New Age Islam
Tue Jan 19 2021, 01:09 PM

Loading..

Hindi Section ( 27 Feb 2012, NewAgeIslam.Com)

What is Salafism? सल्फ़ी नज़रिया क्या है?


डॉ. अदिस दुदरीजा, न्यु एज इस्लाम

इस्लामिक स्टडीज़ विभाग, मेलबर्न विश्वविद्यालय

(अंग्रेजी से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

अक्सर हम मीडिया में सल्फ़ी नज़रिया या सल्फ़ी मुसलमानों के बारे में सुनते हैं। हाल ही में सल्फ़ी नज़रिया की ये पदावली/ विचार मिस्र में विभिन्न 'सल्फ़ी' मुस्लिम पार्टियों की चुनावी सफलता या मालदीव में अव्यवस्था के साथ सामने आयी। लेकिन इस कल्पना को गलत तौर पर समझा गया है। इस कल्पना का इस्लामी रवायत में क्या मतलब है? यह लेख हाल ही में सल्फ़ी दृष्टिकोण पर प्रकाशित हुई मेरी किताबः कन्स्ट्रक्टिंग ए रिलिजियस आइडियल बिलीवर एंड वुमैन इन इस्लाम ...... .... (http://www.amazon.com/Constructing-Religiously-Ideal-Believer-Woman/dp/0230120571) का सार है। और इस लेख में संक्षेप में वर्णन किया गया है कि सल्फ़ी नज़रिया का इस्लामी रवायत में क्या मतलब है।

इस्लामी रवायत में सल्फ़ी नज़रिया के विचार में कई पहलू हैं। इसमें से एक का संबंध इस्लामी रवायत की तशरीह के मुस्तनद (प्रामाणिक) तरीकए-कार (प्रक्रिया) को समझने के मुज़मरात से है। दूसरे तत्व का संबंध पैगम्बर मोहम्मद (स.अ.व.) के सहाबा के सामाजिक- राजनीतिक अव्यवस्था के बीच भूमिका के बारे में सुन्नी सियासी नज़रिए से है जो प्रारंभिक इस्लाम की विशेषता को बताता है। तीसरे पहलू का संबंध इतिहास और समय की प्रकृति पर एक विशेष दृष्टिकोण के आधार पर इस्लामी रवायात के तसव्वुर (विचार) से है। आइए हम इनमें से हर एक का मुशाहिदा करें।

सबसे पहले इस्लामी रवायत में मोक़द्दस माज़ी के तसव्वुर का इज़हार सल्फ़ी नज़रिया में हुआ। सल्फ़ी नज़रिया न सिर्फ ये कि किस तरह इस्लामी रवायत के तसव्वुर की तश्कील और तशरीह की जाये बल्कि उसके तसव्वुर से मुराद इतिहास और समय की प्रकृति को पढ़ने के सवालात से संबंधित है। इस्लामी फ़िक़ह में अस्सल्फ़ अस्सलीह 'वाक्य के विभिन्न अर्थ हैं जैसे "हर समूह ने सल्फ़ को अपनी वाक़्फियत और मकतबे फिक्र के मुताबिक तारीफ की है"। अस्सल्फ़ अस्सलीह जुमले की तारीफ के अनुसार इससे मतलब "मकतबे फिक्र (पंथ) के इब्तेदाई मुजाहिद उलमा" से है जिन्होंने कुबूल कर लिया और उसकी नकल के जैसे कि अबु हनीफा और उनके असहाब अबु यूसुफ और अलशीबानबी (हनफ़ी मसलक) या इमाम अहमद बिन हम्बल (हम्बली मसलक), नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के सहाबा और तबे ताबईन। दूसरी परिभाषा शाफ़ेई मसलक में पाई जाती है, अस्सल्फ़ अस्सलीह की व्याख्या, जो मुसलमान उम्मत के शुरुआती लोग थे, के रूप में करता है। अस्सल्फ़ अस्सलीह की एक और परिभाषा के अनुसार सहाबा, ताबेईन, तबा ताबेईन जो नबी करीम (स.अ.व.) की हद में रहने वालों से मुराद है: "मेरी सदी की उम्मत सर्वश्रेष्ठ है, फिर उसके बाद आने वाले उम्मती और फिर उसके बाद आने वाले उम्मती। आधुनिकता से पहले खूब लिखने वालों में से एक सुन्नी मुसलमान लेखक इमाम अलसयुती (d.911/1505), के अनुसार अस्सल्फ़ अस्सलीह एक ज़माना था जो लगभग 220 हिजरी साल पहले तक था, "जब लोगों में बिदअत आम हो गई थी, अलमोतज़िला को वो बोलने दिया जो वह बोलना चाहते थे, फलसफ़ियों ने अपनी आवाज़ बुलंद की, अहले इल्म हज़रात ने कुरान का गठन किया है, कहने पर मुकदमा किया गया और मामलात बहुत तेजी से तब्दील हुए। अस्सल्फ़ अस्सलीह की एक परिभाषा विचारधारा को इस तरह स्पष्ट करती है, ऐसे लोग जो 400 हिजरी से पहले रहते थे और उसके बाद मुसलामनों की पीढ़ी को खलफ़ के तौर पर नज़रिये की वज़ाहत करता है। इसलिए, अस्सल्फ़ अस्सलीह पीढ़ियों के अनेक परिभाषाओं के मद्देनजर और कौन सल्फ़ी नज़रिया से ताल्लुक़ रखता है, इसे इस्लामी रवायत में स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है।

