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Hindi Section ( 30 May 2012, NewAgeIslam.Com)

Diversity and Sharia तनव्वो और शरीयत


डाक्टर अदिस दुदरीजा, न्यु एज इस्लाम

मेलबोर्न युनिवर्सिटी इस्लामिक स्टडीज़

(अंग्रेज़ी से तर्जुमा- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

शरीयत, इस्लामी तसव्वुरे कायनात में सबसे अहम कलीदी तसव्वुरात में से एक है।

शरीयत की बड़ी तादाद में मुख़्तलिफ़ तरीक़ों से तारीफ़ पेश की जा सकती है: लफ़्ज़ी, कुरानी या फ़िक़ही ( यानी जैसा कि ये इस्तिलाह इस्लामी फ़िक़्ह में इस्तेमाल की जा रही/की जा चुकी है) लेकिन इसका सबसे बुनियादी मानी, उसकी तारीफ़ के मुंदरजा बाला तरीक़ों में से सब में पाया जाता है, और जो तौहीद के तसव्वुर से मुंसलिक है जो ख़ालिक़ और मख़लूक़ के दरम्यान अमूदी और वजूदियाति ताल्लुक़ात की वज़ाहत करता है। ख़ुदा ख़ुदमुख़्तार, सबसे बड़ा मुंसिफ़, कायनात में हर चीज़ का मूजिद और रोज़े जज़ा का मालिक है (क़ुरान 1:3)। लोगों के ज़रीए मंसूब किए जाने से भी वो ख़ालिक़ बालातर है, इस जुमले को क़ुरान में बार बार दुहराया गया है। क़ुरान हमें बताता है की ख़ुदा ने मुख़्तलिफ़ क़ौमों और क़बीलों /तबकों के लिए मुख़्तलिफ़ रास्ते( कुरानी मानों में शरीयत) बनाए हैं ताकि वो एक दूसरे को जान सकें और आमाल सालेहा में एक दूसरे से मुक़ाबला कर सकें। इन तमाम रास्तों का मंबा एक और सच्चा ख़ुदा है, जिस की तरफ़ ये रास्ते (शरीयत का लफ़्ज़ी मानी) ले जाते हैं। प्रोफ़ेसर रमज़ान के अलफ़ाज़ में, ख़ुदा पूरी काइनात में इंसानों के लिए पाया जाने वाला मुकम्मल हवाला है और ख़ुदा की मुसलसल तलाश खुदा को पाने की तरफ़ एक रास्ता है। जैसा कि प्रोफ़ेसर अलफ़ज़्ल ज़ोर देते हैं कि शरीयत ख़ुद में तख़ैयुल परस्ताना, इलाही अंसर को बरक़रार रखती है जिसे इंसान हासिल करना चाहते हैं लेकिन कभी हासिल नहीं कर सकते हैं। दूसरे अल्फ़ाज़ में इंसान मंबा तक कभी नहीं पहुंच सकता है लेकिन इसके बावजूद ये ज़रूरी है कि वो ऐसे रास्ते पर चलें जो उन्हें इसके क़रीबतर ले जा सके। इंसान कभी दावा नहीँ कर सकता है कि वो ख़ुदा की मर्ज़ी और इरादे को मोकम्मल तौर पर जान गया है और शरीयत (यानी फ़िक़्ह) की इंसानी तफ़्हीम के साथ इसका मवाज़ना नहीं किया जा सकता है। इंसानी तफ़्हीम को इस तरह अलैहदा किया जाना इलाहियत की तश्कील करता है, अगरचे सतही तौर पर अजीब और ग़ैर मुफ़ीद लगता है, गहराई से ग़ौरो फ़िक्र करने पर इंसानी शऊर , फ़हेम और इल्म को यक़ीनी बनाने के लिए ये ज़रूरी है और इलाही शऊर को ख़ुदादाद के दर्जे पर नहीं रखा जाता है, जैसा कि ख़ुदा के नाम और ख़ुदा के साथ ज़ालिमाना इंसानी आमाल के जवाज़ के तौर पर पेश करने के लिए किया जाता है। इसी तरह शरीयत की बैंकों के अल्फ़ाज़ के तहत तारीफ़ पेश की जा सकती है जैसे कि नाख़ुदा तरस इंसानी तर्ज़ अमल और रवैय्ये के ख़िलाफ़ ख़ुदा की कुछ किस्म की इंश्योरेंस पालिसी की तारीफ़ पेश की जाती है।

