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Hindi Section ( 29 Jun 2012, NewAgeIslam.Com)

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Madrasas: A Few Bitter Facts and Experiences दीनी मदारिस: चंद तल्ख़ हक़ायक़ व तजुर्बात

 


ग़ुलाम रसूल देहलवी, न्यु एज इस्लाम

23 जून, 2012

(उर्दू से तर्जुमा- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

बर्रे सग़ीर में दीनी मदारिस के क़याम का आग़ाज़ मुस्लिम सलातीन ही के दौर में हो चुका था। सिंध व मुल्तान के अलावा दिल्ली, आगरा, जौनपुर, अहमदाबाद और गुजरात वग़ैरा की क़दीम दारुल सल्तनत में कई ऐसी मसाजिद, मक़ाबिर और ख़ानक़ाहें तामीर हुईं जिनकी हैयत कज़ाई साफ़ बताती है कि इनका बड़ा हिस्सा तालीम के काम आता था, इन मदरसों में उलूमे इस्लामिया के साथ साथ मुरव्वेजा असरी फ़नून भी दाख़िले दर्स थे, जिनके इम्तेज़ाज से नौनिहालाने मिल्लत को इस्लाम के हक़ायक़ व मआरिफ़ से आश्ना और उनकी इशाअत व इब्लाग़ का अहल बनाया जाता था। और ग़ालिबन ये उन्हीं फ़ाज़लीने मदारिस की शबाना रोज़ जद्दोजहद और मसाई जमीला का समरा है कि आज इस्लामी तालीमात व हिदायात अपने हक़ीक़ी ख़दो ख़ाल के साथ हमारे सामने जलवागर हैं।

आज़ादी के बाद हिंदुस्तान की सरज़मीन पर मदारिसे इस्लामिया की निशाते सानिया के लिए पुरज़ोर सरगर्मी शुरू हो गई। उल्मा व ख़वास, अस्हाबे फ़िक्र व ख़ैर और अर्बाबे बस्त व कुशाद की सरगर्म कोशिशों से चंद ही अर्सा में उलूम नबवी के गहवारे गाहे बगाहे तामीर होने लगे और उसे फ़ज़ले ख़ुदावंदी की दस्तगीरी कहिए कि मुख़्तसर से अर्से और नाकाफ़ी वसाइल व अस्बाब के बावजूद आज मुल्क के गोशों में मकातिब के अलावा दीनी मदारिस की मौजूदा तादाद आदादो शुमार के मुताबिक़ तक़रीबन 27000 है। जो उत्तरप्रदेश, उत्तरांचल, बिहार, बंगाल, राजस्थान, झारखंड और आसाम वग़ैरा में खासतौर से इल्म व अमल और दीन व दानिश के फ़यूज़ लुटा रहे हैं।

