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Hindi Section ( 26 Nov 2013, NewAgeIslam.Com)

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Shared Values among Religions and the Call for Interfaith Dialogue साझे धार्मिक मूल्य और अंतरधार्मिक संवाद

 

गुलाम ग़ौस, न्यु एज इस्लाम

15 मई, 2013

इस्लाम सभी धर्मों के बीच शांतिपूर्ण सहअस्तित्व को बढ़ावा देता है। सभी प्रमुख धर्मों की शिक्षाएं लगभग समान हैं। लेकिन धर्मों की गलत व्याख्या मतभेदों और विवादों को हवा देती है। हम अक्सर देखते हैं कि धर्म के तथाकथित नेता कट्टरता, उग्रवाद, आक्रामकता और नफरत की आग को भड़काते हैं और यही नहीं हिंसा और खूनी मुठभेड़ को उचित भी बताते हैं। अक्सर राजनीतिक सत्ता हासिल करने के सपने को अमलीजामा पहनाने के लिए धर्म का दुरुपयोग किया जाता है। अतीत से लेकर मौजूदा दौर तक लगातार हम ये देख सकते हैं कि अक्सर ये हिंसक गतिविधियों धर्म के नाम पर अंजाम दी जाती हैं।

हमने विज्ञान में बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं लेकिन कमज़ोर क़ौमों की रक्षा करने में हम बुरी तरह नाकाम हो चुके हैं। ऐसे हथियार और गोला बारूद बनाए जा रहे हैं जिनसे न सिर्फ ये कि किसी कमज़ोर देश को तबाह किया जा सकता है बल्कि उससे पूरी मानवता का खात्मा करना सम्भव है। इसलिए हम इस्लाम में आंतरिक और बाहरी स्तर पर जारी जंग का समाधान पेश करने में नाकाम रहे हैं। परिणामस्वरूप धार्मिक असहिष्णुता के कारण बड़े पैमाने पर तबाही और इंसानों के खून खराबे की घटनाएं सामने आ रही हैं। खासकर इराक, अफगानिस्तान, सीरिया, फिलिस्तीन और पाकिस्तान जैसे देश इस मामले में प्रमुख हैं जहां आतंकवाद, धार्मिक उग्रवाद और शियों, अहमदियों और दूसरे धार्मिक अल्पसंख्यकों के नरसंहार और साथ ही साथ इस्लामिक सांस्कृतिक विरासत का विध्वंस और विनाश भी अपने चरम पर है।

इस बहस से धर्म के घातक तत्व को शिकस्त देते हुए बहुत समझदारी के साथ पेश आने की ज़रूरत है। धर्मों के बीच शांति स्थापित करने वाले तत्वों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। दूसरे शब्दों में धार्मिक प्रतिनिधियों को शांति स्थापित करने में अपनी नैतिक भूमिका निभानी चाहिए। और बदले में बाकी सभी लोगों को शांति स्थापित करने में धार्मिक नेताओं का सहयोग करने के लिए धार्मिक कारकों का संज्ञान लेना चाहिए।

पूरी दुनिया में धार्मिक विविधता हम में एक दूसरे के प्रति सहिष्णुता और सम्मान की अपेक्षा करती है। कुरान और हदीस का गहरा अध्ययन इस मांग को पूरा करता है।

कुरान का फरमान ''और अगर अल्लाह चाहता तो तुम सबको (एक शरीयत पर सहमत) एक ही उम्मत बना देता लेकिन वो तुम्हें इन (अलग अलग आदेशों) में आज़माना चाहता है जो उसने तुम्हें दिए हैं, सो तुम नेकियों में जल्दी करो। अल्लाह ही की तरफ तुम सबको पलटना है फिर वो तुम्हें इन (सभी बातों में सच और झूठ) से आगाह कर देगा जिनमें तुम मतभेद करते थे'' (5: 48)

बहुत से लोग ये सोचते हैं कि हम कैसे सहिष्णुता और शांति को बढ़ावा दे सकते हैं, हालांकि विभिन्न धर्मों के बीच विश्वास के मामले में कई मतभेद हैं।

