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Hindi Section ( 18 May 2014, NewAgeIslam.Com)

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Modi's Dream Win मोदी की शानदार जीतः शाही इमाम और अज़ीज़ बर्नी के अखबार अज़ीज़ुलहिन्द के अलावा किसी भी दैनिक अखबार ने डर फैलाने वाली खबरों को प्रकाशित नहीं किया

 

विशेष संवाददाता, न्यु एज इस्लाम

नई दिल्लीः 17 मई, 2014

 छद्म सेकुलर लीडर लंबे समय से नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत के भगवाकरण को लेकर मुसलमानों को डराते रहे हैं। यहां तक ​​कि ऐसे माहौल में 2,000 की संख्या में मुसलमान मार दिये जाएंगें, ऐसी चर्चाओं को भी चलाया गया। [इन आंकड़ों की गणना कैसे की गयी, इसका अंदाज़ा कोई भी लगा सकता है] हालांकि, देश में मुस्लिम राय के एकमात्र बौरोमीटर दिल्ली के उर्दू प्रेस के त्वरित सर्वे से पता चलता है कि अज़ीज़ बर्नी के दैनिक अखबार अज़ीज़ुलहिन्द में प्रकाशित होने वाले शाही इमाम के बयान, खुद इस अखबार और कुछ पत्रकारों के अलावा किसी भी उर्दू अखबार ने मोदी सरकार को लेकर डर फैलाने वाली खबरों को प्रकाशित नहीं किया। इन अखबारों में कोई भी भयानक भविष्यवाणी नहीं की जा रही हैं। तमाम लोगों ने जनता के फैसले को स्वीकार किया है और उनका कहना है कि लोकतंत्र में जनता के फैसले को हमेशा स्वीकार किया जाना चाहिए और इसका स्वागत किया जाना चाहिए क्योंकि ये लोगों के सामूहिक विवेक को दर्शाता है। सभी संपादकीय लेखक मुसलमानों को यही कह रहे हैं कि वो भाजपा की तरफ से वादा किये गये अच्छे समय का इंतेज़ार करें।

हालांकि कुछ उर्दू अखबारों ने प्रधानमंत्री पद के लिए मनोनीत श्री मोदी के द्वारा अपनी जीत के बाद दिये गये भाषण कि, वो सबको साथ लेकर चलेंगे, इस टिप्पणी को सकारात्मक रूप में लिया गया है।

इसके अलावा अखबारों में भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह के द्वारा पार्टी कार्यकर्ताओं को बार बार दी गई सलाह को प्रमुखता से पेश किया गया है जिसमें राजनाथ सिंह ने किसी भी समुदाय (मुस्लिम पढ़ें) के खिलाफ कोई बयानबाज़ी नहीं करने की सलाह दी है।

 अखबार अज़ीज़ुलहिन्द में जामा मस्जिद दिल्ली के शाही इमाम का ये बयान प्रमुखता से दिया गया है कि जब तक भाजपा अपनी नीतियों में बदलाव नहीं करती तब तक श्री मोदी की जीत देश के लिए एक "खतरा" है। विभाजनकारी राजनीति  देश के हित में नहीं हो सकती। इस बयान में शाही इमाम ने ये भी कहा कि, ''अगर भारतीय संविधान को लागू करने के बजाय भाजपा खुद अपनी नीतियों पर अमल करती है तो ये देश के लिए बहुत खतरनाक होगा।''

 इस मामले में एकमात्र अपवाद अज़ीज़ बर्नी का अखबार अज़ीज़ुल हिन्द है। अज़ीज़ बर्नी एक प्रमुख उर्दू पत्रकार हैं और वो दो दशकों से भी अधिक समय तक उर्दू के सबसे बड़े दैनिक अखबार रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा के संस्थापक संपादक रह चुके हैं। अज़ीज़ुलहिन्द उनका नया अखबार है और आज इस अखबार के प्रकाशन का 337वां दिन है। आज उनके अखबार का कवर पेज पूरी तरह से काला है। ऐसा लगता है कि 16 मई, 2014 उनके लिए एक काला दिन है।

