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Meditating On Life and Death from an Islamic Perspective इस्लाम में ज़िन्दगी और मौत का तसव्वुर

गुलाम गौस सिद्दीकी, न्यू एज इस्लाम

उर्दू से अनुवाद न्यू एज इस्लाम

14 जनवरी 2022

यह धारणा कि ज़िन्दगी और मौत आज़माइश हैं, मोमिनों के लिए अपने व्यवहार में सुधार करने का एक अवसर है।

प्रमुख बिंदु:

मौत और आखिरत के बारे में मुसलमानों के विचार कुरआन पर आधारित हैं।

अल्लाह पाक ने ज़िन्दगी और मौत को यह परखने के लिए बनाया है कि किसके आमाल अच्छे हैं।

इस्लाम आमाल की मात्रा पर आमाल की गुणवत्ता को प्राथमिकता देता है।

यह याद रखना कि मौत के बाद हम अपने रब के सामने जवाबदेह होंगे, हमें अच्छे अमल करने और अच्छी बातें कहने की क्षमता देता है।

मानव अधिकारों की पूर्ति धोखे और फरेब के बजाय ईमानदारी और मुख्लिसना यकीन पर आधारित होनी चाहिए।

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दीन के अनुसार एक मुसलमान की पूरी ज़िन्दगी आज़माइश और इम्तेहान है, जो उसके आखरी अंजाम का निर्धारण करता है। उसके लिए मौत आत्मा का अपने निर्माता, खुदा से मुलाक़ात का जरिया है। मौत और बाद की ज़िन्दगी के बारे में उसके विचार उसके दिमाग से कभी दूर नहीं होते। इससे उसे अपनी ज़िन्दगी और आमाल को संतुलन में रखने में मदद मिलती है क्योंकि वह अच्छे काम के नतीजे में आने वाली चीजों की उम्मीद में जीने की कोशिश करता है। मौत और आखिरत के बारे में मुसलमानों का दृष्टिकोण कुरआन पाक पर आधारित है।

मौत और ज़िन्दगी के अर्थ की तलाश उस समय तक अपूर्ण रहेगी जब तक कि हम कुरआन का जायज़ा ना लें। अल्लाह पाक ने मौत और साथ ही ज़िन्दगी को क्यों पैदा किया? ज़िन्दगी उतार चढ़ाव से भरी पड़ी है, लोग कभी खुश और कभी दुखी होते हैं इस हकीकत के बावजूद कि वह ज़िन्दगी को पसंद करते हैं, उन्हें मौत पर गौर व फ़िक्र करना मुश्किल लगता है। मौत एक अपरिहार्य हकीकत है; यह सबके लिए, बिना किसी अपवाद के जो कि अप्रत्याशित तरीके से आ जाती है। लेकिन ज़िन्दगी और मौत का उद्देश्य क्या है? क्या मौत और ज़िन्दगी की कोई ख़ास वजह है?

कुरआन पाक इस सवाल का स्पष्ट जवाब देता है: वह जिसने मौत और ज़िन्दगी पैदा की कि तुम्हारी जांच हो तुम में किस का काम अधिक अच्छा है और वही इज्जत बख्शने वाला है (67:2)

उपर्युक्त आयत से यह पता चलता है कि अल्लाह ने ज़िन्दगी और मौत दोनों को केवल इस लिए पैदा किया कि मोमिनों की आज़माइश हो कि किसके अख़लाक़ अच्छे हैं। कुरआन के मुताबिक़ ज़िन्दगी एक इम्तेहान है और हमें अपने आमाल का नतीजा मौत के बाद मिलेगा। ज़िन्दगी के अनुभव हमें सिखाते हैं कि इस इम्तेहान में बेएहतियाती न की जाए। बिना किसी मुश्किल के आज़माइश का तसव्वुर करना संभव है। अच्छे अख़लाक़ का हामिल बनने के लिए हमें गम, परेशानी, भूक, तबाही, जब्र, बदउनवानी और जान व माल के नुक्सान, आदि जैसे चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

वह लोग जो अपनी मौत पर हमेशा गौर करते हैं उनके अंदर अधिक से अधिक नेकी करने का हौसला पैदा होता है। बेशक इंसान के वजूद का हर कदम उसे अल्लाह की मुतलक ताकत के मुकाबले में उसकी अपनी कमजोरी और बेबसी की याद दिलाता है और उसके अंदर सालेह ज़िन्दगी गुज़ारने की ख्वाहिश पैदा करता है। दूसरी तरफ मौत का खौफ अपनी ज़िन्दगी शैली में सुधार का सबसे प्रभावी तरीका है, शर्त यह है कि उसे यकीन हो कि मुझे कयामत के दिन अपने खुदा के सामने जवाब देना है और खुदा की नाराज़गी का मुशाहेदा करना बहुत बुरी बात है।