एक इस्लामी फिक्र के तौर पर सल्फ़ी नज़रिया दूसरी सदी हिजरी के आखीर में तरक्की पाया। एक विचारधारा के रूप में सल्फ़ी मानसिकता को मुस्लिम समुदाय की पहली सदी हिजरी में राजनीतिक और फ़िक़्ही समुदाय बनाने की रोशनी में अच्छी तरह से समझा जा सकता है। उस ज़माने में सल्फ़ी नज़रिया को वैचारिक रूप से मुकाबला कर रहे विभिन्न समूहों के लिए केंद्रीय रूप में इस्तेमाल किया जाता था, और दूसरे लोगों के विपरीत यह सभी समूह मुस्लिम उम्मत के शुरुआत के समय के सभी आला मरतबत लोगों के विचारों के अनुसार खुद को जाहिर करने की कोशिश कर रहे थे। ये मिसाल के तौर पर है, हसन अलबसरी (डी 110/728) से मंसूब समझौतों में अस्सल्फ़ अस्सलीह 'शब्द के इस्तेमाल में वाज़ेह है, जो अपने मोज़ाकरात-कारों के विपरीत स्वतंत्र इच्छा के दृष्टिकोण समर्थन करने के लिए मानते थे कि अस्सल्फ़ अस्सलीह ने इस सिद्धांत को पैदा किया था। किसी के धार्मिक, राजनीतिक या कानूनी विचारों के लिए धार्मिक औचित्य के लिए इसे अस्सल्फ़ अस्सलीह 'से जोड़ कर पेश किया जाता था इस तरह इन समुदायों में मेयारबंदी, मोतबरियत और मुस्तनद होने के एहसास सरायत कर गए।

