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Hindi Section ( 23 Sept 2014, NewAgeIslam.Com)

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Reciting the Holy Qur’an in a Singing Manner कुरआन को गा गा कर पढ़ना

 

जी एम परवेज़

मेरी ड्यूटी ऐसी थी कि घर देर से पहुंचता था घर वाले आराम कर रहे होते। फिर सुबह बेगम ज़ोर ज़ोर से तिलावत (कुरआन पढ़ती) करतीं जिस से मेरी नींद पूरी नहीं होती थी। दिल चाहता था कि मैं उन्हें तिलावत का मतलब समझाऊँ मगर यह भी डर था कि कहीं यह बद दिल होकर कुरान को हाथ लगाना ही न छोड़ दे। अंततः एक बार मैंने हिम्मत से काम लिया और उनके पास जा कर बैठा। मैंने कहा बेगम आज तो इसका अनुवाद सुनाईए जो आप ने पढ़ा है। उन्होंने कहा कि यह तो बिना अनुवाद का है। शादी के समय आप के घर से यही दिया गया था।

तो इससे क्या फायदा उठाती हैं मैं ने पूछा? और फिर ज़ोर ज़ोर से किस लिए पढ़ती हैं? कहा इस लिए कि सुनने वाले भी इससे लाभ उठाएं। देखिए बेगम जिसे पढ़कर आप कुछ फायदा नहीं उठा सकतीं (अनुवाद न होने की वजह से) इस से अन्य लोग क्या लाभ उठाएंगे। क्या हमारी औलाद मक्के मदीने से आई है? अरबी जानती है?

बेगम अगर आप से कहूँ Please bring one cup of tea. यदि आप यह भाषा नहीं जानतीं तो कैसे मेरा आदेश मानेंगी? यही हाल अल्लाह का है यदि आप इबादत को समझेंगीं नहीं तो आपको कैसे पता चलेगा कि अल्लाह क्या हुक्म दे रहा है और क्या चाहता है?

तो आप क्या सोचते हैं कि हम अरबी नहीं जानते इसलिए हम कुरान न पढ़ें?

यह मैं ने कब कहा, कुरान अवश्य पढ़ें समझने के लिए और समझें अमल करने कि लिए। अगर यह उद्देश्य न हो तो वास्तव में आप कुरान को हाथ न लगाएं क्योंकि यह कुरान पढ़ना नहीं है अपमान है। अगर आप किसी किताब के लेखक से कहें कि अपनी ताजा किताब 'ज़िंदगी का राज़' बड़ी अच्छी किताब है हमेशा मेरे पलंग के साथ टेबल पर रखी रहती है लेकिन मैंने पढ़ा नहीं है या किताब की भाषा से अनभिज्ञ हूँ। तो वह भी आपसे नाराज हो जाएगा। क्या इस तरह से पढ़ने से अल्लाह पसंद करेगा। जबकि यह किताब अल्लाह की इंसान के साथ हम कलाम की अंतिम किताब है। बेहतर है कि आप कुरान पढ़ने के बारे परवेज साहब का लेख सुनिए जो उन्होंने कुरआन साक्षरता के बारे में लिखा है। हर रविवार सुबह जो मैं जाता हूं उन्हीं का प्रवचन सुनने जाता हूँ।

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अल्लामा गुलाम अहमद परवेज साहब किसी ने ऐसा ही सवाल किया था। परवेज साहब ने जो जवाब दिया था वह सुनिए आशा है बात आप की समझ में आ जाएगा।

प्रश्न:. पिछले कुछ वर्षों से यह मामूल है कि विभिन्न इस्लामी देशों से क़रीयों का एक समूह आता हैं। बड़े शहरों में अपने क़रआत की महफ़िलें जमती हैं। वह गा गा कर कुरान सुनाते हैं और दर्शक मरहबा और सुबहान अल्लाह के नारों से दाद देते हैं। चले जाते हैं तो उनके रिकॉर्ड, रेडियो पाकिस्तान से प्रसारित होते रहते हैं। क्या आप बताएंगे कि इस्लाम में इसकी स्थिति और उसका फायदा क्या है?

