अयाज़ निज़ामी, न्यु एज इस्लाम
5 जून, 2013
सही मुस्लिम, किताबुल ईमान की हदीस है: अनिन नबीये सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम काल: बनीयिल इस्लाम अला खमसतः अला अन यूहदल्लाहो वएकामस्सालातो वइताइज़्ज़कातो वसियामा रमज़ान वल हज
अनुवाद: नबी करीम ने फरमाया कि इस्लाम की बुनियाद पांच चीज़ों पर है। अल्लाह को एक क़रार दिया जाए, नमाज़ क़ायम की जाए, ज़कात अदा की जाए, रमज़ान के रोज़े रखे जाएं और हज अदा किया जाए।
मैं इस लेख में इस्लाम के पाँच मुख्य सिद्धांतों का संक्षिप्त विवरण और मुसलमानों के जीवन पर इन अमल के सामान्य प्रभाव की समीक्षा बयान करना चाहता हूँ।
तौहीद (एक खुदा का विश्वास): तौहीद का अर्थ ये है कि इंसान ये विश्वास रखे कि इस ब्रह्मांड का निर्माता एक है, वही इबादत के लायक़ है, इसलिए कई खुदाओं की पूजा के बजाय एक खुदा की इबादत की जाए। तौहीद के विश्वास का अनिवार्य प्रभाव एक एकेश्वरवादी के जीवन में विचारों की एकाग्रता के रूप में प्रकट होना चाहिए। अगर एक समाज में विभिन्न खुदाओं की इबादत की जाती होगी तो मैं इनमें अपने अपने खुदाओं को दूसरों के खुदाओं से बेहतर करार दिए जाने की बुनियाद पर विरोध करना और लड़ना झगड़ना हो सकता है , लेकिन तौहीद अपने मानने वालों को ये मौक़ा ज़रूर प्रदान करता है कि कम से कम खुदा की ज़ात के हवाले से उनके आपसी मतभेदों के आधार खत्म हो जाएं। दुनिया के कई धर्म, तौहीद के अलमबरदार होने का दावा करते हैं, लेकिन इस्लाम का एकेश्वरवाद का विश्वास दूसरे धर्मों की तुलना में सरल, आसानी से समझ में आने वाला और विकसित है।
लेकिन हैरानी की बात ये है कि दुनिया के सबसे विकसित विश्वास एकेश्वरवाद रखने वाले मुसलमान आपसी मतभेद और असहिष्णुता में दूसरे धर्मों के मानने वालों की तुलना में विशिष्ट स्थान रखते हैं और अपने इस व्यवहार में दुनिया में सबसे ज़्यादा देवताओं को मानने वाले हिंदुओं से भी आगे बढ़े हैं जो 33 करोड़ देवी देवताओं को पूजा के योग्य समझते हैं। दुनिया भर में फैले हुए विभिन्न क़ौमों से जुड़े मुसलमानों में असहमति और असहिष्णुता का रवैया आमतौर पर समान रूप से पाया जाता है, जिससे पता चलता है कि तौहीद के दावेदारों की ज़िंदगी में तौहीद का विश्वास उनके निजी जीवन और सामूहिक जीवन में कोई भूमिका नहीं निभा पाया। दुनिया की आबादी का पांचवां हिस्सा आपसी मतभेदों को खत्म करने के लिए एक ज़बरदस्त संयुक्त मूल्य (Common Value) रखने के बावजूद न सिर्फ सहमति और तौहीद की बरकत से महरूम है बल्कि आपस में बहुत बुरी तरह से संघर्ष कर रहे हैं।
सलात (नमाज़) - इस्लाम में सलात या नमाज़ को धर्म का स्तंभ करार दिया गया है, यानि धर्म की पूरी इमारत नमाज़ पर क़ायम है। नमज को अदा करने का अंदाज़ मैदाने जंग में एक लश्कर के अनुशासन से बहुत मेल खात है। जिसमें एक सिपहसालार लश्कर का नेतृत्व कर रहा होता है, एक नक़्क़ारची होता है जो सिहपसालार के सभी आदेशों और संदेशों को लश्कर के सभी लोगों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी को पूरा करता है, और फिर पंक्तिबद्ध सेना, जो अपने सेनापति के एक एक आदेश को सुनकर पूरी लगन से ही अंजाम देने की कोशिश करती है। नमाज़ को अदा करने का तरीका भी उसी संगठित अंदाज़ से होता है, और मुस्लिम उलमा जहां नमाज़ के दूसरे फायदों का ज़िक्र करते हैं वहाँ इस फायदे का विशेष उल्लेख होता है कि नमाज़ अदा करने से मुसलमान में अनुशासन पैदा होता है।