मज़कूरा बातें हमारे ज़हन व दिमाग़ को ज़रूर ख़ुशगवार तस्कीन पहुंचाती हैं, मगर तस्वीर का दूसरा रुख़ पलटते हैं कर्ब व तश्वीश को राह मिलने लग जाती है। अब दीनी मदारिस और इस्लामी जामिआत की रोज़ अफ़्ज़ों कसरत और जा बजा भरमार से मिल्लत का दूरअंदेश तब्क़ा ज़हनी शादमानी के साथ साथ यकगूना क़लक़ भी महसूस कर रहा है जो बेवजह नहीं बल्कि इसके पीछे कुछ लाज़िमी मुहर्रिकात हैं। इस में कोई दो राय नहीं कि मुल्क के मुख़्तलिफ़ हिस्सों में उलूमे नबविया की चंद ऐसी क़ाबिले फ़ख़्र दानिशगाहें भी हैं जिनके आफ़ाक़ व गीर कारनामे और अहद साज़ मंसूबे आबे ज़र से लिखे जाने के काबिल हैं। लेकिन जब से इन दीनी इदारों पर दीन से नावाक़िफ़ लोगों का क़ब्ज़ा हुआ या यूं कहिए कि कुछ बानी और मोहतमिम हज़रात ने मदारिस और चंदे के शरई निज़ाम को कारोबार और इंडस्ट्री के तौर पर चलाना शुरू कर दिया, तभी से उलूमे नबविया के इन शबिश्तानों ने अपना तशख़्ख़ुस खो दिया। वाक़ेआ ये है कि आज ख़ानाज़ाद जाली मदारिस और दीन के नाम निहाद ख़ुद्दाम की ऐसी तादाद वजूद में आ चुकी है जिसने मदारिस की काया ही पलट दी है। आज आपको बगै़र ढूंढे ऐसे सैकड़ों ज़िम्मादारान और मुंतज़मीने मदारिस देखने को मिल जाऐंगे जिनकी कोताह इल्मी, किरदार की पस्ती, अख़्लाक़ की कमी, तालीम की नाक़द्री, दीनी उमूर से नावाक़फ़ी, ग़ैरज़िम्मेदाराना बेहिसी, तमल्लुक पसंदी, ऐश कोशी व ख़ेशपरवरी बल्कि उनके आम तर्ज़ बूद बाश से भी ये पता लगाना दुश्वार हो जाता है कि इनकी अनथक जद्दोजहद और तग व दो का मक़सदे हक़ीक़ी उलूम नब्वी का फ़रोग़ है या हुसूले ज़र और जलबे मनफ़अत का इंतेज़ार?

कैलेंडरों, पोस्टरों, पमफ़्लेटस, रसीदों और तोस्यात् व सिफ़ारिशात में ताजिराना अंदाज़ से वो एक मुतैय्यना रक़म इन्वेस्ट कर के कई गुना ज़्यादा रक़ूम के ख़्वाहिशमंद होते हैं। इस तरह चंदे की सोने की छड़ी के ज़रिए जब उनकी हसरत बर आती है तो शुरू हो जाता है ऐशो इशरत के ख़्वाबों की तकमील का ऐसा सिलसिलए दराज़ जो बरसों पर मुहीत होता है। जबकि इनके मदरसों के बच्चे (जिन्हें उनके पोस्टर्ज़ की ज़बान में तिश्नगाने उलूम व फ़नून और ग़रीब वा नादार तलबा का ख़िताब मिलता है) क़याम व ताम के माक़ूल इंतेज़ाम, बिजली ,पानी ,ग़ुसलख़ाने और बैतुल ख़ला जैसी अहम ज़रूरियात से महरूम और परेशान हाल रहते हैं, बल्कि उलूम व फ़नून की शदबद से वाक़िफ़ होने के लिए भी तरस रहे होते हैं। वहीं दूसरी तरफ़ वहां के असातिज़ा और उल्मा अपनी इल्मी इस्तेदाद और शौहरत याफ़ता क़ाबिलियत के बावजूद इंतेज़ामिया की नज़र में वो मुक़ाम हासिल नहीं कर पाते जो एक मामूली दर्जा के मौलवी या मुलाज़िम को हासिल हो जाता है। नतीजन उनकी बदहाली की भी एक दिलचस्प दास्तान जारी रहती है जिसके बतन से उनके अंदर फ़िक्री जमूद, इल्मी इन्हेतात, तमल्लुक पसंदी और तन आसानी का मिज़ाज तो जन्म लेता ही है उसी के साथ तदरीसी लगन, मोतालए कुतुब और तलाश व जुस्तजू का सिलसिला, मेहनत व जाँफ़िशां का जज़्बा ख़ुलूस व लिल्लाहियत का दाईया सब के सब अपना तसलसुल खो देते हैं।