अल्लाह का फरमान है, 'आप फरमा दीजिएः ऐ काफिरों! मैं उन (बुतों) की इबादत नहीं करता, जिन्हें तुम पूजते हो, और न तुम उस (रब) की इबादत करने वाले हो जिसकी मैं इबादत करता हूँ, और न (ही) मैं (आइंदा कभी) उनकी इबादत करने वाला हूँ जिन (बुतों) की तुम पूजा करते हो, और न (ही) तुम उसकी इबादत करने वाले हो जिस (रब) की मैं इबादत करता हूँ, (सो) तुम्हारा धर्म तुम्हारे लिए और मेरा धर्म मेरे लिए, 'निश्चित रूप से ये दुनिया की सबसे सेकुलर विचारधारा है।

जहां तक मुस्लिम दुनिया का सम्बंध है उन्हें हमेशा कुरान की ये आयत याद रखनी चाहिए:

''दीन (धर्म) में कोई ज़बरदस्ती नहीं।' (2: 256)

मुसलमान सभी नबियों पर ईमान रखते हैं और उन्हें किसी भी नबी और धर्म के प्रति ज़रा सा भी असम्मान और गुस्ताखी करने की इजाज़त नहीं है। ये आयत मुसलमानों को दमन करने से रोकती है। इसका मतलब ये है कि मुसलमानों को दमन और हिंसा के साथ इस धरती पर इस्लाम स्थापित करने की इजाज़त नहीं है। और कुरान का यही सिद्धांत नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की दिनचर्या में प्रमुख था। ये आयत सभी धार्मिक समुदायों को इबादत की आज़ादी की गारंटी देती है। इससे उस कुरानी आयत को समर्थन मिलता है जिसमें अल्लाह का फरमान है कि उसने लोगों को क़ौमों और क़बीलों में बाँट दिया ताकि वो एक दूसरे को जान सकें और मेहरबानी व उदारता के एक ही स्वभाव के साथ आपस में मामलों को अंजाम दे सकें।

यही कारण है कि मुख्यधारा में शामिल मुसलमान दूसरे धर्मों को खुले दिल से स्वीकार करते हैं, चाहे इस्लामी दृष्टिकोण से उनका धर्म उन्हें कितना ही ग़लत क्यों न लगे।

हम इस घटना से भी अच्छी तरह परिचित हैं कि जब दूसरे धर्म के मानने वालों का एक प्रतिनिधिमंडल मदीना की मस्जिदे नबवी में आया। पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से मुलाकात करने से पहले उन्होंने मस्जिद में ही अपनी इबादत करने की इच्छा व्यक्त की, जबकि नमाज़ का वक्त समाप्त हो रहा था। पैग़म्बर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि उन्हें पहले अपनी इबादत अदा कर लेनी चाहिए, नमाज़ के लिए इंतेजार किया जा सकता है। इसी तरह एक और मौके पर नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम एक गैर मुस्लिम के जनाज़े के सम्मान में खड़े हो गए और कहा कि ''शिष्टाचार के मामले में धर्म से कोई फर्क नहीं पड़ता।''

भगवद् गीता में ऐसे ही कई स्थानों पर जहां कृष्ण ने अर्जुन को दुश्मनों से लड़ने का हुक्म दिया हालांकि वो उनके रिश्तेदार ही क्यों न हों। इसमें धर्म के लिए संघर्ष को बढ़ावा दिया गया जिसे कुरान की भाषा में जिहाद कहा जाता है। लेकिन आज इसके बारे में गलतफ़हमी पाई जाती है और इसकी गलत व्याख्या की गई है। विभिन्न धर्मों में बुनियादी मूल्य अलग नहीं होते। जो लोग अल्लाह पर ईमान (विश्वास) रखते हैं वो अन्याय की इच्छा नहीं कर सकते। इसलिए कि खुदा उन्हें दूसरों के साथ मेहरबानी का मामला करने का हुक्म देता है।

