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Hindi Section ( 18 Sept 2012, NewAgeIslam.Com)

Why Muslim Converts Wear Hijab धर्मान्तरित मुसलमान औरतें हिजाब क्यों पहनती हैं

 

डॉक्टर अदिस दुदरीजा, न्यु एज इस्लाम

इस्लामिक साइंसेज़, मेलबर्न विश्वविद्यालय

(अंग्रेजी से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

सैली नबर अपने लेख "सीक्रेट अन्वील्ड (बेपर्दा राज़)" ("दि ऑस्ट्रेलियन' में प्रकाशित लेख) में हमें एक नौजवान की कहानी बताती हैं जिसने इस्लाम स्वीकार किया है उसका नाम उम्मे ज़ैनब (उसके द्वारा अपनाया गया नया नाम) है, जो नक़ाब पहनती है और नक़ाब पहनना उम्मे ज़ैनब के लिए क्यों "स्वतंत्रता का अनुभव" कराने वाला है। वह रोज़ाना की ज़िंदगी के अनुभव को बयान करती हैं, जिसमें जब उम्मे ज़ैनब की तरह महिलाएं (सिडनी के ला केम्बा नाम के उपनगर की रहने वाली, जहां बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदाय रहता है) घर से बाहर जाने का फैसला करती हैं, तो परिवार में अक्सर जबानी तौर पर बदसुलूकी और तनाव पैदा होता है,

लेखिका और साक्षात्कार करने वाले दोनों ने कई व्याख्यात्मक मान्यताओं के आधार पर कई विवादास्पद बयान इस्लामी परंपराओं में हिजाब के अर्थ और स्थिति के बारे में दिए और शायद जिनसे वे परिचित भी नहीं हैं। जो इन समस्याओं का अध्ययन शैक्षणिक दृष्टि से और बड़ी दिलचस्पी के साथ करता है, उस व्यक्ति के तौर पर मैं इन बयानों को व्यापक इस्लामी परंपरा के प्रकाश में पेश करना चाहूंगा। इससे पहले कि मैं ऐसा करूँ, मैं हाल ही में पश्चिमी मुस्लिम महिलाओं, विशेष रूप से युवा मुस्लिम महिलाओं, नये मुस्लिमों द्वारा हिजाब और नक़ाब पहनने के अमल और इसकी मौजूदगी के संदर्भ को बताना चाहूंगा।

मेरे शोध का हिस्सा होने के नाते मैंने बड़ी संख्या में सुबूत देखे हैं जो संकेत करते हैं कि पश्चिमी मूल की युवा मुसलमान औरतें तेजी से हिजाब और नक़ाब सहित स्पष्ट रूप से इस्लामी लिबास को अपना रही हैं। ये बात आस्ट्रेलिया में रहने वाली मुस्लिम महिलाओं के लिए भी सही है। अध्ययन इस बात की ओर इशारा करते हैं कि पश्चिमी मूल की युवा मुस्लिम महिलाओं के लिए हिजाब पहनना नए पश्चिमी मुस्लिम पहचान के निर्माण में एक निर्णायक भूमिका निभाता है। इन रुझानों को पश्चिमी मुसलमानों की नए आप्रवासियों के धार्मिक अल्पसंख्यक की हैसियत और व्यापक भौगोलिक और राजनीतिक संदर्भों में समझा जा सकता है जो ज़्यादातर धार्मिक आधार पर इन की पहचान का निर्माण करते हैं। पश्चिम मुस्लिम महिलाओं पर किये गये पर्यवेक्षण पर आधारित अनुसंधान हमें बताता है कि मुस्लिम महिलाएं हिजाब या नक़ाब क्यों अपनाती हैं, इसके कई कारण हैं। इनमें आनुवंशिक जातीय संस्कृति के विरोध से लेकर बहिष्कार की जातीय बातचीत तक, इसे राजनीतिक विरोध (आमतौर पर राजनीतिक इस्लाम के रूप में) पहनने से लेकर नैतिक पवित्रता के संकेत तक, धार्मिक पहचान के लिए मजबूत संकल्प के संकेत से लेकर बेगाने, संभावित तौर पर धमकाने वाले माहौल में सुरक्षा के एक उपकरण के रूप में और साथ ही इसके कई और दूसरे कारण हैं।

