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Hindi Section ( 9 Sept 2012, NewAgeIslam.Com)

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The Relationship between the Muslim Religious Self and the Religious Other मुसलमान और अन्य धार्मिक लोगों के बीच संबंध

 

डाक्टर अदिस दुदरीजा, न्यु एज इस्लाम

3 मार्च, 2012

(अंग्रेजी से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

ये 2010 में प्रकाशित एक लेख का हिस्सा है जो यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं:

http://web.ysu.edu/gen/class_generated_bin/documents/basic_module/SCI_1012.pdf#page=93

विशेष रूप से मदीना की अवधि में जब अपनी और अन्य लोगों की पहचान का सवाल पैदा हुआ, तब ऐसे में मुसलमानों और अन्य धार्मिक लोगों के बीच मानक संबंधों को समझने के लिए वही के नाज़िल होने के माहौल को समझने की जरूरत पड़ी जिसमें कुरानी वही के नाज़िल होने और नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के द्वारा इसका व्यवहारिक प्रकटीकरण हुआ। ये इसलिए ज़रूरी है क्योंकि ये मुख्य रूप से मदीना मुनव्वरा में हुआ था और इसलिए पैगंबर मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का संदेश और मुस्लिम पहचान को लेकर लोग खुद के प्रति अधिक सजग हो गये थे। लेकिन ये नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम और प्रारंभिक मुस्लिम समुदाय का मदीना मॉडल था कि बहुत से मुसलमानों ने इसे कई मायनों में अन्य (धार्मिक) लोगों के साथ संबंधों सहित इसका अनुकरण करने के बारे में सोच विचार किया। इसके अतिरिक्त, कुरान की विषय वस्तु का सरसरी तौर पर जायज़ा भी (और इसलिए, नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की विरासत का) मूल रूप से इस संदर्भ से जुड़ा था, विशेष रूप से कुरान की विषय वस्तु का वो आयाम जो मुसलमानों और अन्य धार्मिक लोगों के बीच संबंधों को बयान करने वाली थीं।

इसे समझने की कोशिश में कई साधारण बातों पर विचार करने की ज़रूरत है। धार्मिक दृष्टिकोण से खुद की और अन्य लोगों की पहचान की कल्पना जैसा कि नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के ज़माने में कुरान और पैगंबर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के द्वारा व्यवहारिक प्रकटीकरण की रोशनी में समझा गया था।

प्रथम, पैगंबर मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का संदेश पहले से स्थापित धार्मिक वर्गों के संदर्भ में सामने आया, इसमें इस्लाम से पहले की मूर्ति पूजा के अलावा सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण यहूदीवाद, ईसाईयत और हनीफिया था। कुरान स्वयं ही अन्य गैर मुस्लिमों के प्रति मुसलमान वर्ग के रवैय्ये की कई मिसालें बयान करता है।

दूसरा, अन्य गैर मुस्लिमों के बारे में कुरान का दृष्टिकोण, (और मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का व्यवहार) स्वाभाव में बहुत संदर्भ वाला है, और इसलिए, संभावित रूप से दो भावनाओं वाला है। इसके अलावा मुस्लिम वर्ग के प्रारंभिक अवधि के दौरान के अधिकांश भाग में, मदीना में धार्मिक/ इकबालिया पहचान बनाने के संबंध में राजनीतिक और फ़िक़्ही (धर्मशास्त्रीय)/ धार्मिक दुश्मनी का माहौल और मुसलमानों के बीच दुश्मनी का माहौल एक तरफ जारी था और मुशरिकीन, बड़ी संख्या में यहूदी जनजाति, ईसाई और मुनाफिकीन दूसरी ओर प्रबल थे। इन परिस्थितियों के तहत मुसलमानों को अपने नये स्थापित धार्मिक वर्ग के अस्तित्व के बारे में लगातार चिंता थी। इन सभी कारकों को एक साथ मिलाकर कहा जा सकता है कि इनके कारण उस ज़माने के मुसलमानों (साथ ही साथ विभिन्न गैर मुस्लिम समूहों) ने अन्य धार्मिक लोगों के संबंध में अक्सर प्रतिक्रियावादी व्यवहार और साथ ही साथ दुश्मनों वाला रुख़ धारण किया। उदाहरण के लिए, वाट ने मुसलमानों और गैर मुसलमानों के बीच संबंध की स्थिति और उनके पीछे के कारकों, विशेष रूप से पैग़म्बरे इस्लाम और मदीना के यहूदियों के बीच सम्बंधों को स्पष्ट किया है:

मदीना में पैगंबर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के शुरुआती दो वर्षों के दौरान यहूदी ही आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के पैगम्बरी के दावे और आपके अनुयायियों के धार्मिक उत्साह के सख्त विरोधी थे, जिन पर काफी निर्भरता थी, वो बहुत कम हो सकता था जब तक कि यहूदी आलोचना को शांत या असफल न कर दिया जाता ..... जब ​​यहूदियों ने अपना रवैय्या बदल दिया और सक्रिय रूप से दुश्मन बने रहने से रुक गये, उन्हें छेड़ा नहीं गया ........

कुरान ने खुद इस बात की पुष्टि की है। अन्य लोगों के बयान के बारे में धार्मिक ग्रंथों के संदर्भ पर निर्भरता पर वार्डेन बर्ग ने दावे से कहा कि "वर्तमान धार्मिक वर्गों के साथ नए इस्लामी धार्मिक आंदोलन की बातचीत पर विचार करते हुए हम सामाजिक और राजनीतिक कारकों के महत्व पर हैरान हैं।" इसी तरह फ्रेड मैन ज़ोर देते हैं कि जिन अन्य वर्गों का मुसलमानों को सामना करना पड़ा, उनके प्रति मुसलमानों का रवैया इस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के कारण बना जिसमें उनका आपस में सामना हुआ और साथ ही काफी हद तक संबंधित गैर मुस्लिम परंपराओं के कारण निर्मित हुआ था।"

राजनीतिक सामाजिक कारकों के अलावा, धार्मिक विचार भी महत्वपूर्ण थे, क्योंकि इस्लामी धार्मिक पहचान का सतत विकास, मजबूती और जटिलता से अन्य लोगों की धार्मिक पहचान विशेष रूप से यहूदियों और ईसाइयों की पहचान से जुड़ी थी। धार्मिक पहचान के क्रम और कुरान में अन्य विश्वासों के साथ समानता के पहलुओं के प्रकटीकरण, मुस्लिम पहचान की मौलिकता और विशिष्टता से मिली जुली है।" इस तरह कुरानी वातावरण में धार्मिक पहलुओं और अन्य धार्मिक वर्गों के बीच बातचीत ने मुसलमानों के धार्मिक / इकबालिया पहचान के निर्माण में मदद की और इसके निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

डोनर (Donner) ने पैगंबर हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम और कुरान के इकबालिया विशिष्टता के अध्ययन के दौरान ये पाया है कि इस्लाम की शुरुआत और इस्लामी ग्रंथों में मोमिनों की जमात की कल्पना को स्वतंत्र रूप से इकबालिया पहचान (confessional identity) पर स्थापित किया गया था। और ये कि पहली सदी हिजरी के अंत तक (मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की उम्मत बनने के पूरी एक पीढ़ी के बाद) मोमिनों की जमात की सदस्यता को स्वयं ही इकबालिया पहचान की हैसियत से देखा जाने लगा, जब बाद में धार्मिक शब्दावली के गठन के उपयोग के अनुसार, मुसलमान या ईमान वाला होने से मतलब ये था, कि मिसाल के तौर पर ईसाई या यहूदी नहीं था।

किसी और जगह वो लिखते हैं:

जैसा कि कुरान में इस्तेमाल किया गया है, तब इस्लाम और मुसलमान दोनों को अपनी विशिष्टता से संबंधित स्वीकृति का एहसास नहीं था जिसे अब हम 'इस्लाम' और 'मुस्लिम' के साथ जोड़ते हैं, उनका मतलब व्यापक और अधिक लोगों को शामिल करने वाला था और कभी कभी ये कुछ ईसाइयों और यहूदियों पर लागू होता था....