सरदस्त ये ज़िक्र करना भी दिलचस्पी से ख़ाली ना होगा कि बाज़ फ़ुज़्ला की ज़बान से बारहा ये सुनने को मिला कि इंतेज़ामिया की तरफ़ से उन्हें इस हुक्म का पाबंद बना दिया गया है कि उनके लिए इतनी मिक़दार में चंदा करना लाज़िमी है, नौबत बाएं जा रसीद कि बाज़ मदरसों में ये अमर तालीम व तदरीस के मंसबे अज़ीम पर फ़ाइज़ होने के लिए तक़र्रुरी के शराइत में दाख़िल है। तालीम तर्बियत और इफ़हाम व तफ़्हीम का माद्दा जैसा भी हो तहसील चंदा का फ़न अगर ठोस और मज़बूत है तो ऐसे असातिज़ा की तनख़्वाहों का मेयार भी बुलंद से बुलंद तर होता है, मुसलसल हौसला अफ़्ज़ाई और मद्हसराई इस पर मुस्तज़ाद। हालाँकि हालात इस बात के मुतक़ाज़ी हैं कि चंदे के लिए मुदर्रिसीन की बजाय वो लोग मख़सूस किए जाएं जिनका काम सिर्फ चंदा करना ही हो। मज़ीद बराँ उनकी मुनज़्ज़म तर्बियत भी ज़रूरी है। उल्मा और असातिज़ा से चंदा करवाने से सच कहें तो उनकी इज़्ज़त दाँव पर लग जाती है। जिसका अफ़सोसनाक शाख़साना ये है कि उमरा और सरमायादार तब्क़ा तो दरकिनार अवाम और मामूली हैसियत के लोग भी उन पर पभतियां कसने को अपना मौरूसी हक़ समझ बैठते हैं।

माज़ी में दीनी मदारिस के अहवाल पर नज़र डालें तो ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल ना होगा कि सिर्फ पच्चास साठ बरस पहले मदारिस के मुंतज़मीन उमूमन बेलौस दीनी ख़िदमात के हामिल हुआ करते थे। मदरसा के इंतेज़ाम व इंसेराम को वो एक ख़ालिस दीनी अमल और कारे सवाब समझ कर ख़ैर व आख़िरत के ज़िंदा एहसास के साथ सरअंजाम देते थे। ज़रपरस्ती, शोहरत व नामवरी, नमूद व नुमाइश और तब्क़ाती उस्बियत का दूर दूर तक कोई पता ना था। बड़े से बड़ा सरमायादार और दुनियावी वजाहत का मालिक उनकी नज़र में आख़िरत तलब मुख़ैय्यर और मुख़लिस ग़रीब के बनिस्बत हेच हुआ करता था। इसलिए उस वक़्त मदारिस के लिए ग़ैबी इमदाद व बरकात का समुंदर भी पुर जोश था और वो नुमायां कामयाबी के साथ अपने आफ़ाक़ी मक़ासिद की तकमील में रवां दवां थे। मगर आज का मंज़रनामा ये है कि मदारिस की बड़ी तादाद तेज़ी से कारोबारी अफ़राद, दुनियादार अहले सरवत और सियासी गलियारों के मस्नद नशीनों की आमाजगाह और उनकी इज़्ज़त व शोहरत का ख़ुशनुमा ज़रिया बनती जा रही है। अइज़्जा पर्वरी और अक़रबा नवाज़ी की वबा तो इस तरह फैली हुई है कि बड़े से बड़े बा-सलाहीयत असातिज़ा और होनहार तलबा उस की भेंट चढ़ा दिए जाते हैं। और उनकी सलाहियतों की बेदरेग़ तज़ी की जाती है। रज़्ज़ाक हक़ीक़ी को ख़ुश करने की बजाय चंदा दहिंदगान को ख़ुश रखने के लिए काफ़ी तग व दौ की जाती है। और कभी कभी इसी जज़्बा की तहरीक पर जायज़ व नाजाइज़ की तफ़रीक़ किए बगै़र मदरसा चलाने का हर तरीक़ा इख़्तियार किया जाता है। इसकी अफ़सोसनाक मिसाल ये है कि लखनऊ बोर्ड के अरबी व फ़ारसी इम्तेहानात दिलाने वाले मदारिस फ़र्ज़ी हिसाब पेश करते हैं, फ़र्ज़ी लोगों को इम्तेहान में बिठाते हैं, मदरसा के अंदर इतनी बेबाकी से नक़ल करवाते हैं कि असरी तब्क़ा के लोग ख़ुदा की पनाह मांगते नज़र आते हैं। इसलिए ये कहना बेजा ना होगा कि आज मज़हबी इदारों की दीनी व एख़लाक़ी शबिया पर रफ़्ता रफ़्ता माद्दी व सियासी क़दरों की छाप नज़र आने लगी है।

