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Hindi Section ( 3 Feb 2012, NewAgeIslam.Com)

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ON BEING KAFIR काफिर होने पर


असग़र अली इंजीनियर (अंग्रेजी से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम डाट काम)

हाल ही में पाकिस्तान में हुए एक विमान हादसे में एक हिंदू नौजवान जो यूथ पार्लियमेंट का मेंम्बर था, मर गया और किसी ने इस के ताबूत पर 'काफ़िर' लिख दिया जिसने एक विवाद को हवा दे दिया और कई पाकिस्तानियों ने इस नजरिए की निंदा की और उसकी जगह एक इंसानियत भरा काम करते हुए उन लोगों ने, 'हम तुम्हें प्यार करते हैं लिख दिया। इसके बावजूद इससे पता चलता है कि कितने मुसलमान गैर मुसलमानों को काफ़िर मानते और उनके साथ वैसा ही बर्ताव करते हैं। इसलिए, ये ज़रूरी है कि इस मामले पर कुछ रौशनी डाली जाए।

यह जरूरी है कि शब्द काफ़िर को भाषाई , ऐतिहासिक और धर्म के ज्ञान के आधार पर समझा जाए। सबसे पहले आइए इसके अर्थ को समझते हैं। कफ़्फ़ारा का शाब्दिक अर्थ जो छुपा है, के हैं और इसी वजह से इमाम राग़िब के क्लासिकी पुस्तक  मफ़्राज़ातुल कुरआन में वो कहते हैं कि किसान भी काफ़िर है क्योंकि वो फसल उगाने के लिए बीज को मिट्टी के नीचे छुपाते हैं और रात भी काफ़िर कही जाती है क्योंकि वह रौशनी को छिपाती है।

और इल्मे दीन के मुताबिक जो हक़ को छिपाए उसे काफ़िर कहा जाता है। हर एक नबी अलैहिस्सलाम अल्लाह की तरफ से हक़ को लेकर आए, जो लोग इसे स्वीकार करते हैं वो मोमिन कहलाते हैं और जो नहीं करते हैं वो काफ़िर कहलाते हैं क्योंकि वो हक़ को कुबूल करने से  इन्कार करते हैं और उसे छुपाते हैं। लेकिन कुरान के अनुसार जो लोग अल्लाह के भेजे हुए पिछले नबियों पर ईमान रखते हैं वह भी मोमिन हैं क्योंकि ये सभी नबी भी अल्लाह के दिये हक़ को साथ लेकर लाए थे। चूंकि अल्लाह की तरफ़ से अता हक़ उनको दी गई किताब में शामिल था, इशलिए उन्हें अहले किताब कहा गया।

इनमें से कुछ का ज़िक्र कुरान में है लेकिन बहुत से दूसरे नाम नहीं दिये गये हैं। खुद कुरान के अनुसार नबियों के नाम की फेहरिस्त मुदल्लल है, व्यापक नहीं है। मुसलमानों का विश्वास है कि लगभग 124,000 अम्बिया हज़रात इस दुनिया में आए और क़ुरआन कहता है कि अल्लाह ने हर उम्मेत के लिए एक गाइड (हादी) भेजा है। इस तरह, अगर एक देश या किताब का कोई ज़िक्र नहीं है तो इसका खुदबखुद ये अर्थ नहीं होना चाहिए कि इस देश या समुदाय के लोगों ने हक़ को छिपाया है और इसलिए काफ़िर हैं।

18 वीं सदी दिल्ली के प्रसिद्ध सूफी बुज़ुर्ग मज़हर जाने जनान से उनके एक शागिर्द ने पूछा कि, चूंकि हिंदू मूर्ति पूजा करते हैं तो क्या हमें काफ़िर के तौर पर उनकी निंदा करनी चाहिए? सूफी बुज़ुर्ग मज़हर जाने जनान ने शिष्य को इल्मी और फ़िक्री जवाब लिखा। उन्होंने कहा कि हिंदू अपने शास्त्रों के अनुसार भगवान में विश्वास रखते हैं जो निरंकार और निर्गुण है (यानी बिना रूप और गुणों का है) और ये तौहीद की आला शक्ल है। उनकी पवित्र किताबों में मूर्ति पूजा का ज़िक्र नहीं है।

