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Hindi Section ( 29 Apr 2012, NewAgeIslam.Com)

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Sufism a Great Contribution to Islamic Civilization सूफीवाद का इस्लामी संस्कृति में महान योगदान है


असग़र अली इंजीनियर

(अंग्रेजी से अनुवादः समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

(इस्लाम एण्ड माडर्न एज, अप्रैल, 2012)

जो सूफीवाद का भ्रामक तौर पर विरोध करते हैं, वो एक सवाल खड़ा करते हैं- क्या इस्लाम वही है जो सूफीवाद है? तो फिर सूफीवाद क्यों, इस्लाम ही काफी है, और क्या सूफीवाद इस्लाम के खिलाफ है? तो फिर हमें सूफीवाद की जरूरत नहीं है। ऐसे बहुत से लोग जो न तो इस्लाम और न ही सूफीवाद के बारे में जानते हैं वो भ्रामत तौर पर इस तरह के सवाल खड़े करते हैं। सच्चाई ये है कि अन्य धर्मों या विचारों की तरह इस्लाम में भी कई रुझान हैं और इस्लाम में कई रुझान, समुदाय और नज़रिया हैं। सूफीवाद इनमें से एक है।

वास्तव में कोई भी इस तरह के रुझान के लिए प्रश्न खड़े कर सकता है। उदाहरण के लिए क्या वहाबी नज़रिया वही है जो इस्लाम है? फिर हमें इस्लाम की जरूरत है न कि वहाबी नज़रिया की या क्या वहाबी नज़रिया इस्लाम के खिलाफ है? तब हमें इस्लाम की जरूरत है न कि वहाबी नज़रिया की जरूरत है। इस तरह की भ्रामक राय का इज़हार जिहालत को धोखा देता है, जैसा कि ऊपर में पहचान की गई है। असल में हर रुझान कुछ कारणों से उभर कर सामने आता है। जो लोग उसे सामाजिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक नज़रिया से नहीं लेते और हर चीज़ को फिकहा के रूप में समझने की कोशिश करते हैं वही इस तरह की गलती करते हैं।

कोई धार्मिक या वैचारिक रुझान दिए गए सामाजिक ऐतिहासिक या सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों में उभर कर सामने आता है और एक विशेष रुझान को समझने के लिए उन स्थितियों को जानना आवश्यक है। सूफीवाद भी कुछ ठोस स्थिति में उभर कर सामने आया और इसी तरह सूफीवाद जो वहाबी विचारधारा की निंदा करता है। दोनों बिल्कुल ही एक दूसरे से अलग सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों में उभर कर सामने आए हैं। और ये स्थिति में एक दूसरे के बिल्कुल विपरीत थे।

सूफी हज़रात के अनुसार नबी करीम मुहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम पहले सूफी थे और कुछ के अनुसार हज़रत अली रज़ि. पहले थे। बहरहाल जो भी रहा हो रसूल अल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम और हज़रत अली में वो खूबियाँ थीं जिनसे सूफी हज़रात प्रेरणा पाते हैं। हम इनके बारे में थोड़ी देर बाद बात करेंगे। लेकिन पहले यह ध्यान देने योग्य है कि वो हालात जिनमें इस्लाम में  ये रुझान पैदा हुए एक दूसरे के विपरीत कल्पना किए जाते हैं। ये भी उल्लेखनीय होना चाहिए कि हालांकि फ़िक़्ही रूप से ये एक दूसरे का विरोध कर सकते हैं लेकिन लेकिन हम सामाजिक और मनोवैज्ञानिक नज़रिये से इस पर बात करें तो ऐसा होना ज़रूरी नहीं है। किसी भी रुझान को उसकी सारी पेचीदगियों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

सूफीवाद दूसरी सदी हिजरी में तब सामने आया जब दो मुस्लिम शाही घरानों बनू उमैय्या और अब्बासियों के बीच राजनीतिक संघर्ष अपने चरम पर था। ये राजनीतिक सत्ता के लिए एक दूसरे से संघर्ष कर रहे थे और अपनी लड़ाई को जायज़ ठहराने के लिए इस्लाम और कुछ तथाकथित धार्मिक सिद्धांतों का इस्तेमाल करते थे। सत्ता की इस लड़ाई में बहुत खून बहा और लाखों मुसलमान इसमें अपनी जान गँवाये।

