New Age Islam
Wed Dec 08 2021, 11:42 AM

Hindi Section ( 4 Feb 2021, NewAgeIslam.Com)

Comment | Comment

Muslims Need to Introspect More than Making Demands मुसलमानों को मांगों से अधिक आत्म चिंतन की आवश्यकता

गुफरान साजिद कासमी

११ जून, २०१३

शिक्षा किसी भी कौम के लिए विकास का महत्वपूर्ण और मुख्य स्रोत होता है, जो कौमें ज्ञान प्राप्त करती हैं और उसकी रौशनी से भरपूर लाभ उठाती हैं वही कौमें विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में विकास कर के दुनिया पर शासन का ख्वाब देखती हैं और बाकी दुनिया को अपने पीछे चलने पर मजबूर करती है, लेकिन जो कौमें ज्ञान प्राप्ति में कोताही बरतती हैं, और उसकी रौशनी से लाभ उठाने में असफल रहती हैं उसे विकसित कौमों की गुलामी का तौक अपने गर्दन में डालने पर मजबूर होना पड़ता है। शिक्षा और मुसलमान का चोली दामन का संबंध रहा हैमुसलमानों के लिए शिक्षा का महत्व इस तथ्य से भी स्पष्ट होता है कि पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर  वही का प्रारम्भ  "इकरा" शब्द से शुरू हुआ थाजिसका अर्थ "पढ़ो" हैबल्कि कुरआन और हदीस में भी जगह जगह ज्ञान प्राप्ति की प्रोत्साहना की गई है। ज्ञान के अधिग्रहण को विभिन्न स्थानों पर प्रोत्साहित किया गया हैऔर ज्ञानी और अज्ञानी के बीच अंतर को दृष्टिवान और अंधे के बीच के अंतर से समझा गया है। प्रत्येक मुस्लिम पुरुष और महिला का यह कर्तव्य है कि वे अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त करें। एक उदाहरण मेंपैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने लोगों को ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया और कहा, "अपनी माँ की गोद से कब्र में जाने तक ज्ञान प्राप्त करें।" भले ही आपको इसके लिए चीन की यात्रा करनी पड़े। हदीसों की प्रामाणिकता या कमजोरी की परवाह किए बिनायह निश्चित है कि ज्ञान की स्थिति और इसका महत्व निश्चित हैऔर किसी को भी इसके महत्व से कोई भी शउर वाला मनुष्य इनकार नहीं कर सकता।

एक तरफ तो वह कौम और उम्मत कि अल्लाह ने जिसके पैगम्बर को सबसे पहले वही पढ़नेके आदेश की शकल में भेजी, कुरआन करीम में जगह जगह ज्ञान के महत्व को बयान किया उस नबी की उम्मत पर अनपढ़ का लेबल लगे, अफ़सोस है! जी हाँ २००४ में कांग्रेस जब एक लम्बे समय के बाद सत्ता में वापिस आई तो उसे यह ख़याल हुआ कि जिस कौम के बल बूते उसने यह सत्ता प्राप्त किया है, भारत में उस कौम की शैक्षिक, आर्थिक, और सामाजिक स्थिति क्या है? थोड़ा इसका अवलोकन किया जाए, इस नेक उद्देश्य के लिए मनमोहन सरकार ने जस्टिस राजेन्द्र सच्चर की अगुवाई में एक कमेटी बनाई, जिसका बुनियादी उद्देश्य था कि पुरे देश का अनुसंधात्मक सर्वे कर के यह संख्या प्राप्त किये जाएं कि भारत में मुसलमानों के आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक हैसियत क्या है? जस्टिस राजेन्द्र सच्चर ने बड़ी इमानदारी और लगन से पुरे भारत का निरिक्षण किया, उन्होंने इस निरिक्षण के दौरान केंद्र सरकार, राज्य सरकार, इसी तरह केंद्र और राज्य सबके नीचे आने वाले सभी विभागों, सरकारी, अर्ध सरकारी और प्राइवेट शैक्षणिक संस्थानों और मदरसों का जायज़ा लिया और यह उन जगहों पर मुसलमानों की संख्या क्या है इसके आंकड़े प्राप्त किये? वैसे तो अवलोकन मुसलामानों की ज़िन्दगी के सभी शोबों से संबंधित था, लेकिन इस समय मुझे केवल मुसलामानों की शैक्षिक स्थिति पर बात चीत करनी है, क्योंकि हर तरह की तरक्की का राज़ शिक्षा में ही छुपा है। जस्टिस राजेन्द्र सच्चर ने अपनी यह रिपोर्ट नवंबर २००६ में भारत सरकार को पेश कर दी, जिसको लगभग ७ साल से अधिक समय हो चुका है।

