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Hindi Section ( 17 Sept 2012, NewAgeIslam.Com)

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A Paradigm Shift in Assessing /Evaluating the Value इस्लामी विचारधारा में हदीस के मूल्य और महत्व का आकलन/ मुल्यांकन में आदर्श परिवर्तन: इल्मुल अस्नाद से उसूलुल फिक़्हा तक

 

डाक्टर अदिस दुदरीजा, न्यु एज इस्लाम

मेलबर्न विश्वविद्यालय, इस्लामिक साइंसेज़

20 फरवरी, 2012

(अंग्रेजी से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

यह लेख अरब लॉ त्रैमासिक (Arab Law Quarterly) द्वारा 23 जनवरी, 2009 को इसी शीर्षक से प्रकाशित लेखक के लेख से लिया गया अंश है। इसे हदीस और सुन्नत के शीर्षक पर इसी वेबसाइट पर प्रकाशित मेरे अन्य लेखों के साथ मिलाकर पढ़ना चाहिए।

प्राचीन इस्लामी विचारघारा में कुरान और सुन्नत की बातचीत जैविक रूप से बँटी हुई या सहजीविता के लिए आपस में निर्भर मानी जाती थी, क्योंकि इन दोनों स्रोतों को एकमात्र, एकीकृत और व्याख्यात्मक गठबंधन के रूप में माना जाता था। इसके अलावा ये पाठ के लिहाज से निर्धारित नहीं थे और अक्सर अधिक अमूर्त नैतिक और धार्मिक कल्पना मानी जाती थी, जिसका उद्देश्य समाज को हासिल होने वाले लाभ को आसान बनाना था और नैतिक वास्तविक मूल्यों जैसे कि मारूफ (जो आम तौर पर अच्छा है) और अद्ल (न्याय) के सिद्धांतों के आधार पर समस्याओं को दूर करना था। इस विचार के आधार पर, मैंने किसी अन्य स्थान पर सुन्नत की एक नई पद्धति का प्रस्ताव पेश किया है जो कुरान और सुन्नत के इस समग्र दृष्टिकोण की कल्पना औऱ व्याख्या के अनुसार है।

इस नई पद्धति के अनुसार, मैंने सबसे पहले तर्क दिया कि कुरान की समान रूप से स्वीकार्य व्याख्या की जरूरत के आधार पर, और उसके बाद का प्रस्तावना कि कुरान के संदेश का नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के ज़रिए इसका व्यवहार रूप में प्रकटीकरण इसकी सबसे प्रामाणिक व्याख्याओं (यदि सबसे अधिक नहीं तो) में से एक है। इस व्याख्यात्मक निर्वात को कुरान में बार बार आई सुन्नत की कल्पना 'आज्ञापालन करो अल्लाह और उसके रसूल की' का सहारा लेकर पूरा किया गया था। अरब के इस क्षेत्र में सुन्नत की कल्पना काफी आम थी जिसका अर्थ ज्ञान/ प्रक्रिया का प्रामाणिक स्रोत या अमल किये जाने लायक मानक उदाहरण था। पैग़म्बर (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) की सुन्नत की शब्दावली नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के पहले के समय में होने की संभावना है।

इसके अलावा, मैंने ये दावे के साथ कहा है कि कुरान और सुन्नत वैचारिक रूप से एकजुट और सहजीविता के संबंध में मौजूद थे। इस तरह इनकी संभावना और प्रकृति को समान ही समझा जाता था। दूसरे शब्दों में, वो एक ही सिक्के के दो पहलू के रूप में माने जाते थे। संभावना से मेरा तात्पर्य ये है कि दोनों ने एक ही हद तक पाठ के अतिरिक्त स्रोत के ज्ञान को शामिल किया और प्रकृति से मेरा मतलब है कि वो नैतिकता, कानून, रस्म व रिवाज को शामिल करते हुए खुद को मानव अस्तित्व के आयाम की एक बड़ी संख्या के साथ संबंधित रखा। जैसा कि मैंने ये भी तर्क दिया था कि सुन्नत में चार तत्व शामिल हैं, जो कुरान के संवाद की संभावना और उसके तत्वों को प्रदर्शित करती है, जैसे: आस्था पर आधारित सुन्नत, नैतिकता पर आधारित सुन्नत, कानून पर आधारित सुन्नत और इबादत और अमल पर आधारित सुन्नत।

इस दृष्टिकोण के अनुसार, इबादत और अमल के आयाम के अलावा सुन्नत के सभी घटकों जिसे किसी व्याख्या की आवश्यकता नहीं है और जिसकी निर्भरता लिखित ज्ञान के संचारण पर नहीं है लेकिन अमली तौर पर उसे बनाए रखा गया है, वो व्याख्यात्मक रूप से कुरान से सीधे जुड़ा है।