उत्तरः- इस प्रश्न के उत्तर आने से पहले कुछ कहना चाहता हूँ, कुरआन करीम पर सोच विचार कर के,इस पर अमल करने वाली जमात मोमनीन ने दुनिया में जो इंक़लाब लाया। उस से स्वार्थी समूहों। सल्तनत, धार्मिक पेशवाययत और पूंजीवाद पर जो चोट पड़ी, वह इतिहास मानवता का एक बे मिसाल अध्याय है। इन समूहों ने महसूस किया कि अरबों जैसे देश में जिनके बारे में उनका पड़ोसी कौमें यह कह कर अपनी घृणा व्यक्त करती थीं कि 'ज़शीर शत्र खुर दन व सोसमार' ऊँटनी का दूध पीने वाले और गोह (एक खाकी रंग का सहराई जानवर जो पृथ्वी पर बिट बनाकर रहता है) खाने वालों में इस तरह की अद्भुत परिवर्तन पैदा करने के सबब यह किताब है। जब तक इस क़ौम को इस किताब से बेगाना नहीं किया जाएगा। उनके स्वार्थ सुरक्षित नहीं रह सकेंगी। इसलिए मुसलमानों को इस महान पुस्तक। जीवन को खुदावंदी से जुदा करने के लिए इन्हों ने तरह तरह की चालें चलीं और तरह तरह के षड़यंत्र की। सुरक्षात्मक संबंधी दिलों में संदेह पैदा करने के लिए यह किस्सा स्पष्ट किया गया कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम उसे एक सेट पुस्तक के रुप में दे कर नहीं गए थे। यह हड्डीयों , ठेकरीयों और खजूर के पत्तों इत्यादी पर लिखा बिखरा हुआ था। उसे बाद में मिला जुला कर पुस्तक की शक्ल दी गई और वह भी इस तरह जिस में संदेह के सेंकड़ों सबूत मौजूद हैं।

कहीँ कहा गया है के शुरु में उस के शब्द पर बिंदु (नोक़ते) ही नहीं थे। बाद में लोगों ने अपने अपने अनुमान से उन पर बिंदु (और एराब) लगाए। (नक़ात और एराब के फर्क़ से अर्थ में अंतर पड़ जाता है। अरबी वाले इसे से खुब जानते है) कहीं उस के अर्थ के संबंध में कहा गया है कि यह बड़ी मोजमल किताब है। जिस से कोई बात निर्धारित तौर पर समझ में नहीं आ सकती। इस का अर्थ समझने के लिए बीसीयों तरह के बाहरी सहारों की जरुरत पड़ती है।

कहीँ कहा गया है कि इस में सेकड़ों आयात ऐसी है जिन्हें पढ़ा ते जाता है लेकिन उन का हुक्म रद्द हो चुका है। दूसरी तरफ कुछ आयात ऐसी भी है जो मौजूदा क़ुरआन में नहीं है लेकिन उन का हुक्म बाकी है।

कहीँ यह अक़ीदा (आस्था) विकसित किया गया है कि क़ुरआन के अर्थ मसझने कि जरुरत नहीं, उस के शब्द दोहरा लेने से पुण्य मिल जाता है। अगर किसी को इस के शब्द भी पढ़ने न आते हों तो उस के पंक्तियों पर उंगली फेर लिया करें। उस से भी तिलावत का पुण्य मिल जाता है। बिना समझे नमाज़ में, क़ुरआनी सुरतों का पढ़ लेना तरावीह में क़ुरआन शरीफ खत्म करना। जब के न पढ़ने वाला उस का अर्थ समझे, न सुनने वाले। मुर्दों को पुण्य पहुँचाने के लिए क़ुरआन खानी। सब इसी अक़ीदा (आस्था) से जुड़े है।

इस से आगे बढ़े तो अरबाब तरीक़त ने सिद्धांत स्थापित किया कि क़ुआन का असल मतलब उस के शब्द का अर्थ सामने नहीं आ सकता। इस के बाहरी अर्थ है जो अरबाब तरीक़त के यहाँ सीनह ब सीनह चले आ रहे हैं। क़ुरआन का मतलब इन बातनी अर्थ से समझ में आ सकता है। इन बातनी अर्थ का एक झलक सामने आ जाए तो इंसान आश्चर्य में गुम हो जाए कि वह किस दुनिया में पहुँच गया है।

इस से यह अक़ीदा (आस्था) का पता चला कि क़ुरआनी अक्षर या शब्द के विर्द, वज़िफह, नक्श, तावीज़ से वह काम लिए जा सकते है जिन से कोई लाभ नहीं। और तरफा तमाशा यह है कि उनका नाम 'अमाल कुरआनी' रख दिया गया। और ऐसा करने वाले आमिल कहलाते है। और अगर किसी के दिल में उस के शब्द के अर्थ को मद्देनजर रखकर पढ़ने का विचार पैदा हुआ।तो उस से यह कह दिया गया कि कुरान में विचार की कोई गुंजाइश नहीं इसका क्या मतलब समझा जा सकता था, वह समझा जा चुका है। तुम इसलाफ के बताए हुए अर्थ से जरा भी अलग नहीं कर सकते।