सैली नेबर अपने लेख में हमें कई घटनाओं से जोड़ती हैं जिसमें लाकीम्बा की सड़कों पर उम्मे ज़ैनब और गैर मुस्लिम लोगों के बीच तनाव बढ़ता है। ये लेख की लेखिका के लिए कोई आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि ये बहुत से पश्चिमी देशों में हो चुकी अनुसंधान की ही पुष्टि करती हैं (जैसे कि अमेरिका, कनाडा और पश्चिमी यूरोप) जो कुछ पश्चिमी मुसलमानों के बीच कई धार्मिक प्रथाओं के कारण के रूप में पहचान की जाती है और जो मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों और गैर मुसलमानों के बीच भेदभाव पैदा करने की भावना के लिए जिम्मेदार है और जो कुछ मुसलमानों विशेष रूप से कुछ मुस्लिम महिलाओं के व्यापक रूप से पश्चिमी समाज में योगदान और मुसलमानों और गैर मुसलमान वर्गों के बीच वार्तालाप में रुकावट पैदा करता है (मैं ये नहीं कह रहा हूँ कोई भी पश्चिमी अमल ऐसा नहीं है जो ऐसा ही करता हो, लेकिन यहाँ मेरी मुराद मुस्लिम तरीके नहीं हैं)। हिजाब या नक़ाब पहनने के अमल के अलावा कुछ मुस्लिम वर्ग में पहले से ही मौजूद अमल जैसे के समानान्तर शैक्षिक प्रणाली के रूप में कम समय में तेजी से पनप आए मुस्लिम निजी स्कूल, जल्दी शादी के द्वारा महिलाओं पर यौन रेगूलेशन और मुस्लिम महिलाओं पर मर्दों और औरतों के मिले जुले रोज़गार वाले स्थानों पर काम करने के लिए हतोत्साहित करने के दबाव (इसके परिणामस्वरूप उनका अपने परिवार के पुरुष सदस्यों जैसे पिता, पति या भाइयों पर पूरी तरह निर्भरता होती है) का भी उल्लेख होता है। उम्मे ज़ैनब का दावा है कि उनका हिजाब पहनना सलफ़ के अमल (या मुसलमानों की पहली तीन पीढ़ियों) पर आधारित है और पैगंबर मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की बीवियों ने इस अमल को अपनाया था और जैसा कि उसकी इच्छा है कि वो एक रोल माडल (आदर्श) के उनकी तक़लीद (अनुसरण) करना चाहती है। सैली नेबर ये भी कहती हैं कि, ये महिलाएं "कुरान के शुद्ध और शाब्दिक अर्थ को मानती हैं और जो ऐलान करता है कि, 'अपनी बीवियों, बेटियों और मोमिनों की औरतों से कह दो कि जेयूबहन्ना को ढंके रहा करें, ये एक ऐसा शब्द है जिसका मतलब शरीर, चेहरा, गर्दन और सीना है।

आइए इन दावों की वैधता की जाँच करें। मुस्लिम इतिहास में हाल फिलहाल तक विभिन्न मुस्लिम राजनीतिक व धार्मिक समूहों की एक बड़ी संख्या ने सल्फ़ या अलसल्फ़ अलसालेह के अनुयायियों ने इस वाक्य का इस्तेमाल दूसरे मुसलमानों के दावों को अवैध करार देने और अपने विचारों को ज़हननशीं कराने और इस्लामी शिक्षाओं, यानी क़ुरान और सुन्नत के मुख्य स्रोत के "शुद्ध" और बे मेल शिक्षा के एकमात्र संरक्षक होने के उनके दावे पर आधारित कानूनी वैधता प्रदान करना था। इनमें सबसे आगे तथाकथित औऱ खुद को सल्फ़ी या अहले हदीस मुसलमान हैं। कुरान और सुन्नत की व्याख्या का उनका दृष्टिकोण, जिसे मैंने अपने एक प्रकाशन में शामिल किया है, उनमें प्रणाली सम्बंधी कमियों और ज्ञानमीमांसा से संबंधित कमजोर तर्क में दिखाये गए हैं, इन दोनों स्रोतों का पूरी तरह से शाब्दिक और बिना किसी संदर्भ की समझ के आधार पर व्याख्या की जाती है। इसके अलावा, जैसा कि मैंने अपने आनर्स की थीसिस में बताया है कि, अहले हदीस या सल्फ़ी 'किस तरह सुन्नत के विचार (या नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की व्याख्या या कुरान शिक्षा के व्यवहारिक प्रदर्शन) और उसके प्रकार और उसे समझने के सिलसिले में अपने को अलसल्फ़ अलसालेह के पैरोकार होने का दावा करते हैं और जैसा कि उम्मे ज़ैनब और जिन लोगों की क्लास में वह हाज़िर रहती हैं, वो खयाली ताबीर से अधिक कुछ भी नहीं है, क्योंकि वो सुन्नत के विचार के बिगड़े और गलत समझ के साथ चिपके हुए हैं, जैसा कि (जिसकी संभावना सबसे अधिक है) पहली तीन पीढ़ियों के मुसलमानों ने समझा था। कुरान का वो पाठ (जिसका उल्लेख इस लेख में नहीं है) जो नबी करीम नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की बीवियों को नकाब पहनने की दलील के रूप में प्रयोग किया जाता है, वो सूरे नंबर 33 और आयत नंबर 53 में पाया जाता है। ये आयत मर्दों को निर्देश देती है जब आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के बीवियों से बात करना चाहते हैं तो (हिजाब) पर्दे के पीछे से ऐसा करें क्योंकि ये उनके दिलों के लिए और नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की महिलाओं के लिए पाक साफ है। सबसे पहले ये कि इस आयत में शब्द नक़ाब नहीं हिजाब इस्तेमाल किया गया है जिसका इस संदर्भ में मतलब पर्दे से है।

