमरान खान की रिहाइश के मध्य में स्थित था। इमरान खान ने दो टोक अलफ़ाज़ में कहा कि उसकी पार्टी उदारवादी है मगर वह अफगानिस्तान के हक़ हुकमरानी की हिमायत करेगा। और मुसलसल करता रहा मगर क़ाज़ी हुसैन अहमद से बात करने पर आमादा ना हुए। कुल जमाती कांफ्रेंस धरी की धरी रह गई। उदारता और एहतियात कहाँ, हिकमत व दानाई कहाँ केवल जोअमे तकवा। अमेरीका ने अफगानिस्तान पर हमला किया तो एक बुज़ुर्ग ने मुझ से कहा कि क्या तुम अफगान दूतावास की कुछ मदद कर सकते हो कि अखबारों के लिए वह अपना स्टैंड मुरत्तब कर लिया करें। दो बार मैं पहले समय ले कर सफीरे अफगानिस्तान मुल्ला ज़ईफ़ की खिदमत में हाज़िर हुआ मगर दोनों बार उनके पास समय नहीं था। दोनों बार उन्होंने मुझसे केवल दो शब्द कहे। सब्र करोउनके एक नायब ने एक बार इस पर इजाफा किया। हम जिहाद में हैं और हर शख्स की जिम्मेदारी है कि हमारी मदद करेगुल्बदीन हिकमत यार तेहरान में तेज़ रौशनियों तले, मालुम नहीं कितने खतरे मोल ले कर तालिबान की मदद करते रहे मगर तालिबान का तकाजा बरकरार रहा।बैत करो, बैत आदमियत की तारीख ने ऐसे हुक्मरान कब देखे होंगे कि हालते जंग में अगर उनकी मदद करना चाहो, तब भी शर्त उनकी हिकमत ना इल्म, फकत इसरार, फ़क्त अपनी अजमत पर इसरार जुलाई १९९२ में काबुल के एक होटल के जनरल मैनेजर ने मुझ से कहा। एक तरह के पागल चले गए और दूसरी तरह के आ गए।जनरल परवेज़ मुशर्रफ ज़िम्मेदार हैं। ४ मई से कोएटा के एक होटल में पड़ा हूँ। सारा दिन अखबार नवीसों, दानिशवरों और सियासी कारकुनों से उस शख्स के कारनामे सुनता हूँ, जो डरता वरताकभी ना था मगर जिसने पाकिस्तान को अमेरीका के क़दमों में डाल दिया। जिसने बलूचिस्तान की रूह पर वह ज़ख्म लगाए की भरने के लिए मरहम बना लिए जाएं तब भी सालों साल दरकार होंगे। सच में एक दिन जनरल अशफाक परवेज़ कयानी की प्रीफिंग के लिए रावलपिंडी गया और एक मिसरा दोहराता हुआ लौट आया।

खिल गए ज़ख्म कोई फूल खिले या ना खिले

इमरान खान और सैयद मुनव्वर हसन ने सच कहा कि कोई फ़ौज अपने अवाम से बरसरे पैकार नहीं हुआ करती मगर सीने पर हाथ रख कर बताएं कि स्वात के मुजाहिदे इस्लामने कोई बाकी रहने दी थी? निजामे अदल कुबूल, काजियों की मन पसंद नियुक्तियां कुबूल, वकीलों की बेरोज़गारी कुबूल, और क्या हुक्म है मेरे आका? फरमाया जम्हूरियत कुफ्र, अदालतें कुफ्र, आइन कुफ्र, कुरआन करीम करार देता है। वादा पूरा किया करो कि रोज़े जज़ा वादे के बारे में सवाल किया जाएगा। उन्होंने मुआहेदा किया और बाह्म पैगाम भेजे कि दिखावे के लिए इधर उधर टल जाओ। ऐसी ढिटाई और ऐसी सीना जोरी। केवल फिकही मतभेद पर उन्होंने अपने हरीफ की लाश कब्र से निकाली और सूली पर लटका दी। कौम के खून पसीने से बनाए गए शैक्षणिक संस्थान बमों से उड़ा दिए इस पर भी उनकी बात मान ली गई तो मुतालबात की एक नई सूची वजूद में आ गई और बच्चे जनने लगी। इंसानों के बीच विवाद होते हैं और सारी दुनिया में उन्हें तय करने का एक ही करीना है। बात चीत लेकिन अगर समझौते के बावजूद एलान के बावजूद एक हरीफ मन मानी पर तुला रहे? अल्लाह की आखरी किताब क्या कहती है? “कि उनमें सुलह करा दो, फिर अगर एक पक्ष फिर जाए तो सब मिल कर उससे लड़ो। उस खुदा की कसम, जिसके कब्ज़े में इंसानों की जान और आबरू है, मौलाना फजलुल्लाह और उनके साथियों ने अपनी कब्र खुद खोदी है और वही स्वाती अवाम की तकलीफ के सबसे अधिक जिम्मेदार हैं। हद हो गई घर के दरवाज़े पर डाकू असलहा ताने खड़े हैं और घर एक ऐसा भी है जिसने खानदान ही को बंधक बना लिया कि डाकुओं का मुकाबला उसकी मर्ज़ी से होगा। सच्चाई, सब्र और हिकमत से नहीं, जैसा कि इंसानों को उनके परवरदिगार ने हुक्म दिया है बल्कि जूनून से। बजा कि मुजरिम अमेरीका है और उसके कारिंदे, बजा कि अवाम की अदल से महरूमी और हुक्मरान वर्ग की बेहिसी सबसे बड़ा मसला है। इसमें हरगिज़ कोई कलाम नहीं कि गीदड़ों की एक काबिले ज़िक्र संख्या अमेरीका की दरयुज़ा दरगवार बद उन्वान है मगर इसका यह मतलब कैसे हुआ कि बेगानों को क़त्ल किया जाए। पाकिस्तान के अमेरीका विरोधी और अफगानियों की आज़ादी के हामी अवाम का जुर्म क्या है?

पूरा सच कोई नहीं बोलता, केवल अल्लाह की किताब और उसका सच्चा रसूल। अल्लाह के आखरी रसूल ने तेरह बरस तक ताने सुने, गालियाँ खाई, तकलीफें बर्दाश्त कीं। दस बरस तक मदीना मुनव्वरा में यलगार पे यलगार का सामना किया। बुग्ज़ व इनाद और नफरत की आखरी हद का मक्का में फातेहाना कदम रखा तो यह कहा। आज तुमसे कोई बाज़ पुरस नहीं होगी। अबू सुफियान के घर में, अपने किवाड़ बंद करने वाले को और हरम में पनाह लेने वाले को। अल्लाह और उसके पैगम्बर को मानने वाले यह कैसे लोग हैं कि उनसे पनाह की कोई सूरत ही नहीं। उनकी सारी बात मान लो, यह तब भी नहीं मानते। नहीं बखुदा, जिहाद नहीं, यह जूनून है कि जिहाद की अखलाकी शर्तें हैं। दायमी और अबदी कि कुरआन करीम का कोई फरमान, अल्लाह के आखरी रसूल का कोई इरशाद वक्ती, आरज़ी, सतही और मुकामी नहीं होता।

URL for Urdu article: https://www.newageislam.com/urdu-section/haroon-rashid-ہارون-رشید/this-madness-jihad-جہاد-نہیں-یہ-جنون-ہے/d/1401

URL: https://www.newageislam.com/hindi-section/haroon-rashid-tr-new-age-islam/this-madness-jihad-जिहाद-नहीं-यह-जूनून-है/d/124672


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