ऐतिहासिक दृष्टिकोण से, 'अस्सल्फ़ अस्सलीह की शब्दावली का सबसे पहले उपयोग नबी करीम (स.अ.व.) के पर्दा कर जाने के बाद की ऐतिहासिक घटनाओं जिनका संबंध कुरान और सुन्नत में गैर हल शुदा मसाएल पर' अस्सल्फ़ अस्सलीह के बाद की पीढ़ी के मुसलमानों का एक खास जावियए निगाह माना जाना चाहिए, साथ ही साथ नौ-जायेद मुस्लिम तब्के को ऊपर बताये गये राजनीतिक और वैचारिक विभाजन ने अपनी गिरफ़्त में ले लिया था, ये उसे भी समझने का माध्यम था। यह सल्फ़ी दृष्टिकोण जिसे अब बहुत हद तक केंद्रीय धारा की सुन्नियत समझा जाता है, बनाने के लिए काफी अहम है, और जिसका चौदहवीं सदी में अर्थ अहले सुन्नत वलजमात होता था। इसका महत्व राजनीतिक प्रणाली के रूप में काम करने के कारण था जिसने मुसलमानों के विभिन्न धड़ों में विवाद और हिंसा के बाद नबी करीम (स.अ.व.) के सहाबा हज़रात को इसमें भाग लेने या जिम्मेदारी निभाने से तथाकथित रूप से साफ करने की कोशिश की जिसने नौ-ज़ायेद मुस्लिम वर्ग के समाजी ताने बाने को मुन्तशिर करने की धमकी दी। यह हदीस तंक़ीद अध्ययन के विकास के लिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि मोहद्दिसीन के ज़रिए अपनाया गया तरीकए कार अस्नाद पर आधारित था और सहाबा जिन्होंने यह हदीस मुंतक़िल की उनकी भूमिका पर निर्भर था। एक नतीजे के तौर पर सल्फ़ी नज़रिया को पहली शताब्दी के धार्मिक और राजनीतिक हुक्काम के विचार में माना जा सकता है, जो लोग मुनहरिफ हुए उनके विपरीत उनके बारे में माना जाता था कि वो अक़ीदा, मनहज और ईबादतों के मामले में कुरआन की शिक्षाओं और रसूल अल्लाह (स.अ.व.) की सुन्नतों के वफादार हैं। इसके अलावा दूसरी इस्लामी सदी के अंत में सल्फ़ी दृष्टिकोण से प्रभावित वैश्विक दृश्य ने फलसफा, इल्मियाती हुदूद को रूप देना शुरू कर दिया और जल्द ही ये एक मामूल बन गया। (इन्हीं कारणों से मैंने किताब में इसका जिक्र किया है)। मिसाल के तौर पर इस तथ्य से स्पष्ट है कि विभिन्न इस्लामी अध्ययन के संस्थापक या शुरू करने वाले हज़रात ने बतौर बुद्धिजीवी अपने संबंधित जानकारी के लिए, अस्सल्फ़ अस्सलीह के बीच से ही कल्पना और विचार हासिल करने की कोशिश की। इस संदर्भ में इस्लाम के एक प्रमुख विद्वान आई गोल्डज़ीहर ने इस बात पर जोर दिया कि जैसे की सल्फ़ की समानता के लिए, परहेज़ करने वाले पूर्वजों ने जिन्होंने अपनी आदतों और अतवार को नबी करीम (स.अ.व.) की नज़रों के सामने और उनकी सुन्नतों पर अमल कर तश्कील दी थी वह मुत्तक़ी मुसलमानों के लिए आदर्श बन गए। धीरे धीरे सल्फ़ी यानी, एक जो अपने पूर्वजों की नक़ल की और अच्छे समाज में तारीफ के सबसे आला सनद बन गये।

इस्लामी ज़मीर में एक नाकाबिले तब्दील अंसर के तौर पर भी सल्फ़ी दृष्टिकोण ने इस्लामी रवायत के धर्म और अहले हदीस पर आधारित तरीके को स्वीकार करने के लिए तसव्वुराती बुनियाद क़ायम की। साबिक को हक़ीक़ी रवायत पसंदी कहा गया जिसने मिसाली माज़ी और मौजीदा हाल की कशीदगी से मुंसलिक इर्तेक़ा के असरात को बे-असर करने की कोशिश की और बाद में सलफिया, कदीमी और जदीद, जो मुसलसल तब्दीली पर तजदीद करती है। जो इन्हेराफ और बिदअत के सिलसिले में ज़रूरी जब्दीली मानी जाती है। जो सलफ के मिसाली माज़ी वापस लाने के लिए ज़रूरी तसव्वुर किया जाता है (पर मख्सूस मुद्दत के मतालिबात के सिलसिले में कम या आज़ादाना तौर पर वज़ाहत की गयी है)

जैसा कि ये दोनों तरीके सच्चाई के लिए मुकाबला करते हुए एक दूसरे को लगातार चुनौती देते रहते हैं और वर्तमान में भी एक दूसरे को चुनौती देना जारी रखेंगे जो कि मौजूदा दौर के चर्चा में तथाकथित धर्म पर आधारित विद्वानों, खलफ़ या अहले हदीस पर मब्नी उल्मा, सल्फ़ हैं।