जैसा कि शरीयत के मुंदरजा बाला तसव्वुर से समझा जा सकता है जो उसे बालातर, जुदा, ख़दादाद और इंसानों की पहुंच से दूर लेकिन ये वो जिसकी वो आरज़ू करते हैं। इंसानी उमूर के इंज़िबात में शरीयत की बालादस्ती की बुनियाद को तमाम मुसलमान नस्लों ने तस्लीम किया है, अगरचे उन्होंने यक़ीनी तौर पर अपनी मुख़्तलिफ़ रुहानी शक्ल पेश की। "कैथोलिक" उसूल की तरक़्क़ी और मज़बूती के साथ क़ानून के माहिरीन (फ़िक़्ह) के ज़रीए तेज़ी के साथ शरीयत को एक मुद्दत में क़ानूनी उसूलों वराई इदराज के तौर पर देखा गया जिसकी बुनियाद पर मुस्बत क़वानीन का क़याम अमल में आया। शरीयत और इसकी फ़िक़्ह के तूलो अर्ज़ के दरम्यान ताल्लुक़ के नतीजे में ये हक़ीक़त कि शरीयत मुसलमान के साथ ही साथ ग़ैर मुसलमानों के तक़रीबन ख़ुसूसी ख़्याल के तौर पर सामने आया, जैसा कि इलाही क़ानून सिवाए कुछ सूफ़ी नज़रियात के स्कालरों के अलावा फ़िक़्ह / इस्लामी फ़िक़्ह पर मौजूद बेशुमार किताबों में पाया जाता था, सूफ़ी स्कालरों ने बड़ी हद तक शरीयत को इसके इंसानी तफ़्हीम से वाज़िह तौर पर मुख़्तलिफ़ होने के तसव्वुर को बरक़रार रखा और उसे फ़िक़्ह नाम दिया। रहमान, सौरुश, अलफ़ज़्ल, मूसा, इस्हाक़ और बारलास जैसे जदीद मुस्लिम स्कालरों इस उसूल की बुनियादी एहमीयत से बाख़बर थे और मेयारी और तारीख़ी, मज़हब और मज़हबी इल्म के दरम्यान वाज़ेह इम्तियाज़ को बरक़रार रखा और इस तरह शरीयत और फ़िक़्ह की तशकील की और जैसा कि गुज़श्ता और मौजूदा नस्लों के जाल में नहीं फंसे, जिन्होंने अक्सर शरीयत और फ़िक़्ह के दरम्यान फ़र्क़ को ख़त्म कर दिया और अलफ़ज़्ल के अल्फ़ाज़ में " ख़ुदा के अल्फ़ाज़ की इजारादारी" को पैदा किया।

मुंदरजा बाला में बेहतरीन नुक़्ता तक वज़ाहत की गई क्योंकि ये हक़ीक़त है कि जब तनव्वो और शरीयत के मुआमले पर ग़ौर किया जा रहा है तो ये ज़रूरी है कि इब्तेदाई ब्यान की बुनियाद के तौर पर ख़ुदादाद शरीयत और इसके मुतअद्दिद इंसानी तख़्लीक़ात के दरम्यान फ़र्क़ को वाज़ेह कर दिया जाय।