दूसरे, मुस्लिम समाजी और शैक्षिक मामलों की मशहूर विशेषज्ञ फ़ातिमा मरनस्सी ने अपनी किताब "दि वेल एंड द मेल इलीट" (परसियूस बुक 1991) में स्पष्ट रूप से कहा है कि कुरान की इस आयात का नुज़ूल (अवतरण) एक मर्द और एक औरत नहीं बल्कि दो मर्दों के बीच रुकावट डालने के लिए हुआ है। उदाहरण के लिए पारंपरिक पाठ के अनुसार इस वही के नुज़ूल के पीछे की पृष्ठभूमि, शादीशुदा जोड़े के आराम की जगह है (यानी नबी करीम मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम और उनकी पत्नी हज़रत ज़ैनब रज़ियल्लाहू अन्हा) जो अपनी गहरी अंतरंगता की रक्षा करना चाहते हैं और तीसरे व्यक्ति (एक व्यक्ति जिनका नाम हज़रत अनस इब्ने मलिक है जो नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के सहाबा में से हैं) को अपने बीच से हटाना चाहते हैं। संक्षेप में पारंपरिक घटना (हदीस के रूप में कई संस्करणों के साथ) के अनुसार वही के नाज़िल होने के पीछे मौका ये है कि शादी की रात नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम खुद को कई बेअक़्ल मेहमानों से जो शादी की रात खाने के दौरान बातचीत में खो गए हुए थे जबकि आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम शादी की पहली रात हज़रत ज़ैनब रज़ि. के साथ अकेले रहना चाहते थे। परोक्ष रूप से पुरुषों को व्यक्त करने के लिए कई प्रयासों के बाद कि ये समय है कि वो लोग उनके घर से निकल कर आंगन में चले जाएं, इस घटना के गवाह हज़रत अनस इब्ने मलिक के अनुसार, नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने सवाल के रूप में इस आयत को पढ़ा। नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के इस आयत के पढ़ने के बाद आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अपने (और अपनी बीवी) और हज़रत अनस रज़ियल्लाहू अन्हू के बीच पर्दा खींच दिया (हदीस इस शब्द के विकल्प हिजाब का उपयोग करता है जिसका अर्थ पर्दा है)। ये स्पष्ट नहीं है कि कैसे इस आयत का मतलब महिलाओं को नक़ाब पहनने की जरूरत के रूप में समझा जा सकता है।

