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The Verses of Jihad in Quran: Meaning and Context - Part 8 कुरआन मे जिहाद की आयतें: अर्थ व मफहूम, शाने नुजुल और पृष्ठ भूमि

बदरुद्दूजा रज़वी मिस्बाही, न्यू एज इस्लाम

भाग-८

२४ अप्रैल २०२१

[12]قَاتِلُوا الَّذِیۡنَ لَا یُؤۡمِنُوۡنَ بِاللّٰہِ وَ لَا بِالۡیَوۡمِ الۡاٰخِرِ وَ لَا یُحَرِّمُوۡنَ مَا حَرَّمَ  اللّٰہُ  وَ رَسُوۡلُہٗ  وَ لَا  یَدِیۡنُوۡنَ دِیۡنَ  الۡحَقِّ مِنَ الَّذِیۡنَ اُوۡتُوا الۡکِتٰبَ  حَتّٰی یُعۡطُوا  الۡجِزۡیَۃَ  عَنۡ ‌یَّدٍ  وَّ ھُمۡ  صٰغِرُوۡنَ [التوبہ،آیت:29]

अनुवाद: अहले किताब में से जो लोग न तो (दिल से) ख़ुदा ही पर ईमान रखते हैं और न आख़िरत के दिन पर और न ख़ुदा और उसके रसूल की हराम की हुई चीज़ों को हराम समझते हैं और न सच्चे दीन ही को एख्तियार करते हैं उन लोगों से लड़े जाओ यहाँ तक कि वह लोग ज़लील होकर (अपने) हाथ से जिज्या दे

सुरह तौबा की इस आयत में अहले किताब यहूद व नसारा से उस वक्त तक जंग करने का हुक्म दिया गया है; जब तक कि वह अपने अधिकारों की सुरक्षा के लिए जिज़या अदा करने पर राज़ी ना हो जाएं, चूँकि यह आयत जिज़या के वजुब और उसकी मशरूइयत की तरफ मशअर है इसलिए हम यहाँ पर जिज्या और इस जैसे दुसरे वसूली पर संक्षिप्त प्रकाश डालेंगे ताकि यह स्पष्ट हो जाए कि अहले किताब या गैर मुस्लिम अल्पसंख्यक के साथ ही साथ मुसलामानों से भी ज़कात के रूप में इस प्रकार के महासिल वसूल किये जाते थे और मुसलमान भी इसकी आदयगी के लिए पाबंद थे।

रिसालत के ज़माने में महासिल की पांच किस्में थीं:

(१) गनीमत (२) फई (३) ज़कात (४) जिज़या (५) खराज

(१) गनीमत: वह माल है जो पराजित कौम से विजय के समय प्राप्त होता है, इसका पांचवां हिस्सा अल्लाह व रसूल के नाम पर हुकूमत के मसालेह और दुसरे अग्राज़ व मकासिद के हुसूल के लिए विशेष था बकिया माल एक जाब्ते के तहत मुजाहेदीन सिपाहियों में बराबर बराबर बांटा जाता है।

(२) माले फई: वह माल है जो मुसलमानों को कुफ्फार से लड़ाई के बिना हासिल होता था जैसे: सुलह आदि से यह अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जेरे इंतज़ाम रहता था आप इस जविल कुर्बा (क़राबत दारों), यतीमों, मिस्कोनों, गरीबुल दयार मुसाफिरीन और आम मुसलमानों की आवश्यकताओं पर खर्च करते थे।

(३) ज़कात: यह केवल मुसलमानों पर फर्ज़ थी और चार मदों से वसूल की जाती थी: नकदी (कैश), फल व पैदावार, मवेशी, सामाने तिजारत।

मुसलमानों का जज़्बा ए इमानी उन्हें खुद सदकात व ज़कात पेश करने पर आमादा रखता था, लेकिन एक बड़े ममलकत में महासिल की तहसील के लिए बाकायदा एक निजाम की आवश्यकता थी, इसलिए हुजुर सैयदे आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने माले ज़कात की तहसील के लिए वसूलने वाले मुकर्रर फरमाए थे साधारणतः खिदमत हर कबीले के सरदार को दी जाती थी इतिहास व सीरत की किताबों में मोह्सलीन और आमेलीने ज़कात के इस्मा का शरह व बसत के साथ ज़िक्र मिलता है।

(४) जिज़या: गैर मुस्लिम अल्पसंख्यक या रिआया से उनके हुकुक, जान व माल, आल व औलाद की सुरक्षा के लिए लिया जाता था रिसालत के ज़माने में हर योग्य और बालिग़ मर्द से एक दीनार सालाना वसूल किया जाता था अभी हम इसकी मजीद तफसील करेंगे।