यह (और इस प्रकार के अन्य कई एक) तरीक़े थे जो मुसलमानों जैसी इंक़लाबी जमात को क़ुरआन से दूर और अनजान रखने के लिए इस्तेमाल किए गए। परिणाम उस का हमारे सामने है, वही क़ौम जिस ने उसी किताब के बदौलत, हर झुठे का तख्ता पलट कर रख दिया था। आज इन्हीं प्रणाली के अलमबरदारों के दरवाज़ों पर भीख माँगती दिखाई दे रही है। इन्हीं साज़िशों में एक साज़िश यह भी थी कि क़ुरआन गा गा कर पढ़ा जाए, गाने का संबंध इंसानी भावनाओं से है। आप कि अच्छे संगीत को सुनिए।आप देखेंगे कि इस दौरान न गाने वाला, अक्ल और चिंता की रौ से किसी बात की ओर ध्यान दे सकने में सक्षम होगा। न सुनने वाले। अगर गाने वाले का ध्यान जरा भी किसी और तरफ चला जाए तो इसका राग बिगड़ जाता है। और सुनने वाले कुछ और सोचने लग जाएं तो संगीत का मज़ा बेकार हो जाता है। संगीत में सब भावनाओं में गुम होते है। और इस दौरान उनकी बुद्धि और चिंता का (Switch Off) होता हैं। संगीत का मक़सद ही यह है कि जब इंसान का मन लगातार सोंच विचार से थक जाए, तो उसे कुछ समय के लिए सकून मिल जाए। इसलिए किसी चीज़ को गा कर पढ़ने का परिणाम यह होता है कि आदमी के बारे में विचार से काम नहीं ले सकता। आप स्वयं अनुभव करके देख लें। आप किसी पाठ को झूम झूम कर, गा गा कर पढ़ें, आप देखेंगे कि आप को खुशी तो होगा, लेकिन (इस दौरान) इस के मतलब और अर्थ पर विचार नहीं कर सकेंगे। इसके विपरीत, आप इसे कविता की तरह पढ़ें (या किसी को पढ़ते हुए सुना, चाहे आवाज़ से और चाहे आँखों ही आँखों में चुपचाप। आप के मतलब की गहराई तक पहुंच सकेंगे।

दीन जब धर्म में परिवर्तन हो जाता है तो उस की किताब से उस के अनुयायी का संबंध भावनात्मक रह जाता है। वह उनके लिए व्यावहारिक जीवन का नियम नहीं रहता, यही कारण है कि 'धार्मिक पुस्तकों' आमतौर पर गा कर पढ़ा जाता है। मंदिरों में वेदों के मंत्र, गुरुद्वारों में गुरुबानी के शब्द। गिरजाओं में 'खुदावन्दी गीत' सुमओं में ग़ज़ल इत्यादी, गा कर पढ़ी जाती है और इस तरह अक़िदत मंदों (भक्तों) के 'भावनाओं की संतुष्टि'का सामान पहुँचा दिया जाता है। इसी भावनाओं की संतुष्टि का नाम आध्यात्मिक संतुष्टि या ईश्वर परमात्मा से लौ लगाना रख दिया जाता है। जब उस की शिद्दत से जज़्बात बेक़ाबू हो जाता है तो उस का प्रदर्शन क़व्वाली की महफिल में नृत्य के रुप में होता है।

इस से यह तथ्य सामने आ गई होगी कि मुसलमानों को क़ुरआन से अलग करने(और इस तरह दीन को धर्म की सतह पर ले आने) के लिए जो साज़िशें हुईं उन में एक यह भी थी कि क़ुरआन को गा गा कर पढ़ा जाए। फिर जिस तरह इस प्रकार के हर साज़िश को पवित्रता का लिबादा ओढ़ा दिया गया। फ़न क़रआत पर पवित्रता की चादर चढ़ा दिया गया।