यह ध्यान रखना उचित है कि न्यायमूर्ति राजेंद्र सच्चर द्वारा पेश की गई उनकी रिपोर्ट मेंइस पूरे देश में मुस्लिम अत्यंत पिछड़े हुए हैंन तो आर्थिक रूप से मजबूत हैंऔर न ही अन्य कौमों की तुलना में सामाजिक रूप से बेहतर हैं।

शिक्षा के मुद्दे के लिए, शिक्षा के अग्रणी होने के बावजूद, वे इस क्षेत्र में भी पिछड़े हुए हैं। मुसलमानों के प्रति एक सामान्य सार्वजनिक प्रवृत्ति यह है कि वे कट्टरपंथी और रूढ़िवादी हैं, इसलिए वे अपने बच्चों को केवल धार्मिक शिक्षा देते हैं, लेकिन सच्चर रिपोर्ट ने इस विचार को भी खोल दिया है कि मुस्लिम केवल 4% बच्चे ही मदरसों में पढ़ते हैं, सांख्यिकीय नहीं केवल आम लोगों के लिए, बल्कि स्वयं मुसलमानों के लिए भी। यह किसी चिंता से कम नहीं है कि केवल 7% बच्चे ही मदरसों में पढ़ रहे हैं। ये आंकड़े कम से कम 50% होने चाहिए, लेकिन मुसलमान इसमें भी पीछे हैं, शेष श्री सच्चर की रिपोर्ट के अनुसार, 66% सरकारी स्कूलों में और 30% निजी स्कूलों में हैं। यहां तक कि स्कूलों, कॉलेजों और युनिवर्सिटियों में भी, हमारी संख्या गिनती के लायक है। जबकि 2001 की जनगणना के अनुसार भारत की समग्र साक्षरता दर 65% है, जबकि मुसलमानों में यह केवल 59% है, जबकि हिंदू 65%, ईसाई 80%, सिख 69%, बौद्ध 72% और जैन 94% हैं। मुसलमानों में साक्षरता दर है। पुरुषों के लिए 67% और महिलाओं के लिए 50% है, जो ऊपर गिने गए सभी धर्मों के अनुयायियों में सबसे कम है। ऐसा क्यों है? जिस धर्म की बुनियाद ही शिक्षा पर है जिसके पेशवा  की सैकड़ों हदीस और कुरआन की अनेकों आयतें ज्ञान प्राप्त करने के संकेत पर हैं। आखिर, इस कौम के अनुयायियों के बीच साक्षरता की स्थिति इतनी दुखद क्यों है? क्या हमें यह एहसास नहीं है कि हम अपने धर्म और अपनी शिक्षाओं से कितने दूर आ गए हैं? बस उस समय को याद करें जब हमारे ज्ञान और अनुसंधान का डंका दुनिया भर में बज रहा था, विज्ञान और हास्य की दुनिया के महान आविष्कारों का श्रेय हमारे शोधकर्ताओं को जाता है, लेकिन हमारी कमियों और हमारे ज्ञान से दूरी ने  इन आविष्कारों का श्रेय हमसे बड़े शातिराना अंदाज़ से छीन कर अपने सर ले लिये और हम कुछ नहीं कर सके।