इसके नतीजे का मतलब है कि सुन्नत पर अमल या कुछ सिद्धांतों, विश्वासों या कार्यों पर अमल की निर्भरता इस पर है कि कुरान की किस तरह व्याख्या की जाती है। इसलिए सुन्नत को कायम करने में सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक तत्व कुरान की व्याख्या संबंधी तरीकों से जुड़ा है, यानी क़ुरान की व्याख्या से संबंधित सवालात, यहाँ तक कि अगर कुरान का शाब्दिक पाठ स्वयं विचारणीय मुद्दे पर खामोश है और खुद ही हदीस को स्थगित नहीं किया है और जिसे या तो मुहद्दिसों या उसूल के विद्वानों के द्वारा जिसकी पुष्टि की गई है। इस तरह ये तरीका सुन्नत के वैचारिक और व्याख्यात्मक संबंध को क़ुरान से बनाए रखता है जो पूर्व प्राचीन इस्लामी विद्वता में स्पष्ट था।

महत्वपूर्ण बात ये है कि सुन्नत/ हदीस की गतिशीलता के बारे में ये दृष्टिकोण और उसूलुल फिक़्हा में इसकी समग्र भूमिका पदानुक्रमित प्राचीन उसूलुल फिक़्हा थ्योरी के साथ विवश नहीं है, जिसका उल्लेख उपरोक्त में किया गया है, जैसा कि ये हदीस साहित्य की केंद्रीय भूमिका को स्थानांतरित कर देता है और साथ ही साथ इजमा के सिद्धांत अधिकांशतः व्याख्या के क्षेत्र को भी तय करता है जिसके तहत क़ुरान और सुन्नत की व्याख्या की जा सकती है।

कुरान और सुन्नत  की नई व्याख्यात्मक संभावना नए व्याख्या मॉडल को पेश कर तैयार किया जा सकता है, जो उदाहरण के लिए गैर शाब्दिक स्रोतों जैसे चेतना, या नैतिक मूल्यों के उद्देश्य के आधार पर आधारित प्रकृति या कुरान और सुन्नत की व्याख्या का संदर्भ पर आधारित दृष्टिकोण या उसूलुल फिक़्हा की थ्योरी में जो विचार उद्देश्यों पर आधारित व्याख्या को प्राथमिकता देता है।

इस्लामी फिक्र में हदीस के अमल और मूल्य की स्थापना में नये मानदंड

अमल और महत्व के संबंध में उपरोक्त में व्यक्त अंतर्दृष्टि इस्लामी विचारधारा और उसूलुल फिक़्हा में हमें किस ओर ले जाती है?

दूसरे भाग में ये दलील दी गयी थी कि इस्नाद और अल-रिजाल पर आधारित हदीस के प्रमाणिकता और इसकी विशवसनीयता जैसा कि मोहद्दिसों ने समर्थन किया है और साथ ही साथ उसूल से जुड़े विद्वानों, इल्मियात से संबंधित हदीस की समीक्षा को व्यवस्थित और बेहतर तरीके से कुरान और सुन्नत की  व्याख्या से संबंधित समस्या को हल करने में असमर्थ हैं। क्योंकि इस प्रक्रिया को चलाने वाले मूल मान्यताओं में प्रक्रिया से संबंधित कमज़ोरियां पहले से शामिल हैं। वास्तव में इस्लामी विचारधारा के पूरे इतिहास के दौरान परस्पर विरोधी या इससे भी आपसी विशेषताओं पर आधारित हदीस के असंगठित प्रयोग (और कुरानी आयात) जो कुरान और सुन्नत के अनुसार होने का दावा या मुसलमान "अन्य" के कुरान और सुन्नत की शिक्षाओं का पालन न होने के इल्ज़ाम, विशेष रूप से शाब्दिक व्याख्या पर आधारित समाज, उदाहरण के लिए जैसा अहले हदीस और मानवीय विचारधारा के द्वारा। तीसरे हिस्से में दी गयी नई पद्धति से ये स्पष्ट हो जाता है कि इस्लामी फिक्र और खासतौर से उसूलुल फिक़्हा में हदीस साहित्य के काम और महत्व को नए मानदंड पर स्थापित किए जाने की आवश्यकता है:

(1) कुरान और सुन्नत के बीच व्याख्यात्मक सहजीवन और आपस में निर्भर करने वाले संबंध को स्वीकार करें, जो इस्लामी फिक्र के शुरुआती समय के दौरान मौजूद था।

(2) सुन्नत और हदीस के बीच वैचारिक और व्याख्या स्वतंत्र संबंध और कुरान और सुन्नत के निहितार्थ जो इस्लामी फिक्र के शुरुआती समय में स्पष्ट था।