पाठक की भी ये प्रतिक्रिया है कि कुरानी आयत जिसका उल्लेख उपरोक्त में किया गया वो नक़ाब और हिजाब को अपनाने के लिए मुसलमान महिलाओं के लिए तर्क के रूप में प्रयोग किया जाता है और मोमिन महिलाओं को न सिर्फ हिजाब (सिर को ढँकने) बल्कि नक़ाब (चेहरे का पर्दा) करने की ज़रूरत है। ये इस भूमिका पर आधारित है कि "कुरान के शुद्ध और शाब्दिक अध्ययन से प्रभावी शब्द "जयूबेहिन्ना" जैसा कि नेबर इसे पेश करती हैं (निस्संदेह उसके और शायद उम्मे ज़ैनब द्वारा न केवल कुरान अरबी बल्कि फ़िक़्ही बहस की पेचीगदी और पिछले वर्गों के द्वारा इस आयत और संबंधित शब्द पर पेश की गई राय के बारे में मानसिक रूप से गहरी अशिक्षा पर आधारित है) जिसका न सिर्फ औरतों के बालों बल्कि शरीर, चेहरा, गर्दन, सीना को पूरी तरह से ढकने से कम कोई मतलब नहीं है। वो लोग जो इस्लामी परंपरा बेहतर ज्ञान रखते है जैसे प्रोफेसर खालिद अबुल फज़्ल, जो एक प्रसिद्ध समकालीन इस्लामी कानून दां हैं, उन्होंने सऊदी अरब से आने वाले ऐसे कुरान के कई अनुवादों में बौध्दिक बेईमानी को उजागर किया है, जिन्हें पेट्रोडालर की वित्तीय सहायता प्राप्त हुई है, उदाहरण के लिए जैसे मदीना विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर के सह लेखन वाले अनुवाद को स्वर्गीय अब्दुल अज़ीज़ बिन बाज़ से पुष्टि और मान्यता प्राप्त हुई है जो इस्लामिक रिसर्च, कानूनी राय, प्रचार और मार्गदर्शन के मंत्रालय के प्रमुख रहे हैं और जबकि उन्हें अंग्रेज़ी का एक शब्द भी नहीं आता था।

 प्रोफेसर अलफज़्ल इसे ट्रोजन हार्स (Trojan Horse)  अनुवाद कहते हैं। ये कई मुस्लिम पुस्तकलायों में और अंग्रेजी बोलने वाले बहुत से इस्लामी केन्द्रों पर उपलब्ध हैं। अनुवाद का शीर्षक है:

"Interpretation of the Meanings of the Noble Qur'an in the English Language: A Summarised Version of At-Tabari, al-Qurtubi and Ibn Kathir With Comments from Sahih al-Bukhari in One Volume."

ऐसे बहुत से मुसलमान है, लेकिन विशेष रूप से केवल वो लोग नहीं जो इस्लाम में नए दाखिल हुए हैं, जो कुरान के अरबी से नावाकफियत के कारण कुरान के मतलब को समझने के लिए और इनके जैसे दूसरे अनुवादों पर निर्भर और भरोसा करते हैं।

अपनी किताब "The Conference of the Books "The Search for Beauty in Islam" (University of America Press, 2001)" में प्रोफेसर अलफ़ज़्ल ने कुरानी अरबी पाठ के अर्थ के साथ ऊपर वर्णित किये गये कुरान के अनुवाद में (कोष्ठक में वाक्य  के द्वारा) हस्तक्षेप को उजागर किया है जिसका उद्देश्य कुरानी पाठ/ आयतों के विवरण और अर्थ की व्याख्या के लिए इस्तेमाल था। लेख में संदर्भ के रूप में दी गई क़ुरानी आयत सूरे अल-अहज़ाब (33) आयत 59 में पाई जाती है। उपरोक्त में चर्चा किए गए और सऊदी अरब में किया गया अनुवाद निम्नलिखित है: ऐ नबी! अपनी बीवियों और अपनी बेटियों और मुसलमानों की औरतों से कह दे दें कि (बाहर निकलते वक्त) अपनी चादरें (पर्दे) अपने ऊपर ओढ़ लिया करें (यानी खुद को पूरी तरह सिवाय रास्ता देखने के लिए आँखों या एक आँख को ढँक लेना चाहिए) ये इस बात के क़रीब है कि वो पहचान ली जाएँ (कि ये पाक दामन आज़ाद औरतें हैं) फिर उन्हें (आवारा बांदिाँयाँ समझ कर गल्ती से) ऐज़ा (कष्ट) न दी जाए, और अल्लाह बड़ा बख्शने वाला और बड़ा रहम करने कहा वाला है।" इस अनुवाद पर अलफ़ज़्ल की व्याख्या निम्नलिखित है; " लेखकों का दावा है कि खुदा का हुक्म है कि महिलाएं खुद को एक बड़े पर्दे में और एक या दोनों आँखों के अलावा उन्हें सब कुछ ढँक लेना चाहिए। लेखकों ने जानबूझ कर एक चादर को पर्दा के बराबर बताया है और उनके अनुसार, खुदा ने स्पष्ट रूप से हुक्म दिया है कि औरत के पूरे शरीर पर चादर या पर्दा होना चाहिए। "प्रोफेसर अलफ़ज़् का ये भी कहना है कि आयत का शाब्दिक और रूढ़िवादी अर्थ आयत को इस तरह पेश करेगा,  "ऐ नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम, अपनी बीवियों और अपनी बेटियों और मोमिनों की औरतों से कह दो वो अपने कपड़े को नीचा कर लें (संभव है, खुद पर डाल लें)। ये बेहतर है कि वो न पहचानी जाएंगी या ऐजा (कष्ट) दी जाएंगी। और खुदा बख्शने वाला और मेहरबान है। इस आयत में प्रभावी शब्द युदनीना अलैहिन्ना मिन जलबीबेहिन्ना' है। प्रोफेसर अलफ़ज़्ल के अनुसार इसका या तो "अपने कपड़े को नीचा कर लें" या "अपने शरीर को कपड़े से ढँक लें" मतलब हो सकता है। जलबीबेहिन्ना के शाब्दिक अर्थ उनके कपड़े के हैं, इसका अर्थ पर्दा नहीं है। जलबाब एक लिबास है जो अरब के लोगों की पोशाक है। चादर (ईरान और इराक मैं बहुत सी औरतें इसे पहनती हैं) या एबाया (सऊदी अरब में पहना जाता है) कपड़े का एक टुकड़ा है, और अलफ़ज़्ल के अनुसार जलबाब के रूप में नहीं माना जाएगा।