मौत इस कायनात की एक अपरिहार्य वास्तविकता है। जब इंसान मौत को याद करे तो उसे अपने आमाल की फ़िक्र करनी चाहिए जिसके लिए वह खुदा के सामने जवाबदेह होगा। अगर उसके अमल बुरे हैं तो आखिरत में खुदा के सामने खडा होना उसके लिए ज़िल्लत व रुसवाई का सबब बनेगा। अगर उसका ईमान सच्चा हो और उसका अमल नेक हो तो मौत का तसव्वुर भी उसे परेशान नहीं करता। अज़ीम और नेक कामों पर भी गुरुर से बचना आवश्यक है क्योंकि यह इस्लाम में हराम है क्योंकि अच्छे कामों के लिए खुदा का अज्र बुनियादी तौर पर खुदा की रहमत की वजह से है। और यह कि हमें दुनियावी ज़िन्दगी में नेक आमाल करने का मौक़ा मिला यह निश्चित रूप से अल्लाह पाक की नेमतों में से एक नेमत है।

एक हदीस के मुताबिक़, “मौत एक मुबल्लिग है, और जरूरतों से पाक होने के लिए यकीन काफी है। [तबरानी]

इस हदीस से पता चलता है कि मौत के लम्हे दोस्तों और घर वालों के पास मौजूद होने में काफी तालीम है। अगर हमें इससे लाभ नहीं हुआ तो फिर कुछ भी कारआमद नहीं होगा। मौत का मुशाहेदा करते समय उसे यह याद रखना चाहिए कि एक दिन उसकी ज़िन्दगी के सफर में सब कुछ गुज़र जाएगा और अब इसी लम्हे उसे नेक आमाल शुरू कर देना चाहिए ताकि केवल खुदा के साथ मोहब्बत का खालिस रिश्ता कायम हो सके।

गौर तलब बात यह है कि अल्लाह पाक ने ज़िक्र कि गयी आयत में यह नहीं कहा कि तुममें से कौन ज़्यादा अमल करता हैबल्कि फरमाया कि तुममें से कौन अच्छे अख़लाक़ वाला है।इससे ज़ाहिर होता है कि अल्लाह की नज़र में आमाल का मेयार काबिले एतिबार है। इसलिए कयामत के दिन इंसान के आमाल को शुमार करने के बजाए तोला जाएगा। कुछ सूरतों में, एक अमल का वज़न हज़ारों आमाल के वज़न से अधिक होता है।

अच्छा अमल क्या है?

हज़रत उमर फरमाते हैं कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक बार इस आयत की तिलावत की और जब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम बेहतरीन अख़लाक़तक पहुंचे तो रुक गए और स्पष्ट किया कि इससे मुराद वह शख्स है जो अल्लाह की मना किये हुए चीजों से सबसे अधिक परहेज़ करता है और उसकी इताअत के लिए हमेशा तैयार रहता है। [कुर्तुबी]

इस्लाम हमसे किन चीजों से इज्तिनाब चाहता है यह एक ऐसा विषय है जिसकी तफसील में हम यहाँ नहीं जाएंगे। संक्षिप्त यह कि हम इस्लाम में हुकूक की तकसीम को खुदा के हुकूक और इंसानों के हुकूक के बीच बेहतर तौर पर समझ सकते हैं। अल्लाह के हक़ की अदायगी के साथ हमें बन्दों के हक़ को भी पुरी दयानतदारी के साथ अदा करना चाहिए। इस्लामी दृष्टिकोण से, बन्दों के हक़ की तकमील की बुनियाद दयानतदारी और खुलूस पर होनी चाहिए, न कि इस चालाक और बेईमान रवय्ये पर जो कि अल्लाह के बहुत से तथाकथित अकीदत मंदों का शेवा है। इंसाफ, एहसान, अमन, सामान व्यवहार और दुसरे तमाम बन्दों के हक़ के तथाकथित हुकूक को अपनी असल शक्ल इख्तियार करनी चाहिए। इसकी वजह यह है कि अल्लाह पाक ने इंसानों को ईमान, मोहब्बत, अमन, इंसानी हुकूक, या किसी और चीज में मुनाफिकत को छिपा कर इंसानों को धोका देने से मना किया है। इसलिए हम ममनूअ आमाल [हराम और नाजायज़] से परहेज़ करके अपने इम्तेहान और आज़माइश में कामयाब हो सकते हैं।

कुरआन बताता है कि किस तरह अल्लाह पाक हमें निम्नलिखित तरीके से इम्तेहान में डालता है:

और ज़रूर हम तुम्हें आजमाएंगे कुछ डर से और कुछ मालों और जानों और फलों की कमी से और खुशखबरी सुना उन सब्र वालों को (2:155)