ज़िम्मेदारान मदारिस के अंदर पैर पसार रही इस मोहलक बीमारी की तरफ़ इशारा करते हुए कम अज़ कम हम जैसे नातवां अक़ीदतमंदाने मदारिस को ज़रूर तकलीफ़ हो रही है कि आज ज़िम्मेदारान मदारिस ख़ुद मदारिस के बुनियादी मक़सद को फ़ौत करने के दर पे हैं। आम तौर पर मदरसों का ये नाक़ाबिले फ़हम मुअम्मा सुनने को मिलता रहता है कि वहां के मुंतज़मीन हज़रात तलबा की तालीमी तरक़्क़ी, अख़लाक़ी तर्बियत और तख़लीक़ी ज़हनियत पर कम और उन पर हर चहार जानिब से सख़्त से सख़्त तर पाबंदियां आइद करने पर ज़्यादा तवज्जो सर्फ़ करते हैं। मामूली वजूहात पर तलबा के ख़ारिजा का अमल जिसे अकाबिरीन न बाज़ अलमुबाहात, कहा करते थे,  इस तसलसुल के साथ जारी है कि गोया उसे वाजिब नहीं तो मुस्तहसिन का दर्जा ज़रूर मिल गया है। लगभग इसी रविश के शिकार असातिज़ा हज़रात भी हैं। क़याम व ताम के माक़ूल इंतेज़ाम का फ़ुक़दान, महीनों मेहनताना तनख़्वाह और मोआविज़ा से महरूमी, तनख़्वाहों में ग़ैर ज़रूरी अदम तवाज़ुन, कुतुब व शुरुहात, लोगात व मुआजम, मराजा व मसादिर, मुआसिर मुल्की व ग़ैर-मुल्की रसाइल व जराइद और जदीद लिटरेचर्ज़ की अदम फ़राहमी की वजह से वुसअत मुताला और रौशन दिमाग़ी की कमी, फिर इन सारे आफ़ात पर इंतेज़ामिया की जानिब से दाख़िली व ख़ारिजी ज़िम्मेदारियों और मेहनत तलब ख़िदमात की बौछार उनके लिए वबाले जान बनी रहती है। यक़ीन जानईए! यही हाल हमारे अक्सर मदारिस का है। इल्ला माशाअल्लाह! कुछ इससे मुस्तसना मिलेंगे जिनके एतराफ़ से हमें कोई गुरेज़ नहीं, मगर मौजूदा मदारिस के इस उमूमी इंतेज़ामी बोहरान को क्या कहिये कि आज लग भग 180 फ़ीसद मदारिस मुंतज़मीन और असातिज़ा के दरमियान फ़िक्री वाबस्तगी के फ़ुक़दान से जूझ रहे हैं। जबकि तलबा से तो इस क़दर ख़लीज नज़र आती है गोया बरसों पुरानी कोई रक़ाबत पनप रही हो। आख़िर ये किस के क़सूर का शाख़साना है कि तलबा जब कभी आपस में मुंतज़मीन का तज़किरा करते हैं तो गोंनागों शिकवों के दिलचस्प तबादले शुरू हो जाते हैं। जोश ग़ज़ब में ज़मीन व आसमान के कुलाबे मिला दिए जाते हैं। ऐसा लगता है कि ज़िम्मेदारों की नहीं ज़ालिमों की बात छेड़ दी हो। यक़ीनन ये तश्वीशनाक पहलू अर्बाबे बस्त व कुशाद के लिए ज़बर्दस्त लम्हए फ़िक्रिया है। इसमें तलबा के तईं ज़िम्मेदाराने मदारिस के नारवा रवैय्ये भी बहुत हद तक ज़िम्मेदार हैं जिनसे चश्मपोशी हक़ीक़त से पहलू तही के मुतरादिफ़ है।