युदनीना का मतलब कपड़े को नीचे करने से है। अलफ़ज़्ल के अनुसार इस आयत की व्याख्या इस तरह की जा सकती है जिसमें पैरों के पर्दे और धड़ के पर्दे या सिर्फ शर्म और हया हो सकता है, लेकिन इस अनुवाद का समर्थन नहीं किया जा सकता है जिसे मदीना के प्रोफेसर ने किया है और जो एक या दोनों आंखों और हाथों के अलावा सब कुछ ढँकने की जरूरत बताई जाती है इस आयत के अर्थ पर अलग अलग विचार हैं और जो शुरुआती दौर के मुस्लिम फुकहा के पाये जाने वाले विचारों में देखा जा सकता है। कुछ लोगों का दावा है कि ये आयत पैरों और सीना का पर्दा करने का आदेश देती है। जबकि बहुमत का कहना है कि चेहरे, हाथ और पैरों के अलावा पूरे शरीर का पर्दा किए जाने की जरूरत है। एक विद्वानों के एक अल्पसंख्यक वर्ग की राय ये है कि महिलाओं को चेहरे का भी पर्दा करना चाहिए। लेकिन वो हदीस जिस पर इन विचारों का आधार है उनमें निरंतरता नहीं है। महत्वपूर्ण बात ये है कि, लगभग सभी तिप्पणी करने वाले सहमत हैं कि इस आयत का नुज़ूल महिलाओं की ज़बानी/ शारीरिक शोषण से रक्षा करना था क्योंकि मदीना मुनव्वरा में युवा और भ्रष्ट पुरुषों का एक वर्ग था जो रात के समय महिलाओं को परेशान करता और उनके साथ छेड़छाड़ करता था। ये लोग आमतौर से गुलाम महिलाओं को निशाना बनाना चाहते थे न कि आज़ाद औरतों को। जलबाब पहने हुई महिलाएं आज़ाद औरते कल्पना की जाती थी जबकि बिना जलबाब पहने गुलाम महिलाओं को ये अपना वैध लक्ष्य मानते थे। इसलिए  मोफस्सिरीन के एक अल्पसंख्यक वर्ग की राय ये है कि वही के नुज़ूल के पीछे कारण आज़ाद और गुलाम महिलाओं के बीच अंतर करने के लिए था (7वीं शताब्दी का अरब समाज और अर्थव्यवस्था गुलामों के मालिकों की थी)। इसलिए आयत की इस पर कोई मजहबी ताबीर नहीं और ये किसी धार्मिक दायित्व की ओर इशारा नहीं करती है।