(५) खराज: (माल गुजारी) यह गैर मुस्लिम काश्तकारों से ज़मीन के मालिकाना हक़ के बदले में वसूल किया जाता था और इसकी सुरत यह थी कि आपसी समझ बुझ से ज़मीन की पैदावार का हिस्सा जिस कदर तय पाता था वह उनके जिम्मे वाजिब हुआ करता था। खैबर, फिदक, वादी अल कुरा आदि से खराज वसूल किया जाता था और इसके साथ इसकी सख्त ताकीद भी की जाती थी कि खराज की कोई रकम ज़ुल्म व जब्र से ना वसूल की जाए।

जिज़या या खराज की आमदनी सिपाहियों की तनख्वाह और जंगी मसारिफ में खर्च होती थी अहल व अयाल वाले सिपाहियों को दो हिस्से और अकेले (गैर शादी शुदा) को एक हिस्सा मिलता था।

जिज़या एक तरह से हिफाजती टेक्स था जो ज़िम्मियों (गैर मुस्लिम अल्पसंख्यक) से वसूल किया जाता था, लेकिन यह रकम खुद उनकी जान व माल की सुरक्षा पर खर्च की जाती थी जिम्मी फ़ौजी खिदमात से अलग थे लेकिन नागुजीर हालात में अगर उनसे फ़ौजी खिदमत ली जाती थी तो जिज़या की रकम उनसे वसूल नहीं की जाती थी। इसी तरह नादार, बेकस और माज़ूर जिम्मी अफराद भी जिज़या की अदायगी से अलग थे और यही नहीं कि उनसे जज़िया की रकम नहीं ली जाती थी बल्कि इस्लामी बैतूल माल से जो हर सूबे में कायम थे किफालत भी की जाती थी और उनकी हर तरह की जरूरत पुरी की जाती थी खिलाफते राशिदा बिलखुसुस अहदे फारुकी के बहुत से मुआहेदों में इसकी सराहत है कि जिज़या ज़िम्मियों की हिफाज़त का केवल एक टेक्स था फारुकी अहद में अहले जिर्जान से जो समझौता हुआ उसके अलफ़ाज़ यह हैं:

हमारे जिम्मे इस शर्त पर तुम्हारी हिफाज़त है कि तुम को बकद्रे इस्तिताअत सालाना जजिया देना होगा और अगर हम तुम से मदद लेंगे तो उसके बदले में जजिया माफ़ कर दिया जाएगा।

आज़रबाईजान की फतह में यह मुआहेदा लिखा गया:

जो लोग किसी साल फ़ौज में काम करेंगे तो उस साल का जजिया उनसे नहीं लिया जाएगा।

इस किस्म की बहुत सारी मिसालें आप इतिहास व सीरत की किताबों में देख सकते हैं, बल्की अगर किसी वजह से ज़िम्मियों की हिफाज़त से मुसलमान माज़ूर हो गए तो जिज़या की वसूल शुदा रकम भी उन्हें वापस कर दी जाती थी, जैसा कि यरमुक के मार्के के सिलसिले में जब मुसलमान फ़ौजी ज़िम्मियों की सुरक्षा से माज़ूर हो गए तो सिपाह सालार लश्कर हज़रत अबू उबैदा बिन जर्राह रज़ीअल्लाहु अन्हु ने शाम और मफ्तुहा इलाकों के हुक्काम के नाम यह फरमान सादिर किया कि जितना जिज़या वसूल हो चुका है सब वापस कर दिया जाए।

मजीद यह कि जिज़या की वसूली में किसी सख्ती से भी काम नहीं लिया जाता था, शाम के सफर में हजरत उम्र फारुक रज़ीअल्लाहु अन्हु ने एक जगह पर देखा कि ज़िम्मियों पर सख्ती की जा रही है कारण पूछने पर मालूम हुआ कि यह लोग जिज़या की अदायगी में आना कानी कर रहे हैं और इसकी वजह उनकी नादारी है जब यह मालुम हुआ तो आप ने फरमाया: उन्हें छोड़ दो मैंने हुजुर सल्लाल्लाहुआ अलैहि वसल्लम से सूना है कि लोगों को तकलीफ ना दो जो लोग दुनिया में लोगों को अज़ाब देते हैं अल्लाह पाक उन्हें कयामत में अज़ाब देगा।

जिज़या की वसूली में इस कदर रिआयत बरती जाती थी कि अगर कोई बूढ़ा जिम्मी काम करने से माज़ूर हो जाता या किसी आफत का शिकार हो जाता या दौलत्मंदी के बाद वह गरीब हो जाता और उसके अहले मज़हब उसे खैरात देने लगते तो उसका जिज़या मुआफ कर दिया जाता था और केवल यही नहीं कि मुआफ कर दिया जाता था बल्कि उसे और उसकी औलाद को मुसलमानों के बैतूल माल से खर्च भी दिया जाता था।