इस तरह इस्लाम सत्ता की इस लड़ाई में अपनी आध्यात्मिकता को खो रहा था और सत्ता पर कब्जा करने के लिए एक राजनीतिक माध्यम के रूप में सीमित होता जा रहा था। कुछ लोग जो राजनीतिक सत्ता के खिलाफ थे और जिनके लिए धर्म शक्ति के माध्यम से अधिक आध्यात्मिकता मामला था, मुसलमानों के बीच खून खराबे से हैरान थे और इस तरह के संघर्ष से स्वयं को अलग कर लिया और आध्यात्मिक होने के लिए आवश्यक सरल जीवन जीना शुरू कर दिया।

इस अवधि के दौरान हमारे सामने दो महान नाम उभर कर सामने आते हैं और दिलचस्प रूप से एक मर्द और एक औरत यानी हज़रत हसन बसरी रह. और हज़रत राबिया बसरी रह. दोनों  का बहुत सम्मान किया जाता है और दोनों ने खुद को राजनीतिक संघर्षों से दूर रखा और आध्यात्मिक तरीके से जीने के लिए खुद को समर्पित कर दिया। लेकिन हज़रत राबिया बसरी रह. अपने जीवन को मुख्य रूप से आध्यात्मिक रूप पर समर्पित किया था, और हज़रत हसन बसरी रह. भी सामाजिक रूप से सक्रिय थे और आलिमाना गतिविधियों में लगे हुए थे। लेकिन कोई भी राजनीतिक महत्वकांक्षा नहीं थी।

हज़रत हसन बसरी रह. बनू उमैय्या के भाग्य के सिद्धांत का समर्थन करने से इन्कार कर दिया और उसकी बजाय हज़रत इमाम हसन रज़ि द्वारा हज़रत माविया को लिखे गए पत्र का हवाला देते हुए स्वतंत्र इच्छा के नज़रिया का समर्थन किया। बनू उमैय्या भाग्य के सिद्धान्त को बढ़ावा दे रहा था ताकि उनकी सत्ता को मुसलमान अल्लाह की इच्छा मानकर स्वीकार कर सकें। हज़रत हसन बसरी रह. का मुसलमान बहुत सम्मान करते थे और आपने बहुत ही सरल और आध्यात्मिक जीवन बिताया। वो बड़ी संख्या में लोगों को कुरान की शिक्षा देते और उनके एक शिष्य ने अल-मोतज़िला समुदाय की स्थापना की।

हजरत राबिया बसरी रह. का भी बहुत सम्मान किया जाता था और बहुत सरल जीवन आपने बिताया और आपके कई मानने वाले बहुत से चमत्कार उनसे जोड़ कर पेश करते  थे। एक महत्वपूर्ण सिद्धांत जिस पर सूफी हज़रात विश्वास रखते हैं, तवक्कल, यानी अल्लाह पर पूरा भरोसा। उनमें से बहुत से लोग रोजी रोटी के लिए कुछ भी कोशिश नहीं करते हैं क्योंकि अल्लाह उन्हें सब कुछ प्रदान करेगा। वो इंतजार करते हैं कि कोई उनके लिए खाना लाएगा और इक्सर इस इंतेज़ार में वो भूखे रह जाते हैं, अगर कोई उनके लिए कुछ भी नहीं लाता है। वो इसे भी अल्लाह की मर्ज़ी मानते हैं।

कई लोगों का मानना ​​है कि सूफी 'शब्द सुफ से बना है जिसका अरबी में मतलब ऊन से है क्योंकि ये सूफी हज़रात ढीला ढाला ऊन का कपड़े पहनते थे क्योंकि वो सादगी से जीने में विश्वास रखते थे। हालांकि कई विद्वानों इस शब्द के मूल को अस्वीकार करते हैं लेकिन बावजूद इसके ये एक लोकप्रिय विश्वास है। ये ध्यान देने योग्य है कि सूफी हज़रात आमतौर पर खलीफा या राजा की अदालत में हाज़िरी नहीं देते थे। कुछ तो तब भी नहीं जाया करते थे जब शासक की तरफ से बुलावा आता था।

