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Wed Dec 08 2021, 11:49 AM

Hindi Section ( 30 March 2021, NewAgeIslam.Com)

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What is The Cure of Fear, Sadness and Depression? खौफ व गम और मायूसी का क्या इलाज है?

गुलाम गौस सिद्दीकी, न्यू एज इस्लाम

अल्लाह पाक का बड़ा फज़ल व करम है कि उसने हमें मोमिन बनाया और दोनों जहानों की सआदतें नसीब फरमायाl दुनिया और आख़िरत दो भिन्न जहान हैं कि अगर दुनिया में ईमान की दौलत है तो आख़िरत में दीदार ए इलाही का शौक रखने वालों के लिए बहार ही बहार हैl सबसे पहले यह कि मौत बरहक है मोमिन का ईमान है कि आख़िरत भी एक ज़िन्दगी है जहां कर्मों के हिसाब के बाद रहमान व रहीम की नेअमत व बख्शिश, अजरे अज़ीम और सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हसीन वादियाँ हैंl

दुनिया की हैसियत केवल फना होने वाली है जहां मुसीबतें और परेशानियां हैं, जहां शैतानी मकर व फरेब के जाल व दज्जाल अपना रंग दिखाने में बजाहिर सफल हो जाते हैं, जहां हकीकी रब से गाफिल करने वाली मुह्लिकात का जम्मे गफीर है, जहां नफ्सियाती और ज़हनी बीमारियाँ हैं, जहां ज़ुल्म व सितम का बाज़ार गर्म होता है, जहां कभी कभी बहार का मौसम आने से भी शर्मा जाए, जहां हसद, जलन, गुस्सा, नफरत, कीना, बगावत, मुनाफिकत जैसे कल्बी अमराज़ पनपते हैं, जहां इंसानी हमदर्दी भी दम तोड़ देती है, जहां भाईचारगी का जनाज़ा भी निकलता है, जहां अपने ही देश के रहने वाले, अपने ही घर रहने वाले, अपने ही भाई कहलाने वाले खून के प्यासे हो जाते हैं विशेषतः जहां कुछ ऐसे नाशुक्रे, गाफिल और बेवफ़ा मखलूक भी हैं जिन्हें अपने ख़ालिक व मालिक की सहीह पहचान व प्यार का एहसास भी नहीं____हक़ से अंधे हैं, हक़ से बहरे हैं, हक़ सुनने समझने की तौफीक नहीं____दीन ए हक़ की नेमतों और ईमान की हलावत का अंदाज़ा भी नहीं करते, फैजान ए इलाही से दिल व दिमाग को रौशन करने की सआदतों से महरूम हैंl

ऐसे बेदिल व बेमुरव्वत और ज़मीर फरोश लोगों की बात छोड़ दीजिए और बात कीजिये उन पाकबाज़ मखलूक कि जिनके सरों पर फैजान ए इलाही की बारिशे हैं, यह वह मखलूक हैं जिन्हें ना मौत का खौफ होता है, ना कुछ छिन जाने का गम, ईमान के आला सुतून पर इस तरह बेख़ौफ़ होते हैं कि जिनकी दाद कुरआन ए पाक ने भी दी है: (الا ان اولیاء اللہ لا خوف علیھم ولا ھم یحزنون) अर्थात अल्लाह के वलियों को ना कोई खौफ होता है और ना कोई गमl (कुरान मजीद)

अल्लाह पाक का फरमान है वह दुनिया में लोगों को खौफ देकर, जान लेकर आज़माएगा लेकिन बशारत उन लोगों के लिए है जिन्हें जान व माल के छिन जाने पर भी सब्र होता है, सब्र तो वह खुबसूरत ज़ीना है जो अल्लाह के साथ के यकीन व एहसास की तरफ ले जाती है, यह वही साबिर व शाकिर लोग हैं जिन्हें कोई खौफ नहीं और कोई गम नहींl यह वह ईमान है जो हमें इत्मीनान व सुकून की आला मंजिलें तय कराती है, दिल को हर हाल में फरहत व ताज़गी बख्शती हैl यह वह राज़ है जिसे सूफियाए किराम ने कश्फ़ व इल्हाम और बातिनी निगाह की सैर ए अज़ीम में खूब अच्छी तरह समझा और जिसकी वजह से वह मारफत ए खुदावंदी की सआदत से बहरावर भी हुएl

इस बुनियादी तम्हीद का उद्देश्य केवल इस तरफ ध्यान दिलाना है कि आज़माइश, परेशानी, गम और तकलीफ का संबंध असबाब के आलम से है जो कि इस फानी होने वाले दुनिया का एक वक्ती हिस्सा है, इसका सहीह इलाज यह है कि ईमान व यकीन की शमा रौशन रखें, सब्र व तहम्मुल का दामन थामे रखें, हाँ तो बेख़ौफ़ व बे गम भी रहें, हर नेमत ए इलाही पर शुक्र बजा लाएं, फ़राइज़ व वाजिबात की तकमील करते रहें, करीम रब पर भरोसा रखें जल्द ही नेमत ए इलाही के हुस्न व जमाल के दीदार से मुशर्रफ हो जाएंगे और सारी मुश्किलात आसान हो जाएंगी। कुछ ऐसे भी हैं जो उखरवी ज़िनदगी के ताल्लुक से खौफ व गम का खयाल रखते हैं, उन्हें चाहिए कि अल्लाह पाक से खौफ करें अपने आमाल को उम्दा करें, अपने नफ्स का मुहासबा करें, बदअमली की राह से फरार इख्तियार करें, ज़ाहिर के साथ बातिन को भी संवारें, गुनाह चाहे बड़े ही क्यों ना हों तौबा व रुजूअ से मायूस ना हों, क्योंकि अल्लाह पाक का बड़ा एहसान है कि उसने फरमाया (لا تقنطوا من رحمۃ اللہ) अर्थात अल्लाह की रहमत से मायूस ना होl बंदे को चाहिए कि वह तौबा करते रहें, ईमान की हलावतों को एहसास व नज़र में रखे, फिर देखे ना खौफ, ना गम और ना मायूसीl

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