सच्चर कमेटी की रिपोर्ट हमारे लिए एक सबक है, इसे केवल राजनीतिक हथकंडा नहीं बनाना चाहिए बल्कि हमें गौर करने की आवश्यकता है कि आखिर इसका जिम्मेदार कौन है? क्या केवल सरकार पर इसकी जिम्मेदारी डाल देना पर्याप्त होगा या हमें यह भी देखना होगा कि हम अपने लिए और अपनी कौम के लिए कितने उपयोगी हैं? अगर हमें अल्लाह ने इतनी सहूलत दी है कि हम अपने पड़ोस के पांच बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था कर सकते हैं तो क्या हमने ऐसा किया? थोड़ा गौर करें कि सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार मुसलमानों के ६-१४ वर्ष के लगभग २५ प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं जो या तो कभी स्कूल गए ही नहीं या गए तो उन्होंने बीच में ही शिक्षा को अलविदा कह दिया, है कोई हैसियत रखने वाला मुसलमान जिसने कभी अपने मोहल्ले में यह जानने की कोशिश की हो कि उसके मोहल्ले में कितने बच्चे है जो कभी स्कूल नहीं गए या जिन्होंने बीच में ही स्कूल छोड़ दिया हो? शायद ही भारत का कोई ऐसा गाँव हो जहां इस तरह के हैसियत रखने वाले लोगों की कमी हो? संभव है कुछ ऐसे भी उपकारी लोग हों? या क्या कभी किसी गैर सरकारी संगठन जो मुसलामानों के लिए काम करती है उसने कोई इंतज़ाम किया? इस सवाल का जवाब सब जानते हैं।

सरकार ने जस्टिस राजेन्द्र सच्चर को यह जिम्मेदारी सौंपी थी कि वह भारतीय मुसलमानों की शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक स्थिति का अवलोकन करें, उन्होंने नवंबर २००६ में अपनी यह रिपोर्ट या यह कह लें कि मुसलामानों की ज़बूँ हाली का किर्तासे अबयज़ (सफ़ेद कागज) सरकार के हवाले कर दिया, जहां तक मेरी जानकारी का संबंध है और ख़बरों की दुनिया से बाखबर रहने वाला हर व्यक्ति अच्छी तरह से जानता है कि इस रिपोर्ट के आने के बाद मुसलमानों का हमदर्द कहलाने वाली बड़ी बड़ी संगठनों ने बड़े बड़े सम्मेलन किये, सरकार से मांग किया कि जस्टिस सच्चर ने रिपोर्ट के संदर्भ में जो सिफारिशें पेश की हैं उसे जल्द से जल्द लागू किया जाए, इस तरह मुताल्बे होते रहे और सरकार ने अपनी मुद्दत पूरी कर ली, फिर सरकार इसी रिपोर्ट को साथ ले कर दुबारा चुनाव के मैदान में उतरी और मुसलमानों के सामने यह दुहाई दी कि देखिये आपकी गिरी हुई हालत और बदहाली का पुलंदा हमारे सामने है हमारी मुख्लिसाना और इमानदारानाकोशिश है कि हम इसे लागू करेंगे लेकिन इसके लिए आपको हमें एक और मौक़ा देना होगा, अगर हमें आपने मौक़ा नहीं दिया तो याद रखें पूरा देश गुजरात बन जाएगा, भला मुसलमान कैसे ना एतिबार करता और उन्होंने एड़ी चोटी का ज़ोर लगा कर दुबारा सत्ता सोने की थाली में सजा कर कांग्रेस को पेश कर दिया, अब दूसरी मुद्दत भी ख़त्म होने वाली है, लेकिन मुसलमानों का कितना भला हुआ यह सब को पता है, २०१४ का लोक सभा इलेक्शन बस आना ही चाहता है कि अचानक सच्चर कमेटी रिपोर्ट अर्थात मुसलमानों की बदहाली का किर्तासे अबयज़ को रद्दी की टोकरी से फिर निकाला गया और एक ऐसे समय में जब कि सरकार को और सरकार के मंत्रियों को भी अच्छी तरह पता है कि अब कुछ नहीं कर सकते उन्होंने एक बार फिर बद हाल मुसलमानों की किस्मत को जादुई छड़ी से सुधारने का एलान दाग दिया, होना क्या था एक बार फिर से मीडिया के साथ साथ मुस्लिम संगठनों को भी मौक़ा मिल गया, और सरकार भी खुश हो गई कि हमेशा की तरह एक बार फिर मुसलमान हमारे दाम में फंस चुका है। और इसी बीच अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री जनाब के रहमान खान साहब ने मुसलमानों के लिए एक खुशनुमा एलान किया कि सरकार भारत में अल्पसंख्यकों के लिए पांच यूनिवर्सिटियां कायम करेगी, अब उनसे कौन पूछे कि पहले से जो इरादा अल्पसंख्यकों का है वज़ीर साहब! पहले उसका तो अल्पसंख्यक किरदार बहाल कर दें, फिर आप यह पांच यूनिवर्सिटियां स्थापित करें, एक सवाल के जवाब में मंत्री महाशय ने कहा कि क्या अगर इलेक्शन आने आले हैं तो हम कोई काम ही ना करें, तो उनका जवाब यह भी है कि अल्पसंख्यकों की बुरी हालत का ज्ञान हुए लगभग सात वर्ष का समय गुजर चुका है, इन सात वर्षों में आपने एलानों के सिवा कुछ किया भी है? जब कि उनका दावा है कि सच्चर कमेटी की ७३ सिफारिशों में से लग्बह्ग ६० से अधिक सिफारिशों का निफाज़ हो चुका है, तो अब यह एक बड़ा सवाल है कि उन सिफारिशों का निफाज़ कब और कैसे हुए? जिस तरह सरकार अपने चार साल के कामों का रिपोर्ट कार्ड जारी करती है तो मंत्रालय अल्पसंख्यक मामलों को भी चाहिए कि वह सच्चर कमेटी की रिपोर्ट की सिफारिशों पर अलग रिपोर्ट कार्ड जारी करें ताकि मुसलमानों को भी पता चले कि सरकार ने उनके लिए क्या क्या काम अंजाम दिए हैं और उन्हें इनका लाभ कैसे मिलेगा?

