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Hindi Section ( 21 May 2014, NewAgeIslam.Com)

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Shariat and Wisdom Both against Forced Marriage शरीयत और अक़्ल दोनों जबरन शादी के खिलाफ हैं

 

 

 

 

 

असद मुफ्ती

1 नवम्बर, 2012

पिछले हफ्ते जियो चैनल पर जंग फोरम लंदन का जबरन शादी के बारे में एक विशेष कार्यक्रम देखने का मौक़ा मिला। यू.के. में बसने वाली एशियाई कम्यूनिटी में जबरन, बे-जोड़ और सुविधा की शादी की समस्या विकारल रूप लेती जा रही है। इस बात का खुलासा इस विशेष टीवी कार्यक्रम में बखूबी किया गया। मेरे हिसाब से ये 'पूरे यूरोप' के लिए शो था, जिसे स्कॉटलैंड के शहर डैंडी में रिकार्ड किया गया था कि स्कॉटलैंड में जबरन शादियों को आपराधिक अमल घोषित कर दिया गया है और ऐसा कराने वाले माँ बाप, रिश्तेदार या सरपरस्तों को दो साल तक की सज़ा दी जा सकती है। ब्रिटेन, स्कॉटलैंड और आयरलैंड के एशियाई समुदाय में जबरन और बेजोड़ शादी की साढ़े तीन सौ एशियाई शादियाँ होती हैं, जिनमें पचास प्रतिशत शादियाँ जबरन या बेजोड़ शादियों की श्रेणी में आती हैं। इस प्रकार की स्थिति से दम्पत्ति के अलावा न सिर्फ उनके परिवार, बल्कि जातीय सम्बंध भी प्रभावित होते है।

काउंसिल की एक रिपोर्ट में बाताया गया है कि 88 प्रतिशत शादियों में एक पक्ष का सम्बंध 'विदेश' से होता है। 79 प्रतिशत शादियाँ मुआवज़ा, बेजोड़ और हितों पर आधारित होती हैं (जिन्हें सुविधा की शादी भी कहा जाता है) जबकि 21 प्रतिशत सिर्फ जबरन शादी थी। शादी करने वाली औरतों का अनुपात 62 प्रतिशत और पुरुषों का अनुपात 38 प्रतिशत था, जबकि 35 प्रतिशत को दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा। जबरन शादी के लिए मजबूर की जाने वाली औरतों की उम्र सोलह से बीस साल के बीच थी। यही वजह है कि ब्रिटेन, स्कॉटलैंड और आयरलैंड में मर्ज़ी और मंशा के खिलाफ जबरन शादियों के नतीजे में कुछ लड़कियां आत्महत्या तक कर बैठती हैं और ये बात आपके ध्यान में लाना मेरे लिए बेहद ज़रूरी है कि आत्महत्या की दर एशियाई लड़कियों में दूसरी महिलाओं की तुलना में तीन गुना अधिक है। यही वजह है कि सरकार ने एक नए कानून को देश में परिचित कराया है, जिससे इन लोगों के खिलाफ यौन अपराध, अपहरण और जिस पर जबरदस्ती या जबरन शादी का आरोप साबित हो जाएगा। आने वाले समय में इंग्लैंड में रहने वाले पाकिस्तानी, हिंदुस्तानी और दूसरे एशियाई माँ बाप अपने बच्चों की जबरन शादी करवाने पर अब कड़ी सज़ा का सामना करने के लिए तैयार रहें।

प्रधानमंत्री डेविड कैमरून के हवाले से खबर आ ​​चुकी है। उन्होंने वादा किया है कि उनकी सरकार जबरन और बोगस शादियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेगी। इसके अलावा उप-प्रधानमंत्री ने भी यूरोपियन संवाददाताओं से बातचीत करते हुए फिर कहा है कि संगठित गिरोह फर्ज़ी शादियाँ और सुविधा की शादियाँ करवा के भारी रक़म बटोर रहे हैं। मेरे अनुसार ये भी जबरन शादी जैसा अपराध है और ऐसी शादी के लिए किसी भी एशियाई देश से आने वाले को ब्रिटेन में प्रवेश की इजाज़त नहीं दी जाएगी। इसलिए कानून के तहत किसी एशियाई माँ बाप के लिए ये सम्भव नहीं होगा कि वो अपने बेटे या बेटी या भाई बहन की शादी उसकी मर्ज़ी के खिलाफ कर सके।