लेकिन जब हम मुसलमानों के व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन की समीक्षा करते हैं तो हमें मुसलमानों का व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन अनुशासन के गुण से पूरी तरह खाली एक बेमेल भीड़ की तरह नज़र आता है। एक मुसलमान के व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन में नमाज़ के माध्यम से अनुशासन पैदा होने का कोई नमूना हमें नज़र नहीं आता। क़ुरान की ही एक आयत में ज़िक्र है कि नमाज़ बुराई से रोकती है, लेकिन निरीक्षण और अनुभव इसके बिल्कुल विपरीत है, और हम अपने दैनिक जीवन में ऐसी बहुत सी घटनाएं देखते हैं कि बहुत पाबंदी से नमाज़ अदा करने वाले लोग बड़ी दीदा दिलेरी से सामाजिक एवं अन्य बुराइयों को करते नज़र आते हैं।
वक्त की पाबंदी को भी नमाज़ की पाबंदी के फायदे में से गिनवाया जाता है, लेकिन मुसलमानों में बतौर क़ौम नमाज़ का ये असर भी बहुत ही कम ही दिखता है।
सियाम (रोज़े): सौम या रोज़ा शरई तौर पर रमज़ान के दिन के खास हिस्से में खाने, पीने और शारीरिक सम्बंध से खुद को रोके रखने का नाम है। रोज़ा इस्लाम की प्रमुख इबादतों में से एक है, और रमज़ान का महीना इस्लाम में विशेष महत्व रखता है।, रमज़ान के महीने में मुसलमान रोज़े रखते हैं, तरावीह जैसी इबादत अंजाम देते हैं जिसे अदा करने का मौका साल भर में सिर्फ रमज़ान में ही मिलता है। क़ुरान भी माहे रमज़ान में उतरा, शबे कदर भी रमज़ान के आखरी दस दिनों में तलाश की जाती है। रमज़ान के अंत में मुसलमान अपना महत्वपूर्ण त्योहार ईदुल फितर मनाते हैं। सबसे बढ़कर अहम बात ये है कि रमज़ान के महीने में शैतान को कैद कर दिया जाता है।
रमज़ान का पूरा महीना मानों मुसलमानों के लिए एक ट्रेनिंग कैम्प है जिसमें मुसलमानों के वैचारिक और व्यावहारिक प्रशिक्षण का आयोजन किया जाता है ताकि मुसलमान भूख, प्यास को बर्दाश्त करने के प्रशिक्षण से गुज़र कर व्यावहारिक जीवन में पेश आने वाली कठिनाइयों का सामना धैर्य और बर्दाश्त के माध्यम से कर के एक ऐसा समाज बना सकें जिसकी बुनियाद धैर्य और बर्दाश्त जैसे उच्च गुणों और खूबियों पर स्थापित हो।
रमज़ान के महीने में मुसलमानों के इस क़दर कठिन वैचारिक और व्यावहारिक प्रशिक्षण के बावजूद देखते हैं कि मुस्लिम समाज में धैर्य और सहन करने का व्यवहारिक नमूना बिल्कुल नज़र नहीं आता। रमज़ान का महीना गुजरना तो दूर, मुसलमान रमज़ान में आप ही को धैर्य और धीरज के दायरे से बाहर होते हुए आमतौर पर नज़र आ जाते हैं। ज्यों ज्यों रोज़ा अफ़तार का समय करीब आता है, बाज़ार, पड़ोस और सड़कों पर असंतोष और असहिष्णुता के बीसियों व्यावहारिक नमूने आप खुद अपनी निगाहों से देख सकते हैं। शैतान के कैद होने के बावजूद अपराध की दर में कोई कमी नहीं होती, बल्कि जमाखोरी और मुनाफ़ाख़ोरी अपने चरम पर होती है।
ज़क़ातः मुसलमानों पर फर्ज़ है कि साल भर की ज़रूरत से अधिक आय पर ढाई प्रतिशत की दर से ज़कात अदा करें। ज़कात को माल का शुद्धिकरण भी कहा जाता है। ज़कात का मसरफ क़ुरान के अनुसार गरीब और फकीर हैं। दौलतमंद मुसलमानों पर ज़कात अनिवार्य करने का मकसद क़ुरान में वर्णित मसरफ से भी स्पष्ट होता है कि गरीब और कमज़ोर लोगों की मदद हो, गरीबी का उन्मूलन हो, और त्याग की भावना पैदा हो।