हजरत निज़ामुद्दीन औलिया के बारे में प्रसिद्ध कहानी है जिन्होंने न सिर्फ राजा की अदालत में जाने से इन्कार कर दिया बल्कि अपने शिष्य हज़रत अमीर ख़ुसरो को बताया कि जब उन्हें बताया गया कि राजा स्वयं उनसे मिलने आएंगें तो "अगर राजा एक दरवाजा से मेरी ख़ानक़ाह में आते हैं तो मैं दूसरे दरवाजे से निकल जाउंगा।" इन सूफी हज़रात का विश्वास था कि हुक्मरान शोषण करने वाले हैं और राजनीतिक शक्ति प्राप्त करने के लिए खून बहाने से भी नहीं हिचकिचाते हैं। वो लोगों की सेवा नहीं करते बल्कि लोग उनकी सेवा करते हैं।

ये सच है कि बहुत से सूफी हज़रात ने शासकों से ज़मीन सहयोग के रूप में स्वीकार किया था लेकिन गरीब लोगों के लिए खाने की व्यवस्था करने के लिए इस ज़मीन से होने वाली आमदनी का इस्तेमाल किया। इन लोगों ने भी जनता की आध्यात्मिक आवश्यकताओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ये भी उल्लेखनीय है कि मुसलमान सिर्फ कानूनी समस्याओं के लिए उलेमा के पास जाते हैं इसके अलावा उनका सम्मान नहीं करते। हम किसी ऐसे आलिम की एक कब्र तलाश नहीं कर पाते हैं जहाँ लोग जाते हों जबकि सूफी संत की कब्रें लोगों की महान आस्था के केंद्र हैं।

इसलिए विशेष रूप से बहुत से उलेमा  सूफी हजरात से हसद (ईर्ष्या) करते थे कि वो जनता में अपने जीवन के दौरान और मौत के बाद भी बहुत लोकप्रिय थे। उलेमा ने आमतौर पर शासकों के दरबार में (बेशक कुछ अपवादों को छोड़कर) पदों को स्वीकार किया और वे शोषण करने वाले वर्ग के हिस्से के रूप में माने गए जबकि सूफी हज़रात नेक और आध्यात्मिक होने के कारण शासकों से दूरी बनाए रखा।

दूसरी ओर इस्लाम का वहाबी समुदाय, 18वीं सदी में अब के सऊदी अरब में सामनेआया। जब मोहम्मद अब्दुल वहाब नाम के एक आलमि ने मुसलमानों को मदीना में पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के रौज़ए मुबारक पर पूजा, नोहा और वसीला हासिल करते और बहुत से चमत्कारो से उनको जोड़ते देखा। वो अपने अंदाज़ में कट्टर थे और लोगों को पैग़म्बरों और संतों को परेशानियों को दूर करने वाला बताने से नाराज़ थे। उनका विश्वास था कि कोई संतों से वसीला के लिए दुआ नहीं कर सकता और सिर्फ़ अल्लाह से दुआ कर सकता है।

ये सच है कि 18वीं सदी तक सूफी हज़रात के अमल में बहुत पतन आ गया था। सूफीवाद का मतलब भ्रष्ट शक्तियों और में मोमिनों के बेवजह खून बहा के ख़िलाफ़ बग़ावत थी क्योंकि सूफीवाद का पूरा जोर सादगी, ईमानदारी और नेक जीवन जीने पर था। यह तक़वा और बे गरज़ी है जिसने सूफी हज़रात को जनता के बीच लोकप्रिय बनाया और वो जनता के लिए आदर्श बन गए। इस तरह सूफीवाद इस्लाम को फिर उपयुक्त बनाकर, जिसके लिए इस्लाम का ज़हूर था, के द्वारा एक महत्वपूर्ण जरूरत को पूरा किया, क्योंकि खुद मोमिनों ने सत्ता संघर्ष के लिए इसका दुरुपयोग किया और सूफीवाद ने उसकी जगह ले ली। इस तरह एक समय पर सूफीवाद ने महान सामाजिक और ऐतिहासिक जरूरत को पूरा किया।