डोनर इस दलील के समर्थन में कई अहम प्रमाण पेश करता है, कि कुरान के अनुसार (कुछ) यहूदी और ईसाई भी मुसलमान (जो खुद को खुदा के हवाले करते हैं) के अलावा मोमिनों कहलाने योग्य, लोगों की श्रेणी में आएंगे।

फ़्रीडमेन इस बात की पुष्टि करते हैं कि इस्लामी कानूनी परंपरा में कुछ सुबूत मौजूद हैं जो संकेत देते हैं कि शुरुआती दिनों में जब मुस्लिम समुदाय का सीमांकन स्पष्ट रूप से तय नहीं था, तब यहूदी और ईसाई मुस्लिम समुदाय का हिस्सा माने जाते थे।

मुसलमानों के धार्मिक अस्तित्व के विकास की ऐतिहासिक स्थिति के बारे एक महत्वपूर्ण रुझान पैग़म्बरे इस्लाम और उनके प्रारंभिक समाज का सतत लेकिन रोज़ बढ़ने वाली खुद की चेतना थी। जहां हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के जीवन के प्रारंभिक वर्षों में साझे मूल्यों की खोज के प्रयास और पक्षों के बीच खाई को पाटने की कोशिश मिलती है, वहीं बाद के चरण में विशेष पहचान बनाने पर जोर दिया गया ताकि एक (मुसलमान) की दूसरों से मुख्य रूप से पहचान की जा सके।'

मिर्ले (Miraly)  कहता है कि जहां बहुलतावाद इस्लाम की आवश्यक बुनियाद थी, विशिष्टवाद बाद के दौर में इसमें जुड़ गया। वही के नाज़िल होने के बाद की सदियों में, असल बहुलतावादी भावना को जिसने मदीना के संविधान (Constitution of Madina) की स्थापना की, राजनीति से प्रेरित लोगों ने इस पर क़ब्ज़ा कर लिया। युद्ध और क्षेत्रीय विस्तार को वैध साबित करने के लिए वो कुरान की विशिष्टतावादी व्याख्या प्रस्तुत करते थे।''  इसी तरह मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के दौर में बैजंतियों के बारे में मुस्लिम दृष्टिकोण के संदर्भ में लिखते हुए Shboul  उसके विचार का समर्थन करता है कि मुसलमानों का रवैय्या सहानुभूति और आत्मीयता वाला था जो कुरान की आयतों में परिलक्षित है, लेकिन ये रवैय्या  बैजंताइन सैन्य शक्ति के रोब और अंदेशे, बैजंताईन धन और विलासिता से नफ़रत और अंतिम रूप में खुला विरोध और लंबे युद्ध के अंदेशे में बदल गया।

यहूदियों और नसरानियों को इस्लाम ने अहले किताब का दर्जा दिया है और उन्हें सुरक्षित अल्पसंख्यकों (ज़मी) का दर्जा प्रदान किया है।

इस सवाल से जुड़ी आलोचना जिसका विश्लेषण यहाँ करना उद्देश्य है, वो हनीफ/ मिल्लते इब्राहीम की कुरान की समझ है। कुरान के अनुसार ये कल्पना एक वास्तविक खुदा में विश्वास पर आधारित पुराने धर्म की कल्पना कहला सकता है जो मिल्लते इब्राहीम बताया गया जिसे सार्वभौमिक आस्था प्रणाली माना जाता है और जिसके अंतिम विकास का चरण मुस्लिम और धार्मिक 'अन्य' के प्रति हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का व्यवहार था। बहरहाल ये स्पष्ट नहीं है कि पैगंबर मोहम्मद खुद ऐतिहासिक इस्लाम को पृथ्वी पर पुराने धर्म हनीफिया का एक संभव रूप या एकमात्र रूप के रूप में पेश करते थे।

अंत में धार्मिक अन्य लोगों के प्रति इस्लामी दृष्टिकोण कुरान और सुन्नत की एक विशेष प्रतिनिधित्व करने वाला रहा है। ये दृष्टिकोण इस विश्वास पर आधारित है कि कुरान धार्मिक 'अन्य' के बारे में प्रयोगिक ज्ञान का स्रोत है, जो सार्वभौमिक और ऐतिहासिक रूप से लागू होता है और बिना संदर्भ के लिहाज़ के होता है।

डॉक्टर अदिस दुदरीजा मेलबर्न विश्वविद्यालय के इस्लामिक साइंसेज़ विभाग में रिसर्च एसोसिएट हैं और वो न्यु एज इस्लाम के लिए नियमित रूप से कॉलम लिखते हैं।

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