लेकिन हम देखते हैं कि दुनिया में अमीर और हैसियत वाले मुसलमानों की अच्छी खासी तादाद और ज़कात की व्यवस्था की मौजूदगी के बावजूद दुनिया का कोई एक क्षेत्र भी इस हवाले से मिसाल के तौर पर पेश नहीं किया जा सकता जहां ज़कात की व्यवस्था के माध्यम से गरीबी उन्मूलन हुआ हो। दुनिया भर में गरीबी और गरीबी रेखा से नीचे जीवन जीने वालों की एक बहुत बड़ी आबादी में मुसलमान शामिल हैं। उलमा ये स्पष्ट करते हैं कि ज़कात की राशि सिर्फ मुसलमानों पर ही खर्च की जा सकती है (हालांकि क़ुरान ज़कात की रक़म गैर मुसलमानों पर खर्च करने की मनाही नहीं करता है) इस स्पष्टीकरण के बाद व्यवहारिक रूप से ऐसा होना चाहिए कि दुनिया में ढूंढने से भी कोई भी गरीब मुसलमान न मिलता। लेकिन स्थिति ये है कि आँख बंद करके दुनिया भर के गरीबों पर हाथ रखा जाए तो हर दूसरा गरीब मुसलमान निकलेगा।
हज: हज एक ऐसी इबादत है जो मुसलमान पर जीवन भर क्षमता की शर्त के साथ एक बार अदा करना अनिवार्य है। उलमा हज की हिकमत की व्याख्या करते हुए बयान करते हैं कि हज एक ऐसी इबादत है जिसके सामूहिक और व्यक्तिगत फायदे हैं। सामूहिक लाभ ये है कि हज मुसलमानों की अंतर्राष्ट्रीय कांफ्रेंस है, जिसमें मुसलमान साल भर में एक बार जमा होकर अपने राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक समस्याएं बयान कर सकें और संयुक्त रूप से उनका हल तलाश कर सकें। हज का व्यक्तिगत लाभ ये बताया जाता है कि हज के अदा करने के बाद एक मुसलमान पापों से इस तरह पाक और साफ हो जाता है जैसे एक नवजात मासूम बच्चा जिस पर कोई गुनाह नहीं होता। इस्लाम के दूसरे अमल की तरह हम देखते हैं कि हज का भी मुसलमानों के सामूहिक और व्यक्तिगत जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। पूरी दुनिया में मुसलमानों की स्थिति किसी स्पष्टीकरण की मोहताज नहीं है। मुसलमान एक क़ौम के रूप में राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से अत्यंत पिछड़े हैं। हज के माध्यम से कभी मुसलमानों की किसी सामूहिक समस्या का समाधान नहीं निकाला जा सका। हज मुसलमानों में एकता और सहमति स्थापित करने में बिल्कुल बेअसर साबित हुआ है। मौजूदा दौर में स्थिति ये है कि हर साल लगभग तीस से चालीस लाख लोग हज करते हैं जिस पर समग्र रूप से अरबों रुपये खर्च होते हैं। सऊदी सरकार ने अपने कानून कुछ इस तरह बना रखे हैं कि मुसलमानों की उम्र भर की कमाई जो हज पर खर्च होती है उसका अधिकांश लाभ सऊदी शासक वर्ग को पहुंचता है। और ये प्राप्त लाभ कहाँ और किस काम में खर्च होता है कोई ढकी छिपी बात नहीं है।
इस्लाम तो अपने इन बुनियादी सिद्धांतों और इबादत से वांछित परिणाम प्राप्त नहीं कर सका लेकिन आपसी सहमति, अनुशासन, धैर्य और सहिष्णुता, गरीबी उन्मूलन, और सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं का हल पश्चिम ने बिना खुदा की वही की रौशनी के ही हासिल कर लिया।
URL for English article: https://newageislam.com/islamic-society/fundamentals-islamic-worship-its-effects/d/11896
URL for Urdu article: https://newageislam.com/urdu-section/fundamentals-islamic-worship-its-effects/d/11898
URL for this article: https://newageislam.com/hindi-section/fundamentals-islamic-worship-its-effects/d/11909