वहाबी नज़रिये ने भी एक हद तक धार्मिक जरूरतों को पूरा किया लेकिन उसने सूफीवाद की निंदा की और इसे पूरी तरह खारिज कर दिया। वहाबी नज़रिया कट्टरवादी बन गया और जनता को उनकी आध्यात्मिक जरूरत से वंचित कर दिया। बेशक सूफीवाद चमत्कार में अंधविश्वास के बारे में नहीं होना चाहिए बल्कि जनता के बीच कुछ लोकप्रिय अमल और आस्था में सुधार के लिए होना चाहिए न ही इसे पूरी तरह खारिज किया जाना चाहिए, जो धर्म के मूल और इस्लाम के आध्यात्मिक पहलू पर जोर देता है।

लेकिन वहाबी विचारधारा के मानने वाले सूफी इस्लाम को न सिर्फ खारिज करते हैं बल्कि इसमें विश्वास रखने वालों को काफ़िर कहते हैं। भारत में वहाबी देवबन्दी के रूप में जाने जाते हैं क्योंकि दारुल उलूम देवबंद वहाबी शिक्षा का केंद्र है और सूफी इस्लाम में विश्वास रखने वाले बरेलवियों के रूप में जाने जाते हैं, क्योंकि सूफी इस्लाम का केंद्र उत्तर प्रदेश के बरेली में है। दोनों एक दूसरे की निंदा करते हैं और एक दूसरे से संबंध रखने वाली मस्जिद में या एक दूसरे के पीछे नमाज़ अदा करने से इंकार करते हैं।

यह ध्यान देने योग्य है कि सूफी इस्लाम उन संस्कृतियों में फला फूला जिनका लंबा सांस्कृतिक इतिहास रहा है और वहाबी इस्लाम नज्द में फला फूला, जो एक शुष्क रेगिस्तान था जिसकी कोई संस्कृति नहीं थी। सूफीवाद एक इंसान की अंदरूनी व्यक्तित्व औऱ जो कुछ इस से संबंधित है, पर जोर देता है और आंतरिक दूरदृष्टि किसी के वजूद में तब पैदा हो सकती है जिसकी संस्कृति की समृद्ध इतिहास वाली हो और जिस व्यक्ति के भीतर गौरो फिक्र और दार्शनिक दूरदृष्टि हो।

इस तरह हम देखते हैं कि सूफी इस्लाम इराक, ईरान, मिस्र, मध्य एशियाई क्षेत्र, भारत और दक्षिण पूर्व एशिया में फैला क्योंकि ये क्षेत्र बहुत समृद्ध सांस्कृतिक इतिहास और संस्कृति वाले थे। सूफी फिक्र की सभी महान (मकतबे फिक्र) विचारधाराएं ईरान, इराक, और मध्य एशिया के क्षेत्र में पैदा हुईं। सूफी हज़रात कुरानी आयात के बातिनी मतलब में विश्वास रखते हैं और उनके अनुसार यही बातिन मतलब कुरान का निचोड़ था।

कुरानी आयात का यही बातिनी मतलब बिना दार्शनिक और समृद्ध आध्यात्मिक परंपराओं के रेगिस्तानी स्थिति में सामने नहीं आ सकता था। ये समृद्ध सांस्कृतिक क्षेत्रों में ही संभव था जो सूफी इस्लाम के केन्द्र बन गए थे। उदाहरण के लिए मोहियुद्दीन इब्ने अल-अरबी और उनके मकतबे फिक्र जिसे वहदचुल वजूद कहा जाता है, को लें, जो सूफी मकतबे फिक्र के सबसे लोकप्रिय मकतबे फिक्र में से एक है और जो दक्षिण एशियाई क्षेत्र में विकसित हुआ। उनकी रचना फुसूसुल-हिकाम दार्शनिक दूरदृष्टि और इंसान के आंतरिक अस्तित्व के बारे में है।