फिर वो कुरान की आयत इस का हवाला देते हैं जिसमें कहा गया है कि अल्लाह ने हर एक कौम में अपना रहनुमा भेजा है और वो दलील देते हैं कि अल्लाह एक महान देश हिंदुस्तान को कैसे भूल सकता है और वहां अपना रहनुमा न भेजे। राम और कृष्ण भी इसी तरह रहनुमा थे जिनका हिन्दू बेहद सम्मान करते हैं। वो ये भी कहते हैं कि हिंदू भी हक़ में यकीन रखते हैं क्योंकि वे भी भगवान को सत्यम (हक़) कहते हैं। जैसा कि दारा शिकोह ने अपनी पुस्तक मजमअल बहरैन में इशारा किया है कि हिंदू अपने ईश्वर को सत्यम, शिवम् और सुन्दरम् (हक़, परवरदिगार और सुंदर) कहते हैं और कुरान में अल्लाह के ये तीनों नाम हक़, जब्बार और जमील है।

इस तरह सूफी बुज़ुर्ग मज़हर जानी जनान दलील देते हैं कि इल्मे दीन के अनुसार हिंदू एक भगवान में विश्वास करते हैं इसलिए उन्हें हक़ को छिपाने वाला या काफ़िर नहीं कह सकते हैं। और जहां तक ​​मूर्ति पूजा की बात है तो इसके लिए एक ही दिलचस्प विवरण देते हैं। उनका कहना है कि यह एक लोकप्रिय अमल है क्योंकि आम लोगों को भगवान जो बिना रूप और गुणों का मालिक है का ध्यान करने में मुश्किल आती थी उन्हें पूजा के लिए एक ठोस वस्तु की आवश्यकता थी इसलिए इन लोगों ने एक रूप तैयार कर लिया और एक ईश्वर के रूप को देखते हैं। जाने जनान के अनुसार जो लोग पूजा करते हैं, वो एक पत्थर का टुकड़ा नहीं है बल्कि उसके द्वार एक ईश्वर है।

फिर वो सूफियों की मिसाल देते हैं जिन्हें एक शेख की मदद की जरूरत होती है और अल्लाह तक पहुँचने के लिए जिसकी मदद की ज़रूरत है। एक शेख के माध्यम के बिना एक सूफी शिष्य अल्लाह तक नहीं पहुँच सकता है। इसी तरह एक आम हिंदू के लिए मूर्ति एक शेख, एक माध्यम बन जाती है। इसके अलावा मुसलमान, सूफी संतों की क़ब्रों औऱ दरगाहों पर  जाकर दुआएं करते हैं और उनका तवस्त (माध्यम) हासिल करना चाहते हैं।

ये ध्यान देने के काबिल है कि मज़हर जाने जनान ने सख्त रुख नहीं अपनाया कि हिंदू काफ़िर हैं बल्कि उनके धार्मिक आस्था और आम हिन्दुओं के मनोविज्ञान को, कि क्यों वो मूर्ति पूजा करते हैं, को समझने की कोशिश की। यह सब कुछ जाने जनान के ज़रिए अपने शागिर्द को लिखे खत में मौजूद है। खत की तहरीर बहुत दिलचस्प है। इसके अलावा, मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद ने तर्जुमानुल कुरआन में वहदते दीन (धार्मिक एकता) पर लिखे अपने लेखों में सभी धर्मों में आवश्यक एकता को ज़ाहिर करने के लिए वेदों के कई हिस्सों को बतौर हवाला दिया है। शाह वली उल्लाह ने अपनी क्लासिकी लेखन हुज्जतुल्लाह अलबलाग़ा में वहदते दीन के नज़रिए को व्यापक तौर पर पेश किया है।

ऐतिहासिक रूप से कुरान में ये शब्द मक्का में उन लोगों के लिए इस्तेमाल किया गया है जिन्होंने न सिर्फ नबूवत का बल्कि आप (स.अ.व.) के मिशन को रद्द किया था, बल्कि सक्रिय रूप से आप (स.अ.व.) का विरोध किया था, आप (स.अ.व.) और उनके उम्मतियों पर अत्याचार किए थे। इनमें आप (स.अ.व.) के चाचा अबू लहब थे जो नबी करीम (स.अ.व.) के खिलाफ मुहिम का नेतृत्व कर रहे थे। लेकिन वहां पर ऐसे भी लोग थे जो निष्पक्ष रहे थे और मुसलमानों ने उनके साथ समझौता किया और उनकी मदद मांगी थी।

इस तरह काफ़िर की परिभाषा को बड़ी जिम्मेदारी के एहसास के साथ लागू होना चाहिए न कि इस्लाम में विश्वास न करने वाले सभी गैर मोमिनों के लिए किया जाना चाहिए। हर इंसान के साथ बावकार व्यवहार होना चाहिए वह चाहे जिस तरीके से हक़ में विश्वास रखता हो। हक की  विभिन्न संस्कृतियों में तजल्लियाँ अलग अलग हैं।

लेखक इस्लामी विद्वान और सेंटर फॉर स्टडी आफ सोसायटी एंड सेकुलरिज़्म, मुंबई के प्रमुख हैं।

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