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Hindi Section ( 20 Jul 2022, NewAgeIslam.Com)

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The Legitimacy of Arbitration [Tahkim] as a Dispute Resolution Mechanism under Islamic Sharia इस्लामी शरीअत में विवादों को सुलझाने के लिए सालसी [तहकीम] की कानूनी हैसियत

गुलाम गौस सिद्दीकी, न्यू एज इस्लाम

उर्दू से अनुवाद न्यू एज इस्लाम

9 जून 2022

सुलह और सालसी में अंतर और इस्लाम में इनका जवाज़

प्रमुख बिंदु:

1. तहकीम और सुलह का अरब और इस्लामी बिरादरियों में एक लंबा इतिहास रहा है।

2. इस्लामी कानून में तहकीम को काफी महत्व दिया गया है, जिसकी वजह से इसके निर्धारित नियम व कानून अस्तित्व में आए।

3. सुलह के जवाज़ का समर्थन कुरआनी आयतों और हदीसों से किया जा सकता है जिनसे तहकीम का सुबूत मिलता है।

4. तहकीम अल्लाह की हद, किसास और दियत में जायज़ नहीं क्योंकि तहकीम का फैसला सुलह की तरह होता है तो जिन चीजों में सुलह जायज़ है उनमें तहकीम भी जायज़ है और जिनमें सुलह जायज़ नहीं उनमें तहकीम भी जायज़ नहीं।

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Photo: Prezi.com

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अरब और मुस्लिम बिरादरियों में तहकीम और सुलह का एक लंबा इतिहास रहा है, और इनकी शुरुआत इस्लाम से पहले के अरब से होती है। किसी भी प्रकार के विवाद के हल में, सुलह को एक पसंदीदा अमल माना गया है। अदालती अमल को आसान बनाने के लिए इस्लाम ने तहकीम (सालसी)  को कानूनी हैसियत प्रदान की है। इस्लामी कानून में तहकीम को अहमियत दी गई है, जिसकी वजह से उसके निर्धारित नियम व कानून अस्तित्व में आए। तहकीम का फैसला उस समय लाभदायक होता है जब सालिस या हकम की महारत, जहानत, खुद मुख्तारी, तजुर्बा, दयानतदारी, अक्लमंदी और सलाहियत लोगों की नज़रों में मुसल्लम हो।

सुलह और तहकीम में फर्क बड़ा मामूली है। जिन कुरआनी आयतों और हदीसों से सुलह का जवाज़ मिलता है उसने तहकीम का भी सुबूत मिलता है। कुरआन व सुन्नत दोनों ने एक तीसरे फ्रीक की शक्ल में तहकीम को तस्लीम किया है जिसे फरीकैन अपने मतभेद को मुफाहेमत या फैसले के जरिये हल करने के लिए निर्धारित करते हैं। इसलिए, इसमें फरीकैन के बीच मतभेद को स्वीकार किया जा सकता है। इस्लाम में, तहकीम तीन लिहाज़ से सुलह से भिन्न है:

सबसे पहले, सुलह में दोनों पक्षों के बीच पाए जाने वाले मतभेद को दूसरों की मदद के साथ या उसके बिना भी एक खुशगवार तस्फिये के जरिये खत्म किया जाता है, लेकिन तहकीम के लिए तीसरे फरीक की तकर्रुरी आवश्यक होती है। जबकि दूसरी तरफ, सुलह में मुक़ाबिल फरीकैन के पास किसी फैसले तक पहुँचने के लिए सालिस का इस्तेमाल करने का विकल्प होता है। दुसरे, सुलह का मुआहेदा उस वक्त तक काबिले अमल नहीं है जब तक कि उसे अदालत के सामने न किया जाए, लेकिन तहकीम, जम्हूर फुकहा के मुताबिक़, अदालत की मुदाखेलत के बिना भी काबिले निफाज़ है। तीसरे, सुलह केवल उस सूरत में की जा सकती है जब कोई विवाद पेश आ चुका हो। इसलिए किसी संभावित विवाद को हल करने के लिए सुलह नहीं की जा सकती, जबकि तहकीम का इस्तेमाल मौजूदा और मुमकिना दोनों तरह के विवाद को हल करने के लिए किया जा सकता है। [Aseel Al-Ramahi, Sulh: A Crucial Part of Islamic Arbitration, London School of Economics and Political Science, Law Department, p.12] तहकीम की कानूनी हैसियत कुरआन, सुन्नत और इज्मा से साबित होती है।

और अगर तुमको मियाँ बीवी के झगड़े का डर हो तो एक पंच मर्दों की ओर से भेजो और एक पंच औरत वालों की ओर से यह दोनों अगर सुलह कराना चाहें गे तो अल्लाह उनमें मेल कर देगा, बेशक अल्लाह जानने वाला खबरदार है। (4:35)

अल्लाह पाक यह भी फरमाता है: तो ऐ महबूब! तुम्हारे रब की कसम वह मुसलमान न होंगे जब तक अपने आपस के झगड़े में तुम्हें हाकिम नबनाएं फिर जो कुछ तुम हुक्म फरमा दो अपने दिलों में इससे रुकावट न पाएं और जी से मान लें। (4:65)