इब्ने अल-अरबी तौहीद के सिद्धांत पर जोर देते थे (खुदा की वहदानियत का मतलब ये है कि वास्तविक अस्तित्व केवल एक है और हम सब का अस्तित्व भी उससे ही है)। इस तरह एक ही अस्तित्व से सभी इंसानों के होने का दर्शन सबको शामिल करने का दर्शन है और उसने अलगाव की सभी दीवारों को ढहा दिया। सूफी, विशेष रूप से वहदतुल-वजूद मकतबे फिक्र के सूफी काफी स्वतंत्र विचार और सबको साथ लेकर चलने वाले रहे हैं। इब्ने अल-अरबी ने भी पूरी मानवता से प्रेम पर जोर दिया है। उन्होंने तो यहां तक ​​कहा है कि हबी मेरी शरीयत और मेरा धर्म है।

एक और महान सूफी मौलाना रूम जो अपनी मसनवी के लिए प्रसिद्ध हैं और जिसे फ़ारसी भाषा का कुरान कहते हैं। मौलाना रूम ने भी पूरी मानवता से प्रेम करने पर जोर दिया है और यहां तक ​​कहा है कि मेरी असली पहचान प्यार है। मौलाना रूम की मुसलमानों के अलावा सभी धर्मों यहूदी, ईसाई और आग की पूजा करने वाले सम्मान करते हैं और उनके अंतिम संस्कार में सभी धर्मों के लोग शामिल हुए थे। वह सभी शोक व्यक्त कर रहे थे कि आज उनका पैगम्बर नहीं रहा। सूफी हज़रात की सबको शामिल करने का अमल इनका महान काम था।

दक्षिण एशिया के चिश्ती सूफी हज़रात- बाबा फरीद, अजमेर के ख्वाजा हजरत मोईनुददीन चिश्ती और दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन औलिया और गुलबर्गा शरीफ के बाबा गेसू आदि का पूरे हिन्दुस्तान में सभी धर्मों के मानने वाले सम्मान करते हैं। आज भी मुसलमानों की तुलना में हिंदू उनकी दरगाह पर अधिक जाते हैं। इन सूफी हज़रात ने सभी धर्मों के बराबर सम्मान का प्रदर्शन किया क्योंकि उनके लिए आध्यात्मिकता सभी धर्मों की साझा विशेषता है। उनके लिए धर्म एक माध्यम नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक उद्देश्य था।

ये सूफी संत स्थानीय संस्कृतियों और भाषाओं के खिलाफ कभी नहीं थे बल्कि स्थानीय संस्कृतियों, संस्कार और रिवाजों और परंपराओं के साथ खुद को जोड़ा। ख्वाजा हसन नेज़ामी ने अपनी किताब फ़ात्मी दावते इस्लाम में विस्तार से ज़िक्र किया है कि कैसे सूफी हज़रात ने स्थानीय संस्कारों और रिवाजों और परंपराओं को अपनाया और उन्हें सूफी अमल का हिस्सा बना दिया। ख्वाजा हसन नेज़ामी के अनुसार पालकी में चंदन की लकड़ी को ले जाकर सूफी की कब्र को स्नान कराने की रस्म, हिंदू मंदिरों की रस्म थी जिसे सूफी हज़रात ने अपनाया था और मूर्ति की जगह सूफी संत की कब्र स्थानांतरित कर दिया था।

नागौर, राजस्थान के सूफी संत हमीदुद्दीन नागौर ने स्थानीय हिंदुओं की भावनाओं का सम्मान करने के लिए मांस खाना छोड़ दिया था और हमेशा अपने पास गाय रखते थे। वो अपने शिष्यों से बात नहीं करते थे जो मांस खाने के बाद उनके पास आते थे। उन्होंने अपने शिष्यों को निर्देश दिया था कि उनके पास न आएं अगर उन्होंने गोशत खाया है। हालांकि सभी सूफी हज़रात इस हद तक नहीं गए लेकिन इसके बावजूद वो अपने तरीके से स्थानीय संस्कृति और धार्मिक परंपराओं का सम्मान करते थे।