इस्लाम सभी मुसलमानों पर दूसरे धर्मों का सम्मान करने को अनिवार्य करार देता है। खुद मुसलमानों को ये महसूस होता है कि दूसरे लोग भी इस्लाम को समझें और उसका सम्मान करें। मानवों के निर्माण का मुख्य उद्देश्य यही है जिसकी व्याख्या कुरान (11: 7) में खुद अल्लाह ने की है। अल्लाह का फरमान है कि उसने ज़मीन व आसमान को पैदा किया ताकि इंसानों को आज़माया जा सके कि किस का चरित्र अच्छा है। अच्छे कर्मों में इंसानों के बीच प्रतियोगिता को बढ़ावा देना अल्लाह का उद्देश्य है ताकि आदमी दुनिया को शांति और सुकून का केंद्र बना सके।

जब किसी क्षेत्र में एक विशेष समूह के प्रति गरीबी, दंगा, भेदभाव और भेदभावपूर्ण रवैय्या अपनाया जाता है तो उनमें धार्मिक हिंसा का रुझान तेजी के साथ पैदा होता है। ऐसे समय में दूसरे धर्मों के बारे में ज्ञान और उनके मूल्य अहम पहलू होते हैं और उन पर सभी लोगों के द्वारा प्रकाश डाले जाने की आवश्यकता होती है। सभी धर्मों की शिक्षाएं समानता और न्याय की शिक्षा देती हैं। ताकि वो एक साथ मिलकर सभी प्रकार के दमन और हिंसा का मुकाबला कर सकें चाहे उनका सम्बंध आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक क्षेत्र से क्यों न हो।

आज अक्सर लोग दूसरों के बारे में फैसला अपनी जानारी के द्वारा नहीं बल्कि केवल अनुमान के अनुसार करते हैं। दूसरे धर्मों के बारे में हमारी समझ तथ्यों और सच्चाई से कोसों दूर है। यहां तक ​​कि बहुत सारे लोग खुद अपने धर्म के मूल सिद्धांतों से अनजान हैं। परिणामस्वरूप गलतफहमियाँ बुरे कामों का कारण बनती हैं। इसलिए अंतरधार्मिक बातचीत हमारे भीतर और दूसरों के अंदर भी दूसरे के धर्मों के प्रति सही समझ पैदा करती हैं।

इसलिए आज वैश्विक स्तर पर इन ज्वलंत समस्याओं का समाधान पेश करने की सख्त ज़रूरत है। शांति के सिद्धांत को बढ़ावा देने के लिए अंतरधार्मिक सहयोग को बढ़ावा देना ज़रूरी है। सभी धार्मिक लोगों के लिए ये ज़रूरी है कि वो एक दूसरे को धार्मिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में नहीं बल्कि दोस्त के रूप में स्वीकार करें।

अब हम सभी धर्मों के अंतरधार्मिक पहलुओं पर ध्यान देते हैं। अल्लाह सभी इंसानों को 'कलिमतैन सवाइम् बैनना व बैनकुम' यानी सच्चाई और समानता की तलाश में एक दूसरे के हाथों में हाथ देने और कंधे से कंधा मिलाने का हुक्म देता है। हर इंसान खुदा की रचना है। उसके धर्म का मामला खुदा और उस व्यक्ति के बीच निहित है। आइये हम भी सार्थक संवाद और उपयोगी बातचीत के माध्यम से एक दूसरे के बारे में सब कुछ जानें और एक दूसरे के साथ सम्बंध बनायें। इस तरह हम सभी प्रकार की निर्दयता का विरोध कर सकेंगे और शांति, न्याय और भाईचारे के लिए काम करने में सक्षम होंगे।

हर संवेदनशील व्यक्ति को संघर्षों से बचना चाहिए। बल्कि उन्हें अंतर-सांस्कृतिक और अंतरधार्मिक सतह पर शांति बनाने के लिए बातचीत के लिए आमंत्रित करना चाहिए। वो मुसलमानों और गैर-मुसलमानों के बीच साझा मूल्यों को बढ़ावा भी दे सकते हैं। इसलिए कि हर इंसान खुश रहना चाहता है। पूरी दुनिया की क़ौमों के बीच उस वक्त तक शांति नहीं कायम हो सकती जब तक कि धर्मों के बीच शांति स्थापित न हो जाए। इसी तरह विभिन्न धर्मों के बीच शांति उस वक्त तक लम्बे समय तक नहीं बनी रह सकती जब तक कि विश्वसनीय और प्रामाणिक अंतरधार्मिक बातचीत न हो।

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