एक रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन में सालाना बारह शादियाँ माँ बाप की मर्ज़ी (अरेंज) से होती हैं, जिनमें अधिकांश लड़कियां शामिल हैं मगर अब आगे ऐसा नहीं हो सकेगा। मेरे हिसाब से जबरन शादी न केवल मानवाधिकार का उल्लंघन है, बल्कि ये अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार चार्टर और मानदंड का भी उल्लंघन है। न ही धर्म या संस्कृति के हवाले से उसका औचित्य पेश किया जा सकता है। हमारी तुलना में भारतीय समुदाय में हालांकि इस प्रकार की बेजोड़ और जबरन शादियों की मिसाल बहुत कम है। लेकिन पूरे उपमहाद्वीप में इसका रिवाज है। जो धार्मिक नेता शादी जैसे सुखद मौक़े को माँ बाप की समझ पर छोड़ने के पक्ष में हैं, मेरे हिसाब से वो धर्म की भावना को नहीं समझते लेकिन खुदा के क़रीब होने का दावा करते हैं। इस्लाम का दृष्टिकोण कानून शादी और तलाक में बिल्कुल स्पष्ट है। जिस तरह 'इस्लाम का अर्थ शांति व सलामती है, उसी तरह 'शादी' का मतलब खुशी, संतोष और राहत है। इस्लाम में शादी का उद्देश्य ये है कि आत्मा संतुष्ट हो, दिल को राहत मिले, मर्द व औरत प्यार, दया और सहानुभूति, समानता और सद्भाव, सहयोग, आपस की मोहब्बत और मेहरबानी और दूसरे का खयाल रखते हुए जीवन गुज़ारें और ये तभी संभव हो सकता है जब दोनों पक्षों बिना ज़बरदस्ती, बिना धौंस धमकी और लालच के सौ फीसदी सहमति और प्यार शामिल हो। जब इस्लाम में ज़बरदस्ती नहीं है तो इस्लामी शादी में ज़बरदस्ती कैसे उचित हो सकती है?

इस्लाम ने औरत को जैसे और जितने भी अधिकार दिए हैं, उसमें पहली बात जीवन साथी के चुनाव में उसकी पसंद और पैमाना का खयाल रखना और निकाह के समय सौ फीसद उसकी सहमति है, जिसके बिना निकाह नहीं हो सकता। यहाँ मैं रसूलुल्लाह के ज़माने की एक घटना पेश करना ज़रूरी समझता हूँ। एक व्यक्ति ने अपनी बेटी की शादी एक अमीर व्यक्ति से कर दी। लड़की उसको पसंद नहीं करती थी, उसने नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से अर्ज़ किया कि मेरे पिता ने मेरी शादी अपने दौलतमंद भतीजे से कर दी है, ताकि मुझे फंसा कर अपनी विलासिता का प्रबंध कर सकें। आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया: तुमको ये रिश्ता पसंद नहीं तो तुम आज़ाद हो। तो उस लड़की ने जवाब दिया: मेरे पिता ने जो कदम उठाया है, उसे मैं बहाल करती हूँ लेकिन मैं चाहती हूं कि औरतों को ये मालूम हो जाए कि उनकी मर्ज़ी के खिलाफ माँ बाप को उनके निकाह का अधिकार नहीं है। (मसनद अहमद)

इसी तरह ज़बरदस्ती के खिलाफ एक और इतिहासिक घटना प्रस्तुत हैः रसूलुल्लाह के ज़माने में चूँकि महिलाएं मस्जिदों को जाया करती थीं, हज़रत उमर रज़ियल्लाहू अन्हू को अपनी बीवी हज़रत आतक़ा रज़ियल्लाहू अन्हा का मस्जिद जाना पंसद नहीं था,लेकिन हज़रत आतक़ा रज़ियल्लाहू अन्हा शरियत की इस एक रिआयत का फायदा उठाना चाहती थीं, इसलिए उन्होंने अपना तरीक़ा नहीं छोड़ा और हज़रत उमर रज़ियल्लाहू अन्हू ने भी खलीफए वक्त होने के बावजूद ये गवारा न किया कि उनको ज़बरदस्ती इससे महरुम करें। (बुखारी किताबुल उम्मा)

अंत में माँ बाप और धार्मिक रहनुमा जो जबरन शादी (या कोई नाम दे लें) के कायल हैं, से गुज़ारिश करूँगा कि वो इस्लाम के कानूनों को अपने हाथों में न लें और समाज को बिगाड़ने के लिए अपनी ताकत खर्च करने से बचें, कि यही उनके और समाज के हित में बेहतर है:

इसलिए हैं अंधेरे ख़फ़ा ख़फ़ा हम से

कि हम चिराग़े ज़ेया बार करना चाहते हैं

1 नवम्बर, 2012 स्रोतः रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा, नई दिल्ली

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