खुशखबरी केवल उन लोगों को दी जाती है जो हर किस्म के मसाइल में सब्र से काम लेते हैं, जैसा कि उपर आयत में संक्षिप्त बयान किया गया है। वह लोग जो अपनी खुद गरजी की तस्कीन के लिए हर संभव बद आमाली अंजाम देने के लिए तैयार हैं, जैसे निर्दोष लोगों की हत्या करना, बमबारी करना, तबाही व बर्बादी करना, चोरी करना, और बेबस और अल्पसंख्यकों पर ज़ुल्म करना, आदि, इम्तेहान में असफल हो जाते हैं।

इसके बाद आने वाली दो आयतों में यह बताया गया है कि जिनके लिए बशारतें होती हैं वह किस तरह सब्र से काम लेते हैं:

(वह लोग हैं) कि जब उन पर कोई मुसीबत पड़े तो कहें हम अल्लाह के माल हैं और हमको उसी की तरफ फिरना (2:156)

यह लोग हैं जिन पर उनके रब की दरूदें हैं और रहमत और यही लोग राह पर हैं। (2:157)

पिछले पैराग्राफ के मुताबिक़ वह लोग जो मुसीबत के वक्त सब्र का मुज़ाहेरा नहीं करते और बुरे कामों में लगे रहते हैं वह मरने के बाद अपने रब के फजल और उसकी रहमत से महरूम रहेंगे। वह वही लोग हैं जो अल्लाह के फजल से गिर चुके हैं।

इसके दो प्रकार के नतीजे बरामद होते हैं। कोई आजमाइशी में कामयाब होता है और कोई नाकाम। दोनों किस्म के नतीजे का अल्लाह पाक ने कुरआन पाक में बखूबी ज़िक्र किया है: बेशक हमने आदमी को अच्छी सूरत पर बनाया (95:4) “फिर उसे अहर नीची से नीची हालत की तरफ फेर दिया (95:5) “मगर जो ईमान लाए और अच्छे काम किये कि उन्हें बेहद सवाब है (95:6)

सबसे पहले अल्लाह पाक ने इंसानों को बेहतरीन सूरत [अह्सने तकवीम] में पैदा किया, फिर उसने उनके नफ्स (नफ्स) को खैर व शर के बीच बसीरत अता की (91:8)। इसके बाद जो शख्स अल्लाह पाक, उसके नबी, फरिश्तों, रसूलों और किताबों पर ईमान रखता है और कुरआन व सुन्नत के मुताबिक़ अमल करता है, वह फितरी अख़लाक़ और बेहतर दस्तूर को बरकरार रखता है और उस इम्तेहान में कामयाब होता है। और अगर कोई ऐसा काम करे जो इन तमाम बातों के खिलाफ हो तो वह अपनी फितरी हैसियत को गिरा देता है और इंसान होने की हैसियत से गिर जाता है और फिर अह्सने तकवीम से असफल अस साफेलीन की तरफ चला जाता है।

अल्लाह पाक का यह भी फरमान है कि

बेशक मुराद को पहुंचाया जिसने इसे सुथरा किया (91:9) “और ना मुराद हुआ जिसने इसे मासियत में छिपाया (91:10)

अब यह बात साबिर हो चुकी कि अल्लाह पाक ने इंसान को आज़माइश में डालने के लिए ज़िन्दगी और मौत को पैदा किया है। यह पुरी दुनिया एक इम्तेहान है जिसमें हमें अच्छे और बुरे दोनों कामों का सामना करना पड़ता है। लेकिन जब हम अच्छे काम करते हैं तो हमारा रब खुश होता है और जब हम बुरे काम करते हैं तो हमारा रब नाराज़ होता है। आजकल बहुत से लोग अपने अंदर के शैतान को काबू करने से कासिर हैं। इसकी वजह यह हो सकती है कि वह खुदा से गाफिल हैं और यह भूल गए हैं कि उन्हें कयामत के दिन उसके सामने जवाब देना है।

जैसे कि दुनिया भर में बहुत से लोग कई किस्म के अपराध का इर्तेकाब करने से खौफ खाते हैं क्योंकि वह अंतर्राष्ट्रीय या कौमी कानून को तोड़ने से डरते हैं। कानून न हो तो अपराध बढ़ जाएंगे। इसी तरह अगर अल्लाह पाक आखिरत में सज़ा का कानून कायम न करता तो बहुत से लोग इस दुनिया में बुरे काम करने से बाज़ न आते। सोचने और समझने के लिए बहुत सी चीजें हैं, लेकिन ऐसा करने के लिए हमें मुसलमान की हैसियत से यह याद रखना चाहिए कि हम मरने के बाद अपने रब के सामने जवाबदेह होंगे, इसलिए हमे अपने कौल व अमल पर गौर करना चाहिए ताकि उसकी कोई खिलाफवर्जी न हो।

English Article: Meditating On Life and Death from an Islamic Perspective

Urdu Article: Meditating On Life and Death from an Islamic Perspective اسلام میں زندگی اور موت کا تصور

URL: https://www.newageislam.com/hindi-section/meditating-life-death-islamic-perspective/d/126656

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