उलमा के विपरीत इन सूफी हज़रात ने किसी भी धर्म, जाति या वर्ग के खिलाफ किसी भी तरह के भेदभाव को व्यक्त नहीं किया, और किसी विभेज की तो बात ही मत कीजिए। उन्होंने सभी के साथ बराबर से सम्मान का व्यवहार किया।

दूसरी ओर उलेमा ने न सिर्फ हिंदुओं को काफ़िर समझकर इनसे दूरी बनाए रखी और इस्लाम को स्थानीय संस्कारों व रिवाजों और परंपराएं जो कुफ्र की ओर ले जाती हैं, उनसे आज़ाद कराने के लिए अभियान चलाया।

दूसरी ओर सूफी हज़रात ने अपने अमल में इन्हें अपनाया और समाहित किया। सूफी हज़रात के उस खुलेपन के नतीजे में विभिन्न धार्मिक समुदायों को एक दूसरे के करीब लाने में मदद मिली। शहंशाह अकबर जिन्होंने विभिन्न धर्मों के विद्वानों को अपने दरबार में बातचीत के लिए आमंत्रित किया और दो सूफी भाइयों अबुल फज़ल और फैज़ी से बहुत प्रभावित थे जो पारंपरिक उलेमा के अत्याचार का शिकार रहे और इससे बचने के लिए अकबर के दरबार में शरण चाहते थे।

एक और महान उदाहरण शाहजहाँ के बड़े बेटे दारा शिकोह ने स्थापित की, जिसने मुगलिया सल्तनत को औरंगाबाद ज़ेब के हाथों में जाने दिया। दारा शिकोह ने हिंदू शास्त्रों जैसे उपनिषद का गहराई से अध्ययन किया और यहां तक ​​कि इनमें से कुछ का फ़ारसी में अनुवाद किया। उन्होंने एक दिलचस्प किताब लिखी और उसका नाम बहुत महत्वपूर्ण रूप से मजमउल बहरैन कहा। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि दोनों धर्मों की शिक्षाएं समान है लेकिन फर्क सिर्फ भाषा में है, उनमें से एक संस्कृत में और दूसरा अरबी भाषा में है।

इस तरह दारा शिको लाहौर के महान सूफी संत मियां मीर के शिष्य शिष्य थे जिन्हें हर मंदिर की आधारशिला रखने के लिए आमंत्रित किया गया, जिसे स्वर्ण मंदिर भी कहा जाता है। सूफी हज़रात का संगीत के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान है जिसे उन्होंने भारतीय शास्त्रीय रागों से अपनाया था।

उलेमा हमेशा संगीत की निंदा करते थे और इसे हराम बताते थे और सीखना या बजाने को पाप समझते थे। लेकिन सूफी संत महफिले समा का आयोजन किया करते थे, जिसे सुनकर वह सरमस्ती के आलम में चले जाते थे। इस सेशन को तकनीकी तौर पर कव्वाली के रूप में जाना जाता था जो भारतीय शास्त्रीय रागों पर आधारित होता था और जिसे हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के प्रसिद्ध शागिर्द हज़रत अमीर ख़ुसरो ने ईजाद किया था। कव्वाली सूफी महफिले समा दक्षिण एशिया में सबसे लोकप्रिय हो गया और अधिकांश सूफी हज़रात इसमें भाग लेते थे।

हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की लोकप्रियता से ईर्ष्या करने वाले उलेमा ने उन पर इस्लामी शरीयत का उल्लंघन करने का आरोप था क्योंकि वो नियमित रूप से महफिले समा में भाग लेते थे। उलेमाओं ने राजा से शिकायत की और उन्हें जवाब तलब करने के लिए दरबार में बुलाया गया, केवल इसी अवसर पर वे राजा के दरबार में आए। उन्होंने कुछ हदीसों के आधार पर अपने रुख का बचाव किया और चले गए।