राक़िमुल सुतूर को कई मदारिस के भरपूर जायज़े का मौक़ा मिला। तक़रीबन अक्सर जगहों पर अपनी आँखों से ये दिलख़राश मंज़र देखा कि वहां के मुंतज़मीन हज़रात तलबा की तालीमी व सक़ाफ़ती सरगर्मियों में कोई दिलचस्पी नहीं लेते। हद तो ये है कि वो अपने इदारा के मुमताज़ और काबिले फ़ख़्र तलबा से भी आश्ना नहीं होते। नतीजतन कुछ कर गुज़रने का जज़्बा रखने वाले शाहीन सिफ़त तलबा भी ना उम्मीदी के घेरे में आ जाते हैं और हौसला अफ़्ज़ाई के लिए तरस रहे ये बच्चे अपने आफ़ाक़ी अज़ाइम से दस्तबरदार हो जाते हैं। इस तरह कितने तख़लीक़ी ज़हन के हामिल तलबा अन्फ़स व आफ़ाक़ से रिश्ता तोड़ कर जमूद व तात्तुल के ख़ोल में हमेशा के लिए बंद हो जाते हैं, इसका अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता।

दीनी मदारिस उल्मा व ख़वास की बेलौस जद्दोजहद और अवाम की मुख़लिसाना माली इमदाद के दम पर वजूद में आते हैं। इसलिए जब तक उल्मा व मिल्लत का मुशतर्का ख़ूने जिगर शामिले हाल रहता है, उन की आबयारी होती रहती है। ज्यों ही इनमें से एक जुज़ु भी कम पड़ता है इल्म व अमल के ये दरख़्त ख़िज़ां रसीदा हो जाते हैं। इस तनाज़ुर में ज़िम्मेदाराने मदारिस का अव्वलीन फ़रीज़ा ये है कि वो तमाम इंतेज़ामी उमूर में सालेह व शफ़्फ़ाफ़ और मुख़लिस किरदार पेश करें। ख़्वाह असातिज़ा की तक़र्रुरी हो या तलबा के दाख़िले हर महाज़ पर क़र्ब व बाद की अस्बियत से बालातर होकर महेज़ इल्मी लियाक़त और तद्रीसी सलाहियत के हामिलींन ही के लिए दरवाज़े वॉ करें। मगर इस हवाले से हमें अक्सर शदीद क़लक़ का सामना करना पड़ता है। रियास्ती, इलाक़ाई, दर्सगाही और मशरबी क़राबत के साथ तमल्लुक पसंदी, हाशिया बर्दारी और चंदा हुसूली जैसी कई ऐसी तरजीही बुनियादें हैं जो मदारिस के तालीमी नज़्म को घुन की तरह चाट रही हैं। और एक मुतअद्दी मर्ज़ या वाइरस की तरह फैलती जा रही हैं।

दीदए बीना से देखें तो आज मुंतज़मीन मदारिस की सफ़ से रिजाल इल्म व हुनर की तादाद धीरे धीरे अन्का होती जा रही है अब मदारिस में उल्मा व फ़ुज़्ला की हैसियत मंसबे तदरीस के ख़ुद्दाम महेज़ की रह गई है। इक़्तेदारे आला और इंतेज़ामी ओहदों पर वो तब्क़ा हावी होता जा रहा है जो या तो सिरे से ही आलिम नहीं या सनद याफ़्ता आलिम तो है मगर ख़ुलूस व लिल्लाहियत शऊर दानिश, संजीदगी व दूरअंदेशी और जज़्बए दर्दमंदी से वास्ता ना होने की बिना पर दीनी मदारिस के इंतेज़ामी तक़ाज़ों को भाँपने से क़ासिर है। हालाँकि यही वो इम्तेयाज़ी ख़ुसूसीयात हैं जिनकी बदौलत हमारे अकाबिरीन ने इन्हीं मदारिस के अंदर बेसरो सामानी के बावजूद ख़ाक से इंसान तैय्यार किए, दीन के जियाले पैदा किए, इल्म व अमल और इख़्लास के नमूने पेश किए। अब अगर आज क़ल्बे माहीयत की वजह से अफ़राद साज़ी मुबारक सिलसिला रुक सा गया है तो मक़ामे हैरत क्या है?

