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Hindi Section ( 19 March 2014, NewAgeIslam.Com)

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Arab- Israel Talks: Some other Reasons of Failure अरब- इज़रायल वार्ताः नाकामी के कुछ दूसरे कारण

 

 

 

 

बासिल हेजाज़ी, न्यु एज इस्लाम

19 मार्च, 2014

1948 से लेकर अब तक अरब इजरायल वार्ता लगातार विफल होती चली आ रही है, इसकी वजह राजनीतिक दृष्टिकोण और हितों का अंतर ही नहीं बल्कि भाषा, संस्कृति और मानसिकता का भी अंतर है।

सबसे पहले तो स्वाभाविक और ऐतिहासिक रूप से अरबी बातचीत ऐसे करता है जैसे माल खरीद रहा हो। मिसाल के तौर पर व्यापारी कहता है कि ये क़ालीन हज़ार दीनार का है और आप कहते हैं कि नहीं मैं सिर्फ पांच सौ दूँगा। इस तरह सौदा हो जाता है और व्यापारी के साथ आपके सम्बंध भी बन जाते हैं। अगर सौदा न हो तो खाली समय बड़ी अच्छी तरह से कट जाता है। अधिकतर अरबों के यहाँ ये समय बिताने का एक अच्छा शौक है लेकिन इज़रायल को ऐसे तरीके से नफ़रत है और वो इस तरह की सौदेबाज़ी को दुश्मनी के माहौल में अस्तित्व की लड़ाई समझता है।

दूसरे ये कि इज़रायली "इंशा अल्लाह" और "मुश मुश्किलः" (यानी कोई समस्या नहीं) की मानसिकता को नहीं समझता जो अरबों की ज़बान पर ऐसे सवार रहती है जैसे खाने में नमक ज़रूरी होता है। ये अरब की बातचीत की ज़बान का एक ज़रूरी हिस्सा होता है। दोनों तरफ से एक दूसरे से अलग सांस्कृतिक और भाषा शैली का इस्तेमाल बातचीत की विफलता का एक प्रमुख कारण है।

तीसरे ये कि अरब दुनिया को अरबी भाषा की दूरबीन से देखते हैं क्योंकि ये क़ुरान की ज़बान है। इसलिए सोचने का ढंग और कुरानी आयत से तर्क और बातचीत की शुरुआत से पहले बिस्मिल्लाह का पढ़ना और बातचीत के दौरान "इंशा अल्लाह" और "माशा अल्लाह" बोलना खासकर जब किसी अजनबी से बातचीत की बैठक चल रही हो, बहुत सारा वक्त बर्बाद करता है और अनुवादक को अनुवाद की भूल भुलैय्यों में उलझा देता है जिसके नतीजे में मूल विषय पर ध्यान केंद्रित रखना मुश्किल हो जाता है। दूसरे शब्दों में इज़रायली को ऐसे माहौल में बातचीत करने में कठिनाई होती है जिस पर बातचीत की शुरुआत से लेकर अंत तक इस्लामी आस्था छाई हुई हो और हर अगला वाक्य इस्लामी आस्था का बेजोड़ नमुना हो।

चौथा समस्या ऐसी किसी दूरी की सीमा का अभाव है जो धर्म, काम, राजनीति और सामाजिक सम्बंधों को अलग कर के बिना किसी घुमाव फिराव के सीधे मूल विषय पर बातचीत को सम्भव बनाती हो और समय बर्बाद करने का कारण न बनती हो जिससे बातचीत मुश्किल हो जाती है। मिसाल के तौर पर जैसे कोई पर्यटक जो किसी अरब दूतावास में वीज़ा के लिए आता है उसे सामाजिक सम्बंधों के जादू का बखूबी पता चलेगा जब पांच घंटे इंतेज़ार के बावजूद उसे इस बात की गारंटी नहीं होगी कि दूतावास के बंद होने से पहले उसे वीज़ा मिल सकेगा या नहीं लेकिन अगर वो होटल प्रशासन से सम्बंध स्थापित कर ले तो उसे पता चलेगा कि होटल के मालिक के बेटे का एक दोस्त दूतावास में काम करता है तब सिर्फ एक फोन पर काम आधे घंटे में हो जाएगा। तो पता चला कि तिकोनी तरकीब के स्थिर समाज में सामाजिक सम्बंध बड़े महत्वपूर्ण होते हैं लेकिन पश्चिमी संस्कृति इससे बहुत अलग है।

पाँचवा साहित्य और नैतिकता है जो कि ये भी कभी कभी समस्या बन जाती है। जब बिल क्लिंटन के नेतृत्व में यासिर अराफात, बेंजामिन नेतनयाहू से अमेरिका में बातचीत कर रहे थे तो एक बार वो ज़िद कर के इस बात पर अड़ गये कि  नेतनयाहू पहले दरवाज़े से अंदर जाएंगे। मुझे विश्वास है कि इस समय न तो क्लिंटन और न ही नेतनयाहू को यासिर अराफात की समस्या समझ आई होगी। क्या आप जानते हैं कि आप जापान में ऐसा कोई उत्पाद बेच नहीं सकते जिस पर चार का आंकड़ा लिखा हो? क्योंकि जापानी संस्कृति में चार अंक का मौत से गहरा सम्बंध है ...!

आखरी बात ये कि इस्लाम अमल का मज़हब है, सोच विचार का नहीं, ये इतना आसान है कि आप सिर्फ दो वाक्य बोलकर इसमें बड़े आराम से पूरे पूरे दाखिल हो सकते हैं और केवल एक शब्द को तीन बार ज़बान से अदा कर के तलाक भी हासिल कर सकते हैं ... क्या इतनी आसानी दुनिया के किसी और धर्म में आपको मिल सकती है? लेकिन खबरदार जो आपने इस्लाम में दाखिल होने के एग्रीमेंट को किसी एक शब्द से भी खत्म करने की कोशिश की तो, वरना आपकी खोपड़ी दाँव पर लग जाएगी। ऐसी मानसिकता को राजनीतिक वार्ता में लागू नहीं किया जा सकता।

न्यु एज इस्लाम के स्तम्भकार बासिल हेजाज़ी पाकिस्तान के रहने वाले हैं। स्वतंत्र पत्रकार हैं, धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन और इतिहास इनके खास विषय हैं। सऊदी अरब में इस्लामिक स्टडीज़ की पढ़ाई की, अरब राजनीति पर गहरी नज़र रखते हैं, उदार और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के ज़बरदस्त समर्थक हैं। इस्लाम में ठहराव का सख्ती से विरोध करते हैं, इनका कहना है कि इस्लाम में लचीलापन मौजूद है जो परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने की क्षमता रखता है। ठहराव को बढ़ावा देने वाले उलमाए इस्लाम के सख्त रुख के कारण वर्तमान समय में इस्लाम एक धर्म से ज़्यादा वैश्विक विवाद बन कर रह गया है। वो समझते हैं कि आधुनिक विचारधारा को इस्लामी सांचे में ढाले बिना मुसलमानों की स्थिति में परिवर्तन सम्भव नहीं।

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