एक और आयत (सूरे 24 आयत 31) जिसका उल्लेख लेख में नहीं किया गया है, इसके अर्थ के अनुवाद में इन्हीं लेखक के द्वारा हस्तक्षेप की जा चुकी है। पिछली आयत की ही तरह इसमें भी उसी तकनीक (कोष्ठक में वाक्य या शब्द) का उपयोग करते हुए, अनुवादकों ने इस प्रकार आयत का अनुवाद किया है। ...... और मोमिन औरतों से कह दें कि वो (भी) अपनी निगाहें नीची (हराम चीज़ों से हटाकर) रखा करें और अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त किया करें (अवैध यौन संबंधों आदि से) और अपनी आराइस व ज़ेबाईश (सुन्दरता और शोभा) को ज़ाहिर न किया करें सिवाय (हथेलियों,  रास्ता देखने के लिए ज़रूरी एक या दोनों आँख और बाहरी कपड़े जैसे पर्दा, दस्ताने, ऐप्रन) के जो उसमें से खुद दिखाई देता है और पर्दा को वो पूरे जेयुबेहिन्ना (शरीर, चेहरा, गर्दन और सीना आदि) पर डाले रखें और अपने बनाओ सिंगार को (किसी पर) ज़ाहिर न किया करें सिवाय अपने शौहर के या अपने बाप दादा के ..... लेकिन अलफ़ज़्ल के मुताबिक आयत का शाब्दिक और अधिक ईमानदाराना अनुवाद निम्नलिखित होगा: और मोमिन औरतों से कह दें कि अपनी नज़रें नीची रखा करें और अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त करें, और जो खुद से ज़ाहिर होता है सिवाय उसके अपने ज़ेब व ज़ीनत को जाहिर नहीं करना चाहिए। और इन लोगों को अपने सीना पर पर्दा डालना चाहिए और इन लोगों को अपने शौहर के अलावा किसी के सामने हुस्न न जमाल को उजागर नहीं करना चाहिए........

प्रभावी शब्द खेमार और जोयूब हैं। कुरान औरतों को निर्देश देता है, वलयुदरिब्ना बेखमरेहिन्ना अला जोयूबेहिन्ना' जिसका अर्थ इन लोगों को अपना खेमार लेना चाहिए और अपने सीना पर रखना चाहिए। लेसानुल अरब के प्रमाणिक शब्दकोश के अनुसार खमर कपड़े का वो टुकड़ा है जिसे पगड़ी के रूप में पुरुष या महिलाएं सिर पर पहनती हैं। जोयूब किसी व्यक्ति की छाती होती है। इस्लामी फिक्हा (धर्मशास्त्र) के अनुसार खेमार इस्लाम के पहले के युग में महिलाएं पहनती थीं और इसके एक हिस्से को पीछे की (पीठ की तरफ) की ओर पारंपरिक रूप से रखती थीं जिससे सिर और सीना दिखाई देता था। इस तरह अलफ़ज़्ल की दलील है कि आयत निर्देश देती है कि सिर और गर्दन में आम तौर पर पहने जाने वाले एक कपड़े के टुकड़े (खेमार) को सीना को ढँकने के लिए किया जाना चाहिए।

महत्वपूर्ण बात ये है कुरान के टीकाकारों ने बार बार मक्का और मदीना में महिलाओं के, यहाँ तक कि अगर उनके बाल ढँके हैं तब भी अपने सीने के पूरे या अधिकांश हिस्से को बेपर्दा करने की आदत पर प्रकाश डाला है। इसके आधार पर इस आयत की व्याख्या की जा सकती है कि आयत में महिलाओं को अपने सीने को पर्दे से ढँकने को कहा है। लेकिन शब्द खेमार की व्याख्या कभी भी चेहरा और/ या हाथों के पर्दे के बारे में मांग करने के लिए नहीं किया जा सकता है। कुरानी आयत किसी भी तरह चेहरे का हवाला नहीं देती हैं। अनुवादक ने हेकायत (हदीस) के रूप में अतिरिक्त कुरानी सुबूत का सहारा लिया जिनके बारे में कहा जाता है कि वो नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के ज़माने से संबंध रखती थीं जो हदीस के प्रसिद्ध संकनकर्त्ता इमाम बुखारी के संग्रह में पाया जाता है (वाल्यूम 6, नंबर 282) जिसमें पैगंबर मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के पत्नी हज़रत आइशा रज़ियल्लाहू अन्हा के हवाले से गल्ती से ये अनुवाद किया गया है कि कुरानी आयत 24:31 के नाज़िल होने के बाद महिलाओं ने अपने कपड़े में से एक टकटा फाड़ लिया और उसे खेमार के रूप में पहना था। इसी हदीस के दूसरे संस्करण में बताया गया है कि केवल मक्का की शरणार्थी महिलाएं (जो धार्मिक रूप से सताए जाने के बाद मदीना में शरण लेने के लिए आईं थीं) इस पर तुरंत अमल किया जबकि दूसरे संस्करण के अनुसार मदीना की महिलाओं ने इस पर तुरंत अमल किया था। बहरहाल जो भी मामला रहा हो, ज़्यादातर लोग इस कहानी से जो परिणाम निकाल सकते हैं वो ये कि महिलाओं ने अपने सिरों को ढाँका था न कि चेहरों को। जैसा कि उम्मे ज़ैनब नक़ाब न पहनने को "धर्म के साथ समझौता" मतलब लेती हैं जबकि इसका उससे कोई लेना देना नहीं है। नक़ाब ने इस्लामी परंपरा के साथ कभी समझौता नहीं किया है क्योंकि ये इस्लाम का आवश्यक हिस्सा कभी नहीं रहा है!