वास्तव में इस्लाम मुख्य रूप से संगीत पर प्रतिबंध नहीं लगाता है जिसे 11वीं-12वीं सदी के इस्लाम के महान चिंतक इमाम गज़ाली ने बड़े शानदार तरीके से पेश किया है। इस्लाम संगीत पर तभी प्रतिबंध लगाता है जब ये सिर्फ मनोरंजन के लिए हो और जिसे कुरान के अर्थ के अनुसार जो कुछ भी बिना किसी गंभीर उद्देश्य के बजाय खेल और मनोरंजन के लिए किया जाता है। संगीत जो प्रकृति में धार्मिक हो और जो एक शख्स को अल्लाह पर  अपना ध्यान केन्द्रित करने में मदद करती हो उसे हराम की श्रेणी में  शामिल नहीं किया जा सकता है। इमाम गज़ाली ने विस्तार से अपने रिसाले में इस पर चर्चा की है।

पिछड़ी जाति के हिंदु जो मुख्य धारा के हिंदू धर्म से बाहर किए गए और जिन्हें हाशिए पर डाल दिया गया था, उनके प्रति भी सूफी हज़रात ने प्रतिष्ठा और सम्मान व्यक्त की है और इसी के कारण पिछड़ी जातियों के हिंदु भी इस्लाम की ओर आकर्षित हुए और उनमें से बहुत से लोगों ने अपने धर्म को बदल दिया था, लेकिन इस बात के कोई दस्तावेज नहीं मिलते हैं कि सूफी हज़रात ने उन लोगों को अपना धर्म बदलने के लिए प्रोत्साहित किया था। धार्मिक परिवर्तन इसलिए अधिक हुए क्योंकि मुख्या धारा से बाहर किए गए और पिछड़े हिंदुओं ने समानता के सिद्धांत को बहुत आकर्षक पाया था। लेकिन, मुख्य धारा के इस्लामी समाज ने उनके खिलाफ भेदभाव का अमल किया और जिससे वो आला मकाम हासिल नहीं कर सके।

सल्तनत काल के मशहूर इतिहासकार और आलिम ज़ियाउद्दीन बर्नी उन्हें तालीम के काबिल भी नहीं मानते थे। उन्हें इतना सिखाया जाए जो नमाज़ व तिलावते कुरान और दूसरे इस्लामी संस्कारों के लिए आवश्यक हो गया था। उन्होंने भी इन लोगों को कुत्तों और सुअरों के समान बताया। लेकिन सूफी हज़रात ने इन लोगों के साथ बहुत सम्मानपूर्ण और सभ्य ढंग से बर्ताव किया।

ये वहदतुल वजूद मकतबे फिक्र के सूफी विचारधारा का बहुत बड़ा योगदान है कि ये सभी लोगों को एक अल्लाह की मख़लूक़ मानते हैं और इसलिए सब बराबर और काबिले एहतेराम हैं। ये वास्तव में दूसरों को साथ लेकर चलने वाले समाज को बनाता है और सभी स्वीकार्य बन गए। अन्य दूसरे नहीं रह गए जिन्हें नापसंद किया जा सके। अन्य न सिर्फ स्वीकार्य हुए बल्कि सम्मान के योग्य बन गए। दूसरों को साथ लेकर चलने वाले समाज के निर्माण के लिए हमें और क्या करना है?

सूफी हज़रात जो शक्ति से दूर रहते हैं उनके पास कोई भी वास्तव में दूसरा नहीं है और अन्य का भी अन्य को उसकी भिन्नता के साथ स्वीकार करते हैं। जो धर्म के साथ सत्ता को जोड़ने करते हैं, उनके लिए मोमिन गैर मोमिन से अधिक महत्वपूर्ण हैं या मोमिन को खारिज या कम समझा जाता है। इस तरह ये सूफी इस्लाम का नज़रिया है कि समाज शांतिपूर्ण रहा है और मिलीजुली संस्कृति को विकास मिला है जो हमें विरासत में मिला है और हमारी कीमती विरासत है और जो आज भी हमें हमारे समाज में शांति और स्थिरता बनाए रखने में मदद करता है।

इस तरह के नज़रिया से धर्म लोगों को जोड़ने न कि विभाजन करने वाली सक्ति बन जाता है। ये तरीका सबसे ज़्यादा मानवीय और आधुनिक संवैधानिक दृष्टि के समान है।

असग़र अली इंजीनियर इस्लामी विद्वान और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसायटी एंड सेकुलरिज़्म, मुंबई के प्रमुख हैं।

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