जहां तक जनाब के रहमान खान साहब के माध्यम से अल्पसंख्यकों के लिए ५ युनिवर्सिटियों के स्थापना का एलान है, तो अगर वाकई सरकार इसमें साभार है तो सहीह मानों में यह बड़ा अच्छा कदम होगा लेकिन कानून विशेषज्ञों का मानना है कि दस्तूर में इस तरह की युनिवर्सिटियों के स्थापना की अनुमति नहीं है और अगर ऐसा होता है तो यह मामला सुप्रीम कोर्ट में जा कर अटक जाएगा जो कि कांग्रेस के लिए लाभदायक ही साबित होगा क्योंकि इस स्थिति में एक बार फिर वह उन्हीं अपूर्ण मामलों की बुनियाद पर अल्पसंख्यक वोट प्राप्त करने में सफल हो जाएगी। बहर हाल! अगर यूनिवर्सिटियां स्थापित होती हैं और वह ख़ास मुसलमानों के लिए होती हैं तो इससे लाभ होगा क्योंकि इस समय मुस्लिम ग्रेजुएट का अनुपात तो बिलकुल ही कम है अर्थात दशमलव 4% है, इसी तरह मैनेजमेंट के आला इदारों में यह अनुपात केवल १३ प्रतिशत है। तो अगर कौमी सतह  पर पांच यूनिवर्सिटियां स्थापित होती हैं तो मुसलमानों को अपनी साक्षरता दर बढ़ाने में अवश्य कुछ ना कुछ लाभ होगा।

