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Hindi Section ( 6 Sept 2011, NewAgeIslam.Com)

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Democracy and the Islamic world लोकतंत्र और इस्लामी दुनिया


अयाज़ अमीर

इस्लामी दुनिया ने कई कट्टर तानाशाहों को पैदा किया है। ट्युनिस के शासक बिन अली 23 बरसों तक बिना किसी रोक टोक के सत्ता का मज़ा लेते रहे और अब सऊदी अरब में पनाह लिये हुए हैं। ये बात आपको कुछ सोचने पर मजबूर करती है या नहीं? इस्लामी दुनिया के शासकों और दूसरे तानाशाहों का सबसे बड़ा रक्षक अमेरिका के सिवा कोई और नहीं।

इधर तीस साल से सत्ता पर काबिज़ आज के दौर का फिरऔन, हुस्ने मुबारक है। क्या ये लोग अपने ही साये से बेज़ार नहीं हो जाते? और जब ट्युनीसिया की मिसाल सामने रखते हुए क़ाहिरा के तहरीर चौक पर विरोधियों के मोर्चे सत्ता को चैलेंज करते नज़र आए, तो वो सत्ता को अपने बेटे अरजुमंद जमाल को सौंपना चाहता था, लेकिन बेटे ने ब्रिटेन में पनाह लेने को अक्लमंदी समझी।

तमाम मुस्लिम दुनिया में यही हालात हैं। हम लोकतंत्र को पसंद करने वाले नहीं हैं और जनता के प्रतिनिधियों के ज़रिए चलायी जाने वाली सरकार के बारे में कल्पना सिर्फ एक दिखावा है, जिसके तले तानाशाही और बादशाहत पुलिस की सख्ती ने कायम किये रखा है। जैसा कि मोरक्को, अल्जीरिया और जार्डन की सूरते हाल सामने है।

अगर अमेरिका को मिस्र के संकट पर चिंता है तो ये बात समझ में आती है।..ये हालांकि हम नहीं जानते कि इसका अंजाम क्या होगा और ये ऊँट किस करवट बैठेगा। अमेरिका की मध्य एशिया की दुनिया बिखर रही है, कैम्प डेविड समझौते के समय से ही इस क्षेत्र के लिए जो योजना अमेरिका ने बनायी उसमें मिस्र का रोल काफी अहम था। जिसके बाद मिस्र की इज़राइल के साथ शांति समझौता हुआ और इसने मिस्र को अमेरिका के एक बड़े सहयोगी के रूप में अभरने में मदद की। इज़राईल अपने सभी काम अपने राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखकर करता है, जबकि मुसलमान और अरबों ने अमेरिकी इच्छाओं की धुन पर नाचना अपना मत बना लिया है।

औपनिवेशिक व्यवस्था बहुत पहले अपनी मौत मर चुकी है, लेकिन गुलामी की मानसिकता से इस्लामी दुनिया ने अपना पीछा अभी नहीं छुड़ाया है। देखने में तो आज़ाद है लेकिन इस गुलामी मानसिकता के साथ आज़ादी के नाम पर एक घटिया मज़ाक़ हैं। अगर अरब अमेरिकी हथियारों की मंडी न हों तो अमेरिका की हथियार बनाने वाले उद्योगों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो जायेगा। हमारे भाई मँहगे हथियार खरीदते हैं, लेकिन वो किस से भयभीत हैं? शायद अपनी परछाईं से या फिर अपने दिल में बैठे डर से। क़तर के अमीर का कहना है कि अगर वो अमेरिकियों के अपने एयर बेस दोहा से निकाल बाहर कर दें तो उनके अरब भाई ही क़तर पर हमला कर देंगे।

लेकिन, अरब भाई ईरान से खौफज़दा हैं। विकीलीक्स ने इस खौफ की क़लई खोली है। सऊदी के बादशाह अमेरिका से दरख्वास्त कर रहे हैं कि ईरान पर हमला कर साँप का मुँह कुचल दें, युनाइटेड अरब अमीरात के एक राजकुमार भी ऐसी ही मांग कर रहे हैं। जब अरब की गलियों में, जो कि एक बहुत बड़ी आबादी है, लोग पढ़ते हैं और जब फिलिस्तीन में रहने वालों को विकीलीक्स के ज़रिए पता चलता है कि उनके लीडर किस शर्मनाक तरीके से इज़राइल के साथ समझौता कर रहे हैं, तो क्या हमें हैरत होगी अगर इस्लामी दुनिया में लोगों के गुस्से का ज्वालामुखी फूट पड़ा है। गुस्सा तो ट्युनीसिया में है लेकिन मिस्र में इसकी लहर देखने लायक है। इसकी आंच जार्डन और यमन में भी महसूस की जा रही है। इस आंदोलन को सिर्फ आर्थिक समस्याओं ने ही ताकत नहीं दी है, जबकि इस तरह के आंदोलनों में आर्थिक पहलू काफी निर्णायक होते हैं।