मदारिस के अंदर पैदा शुदा इन बुराईयों की बुनियादी वजह ये है कि फ़ी ज़माना अक्सर मदारिस में मंसबे नेज़ामत की विरासत का निज़ाम जारी हो चुका है। जहां वारिसैन नेज़ामत की मतलूबा सलाहियतों के हामिल हों कि ना हों, मुंतज़िम बनने का इस्तेहक़ाक़ बहरहाल रखते हैं। ये पहलू अलमिया भी है और लम्हए फ़िक्रिया भी। दीनी मदारिस क़ौम व मिल्लत की अमानत हैं। इसलिए अहल व नाअहल की तमीज़ ख़त्म करके उन पर मख़सूस किस्म की इजारादारी मिल्ली नुक़्सानात का पेशख़ेमा है। हाँ! अगर मदरसा के नाज़िम का वारिस सही मायनों में जो हर काबिल है तो ये तो तुर्रए इम्तियाज़ है, मगर लियाक़त की तर्जीह को हर्फ़ए ग़लत की तरह मिटा कर मदरसों पर ख़ानदानी क़बज़ादारी का जो नामानूस रिवाज चल पड़ा है, अगर उसका सद्देबाब ना किया गया तो द्रदमंदाने क़ौम व मिल्लत को उलूमे नब्वी के इन शबशानों को उजड़ते देख कर नालए दर्द सुनाने के लिए अभी से तैय्यार हो जाना चाहिए।

दीनी मदारिस के ताल्लुक़ से एक अफ़सोसनाक अमर ये भी है कि इन में आला सतही हाई पावर ग्रुप (High Power Group ) का फ़ुक़दान है जो ये तय कर सके कि किस इलाक़े में मदरसा की ज़रूरत है कहां नहीं? अगर है तो वो किस तरह का होगा? नतीजा सामने है मुल्क के बहुत से वो इलाक़े जहां क़ौम के अंदर दीनी बेदारी और उनकी शरई रहनुमाई की सख़्त ज़रूरत है, वहां तलाश बिसयार से कोई एक मदरसा नज़र आता है जबकि जहां पहले ही क़दीम और तारीख़ी मदारिस का शोर व गोगा है जो अब जामिआत की शक्ल लिए हुए हैं वहां अब भी मज़ीद नए मदारिस के क़याम के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर सर्फ़ किया जा रहा है। वैसे तो ख़ुदसाख़्ता मोहतमिम की क़यादत में चलने वाले मदारिस की भी एक ख़ास तादाद है मगर उन्हें ना कोई मशवरा देने वाला है ना ही वो उसकी ज़रूरत महसूस करते हैं नतीजा के तौर पर माली हिसाब व किताब की शफ़्फ़ाफ़ियत पर सवाल उठते रहते हैं। इसकी वजह से मुख़्तलिफ़ ग्रुप्स बनते हैं और उनके दरमियान कशीदगी पैदा होती रहती है। जिससे मदरसा के दाख़िली हालात बिलख़ुसूस निज़ामे तालीम तो मुतास्सिर होता ही है, मदारिस और उल्मा की जग हंसाई भी होती है। दूसरी तरफ़ बाज़ अहले मदारिस पर शिकोह इमारतों, बुलंदो बाला मीनारों और संगे मरमर से बनी हुई दीवारों की तामीर में तो असरी तक़ाज़ों का शिद्दत से एहसास करते हैं, मगर मेयारे तालीम और नेज़ाम तर्बियत की तहसीन की तरफ़ नज़र करने के लिए उनके पास वक़्त ही नहीं होता।

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