तनव्वो के हवाला से एक और बहुत अहम सवाल ये है कि शरीयत के ज़राए और वुस्अत की नौईयत है। इस्लामी रिवायत के ज़रीए शरीयत का जो ख़ाका पेश और मंज़ूर किया है वो अक़ीदा/ईमान, क़ानून, एख़्लाक़ियात/तसव्वुफ़ पर मुश्तमिल है। ये मज़ामीन शरीयत के दो बुनियादी मंबा क़ुरान और सुन्नत पर मबनी हैं। क़दीमी ज़माने के बाद (200 हिजरी और इससे आगे) से इस्लामी रिवायत कुछ इल्मियात के पैरामीटर्ज़ के तहत शरीयत बनाई गई और इसके मेयार को मख़सूस तरीक़ेयाती ज़राए से क़ुरान और सुन्नत से लिया गया। इसके नतीजे में शरीयत (या जिसे बेहतर तौर पर फ़िक़्ह कहा गया) सामने आई जो एक मोमिन की निजी या अवामी ज़िंदगी की हर एक तफ़्सील का ताय्युन करती थी इतना कि बहुत सारे ग़ैर मुस्लिम जो इस्लाम के उल्मा थे या नहीं, उन लोगों ने इसकी जामे औऱ तमाम नौईयत के बारे में बात की जो नए हालात की रोशनी में मुवाफ़िक़त और इंसानी तजुर्बे‑ सक़ाफ़्ती, समाजी, सियासी, इक़्तिसादी और टेक्नोलोजी के मुताबिक़ मुवाफ़िक़त के लिए बहुत कम गुंजाइश की इजाज़त देता है। ये दावे कितने सच्च हैं?

इस सवाल का जवाब क़ुरान और सुन्नत की नौईयत की तारीफ़ और उन पर मबनी उसूलों को अख़्ज़ करने के लिए इस्तिमाल किए गए तशरीही मॉडल पर मुन्हसिर करेगा।

इसका तजज़िया करना इस तहरीरी गुफ़्तगु की वुसअत से बाहर है और यहां तक कि मुख़्तसर तौर पर, इस्लामी क़ानूनी नज़रिया जिस की बुनियाद क़ुरान के नुज़ूल और सुन्नत के तसव्वुर की नौईयत को खासतौर पर समझने के लिए उसूलों के इर्तिक़ा का भी जायज़ा लिया जाय। आम तौर पर क़दीमी ज़माने के दौरान क़ुरान और सुन्नत की तशरीह के लिए इल्मियाती गुंजाइश और तरीक़ेयाती आज़ादी दी गई थी जो तेज़ी से क़दीम ज़माने की मुद्दत में मज़ीद मेयार के मुताबिक़ और यकसानियत की ज़रूरत के साथ ही खोती चली गई। क़ानूनी उसूल के तईं क़दीम से क्लासिकी ज़माने तक रवैय्या में आई तब्दीली को मकतबे क़ानून ने नज़ीर बनाया (दर्जाबन्दी हन्फ़ी मतन मैं याकूव के डेवलपमेन्ट आफ़ लीगल थाट में पाया गया) और ये बहुत अच्छी तरह से इस रुझान की तरफ़ इशारा करता है। यासीन ने वाज़ेह तौर पर ज़ाहिर किया है कि किस तरह मलिक (दूसरी हिज्री के दूसरे हिस्से में इंतिक़ाल हुआ), जिन्हें क़ानून के एक क़दीम मकतब का बानी कहा गया इनका नाम, तारीफ़, फ़ितरत और क़ुरान और सुन्नत की तरीक़ेयाती इस्तेमाल इनके बाद के माहिरीन जो तीसरी और चौथी हिज्री में इंतिक़ाल कर गए, उनसे मुनफ़रिद था। मिसाल के तौर पर क़ानून के क़दीम मकतबों, खासतौर से इब्तेदाई मालकी और हन्फ़ी ने हदीस से सुन्नत का तसव्वुर अलग किया, और इमाम शाफ़ई के ज़रीए पेश करदा रिवायती क़ानूनी उसूलों पर शदीद तन्क़ीद से क़ब्ल, मुक़ामी रिवाज (उर्फ़) के लिए ज़्यादा से ज़्यादा गुंजाइश की इजाज़त दी और राय, अवामी दिलचस्पी, मक़ासिद या शरीयत के मक़ासिद और शऊर (अक़ल) के जैसे ग़ैर तहरीरी क़ानून के ज़राए को क़ानूनी उसूल मैं इजाज़त दी। मुवाफ़िक़त और तनव्वो जो कि इस्लामी फ़िक़्ह के अवाइल ज़माने में इसका एक ग़ालिब किरदार था, इसको बरक़रार रखा गया लेकिन नुमायां तौर पर क़दीम ज़माने के बाद के क़ानूनी तर्ज़े फ़िक्र में इल्मियाती तौर पर उसे कमज़ोर किया गया, लेकिन रिवायती ताक़तों के सामने मुकम्मल तौर पर इसने दम नहीं तोड़ दिया।