ये बग़ावत उस अपमान और निराशा के खिलाफ है जो मिस्र के फिरऔन जैसे छत्रपों की कभी न खत्म होने वाले शासन के जैसी है। अब दुनिया बहुत आगे बढ़ चुकी है, जबकि इस्लामी दुनिया अभी भी अतीत की दीवारों में चुनी हुइ है। कुछ देशों में बग़ावत की ये लहर इसी दीवार को गिराने की कोशिश है। हमें वाशिंगटन की सत्ता परिवर्तन की दिल को लुभाने वाली बातों के झांसे में नहीं आना चाहिए। अमेरिकियों के लिए मुबारक जो कभी बहुत मुबारक हुआ करते थे अब उनकी शर्मिंदगी की वजह बन गये हैं, और अमेरिका अब उसे सत्ता से बेदखल करना चाहता है, लेकिन उनको मिस्री जनता के हितों से कोई लेना देना नहीं है और न ही वहां लोकतंत्र चाहते हैं, बल्कि वो सिर्फ नजर रखे हुए हैं कि स्थिति क़ाबू से बाहर न हो जाये।

एक विदेशी टीवी चैनल के एक प्रोग्राम में जो सबसे अच्छा विश्लेषण मैंने देखा है वो ये है कि इज़राइल की सुरक्षा अरब के तानाशाहों पर निर्भर है। दूसरे शब्दों में इज़राइल की सुरक्षा की गारण्टी अरब दुनिया के तानाशाह ही हैं। इसलिए कोई कम अक्ल ही ये सोचेगा कि अमेरिका इन देशों में लोकतंत्र लाना चाहता है। इस्लामी भाईचारे को पेश खतरे के बारे में पश्चिमी मीडिया ने पहले ही उजागर कर रखा है, कि क्या आप उनके शरई क़ानून को लागू करना चाहते हैं। खौफ को बढ़ाने वालों आगे लाया जा रहा है, और पर्दे के पीछे ये भी शक है कि फौज से कहा जा रहा हो कि वो शांति कायम करने के लिए आगे आये। इसमें हो सकता है मुबारक को बलि का बकरा बना दिया जाये, लेकिन तब्दीली की लहर को रोक हालात को ज्यों का त्यों बनाये रखा जायेगा।

इसी तरह के घटनाक्रम को हमने पाकिस्तान में भी देखा, जब परवेज़ मुशर्रफ अमेरिका के लिए नाकाबिले बर्दाश्त हो गये तो उनको तब्दील करके अमेरिका ने एक नया लोकतांत्रिक चेहरा सामने पेश किया, ताकि न सिर्फ जनता को मुतमइन (संतुष्ट) किया जा सके बल्कि अफगानिस्तान में आतंक के खिलाफ जारी जंग में पाकिस्तान की भूमिका भी न बदलने दी जाए। इस लोकतंत्रिक परिवर्तन से अमेरिका जो चाहता था, वो उसको मिल गया। ऐसी सूरतेहाल में ज़रदारी और गिलानी से ज़्यादा कौन सूदमंद होगा?  मुशर्रफ के खिलाफ वकीलों का आंदोलन मिस्र के आंदोलनse रत्ती बराबर भी नहीं था, लेकिन अमेरिकियों का मकसद एक ही है कि जितनी जल्दी हो सके सत्ता परिवर्तन के दौर से गुज़रा जाए और मुबारक की ही तरह एक और मोहरे को लोकतंत्र की शोभा बनाकर पेश किया जाए और अवाम की आंखों में धूल झोंका जाए। मुबारक का जाना अब ठहर गया है और अब ये जानना मुश्किल है कि खून बहाये बग़ैर वो सत्ता में रह सकेंगें। मगर ये तब्दीली, क्रान्तिकारी तब्दीली न हो बल्कि सिर्फ चेहरा बदल दिया जाए। सिर्फ ईरान ही एक ऐसी मिसाल है जहाँ अमेरिका नाकाम हुआ है, वरना वो ऐसे हालात को संभालने में माहिर है। एक क्रान्तिकारी तब्दीली के लिए ज़रूरी है कि फौज में बंटवारा हो। इस पर ध्यान ने देकर कि तहरीर चौक मे प्रदर्शनकारियों और फौजियों में क्या दोस्ताना ताल्लुकात थे, बहरहाल मिस्री फौज एकजुट है। मुबारक के समर्थकों और विरोधिय़ों में झड़प काफी खतरनाक है और ये साबित करता है कि अभी मुबारक हथियार डालने के मूड में नहीं हैं और हालात खराब होने पर फौज का हस्तक्षेप ज़रूरी हो जायेगा। इसके बावजूद अहम सवाल ये है कि इस्लामी दुनिया अब भी क्यों तानाशाही के लिबादे में लिपटी हुई है? हम लोकतंत्र के समर्थक क्यों नहीं? हम एक आधुनिक राज्य की जरूरतों के बारे में स्पष्ट विचार क्यों नहीं रखते हैं?

स्रोतः www.pkcolumnist.com

(उर्दू से हिंदी अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम डाट काम)

URL for English and Urdu article:  http://www.newageislam.com/urdu-section/جمہوریت-اور-عالم-اسلام/d/4100

URL: https://newageislam.com/hindi-section/democracy-and-the-islamic-world--लोकतंत्र-और-इस्लामी-दुनिया/d/5422


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