परिणाम यह है कि जिज़या एक शुद्ध सुरक्षा कर था जो केवल उनकी सुरक्षा पर खर्च किया जाता था और मुसलमानों को इस तरह के भुगतान से छूट नहीं थी, लेकिन मुसलमानों की जकात की राशि जिज़या की राशि से बहुत अधिक थी। इसलिए, यह नहीं माना जाना चाहिए कि इस तरह के करों को केवल गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों पर ही नहीं बल्कि मुसलमानों पर भी लगाया गया है। सीमा यह है कि अगर कोई मुसलमान एक जिम्मी को मारता है, तो अमीर अल-मुमीन हजरत उमर रज़ीअल्लाहु अन्हु संकोच नहीं करेंगे। उससे बदला लेने के लिए। एक बार जब बकर इब्न वाएल की जमात के एक मुसलमान ने हीरा से एक ईसाई को मार डाला, तो उसने मुस्लिम हत्यारे को मारे गए ईसाई के वारिसों को सौंप दिया और उन्होंने उसे किसास में मार डाला और इसी तरह ज़िम्मियों की इम्लाक को भी अगर कोई हानि पहुँच जाता तो आप उन्हें इसका बदला दिलाते थे इसी तरह उन्हें इस्लामी मुमलकत में हर तरह की आज़ादी भी हासिल थी, बैतूल मुकद्दस फतह करने के बाद वहाँ के ईसाईयों के लिए आप ने जो मुआहेदा लिखा उसके अलफ़ाज़ यह हैं:

यह वह अमान है जो खुदा के बन्दे अमीरुल मोमिनीन उमर (रज़ीअल्लाहु अन्हु) ने अहले इलिया को दी। यह अमान जान, माल, गिरजा, सलीब, तंदुरुस्त, बीमार और उनके तमाम अहले मज़हब के लिए है उनके गिरजा में ना तो सुकूनत इख्तियार की जाए ना ही वह ढाए जाएंगे और ना उनके इहाते को कोई नुक्सान पहुंचाया जाएगा और ना उनकी सलिबियों और उनके माल में कमी की जाएगी, मज़हब के मामले में उन पर कोई जबर नहीं किया जाएगा।

(तल्खीस अज तारीख इस्लाम, जिल्द:१, अज पृष्ठ: १९१ से १९३)

और विस्तार के लिए आप किताबुल खराज, तारीखे तबरी जिल्द:५, फुतुहुल बिलदान में सम्बंधित बहस देखिये।

इस उद्धरण से, बिरादराने वतन एक अच्छा विचार प्राप्त कर सकते हैं कि इस्लाम राष्ट्रीय एकता, सहिष्णुता, न्याय और समानता, भाईचारे और एक-दूसरे के अधिकारों के लिए सम्मान का झंडावाहक है। वह खून-खराबे और शर व फसाद की अनुमति नहीं देता है।

इतनी वजाहत के बाद हम सुरह तौबा की आयत :२९ की तरफ आते हैं इस आयत में मुसलमानों को अहले किताब यहूद व नसारा के साथ उस वक्त तक किताल करने का हुक्म दिया गया है जब तक कि वह जजिया अदा करने पर तैयार ना हो जाएं जैसा कि यह इस आयत के आखरी जुज़: "مِنَ الَّذِیۡنَ اُوۡتُوا الۡکِتٰبَ  حَتّٰی یُعۡطُوا  الۡجِزۡیَۃَ  عَنۡ ‌یَّدٍ  وَّ ھُمۡ صغرون" से ज़ाहिर है।

इस आयत में यहूद व नसारा से किताल की चार माकूल वजहें ब्यान की गई हैं:

(१) यह लोग अल्लाह पर ईमान नहीं लाते।

(२) यह लोग कयामत पर ईमान नहीं रखते।

(३) अल्लाह और रसूल ने जिस चीज को हराम करार दिया है; उसे यह लोग हराम नहीं मानते।

(४) यह लोग दीने हक़ की पैरवी नहीं करते।

अल्लाह पर ईमान लाने का मतलब है कि उसकी वहदानियत के साथ उसकी ज़ात और उसकी तमाम सिफाते सबुती और सल्बी पर भी ईमान लाया जाए और कुछ मुफस्सेरीन ने अल्लाह पर ईमान लाने में उसके रसूलों पर भी ईमान लाने को दाखिल करार दिया है। यहूद व नसारा अगरचह इस बात के मुद्दई हैं कि वह अल्लाह पर ईमान रखते हैं लेकिन उनका यह दावा बातिल महज़ है इसलिए कि यहूद अल्लाह पाक की जिस्मियत के कायल हैं और नसारा हुलुल के मोअतकिद हैं जैसा कि यह इसके बाद वाली आयत: ३० से साबित है।

