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Hindi Section ( 27 Sept 2013, NewAgeIslam.Com)

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Mahatma Gandhi's Lessons for Al - Qaeda अलक़ायदा के लिए महात्मा गांधी के सबक

 

क्रिस्टोफर जे. ली

13 सितम्बर, 2013

दक्षिण एशिया, 1947 में विभाजन के बाद से हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच लंबे तनाव, और हाल ही में अलक़ायदा के  माध्यम से कट्टरपंथी इस्लाम की एक नई वैश्विक राजनीति के साथ राजनीतिक दुनिया के सबसे जटिल क्षेत्रों में से एक है।

ऑक्सफोर्ड के एक इतिहासकार फैसल देवजी ने किताबों की एक श्रृंखला में इन विभिन्न राजनीतिक इतिहासों को पेश किया है। इन्हीं में से एक किताब Landscapes of the Jihad (2005) है, जो 9/11 के बाद अलक़ायदा को समझने के पहले गंभीर प्रयासों में से एक है। एक और किताब Muslim Zion: Pakistan as a Political Idea (2013) है, जिसमें पाकिस्तान और इसराइल के बीच असम्भावित सम्बंधों के बारे में बताया गया है।

अफ्रीका में विटवाटर्सरैंड युनिवर्सिटी के सेंटर फॉर इंडियन स्टडीज में एक प्रतिष्ठित मेहमान के रूप में हाल ही में देवजी ने इस्लामी चिंतन के विषय पर दो लेक्चर दिए।

आपकी पहली किताब, Landscapes of the Jihad (2005) में इस्लामी राजनीतिक सोच और समकालीन वैश्वीकरण के संदर्भ में अलकायदा और उसकी प्रेरणा को समझाने की कोशिश थी। क्या 2005 के बाद से आपके विचार बदल गए हैं? ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद इस संगठन के भविष्य के बारे में आपकी क्या राय है?

जहां तक वैश्विक उग्रवाद का सम्बंध था,  9/11 के तत्काल बाद ऐसा लगता है कि अलकायदा ने नए युग की शुरुआत में अग्रदूत की भूमिका अदा की। यही कारण था कि अमेरिका ने खासकर सामान्य रूप से आतंकवाद के स्वरूप को तबाह करने के लिए इतना भारी निवेश किया और अपने देश के नागरिकों की स्वतंत्रता की संरचना को भी दाँव पर लगा दिया और इस तरह अमेरिकी लोकतंत्र को खतरे में डाल दिया। लेकिन इसके बावजूद अलक़ायदा के कई तर्क और व्यवहार नए थे, और भविष्य में इनको बहुत से दूसरे आंदोलनों और हितों के द्वारा अपनाया जा सकता है जिनका इस्लाम के साथ कोई लेना देना नहीं। वैश्विक समर्थन के संदर्भ में खुद इसके नेटवर्क को लगभग तबाह होने तक के जोखिम का सामना करना पड़ा है। ऐसा इसलिए नहीं हुआ कि "आतंकवाद के खिलाफ युद्ध" ने इसकी क्षमता को घटा दिया बल्कि मुस्लिम देशों में इसको अपने समर्थकों का नुकसान उठाना पड़ा है।

ऐसा लगता है कि अलकायदा एक संक्रमणकालीन घटना थी। और मुझे लगता है कि इसने शीत युद्ध के अंत के बाद अर्थ ग्रहण किया। जैसा कि हम जानते हैं कि 1979 में सोवियत संघ के कब्ज़े के खिलाफ अफगानिस्तान में शीत युद्ध की आखरी लड़ाई के दौरान ही नेटवर्क की स्थापना हुई। शीत युद्ध के संदर्भ में, ये स्पष्ट नहीं है उस वक्त वैश्विक राजनीति कैसी थी, और अन्य समूहों की तरह अलक़ायदा ने, अहिंसक गैर सरकारी संगठनों सहित, ने अपने विशिष्ट तरीकों की मदद से इस खाली वैश्विक क्षेत्र पर कब्जा जमाने में कामयाब रही। ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद से, जो लोग अलक़ायदा का नाम लेते हैं वो नेटवर्क और अवधारणाओं के मामले में बहुत कम वैश्विक रह गये और केवल क्षेत्रीय संघर्ष पर ध्यान दे रहे हैं, और "पश्चिम" के बजाय मुसलमानों के बीच संघर्षों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।

हाल ही की एक किताब, The Impossible Indian (2012) हिंसा पर अपने विचारों के साथ रहते हुए महात्मा गांधी के लोकप्रिय विचारों को चुनौती देती है। क्या आपके पहले के कामों में हिंसा और राजनीतिक इस्लाम के बीच कोई सम्बंध है?