शीर्षक सब कुछ कहता हैः नरेंद्र मोदी की जीत: भारतीय इतिहास का काला दिन। कवर पेज के दाईं तरफ पूर्व राष्ट्रपति श्री के.आर. नरायणन का बयान दर्ज है, जो ये है: मैं गुजरात में जारी हिंसा से दुखी हूँ। मैं सांप्रदायिक हिंसा को समाप्त करने के लिए सभी लोगों से अपील करता हूं जिसने पूरे राज्य को तबाह कर दिया है और जो पिछले दो महीने से जारी है। (राष्ट्रीय सहारा, नई दिल्ली, 9 मार्च 2002, पेज 1)

कवर पेज के बाईं ओर के पैनल पर भाजपा के अब तक के एकमात्र और पहले पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी का बयान दर्ज है: "गुजरात में साम्प्रदायिक हिंसा शर्मनाक है, मैं दुनिया को क्या चेहरा दिखाऊँगा। गोधरा की हिंसा पूर्वनियोजित थी। अपराधियों को कभी माफ नहीं किया जाएगा। नरेंद्र मोदी को पक्षपात छोड़ कर राजधर्म (शासन का नैतिक दायित्व) निभाना चाहिए। आग का मुक़ाबला आग से नहीं किया जा सकता है। मैं ये समझने में असमर्थ हूँ कि कैसे लोग जीवित लोगों को आग में फेंक सकते हैं।" (राष्ट्रीय सहारा, नई दिल्ली, 5 अप्रैल 2002, पेज 1)

अज़ीज़ुलहिन्द के संपादकीय लेख का शीर्षक है: धर्मनिरपेक्षता खतरे में। इसमें लिखा गया है कि: "जो व्यक्ति मुसलमानों के नरसंहार के लिए ज़िम्मेदार माना जाता है, वो भारत का प्रधानमंत्री बनने जा रहा है। ये सम्भव है कि देश की नीतियों में कुछ बदलाव किए जाएं। ये हक़ीक़त है कि अल्पसंख्यकों को मोदी से डर है और उनकी नीतियां हमेशा मुस्लिम विरोधी रही हैं। नरेंद्र मोदी चाहे कुछ भी कहें कि हम मुसलमानों के लिए आने वाले दिनों में ये करेंगें हम मुसलमानों के लिए वो करेंगे लेकिन तथ्य ये है कि जो व्यक्ति आरएसएस की गोद में पला बढ़ा हो वो मुसलमानों और इस्लाम के प्रति तटस्थ नहीं हो सकता। आरएसएस का दार्शनिक आधार ही इस्लाम विरोधी है और इसका उद्देश्य हिंदू राष्ट्र की स्थापना है। इस परिदृश्य में आरएसएस और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी मुसलमानों के लिए कुछ भी भला करने का सोच भी नहीं सकते हैं। दरअसल आरएसएस की विचारधारा में ईसाईयों और दूसरे धर्मों के मानने वालों के लिए कोई नरम रवैया नहीं है।

प्रमुख मुस्लिम पत्रकार ज़फ़र आग़ा ने दैनिक हमारा समाज में लिखे अपने लेख में मुसलमानों के वोट बैंक के बेअसर होने का मर्सिया कुछ इस तरह पढ़ा है। हमारा समाज में प्रकाशित लेखक ने अपने कालम में इस तरह निष्कर्ष दिया हैः "इसका परिणाम ये होगा कि देश में सेकुलर राजनीति को अकल्पनीय नुकसान का सामना करना पड़ेगा। ज़ाहिर है कि इसका सबसे अधिक नुकसान मुसलमानों को होगा। चुनावी नतीजों से ये तय हो गया कि भारतीय राजनीति कम से कम दो दशकों के लिए हिंदुत्व यानी हिंदू राष्ट्र की दिशा में बढ़ेगी और मोदी भारतीय राजनीति में लंबे समय के लिए छाए रहेंगे। इसका सबसे अधिक ख़ामियाज़ा मुसलमानों को भुगतना होगा। अफसोस की बात है कि मुसलमानों के पास कोई नेतृत्व नहीं है जो उसे इस मुश्किल घड़ी में राह दिखा सके। अगर मुसलमानों में नेतृत्व है तो वो मीर जाफ़र और मीर सादिक (धोखेबाज़ी के लिए समानार्थक शब्द) से अलग नहीं है। इसलिए मुसलमानों का भविष्य न केवल अंधेरे में दिख रहा है बल्कि मोदी मुसलमानों के इतिहास की सबसे बुरी अवधि के अग्रदूत बनने जा रहे हैं।"