وَ قَالَتِ الۡیَہُوۡدُ عُزَیۡرُ  ابۡنُ اللّٰہِ وَ قَالَتِ النَّصٰرَی الۡمَسِیۡحُ ابۡنُ اللّٰہِ ﴿۳۰

और यहूद बोले उजैर अल्लाह का बेटा है और नसरानी बोले मसीह अल्लाह का बेटा है। (कन्जुल ईमान)

यहूदी हजरत उजैर अलैहिस्सलाम को अल्लाह पाक का बेटा मानते हैं और इसकी वजह मुफ़स्सेरीन ने यह बयान की है कि यहूदियों ने हजरत मुसा अलैहिस्सलाम के बाद बहुत से अम्बिया को क़त्ल कर डाला जिसकी पादाश में अल्लाह पाक ने उनसे तौरेत को उठा लिया (उनके दिलों से उसे महव कर दिया) लेकिन फिर अल्लाह पाक ने एक ज़माने के बाद हज़रत जिब्राइल अमीन अलैहिस्सलाम के जरिये हज़रत उजैर अलैहिस्सलाम को तौरेत हर्फ़ ब हर्फ़ याद करा दिया जिसकी वजह से यहूदियों ने यह कहना शुरू कर दिया कि अल्लाह तौरेत केवल अपने बेटे के सीने में ही इलका कर सकता है जैसा कि तफसीर अबी सउद में है:

"ماجمع اللہ التوراۃ فی صدرہ وھو غلام الا انہ ابنہ"[ تفسیر ابی سعود، ج: 4، ص: 59]

और ईसाई हजरत इसा अलैहिस्सलाम को खुदा का पुत्र मानते हैं। इसका कारण यह है कि वह पिता के बिना मरियम अलैहिस्सलाम के कॉलर, आस्तीन या दामन या उनके मुंह में जिब्राइल अलैहिस्सलाम के दम करने से पैदा हुए थे। इसका एक कारण यह है कि इसा अलैहिस्सलाम अल्लाह की आज्ञा से मृतकों को जीवित करते थे और अल्लाह की आज्ञा से कुष्ठ रोग जैसे लोगों को ठीक करते थे, जिसके कारण ईसाई मानते थे कि इब्न अल्लाह के अलावा किसी और के लिए यह काम असंभव है, जैसा कि तफसीरे अबी सऊद में है:

" وانما قالوہ استحالۃ لأن یکون ولد بغیر اب أو لأن یفعل ما فعلہ من ابراء الاکمہ   و الأبرص و إحیاء الموتیٰ من لم یکن الٰھاً. "

इसी तरह यह लोग आखिरत पर भी ईमान नहीं रखते थे और वही ए मतलू या गैर मतलू से जिसकी तहरीम साबित है उसको यह लोग हराम मानते थे, हद तो यह है कि तौरेत व इंजील में तहरीफ़ कर देते और दीने हक़ जो दीने इस्लाम है और तमाम अम्बिया के दीनों के लिए नासिख है, उस दीन की भी यह लोग पैरवी नहीं करते थे, इसी के साथ ही साथ यह लोग अहद व पैमान की भी पासदारी नहीं करते थे और हमेशा शर व फसाद पर आमादा रहते थे इन सब कारणों से उनसे किताल का हुक्म दिया गया है लेकिन साथ ही साथ यह रिआयत भी बरती गई कि अगर यह लोग ईमान ले आएं या ईमान न लाने की की सुरत में जिज़या की अदायगी पर आमादा हो जाएं तो उनके साथ किसी तरह की छेड़ छाड़ नहीं की जाएगी और जिज़या की अदायगी के बदले में कमा हक्कुहू उनके हुकुक और जान व माल की हिफाज़त की जाए।

जारी............

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मौलाना बदरुद्दूजा रज़वी मिस्बाही, मदरसा अरबिया अशरफिया ज़िया-उल-उलूम खैराबाद, ज़िला मऊनाथ भंजन, उत्तरप्रदेश, के प्रधानाचार्य, एक सूफी मिजाज आलिम-ए-दिन, बेहतरीन टीचर, अच्छे लेखक, कवि और प्रिय वक्ता हैं। उनकी कई किताबें अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमे कुछ मशहूर यह हैं, 1) फजीलत-ए-रमज़ान, 2) जादूल हरमयन, 3) मुखजीन-ए-तिब, 4) तौजीहात ए अहसन, 5) मुल्ला हसन की शरह, 6) तहज़ीब अल फराइद, 7) अताईब अल तहानी फी हल्ले मुख़तसर अल मआनी, 8) साहिह मुस्लिम हदीस की शरह

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