ये समझना बहुत महत्वपूर्ण है, जैसा कि मैंने कहीं और कहा है कि किसी भी चीज़ को कुरान और सुन्नत की शिक्षा के अनुसार मानने के लिए संदर्भों के अलावा कई अन्य व्याख्यात्मक बातों पर भी विचार करने की जरूरत होती है, उदाहरण के लिएः व्याख्या करने वाला कैसे व्याख्या में चेतना की भूमिका और संभावनाओं को देखता है, अर्थ ग्रहण करने में व्याख्यात्मक प्रक्रिया, इन शिक्षाओं के सामाजिक, सांस्कृतिक पहलुओं और वौश्विक पहलुओं के बीच विभेद है या नहीं, नैतिकता और कानून और कई अन्य दृष्टिकोणों के बीच गतिशीलता की प्रकृति के बारे में अनुवादक की मान्यता क्या है! ये भी ध्यान देने योग्य है कि जो लोग नक़ाब पहनने को इस्लामी अमल होने की वकालत करते हैं, वो लोग लैंगिक आधार पर अलग रहने,  महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह से अलग थलग रखने (जिसमें इस हास्यास्पद नियम के कि जो लैंगिक रूप से मर्दों और औरतों के मिले जुले मजमें में महिलाओं की आवाज न पहुंचने की दलील देता है और जिसे मुस्लिम मर्दों के यौन उत्प्रेरणा देने वाली माना जाता है) और या औरतों के अपने शौहर की इच्छा पर पूरी निर्भरता जो अपनी बीवी को उसके माँ बाप के अंतिम संस्कार में भाग लेने से भी मना कर सकता है। उदाहरण के लिए, जैसा कि मैंने कहीं और तर्क दिया है कि इन तरीकों के समर्थक मुस्लिम महिलाओं की मानक छवि को खराब कर देते हैं और जिसे कई बार बिना किसी आपत्ति के इस्लामी होने के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है।

नक़ाब पर उम्मे ज़ैनब और उसके जैसे ही विचारों को मानने वालों से कोई भी वैध रूप से ये सवाल पूछ सकता है कि वो क्यों इस आदेश को नहीं मानती हैं। लेकिन, ये हमें हमारे लेख के मुख्य बिंदु से दूर ले जाएगा। हमें ये समझने की जरूरत है कि ये सभी विचार एक विशेष शैली की महिलाओं के यौन दृष्टिकोण पर आधारित हैं जो कुछ हदीसों (जिनमें से अधिकांश को मुख्य धारा में शामिल पारंपरिक हदीस के टिप्पणीकर्त्ता कमज़ोर स्तर की मानते हैं लेकिन इसके बावजूद नैतिकता और फिक्हा के मामलों पर न केवल उम्मे ज़ैनब के जैसे सल्फ़ी दिमाग रखने वाले मुसलमान बल्कि अन्य मुसलमान भी इसे सबूत के रूप में मानते हैं) में मिलती हैं, जो महिलाओं को नैतिक और सामाजिक अव्यवस्था के स्रोत मानते हैं, अगर वो सार्वजनिक स्थानों पर नज़र आ जाती हैं, क्योंकि उनके शरीर मुख्य रूप से यौन मामलों में बिगाड़ पैदा करने वाले होते हैं। ये विचार कुरान और सुन्नत की शिक्षाओं पर आधारित नहीं हैं। यह गहराई तक पुरुष प्रधान सोच और महिलाओं से नफरत करने वाले समाज के अवशेष हैं जो वही के नाज़िल होने के समय मौजूद थे और जिसके लुभावने तत्वों को आंशिक रूप से समाप्त और महिलाओं से नफरत की तीव्रता को कुरान और पैगंबर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की सुन्नत से कम किया गया। ये इस अर्थ में विडंबना है कि उम्मे ज़ैनब मुस्लिम आप्रवासी महिलाओं पर आरोप लगाते हुए कहती हैं कि मूल कारण ये है कि वो इसलिए हिजाब नहीं पहनती है क्योंकि इन लोगों को "डराया" जाता है और ये कि आप्रवासी मुसलमान औरतों के विपरीत नौ मुस्लिमों के लिए ऐसा करना "सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण" नहीं है। लेकिन उम्मे ज़ैनब को इसका बिल्कुल भी एहसास नहीं है कि वो नक़ाब पहनने का चयन करके स्वयं फारस में 8वीं और 9वीं सदी में लोकप्रिय सांस्कृतिक प्रक्रिया को जीवित कर रही हैं, क्योंकि यही वो समय था जब सामाज के उच्च वर्ग की मुसलमान महिलाओं ने नक़ाब पहनने की परंपरा को अपनाया था!