सल्फ़ी नज़रिया की कल्पना पहले आधुनिक इस्लामी तफक्कुर में ज़माने और तारीख और वर्तमान से संबंध (और भविष्य) की समझ के लिए सरायत कर गया है। यह कल्पना कुछ हदीसों के अध्ययन से लिए गए हैं यदि फिर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बात की जाए तो जिसमें आप (स.अ.व.) ने कहा कि सर्वश्रेष्ठ लोग आपके समय के थे फिर उसके बाद के समय और उसी तरह उस के बाद के युग के लोग थे सिवाय इसके कि कोई वर्ष या दिन नहीं था जो बाद में आया इससे बदतर था। इस इफहाम और तफहीम के अनुसार कुरआन के मुकाबले में सुन्नत थी, जिसने priori के विचार को थोप कर इस्लामी बसीरत ने सबसे ज़्यादा विशेषता वाली खसलत स्थापना और इतिहास के बारे में कहा जाता है कि ये नागुज़ीर (अवश्यम्भावी) है। इस्लामी बसीरत की तारीख के सबसे ज़्यादा विशेषताओं में से एक मेयार से इंहराफ और आखीर में डिवीज़न का कयाम था।

इसके अलावा, इस सल्फ़ी मानसिकता के अनुसार समय को अपने आप में परिवर्तन का माध्यम और उपकरण कल्पना नहीं किया गया। लेकिन अलतवा की एक मुद्दत, गिरावट और अंधविश्वास और गैर माकूलियत (अतार्किक) तक जाने के बाद फिर से प्रकट होना, फिर अमल होना माना जाता है।

यह सल्फ़ी दृष्टिकोण दोनों धर्म और अहले हदीस पर आधारित फिक्र में वाज़ेह है, इसलिए, सभी उत्तर देने के लिए अतीत को तलाशता है और लगातार खुद को वर्तमान पर लागू करता है। दूसरे शब्दों में मुस्लिम पहचान की सच्चाई को ऐतिहासिक समय के एक निश्चित बिंदु पर लौटने यानी नबी करीम (स.अ.व.) और इब्तेदाई मुस्लिम तब्क़े के ज़माने में ही क़ायम की जा सकती है।

सल्फ़ी दृष्टिकोण पर उपरोक्त चर्चा से हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि कल्पना का आपस में कई जुड़े हुए रुझानों से मुराद है। सबसे पहले, यह इस्लामी परंपराओं की व्याख्या की एक विशेष प्रक्रिया है जो 'अस्सल्फ़ अस्सलीह पर आधारित नहीं माने जाते हैं, उन तरीकेकारों से इसे अलग करना है। दूसरे, यह एक धार्मिक और राजनीतिक दृष्टिकोण है जिसकी मन्शा मोहद्दिसीन के ज़रिए तैयार किए गए तनकीद हदीस के तरीकेकार को सही ठहराने के लिए और जो इब्तेदाई इस्लाम की विशेषता रही सामाजिक राजनीतिक अफरा तफरी में नबी करीम (स.अ.व.) के सभी सहाबियों को आम माफी प्रदान करने की है। अंत में, ये इस्लामी परंपराओं के तसव्वुर की तश्कील करना है जो तारीख और ज़माने के रुजअत पसंद खयालात पर मब्नी है।

खुलासा ये कि सल्फ़ी दृष्टिकोण एक क़ाबिले बहस तसव्वुर है जो कुरान और सुन्नत की तशरीह के एक विशेष तरीके, एक विशेष विश्व दृश्य और इस्लाम की इब्तेदाई तारीख की एक विशिष्ट व्याख्या पर जोर देता है।

डॉ. अदिस दुदरीजा, मेलबर्न विश्वविद्यालय के इस्लामिक स्टडीज़ विभाग में रिसर्च एसोसिएट हैं।

URL for English article:

http://newageislam.com/the-war-within-islam/what-is-salafism?/d/6624

URL for Urdu article: http://www.newageislam.com/urdu-section/what-is-the-salafi-ideology?--سلفی-نظریہ-کیا-ہے؟/d/6709

URL for this article: http://www.newageislam.com/hindi-section/what-is-salafism?--सल्फ़ी-नज़रिया-क्या-है?/d/6749

 

Loading..

Loading..