(3) उसूलुल फिक़्हा थ्योरी के प्राचीन निर्माण, हदीस की केन्द्रियता वाली कुरान और सुन्नत की उसूलुल फिक़्हा थ्योरी के उपरोक्त विभेद के अस्तित्व को स्वीकार करता है।

(4) ये स्वीकार करता है कि अंतिम विश्लेषण में, इस्लामी फिक्र में हदीस इल्म के कार्य और महत्व के निर्धारण और मूल्यांकन पर समकालीन बहस में पूरी तरह से पुराने उलूमुल हदीस साइंस के सैद्धांतिक इल्मियात के फ़्रेमवर्क और पुराने प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले मोहद्दिसीन की सीमा के अंदर रहना नहीं है (या पश्चिमी और गैर मुस्लिम स्कालरों का इसके तहत काम करना) लेकिन इस आध्यात्मिक बातचीत को कुरान के इल्मियात के मॉडल के विकास यानी उसूलुल फिक़्हा साइंस से जुड़े प्रश्न से संबंधित होने की जरूरत है। इस संदर्भ में हर हदीस का महत्व और मूल्य के निर्धारण और मूल्यांकन का सबसे लाभदायक पूरी तरह से इसकी सच्चाई/ विश्नसनीयता के संबंध में या इसके इल्मियात से संबंधित मूल्य से एक Priori कल्पना नहीं है, लेकिन अब इसके संदेश/ पाठ, कुरान और सुन्नत के व्याख्यात्मक मॉडल के समग्र रूप से व्यापक पदानुक्रम निर्माण पर पूरी तरह से फिट हो जाता है। तो महत्वपूर्ण सवाल या सवालात, इस संदर्भ में ये हैं कि चाहे कोई हदीस पाक इस्नाद है या एक मोतवातिर हदीस है या नहीं, लेकिन बयान करने की क्या विशेषताएं हैं और पद्धति और इल्मियात से संबंधित मान्यताएं जो किसी विशेष आलिम की व्याख्या के अमल से Govern होता है और जो कुरान और सुन्नत के इल्म के संस्थानों की प्रकृति और संभावनाओं की कल्पना और व्याख्या से संबंध रखता है, जो विशेष हदीस को एक विशेष दृष्टिकोण पर चर्चा करने के लिए इस्तेमाल करता है और जो इसकी व्याख्या के अनुसार हदीस इस तर्क में फिट हो जाती है।

 निष्कर्षः

ये लेख एक आदर्श परिवर्तन के लिए तर्क देता है जिसमें इस्लामी फिक्र, खास तौर से इस्लामी कानूनी सिद्धांत में इल्मे हदीस के मूल्य और महत्व (केवल प्रामाणिक और विश्वसनीय के अलावा) का सवाल है। ये बात औऱ भी ज़्यादा दावे के साथ कही गई कि इस्लामी फिक्र में हदीस के किरदार के निर्धारण और मूल्यांकन का पुराना तरीका और अमल एक व्यवस्थित पद्धति प्रदान करने में असमर्थ हैं और इस्लामी साइंस और विशेष रूप से जो इस्लामी कानून और इस्लामी कानूनी सिद्धांत से संबंधित हदीस के ज्ञान की स्पष्ट भूमिका और महत्व की परिभाषा और बयान करेगा (बल्कि फुकहा/ दर्शन/ सूफीवाद)। कुरान और सुन्नत के बारे में बातचीत की प्रकृति और संभावना और उनके आपसी व्याख्यात्मक संबंधों पर आधारित नई पद्धति पर लेखक इस बात को बरकरार रखता है कि हदीस की सत्यता और विश्वसनीयता से संबंधित प्रश्न, इसके काम और महत्व के मामले में दूसरे दर्जे का महत्व रखते हैं और ये कि कुरान और सुन्नत के व्यापक इल्मियाती निर्माण में (यानी जिसमें हदीस शामिल है) और उसके व्याख्यात्मक और पद्धति से सम्बंधित मान्यताएं अधिक महत्वपूर्ण हो जाती हैं। इस तरह हदीस के इल्मियाती मूल्य और महत्व के निर्धारण और मूल्यांकन की ये नई पद्धति उलूमुल हदीस और उलूमुल फिक़्हा के इल्म के क्षेत्रों के संश्लेषण की दावत देता और इसकी जरूरत पर प्रकाश डालता है।

डॉक्टर अदिस दुदरीजा मेलबर्न विश्वविद्यालय के इस्लामिक साइंसेज़ विभाग में रिसर्च एसोसिएट हैं और वो न्यु एज इस्लाम के लिए नियमित रूप से कॉलम लिखते हैं।

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