जस्टिस राजेन्द्र सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को केवल एक रिपोर्ट समझना हमारी कोताह इल्मी  (ज्ञान की कमी) होगी बल्कि इसे इबरत का सामान समझना होगा और इसके संदर्भ में हमें अपना आत्मनिरीक्षण करना होगा, मैं उन लोगों से क्षमा के साथ कि जो केवल और केवल अपनी बुरी हालत का ज़िम्मेदार सरकार को ठहराते हैं, मैं इसके लिए केवल और केवल अपनी कौम और अपनी कौम के रहबर को ज़िम्मेदार समझता हूँ, भारत में सबसे अधिक साक्षरता दर जैन धर्म में पाई जाती है, ९४ प्रतिशत उनकी साक्षरता दर है तो क्या या सरकार की दें है नहीं? हरगिज़ नहीं! बल्कि यह उनकी जागरूकता है, इसी तरह भारत के कुछ राज्यों में साक्षरता दर कौमी औसत से कहीं अधिक है तो क्या इन सबके पीछे सरकार की करम फरमाई है? अगर है तो इसकी वजह क्या है? इसे जानने की कभी कोशिश की है हमारे रहनुमाओं ने? नहीं! केवल इजलास तलब कर लेने, मेमोरेंडम पेश कर देने और अखबारी बयान बाज़ी से इस कौम की हालत सुधरने वाली नहीं है, बल्कि इसके लिए अपने अंदर बेदारी लानी होगी, बिहार के हज़रत मौलाना मोहम्मद वाली रहमानी ने क्या सरकार के मदद से रहमानी-३० की बुनियाद डाली है? ज़रा गौर करें कि रहमानी-३० के छात्र आज किस मुकाम पर हैं, आज आवश्यकता है कि हर राज्य नहीं बल्कि हर ज़िले में एक वली रहमानी पैदा हो जो कौम के भविष्य को ऊँची शिक्षा बुलंद सोच दे सके, सरकार के सामने हाथ फैलाने से बेहतर है कि हर वह शख्स जो अपने एक बच्चे की शिक्षा के खर्च बर्दाश्त करने के काबिल है वह अपने पडोस के एक बच्चे का भी शैक्षणिक खर्च बर्दाश्त करे, इसी तरह जिस व्यक्ति को अल्लाह ने सामर्थ्य दिया है वह हर मोहल्ले और गाँव में ऐसे मकतब और स्कूल के कयाम की कोशिश करे कि जहां कौम और मिल्लत के भविष्य को संवारा जा सके, जरूरी नहीं कि अकेले इस काम को अंजाम दे बल्कि अपनी अधिक से अधिक शराकत अदा करके कौम के दुसरे मुखलिस और कार आमद लोगों को भी साथ ले और सामूहिक तौर पर यह काम करे, अगर हर शख्स अपने पड़ोस, मोहल्ले और गाँव की फिकर कर ले तो इंशाअल्लाह वह दिन दूर नहीं कि इस देश का हर मुसलमान शिक्षित होगा, हर घर से ज्ञान का प्रकाश फूटेगा जो अपने साथ बहुत सारे घरों को प्रकाशित कर देगा। इंशाअल्लाह, बस जरूरत है अज्म और हौसले की और इखलास और लिल्लाहियत की।

११ जून, २०१३ बशुक्रिया: रोज़नामा सहाफत, नई दिल्ली

URL: http://www.newageislam.com/urdu-section/ghufran-sajid-qasmi--غفران-ساجد-قاسمی/muslims-need-to-do-introspection-more-than-making-demands--مسلمانوں-کو-مطالبات-سے-زیادہ-خود-احتسابی-کی-ضرورت/d/12567

URL: https://www.newageislam.com/hindi-section/muslims-need-introspect-more-than/d/124227


New Age IslamIslam OnlineIslamic WebsiteAfrican Muslim NewsArab World NewsSouth Asia NewsIndian Muslim NewsWorld Muslim NewsWomen in IslamIslamic FeminismArab WomenWomen In ArabIslamophobia in AmericaMuslim Women in WestIslam Women and Feminism


Loading..

Loading..