आप ने इस पर विचार किया होगा कि क़ुरआन करीम ने (फातिहा अल किताब के बाद) सब से पहली सूरत के शुरुआती शब्द में अपना परिचय ज़ालेका अल किताब कह कर कराया है। उस ने कहा है कि यह एक किताब (एक नियमित जीवन) है। उसे किताब ही की हैसियत देना। उस से अलग कुछ और न बना देना, उस के बाद उस में बार बार दोहराया गया है। यह आरबी भाषा की एक किताब है जिस में जो कुछ कहा गया है बहुत ही निखरे और उभरे हुए अंदाज़ में कहा गया है। इसमें कोई अस्पष्टता नहीं। अलतबास नहीं। कोई संदिग्ध बात नहीं, कोई दावा और अनुमान पर आधारित नहीं। फिर, इस में बयान किए हुए तथ्यों पर विचार करने की बार बार ताकीद की गई है। क्या एक अच्छी किताब की विशेषताएं होतीं ? (और क़ुरआन तो सिर्फ एक अच्छी किताब ही नहीं, बे मिसाल किताब है)। इस के बाद यह देखिए कि किया हम ने उसे किताब ही समझा हुआ है या कुछ और बना रखा है ? आप सोचिएं किः-

(1) क्या कभी ऐसा हुआ है कि किसी किताब का एक शब्द भी आप की समझ में न आया हो, और उस के बावजूद आप उसे पढ़ते या सुनते रहें ? आप कभी ऐसा नहीं करते।

(2) क्या कभी ऐसा हुआ है कि किसी के शब्दों (या जिस फ़न से संबंधित है उस के शब्दों) की वजह से जो मतलब सामने आते हैं, और उन्हें खारिज कर दें और यह कहें कि उन शब्दों के अर्थ है और उन्हीं से उस का मतलब समझ में आ सकता है ?

(3) कभी ऐसा हुआ है कि आप किसी आपराधिक के प्रावधानों को गा गा कर पढ़ें, और अदालत के कमरे में न्यायाधीश के सामनें भैरवीं में अलापें कि व्यभिचारिणी और व्यभिचारी - इन दोनों में से प्रत्येक को सौ सौ कोड़े मारो (24:2)

जब आप और किताब के साथ यह कुछ नहीं करते, तो क़ुरआन के साथ ऐसा क्यों करते है जब कि उस ने खुद अपना परिचय यह कह कर कराया है कि। यह एक किताब है। इस परिचय से उस का यह कहना था कि यह तुम्हारे लिए जीवन के मार्गदर्शन के लिए किताब है। उसे कितब कि तरह समझो। उस पर विचार करो और फिर उस के अनुसार जीवन व्यतीत करो।

आप सोचिए कि हम उसे यही हैसियत दे रखा है? इसके साथ ही यह भी सोचिए किः-

(1) जिस एहतमाम के साथ इस किताब को पढ़ा जाता है,

(2) जिस तरह इस के शब्द को दोहराने के लिए रुपये खर्च किए जाते है,

(3) जिस तरह दौलत, समय, उर्जा, उस की आराईश के लिए समर्पित कर रहे हैं। किया दुनिया कि किसी और किताब के संबंधित ऐसा किया जाता है? और उस के बाद उस तथ्य को भी सामने लाएं कि इस किताब के अर्थ से जिस तरह हम वंचित है, किया उस की मिसाल कहीं और भी मिल सकती है?। और फिर सोचिएं कि जिन लोगों के संबंधित कहा गया है कि। यही वे लोग है जिन्होंने अपने रब की आयतों का और उससे मिलन का इनकार किया। अतः उनके कर्म ग़ारत हो गए, तो हम क़ियामत के दिन उन्हें कोई वज़न न देंगे(18:105) यह वह है। लेकिन।  यो वे लोग है जिनका प्रयास सांसारिक जीवन में बेकार गया और वे यही समझते है कि वे बहुत अच्छा कर्म कर रहे है(18:104)। वह यह समझते हैं कि वह बहुत बड़ा पुण्य का काम कर रहे हैं। क्या हमारा गिनती इन्हीं में नहीं होता? (दिसंबर 1968ई)

मैं अल्लाह का अभारी हूँ कि मेरी नसीहत काम कर गई अब नतीजा यह निकला कि वह अनुवाद वाला क़ुरआन ले आईं अब ज़ोर ज़ोर से नहीं पढ़तीं और हम घर वालों को भी कुछ आयात का अनुवाद सुनाती हैं। मेरी आप सब से यह अनुरोध है कि आप भी अपने घरों में यह कोशिश कर देखें इंशा अल्लाह बेहतर परिणाम दिखाई देंगें।जिस के कर्म इस तरह बेनतीजा रहते है कि उन का वज़न करने के लिए क़यामत में मिज़ान खड़ी करने की भी जरुरत नहीं होती।

सितम्बर 2014 स्रोतःमाह नामा सुतुल हक़, कराँची

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