बहरहाल तारीख़ इस हक़ीक़त की तस्दीक़ करती है कि इस्लाम ने ख़ुद को एशिया, अफ़्रीक़ा और यूरोप के कुछ हिस्से में और मुख़्तलिफ़ सक़ाफ़्तों मैं ख़ुद को तब्दील करने में कामयाब रहा और इसके साथ ही आज भी अपनी बुनियादी ख़ुसूसियात को बरक़रार रखा हुआ है।

हाल ही में नौ सलफ़ी तहरीक की तरह चलने वाली दीगर तहरीकों में जिनकी नज़रियाती जड़ें क़ुरान और सुन्नत के तरीक़ेयात और इल्मियात की महदूद तशरीह की तरफ़ वापिस जाने वाली हैं, जो मुख़्तलिफ़ वजूहात की बुनियाद पर और नुमायां तौर पर मुस्लिम और ग़ैर मुस्लिम मुआशरों में जहां मुसलमान रहते हैं, इनको मुतास्सिर कर रहे हैं। शरीयत के लिए ये नुक़्ताए नज़र तनव्वो के लिए हौसला अफ़्ज़ा नहीं है और बुनियादी तौर पर ग़ैर अरब मुस्लमानों पर अरब सक़ाफ़त और रसूमो रिवाज, (ग़लती से) कुरानी या सुन्नत के पैग़ाम के हिस्से के तौर पर नाफ़िज़ करता है। ताहम, जैसा कि प्रोफ़ेसर रमज़ान ने बजा तौर पर इस बात पर ज़ोर दिया है कि शरीयत को अगर सही तनाज़ुर और बेहतर तरीकाएकार की बुनियाद पर में समझा जाय, तो ये  एक निज़ाम को पैदा करता है जो ना सिर्फ मुसलमानों के हवाले से बल्कि दीगर के हवाले से भी तनव्वो की इजाज़त देता है और जैसा कि मज़मून के शुरूआत में ज़िक्र किया गया है।

आख़िर में तनव्वो का सवाल चाहे वो मज़हबी, सक़ाफ़्ती, समाजी या सियासी और शरीयत से मुताल्लिक़ हो वो दूसरे बहुत से बुनियादी सवालात जो आज मुसलमानों को दर पेश हैं (मिसाल के तौर पर सन्फ़ी मसावात, तर्ज़े हुकूमत, इंसानी और अक़ल्लीयतों के हुक़ूक़, बैन-उल-अक़वामी तआवुन, तकसीरितीत, कसीर सक़ाफ़्ती नज़रिया और तहज़ीबी/सक़ाफ़्ती तबादले) इनका इन्हिसार उनके मंबा की तशरीह, और बुनियादी मफ़रूज़ात, इन ज़राए की नौईयत और मुस्लमानों के तारीख़ी विरासत/ तारीख़ के पढ़ने के नुक़्ताए नज़र पर होता है।

हवालाजात:

अलफ़ज़्ल, इस्पीकिंग इन गाड्स नेम, वन वर्ल्ड 2001

बारलास ए, बिलीविंग वूमन इन इस्लाम, यूनिवर्सिटी आफ़ टेक्सास प्रेस, 2002

डटन वाई, दी ओरीजन आफ़ इस्लामिक ला- दी क़ुरान, दी मेवत्ता ऐंड मदीनियन अमल, राऊटलीग कर्ज़न, लंदन, 2002

सोरुश ए. के. रीज़न, फ़ेथ ऐंड डेमोक्रेसी इन इस्लाम, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस 2000

रमज़ान टी. टू बी ए यूरोपियन मुस्लिम, दी इस्लामिक फ़ाउंडेशन, लीसेस्टर 1999

वेस्टर्न मुस्लिम ऐंड फ्यूचर आफ़ इस्लाम

डाक्टर अदिस दुदरीजा मेलबोर्न यूनिवर्सिटी के शोबए इस्लामिक स्टडीज़ में रिसर्च एसोसिऐट हैं और न्यु एज इस्लाम के लिए बाक़ायदा कालम लिखते हैं।

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