पहली आयत इस बात की पुष्टि करती है कि तलाक देने से पहले मियाँ बीवी के बीच मसले को सालसी के जरिये हल किया जाना चाहिए। यह आयत यह भी बताती है कि (हर फरीक की तरफ से एक) दो सालिस या हकम का होना क्यों जरूरी है। और कुरआन की उपर्युक्त आयत में यह बयान किया गया है कि जिसे भी किसी मामले का तस्फिया करने और फरीकैन के बीच फैसला करने की जिम्मेदारी दी गई हो उसके लिए जरूरी है कि वह अपना काम पुरी इमानदारी और इंसाफ के साथ अंजाम दे। यह आयत जजों को कानून के मुताबिक़ फैसला करने का इख्तियार देती है। इसके अलावा इन आयतों को हरीफ जमातों के बीच सुलह को जरूरी करार देने वाला भी माना जा सकता है। बहर सूरत सालसी (तहकीम) का बुनियादी मकसद इस बात को यकीनी बनाना है कि मुसलमानों के विवादों को शांतिपूर्ण और न्यायपूर्ण तरीके से हल किया जाए।

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जिसने दो लोगों के बीच न्याय के बिना सालसी की, उस पर अल्लाह का गज़ब है।

हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुसलमानों और गैर मुस्लिमों को अपने मतभेदों को सालसी के जरिये हल करने का मशवरा दिया। इस नसीहत पर अमल करने वाले सबसे पहले गैर मुस्लिमों में कबीला बनी करंता था। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने भी सालसी फरमाई और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक ऐसे फरीक भी बने जिन्होंने सालसी के फैसले को कुबूल किया। इस्लाम के पैग़म्बर की ज़िन्दगी में सालसी की सबसे पहली मिसाल उम्मते मुस्लिमा की तरफ से किया जाने वाला सबसे पहला मुआहेदा, यानी मीसाके मदीना की एक शिक है, जिसमें सालसी के जरिये मसलों को हल करने की कोशिश की गई और जिस पर 622 ईस्वी में मुसलमानों और गैर मुस्लिमों, अरबों और यहूदियों के बीच दस्तखत किया गया।

सुन्नी इस्लामी फिकह के मुताबिक़, एक बार जब कोई सालिस फैसला कर लेता है, तो यह दोनों फरीकों पर उसी तरह नाफिज़ुल अमल हो जाता है जिस तरह कोई मुआहेदा या अदालती फैसला होता है। इस्लामी शरीअत के मुताबिक़ मुआहेदे की पासदारी लाज़िम है, और अपने मुआहेदे पर कायम रहना एक मुकद्दस फरीज़ा है। अल्लाह पाक का इरशाद है:

और अल्लाह का अहद पूरा करो जब कौल बांधो और कसमें मजबूत कर के न तोड़ो और तुम अल्लाह को अपने उपर ज़ामिन कर चुके हो, बेशक तुम्हारे काम जानता है। (16:91)

सालसी के जवाज़ की मज़ीद ताईद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सहाबा के मुत्तफेका इज्मा से भी है।

अरब और मुस्लिम देशों में सालसी पर खुसूसी तवज्जोह दी जाती है। उन्होंने सिविल और दस्तूरुल अमल में एक ख़ास बाब कायम किया है। 2018 के वफाकी कानून नंबर 6 के जरिये, कुछ देशों, जैसे संयुक्त अर्ब अमारात, ने सालसी को एक अलग निज़ाम के तौर पर स्वीकार किया। 1958 के न्यूयार्क कन्वेंशन पर अक्सर अरब और मुस्लिम देशों ने दस्तखत किये हैं और इसे स्वीकार किया है। अबू ज़हबी, संयुक्त अरब अमीरात में आयोजित होने वाले अपने नौवें इजलास (अप्रैल 1995) में, इंटर नेशनल इस्लामिक फिकह एकेडमी ने विवादों के हल के एक कानूनी तरीके के तौर पर सालसी की हिमायत की है, और यह फैसला किया है कि सालसी दो पक्षों के बीच एक विशेष विवाद की सूरत में एक मुआहिद है जिसमें तीसरा फ्रीक उनके बीच सालसी करे और इस्लामी शरीअत पर आधारित एक ऐसे फैसले के जरिये उनके मतभेदों को हल करे जिसका पाबंद हर एक फरीक हो। इस लिहाज़ सालसी कानूनी है, चाहे वह अफराद के बीच हो या अंतर्राष्ट्रीय विवाद के संदर्भ में हो।

यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि न तो मुक़ाबिल फरीकैन और न ही कोई सालिस, सालसी करने के पाबंद हैं। कोई भी फ्रीक सालसी से उस वक्त तक इनकार कर सकता है जब तक यह शुरू न हुआ हो, और सालिस राज़ी होने के बाद भी किसी भी वक्त मुकदमे से दस्तबरदार हो सकता है, लेकिन इसकी गुंजाइश केवल उस वक्त तक है जब तक कि उसने फैसला जारी करना शुरू न कर दिया हो, चूँकि उनकी रज़ामंदी केवल उसकी ज़ात से संबंधित है, इसलिए वह संबंधित फरीकैन की मंजूरी के बिना किसी और को अपनी जगह कायम मुकाम नामज़द नहीं कर सकता।

तहकीम अल्लाह की हद, किसास और दियात में जायज़ नहीं क्योंकि तहकीम का फैसला सुलह की तरह होता है तो जिन चीजों में सुलह जायज़ है उनमें तहकीम भी जायज़ है और जिनमें सुलह जायज़ नहीं उनमें तहकीम भी जायज़ नहीं।

English Article: The Legitimacy of Arbitration [Tahkim] as a Dispute Resolution Mechanism under Islamic Sharia

Urdu Article:  The Legitimacy of Arbitration [Tahkim] as a Dispute Resolution Mechanism under Islamic Sharia شریعت اسلامیہ میں تنازعات کے حل کے لیے ثالثی [تحکیم] کی قانونی حیثیت

URL: https://www.newageislam.com/hindi-section/arbitration-tahkim-islamic-sharia/d/127531

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