गांधी जी ने हमेशा कहा है कि हिंसा और अहिंसा घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई है, इसलिए एक को दूसरे में परिवर्तित किया जा सकता है। उनका तर्क था कि बुराई को खुद अच्छाई पर निर्भर होना चाहिए। मिसाल के तौर पर सबसे लोभी और विश्वासघाती नेता को अपनी ताक़त का इस्तेमाल करने के लिए अपने समूह के बीच वफादारी, दोस्ती और बलिदान जैसी खूबियों पर निर्भर होना पड़ता है। इसलिए मामला बुराई से अच्छाई को हासिल करने का था ताकि इसका खात्मा हो और जिसे महात्मा गांधी ने असहयोग कहा। अलक़ायदा की कार्रवाईयों और बयानबाज़ी में जो बात मेरी दिलचस्पी की वजह बनी वो दोस्ती, वफादारी और बलिदान जैसे गुणों पर इसकी निर्भरता थी। उग्रवाद पर लिखी गई मेरी दो किताबों में मैंने इसे तलाश करने की कोशिश की है, और ये दोनों किसी न किसी तरह से गांधी से प्रभावित हैं।

आपकी नई किताब पाकिस्तान के बारे में है। वास्तव में आप अपने लेखों में संगठनात्मक राजनीति से व्यक्तिगत राजनीति से राष्ट्र राज्य तक आ गए हैं। क्या ये राजनीतिक गतिविधियों और अभिव्यक्तियों के विभिन्न स्थानों पर शोध के लिए जानबूझकर किया गया सफर था?

पहले आई तीन किताबों के मुक़ाबले पाकिस्तान पर मेरी किताब एक ऐतिहासिक गाथा है। मैं उन तरीकों पर विचार करता हूँ जिस तरीके से ऑल इंडिया मुस्लिम लीग ने पहली बार इस्लाम को एक आधुनिक राजनीतिक रूप में बदल दिया था। जिसने इसमें मेरी रुचि पैदा की, वो ये है कि किस तरह पाकिस्तान का आंदोलन ब्रिटिश संविधानवाद और भारतीय राजनीति की सीमित दुनिया से, अंतर्राष्ट्रीय मामलों में अपनी भूमिका के दायरे में आने में कामयाब हो सका। हालांकि वो अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र जिसमें मुस्लिम राजनीति को उजागर किया जा रहा था वो साम्यवाद और फासीवाद के आंदोलन थे। मैंने वास्तव में इसके लिए लगातार यहूदीवाद पर ध्यान केन्द्रित किया। हम जानते हैं कि इसराइल और पाकिस्तान की स्थापना एक वर्ष के भीतर हमारे समय के दो महत्वपूर्ण "धार्मिक" राज्य की स्थापना के लिए किया गया था। दरअसल इसराइल की स्थापना संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के द्वारा निर्धारित कानूनी मिसाल के आधार पर किया गया।

ज़ंजीबार से सम्बंधित होने के नाते, अफ्रीका में इस्लाम और राजनीति के बारे में आपका क्या ख़याल है? क्या आप इस सम्बंध में दक्षिण एशिया और अफ्रीका के बीच कोई सम्बंध देखते हैं?

तंज़ानियावासी होने के नाते, मैं निश्चित रूप से अफ्रीका में रुचि रखता हूँ, लेकिन कई साल पहले जूलियस नाईरेरे के द्वारा शेक्सपियर का किस्वाहिली भाषा में अनुवाद पर एक लेख के प्रकाशन के अलावा मैंने इस विषय पर नहीं लिखा है।  लेकिन जातियता के आधार पर मैं भारतीय था, लेकिन भारत में मेरी परवरिश नहीं हुई थी, लेकिन मुझे इस बात का संदेह था कि मैं भारतीय या पाकिस्तानी इतिहास का उपयोग करने में सक्षम था और इन समाजों के बारे में बुनियादी सवाल पूछ सकता था जिसे दूसरे लोग बेकार समझते थे। बिल्कुल ऐसा ही मामला इस्लाम का है जो दक्षिण एशिया या मध्य पूर्व के मुक़ाबले अफ्रीका के पूर्वी तट पर बहुत अलग लगता है। वास्तव में ऐसा इसलिए है कि जब मै दारेस्सलाम में था और वहाँ अमेरिकी दूतावास पर अलक़ायदा के द्वारा बमबारी की गई थी और उग्रवाद के इस नए रूप के बारे में सोच कर मैं हैरान था। लेकिन अफ़्रीका पर कुछ और काम करने के बारे में मैं सोच रहा हूँ, विशेष रूप से तंज़ानिया की एकता और साथ ही साथ सहारा क्षेत्र में पहली क्रांति- ज़ंजीबार की क्रांति पर नायरेरे की आखरी कविता पर।

क्रिस्टोफर जे ली अंतर्राष्ट्रीय सम्बंध पढ़ाते हैं और विट्स युनिवर्सिटी में सेंटर फॉर इंडियन स्टडीज़ इन अफ्रीका में काम करते हैं। और Making a World After Empire: The Bandung Moment and Its Political Afterlives 2010 के एडिटर हैं।

स्रोत: http://mg.co.za/article/2013-09-12-gandhis-lessons-for-al-qaeda

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https://www.newageislam.com/spiritual-meditations/christopher-j-lee/mahatma-gandhi-s-lessons-for-al-qaeda/d/13480

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https://www.newageislam.com/urdu-section/mahatma-gandhi-s-lessons-for-al-qaeda-القاعدہ-کے-لئے-مہاتما-گاندھی-کے-اسباق/d/13542

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