शुक्र है ये एक अपवाद है। दूसरा अखबार जिसने मोदी की जीत को साम्प्रदायिकता की जीत बताया है वो हिंदुस्तान एक्सप्रेस है। इसने शाहिदुल इस्लाम का लिखा एक कालम प्रकाशित किया है जिसका शीर्षक है: आखिरकार, सांप्रदायिकता जीत गई। लेकिन ये लेख और साथ ही साथ इसका संपादकीय भी अस्पष्ट है। इस अखबार में श्री मोदी की जीत में आरएसएस के योगदान का भी उल्लेख किया गया है लेकिन साथ ही इसमें कांग्रेस को हार का दोषी उनकी अयोग्यता, रोजगार सृजन की कमी और महंगाई को बताया गया है। इस अखबार में आने वाले दिनों में मुसलमानों को डराने की कोशिश नहीं की गयी है। संपादकीय का शीर्षक हैः अप्रत्याशित जीत।

लेकिन हमारा समाज के संपादकीय में केवल धर्मनिरपेक्ष दलों की हार का मर्सिया पढ़ा गया है और यह समझने की कोशिश की गई है कि धर्मनिरपेक्ष राजनीति की हार का ज़िम्मेदार कौन है। इस अखबार में हार के लिए जिम्मेदार खुद धर्मनिरपेक्ष दलों को ही बताया गया है और कहा गया है कि कहीं कुछ गड़बड़ ज़रूर हुआ होगा जो उन्हें इतनी बड़ी हार का सामना उन पार्टियों से करना पड़ा, जिन्हें फासिस्ट माना जाता है।

आश्चर्य की बात है कि सबसे संतुलित संपादकीय रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा ने लिखा है जिसको इसकी शुरूआत से ही और काफी लम्बे समय तक दिशा अज़ीज़ बर्नी जैसे खतरनाक कट्टरपंथी उग्रवादी ने दी है, जिनका अपना अखबार मोदी की जीत को भारत के लिए काला दिन कहता है। उनके अखबार में लिखा है किः हम जनता के फैसले का सम्मान करते हैं। चूंकि जनता का फैसला लोगों के सामूहिक विवेक का नतीजा है इसलिए इसका स्वागत किया जाना चाहिए और लोकतांत्रिक सिद्धांतों की मांग भी यही है। ये कहना जल्दबाज़ी होगी कि नई भाजपा सरकार का रवैया कैसा होगा, कैसा नज़रिया ये पेश करेगी और कैसे निर्णय ये लेगी? फिर भी सरकार को अपनी नीतियों और व्यवहार को दिखाने के लिए समय दिया जाएगा। लोग सरकार की तरफ डर और उम्मीद से देख रहे हैं।"

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https://www.newageislam.com/islam-and-politics/new-age-islam-special-correspondent/modi-s-dream-win--barring-shahi-imam-and-aziz-burney-s-azizul-hind,-no-urdu-paper-engages-in-scare-mongering,-all-ask-muslims-to-wait-and-watch-for-the-promised-good-times/d/77051

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https://www.newageislam.com/urdu-section/نیو-ایج-اسلام-کے-خصوصی-نامہ-نگار/modi-s-dream-win--مودی-کے-خواب-پورے--شاہی-امام-اور-عزیز-برنی-کے-اخبار-عزیز-الہند-کے-علاوہ-کسی-بھی-اردو-روزنامہ-نے-خوف-و-ہراس-پھیلانے-والی-خبروں-کو-شائع-نہیں-کیا/d/77066

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