उम्मे ज़ैनब ये भी कहती हैं कि नक़ाब पहनने से "आज़ादी का अनुभव" होता है क्योंकि इसको पहनने के बाद लोग आपको न तो आपके शरीर और न ही आपकी सुंदरता बल्कि आपको वैसे ही लेने लगते हैं जैसे कि आप हैं।" लेकिन इस पर कोई भी हैरान हुए बिना नहीं रह सकता है कि किस तरह वो विचार जो महिलाओं के पूरी तरह गुमनामी, उनकी आवाज को खत्म करने और सार्वजनिक जीवन और निर्णय के सभी काम में उनकी उपस्थिति को पूरी तरह हटाने की वकालत करता हो वो कैसे आज़ादी के तौर पर देखा जा सकता है। हालांकि मैं ये प्रस्ताव नहीं दे रहा हूँ कि उम्मे ज़ैनब ने जिस उपभोक्तावादी संस्कृति का हवाला दिया है वो किसी भी तरह बेहतर है। वास्तव में दोनों महिलाओं के दृष्टिकोण महिलाओं के शरीर की अधिक बढ़ा चढ़ा कर पेश की गयी कामुकता और यौन क्षमता की भूमिका पर आधारित हैं।

लेकिन, उम्मे ज़ैनब और रिपोर्टर सैली नेबर के द्वारा प्रस्तुत किए गए विचार यूँ ही नहीं हैं! इस तरह के संकीर्ण विचार का स्रोत और प्रचार की प्रक्रिया उन लोगों में पायी जाती है जिनके इस्लामी क्लास में उम्मे ज़ैनब और कई अन्य लोग शामिल होते हैं। हालांकि इस्लामी परंपरा ने हमेशा एक विशेष विषय पर विभिन्न कथनों और विचारों की एक बड़ी संख्या को अपने में शामिल किया है, समस्या ये है कि वो  लोग जो उम्मे ज़ैनब के जैसे नये मुसलमानों को शिक्षा देते हैं,  वो अपने विचारों को वास्तविक अर्थों मेंने में सही इस्लामी शिक्षाओं के रूप में पेश करते हैं। वो लोग इस्लामी परंपरा के विभिन्न आयामों को सामने नहीं रखते हैं ताकि वे बेहतर निर्णय करने की स्थिति में हों। ये हटधर्मिता से कम कुछ भी नहीं है! ये हर मुसलमान की जिम्मेदारी है कि वो मुसलमानों की समस्याओं पर होने वाली बातचीत और बहस में अपनी आवाज को शामिल करे ताकि इस्लामी परंपरा की विविधता और उसका नैतिक सौंदर्य बाहर आ सके। पश्चिमी और गैर पश्चिमी मुस्लिम विद्वानों की एक बड़ी संख्या पहले ही ऐसा कर चुकी है, लेकिन कुछ मुसलमान इससे आगाह होते हैं (उदाहरण के लिए देखें, ओ. सफ़ी क प्रोग्रेसिव मुसलमान, वन वर्ल्ड, 2003) ये हर एक मुसलमान की जिम्मेदारी है कि वो मुसलमानों के बीच मौजूद तनाव को कम करने के लिए जो भी बेहतर हो सकता है वो करे और अपनी धार्मिक पहचान के खोने या इसके साथ समझौता किए बिना वो अर्थपूर्ण बातचीत और व्यापक समाज में भाग ले ताकि इस्लामी नैतिकता की खूबसूरती को ज़ाहिर कर सकें। ऐसा क्यों नहीं हो सकता, जबकि इसमें कोई धार्मिक रुकावट नहीं है!

डॉक्टर अदिस दुदरीजा मेलबर्न विश्वविद्यालय के इस्लामिक साइंसेज़ विभाग में रिसर्च एसोसिएट हैं और वो न्यु एज इस्लाम के लिए नियमित रूप से कॉलम लिखते हैं।

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