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Hindi Section ( 19 March 2013, NewAgeIslam.Com)

Raja Ji at the Feet of Khwaja Ji राजा जी को ख़्वाजा जी ने बुलाया

 

असर चौहान

9 मार्च, 2013

(उर्दू से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

प्रधानमंत्री राजा परवेज़ अशरफ, एक दिन के निजी (गैर सरकारी) यात्रा पर भारत के शहर अजमेर शरीफ गए और सुल्तानुल हिंद, ग़रीब नवाज़, हज़रत ख़्वाजा मोईनुददीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैहि के दरबार पर हाज़िरी देकर वतन वापस आ गए। भारतीय विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने प्रधानमंत्री के अजमेर शरीफ आगमन पर टिप्पणी करते हुए कहा कि, पुराना अक़ीदा है कि दरगाह पर वही लोग जाते हैं, जिनको बुलावा आता है। राजा परवेज़ अशरफ़ को ख़्वाजा मोईनुददीन चिश्ती ने बुलाया था और हमने उनका स्वागत कर अपना नैतिक कर्तव्य निभाया है।''

आमतौर पर यही कहा जाता है कि जो मुसलमान, हज, उमरा या किसी वली की दरगाह पर हाज़िरी के लिए जाता है, बुलावे के बगैर नहीं जा सकता। हज़रत ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैहि की बारगाह में बड़े बड़े बादशाह हाज़िर होते रहे हैं। पाकिस्तान के राष्ट्रपती और प्रधानमंत्री भी, लेकिन इतिहास के अनुसार, ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैहि ने अपनी ज़िंदगी में जिस बादशाह को भारत बुलाया था, वो था गज़नी का मोहम्मद शहाबुद्दीन ग़ौरी। ग़ौरी एक बार अपनी मर्ज़ी से (यानी ख़्वाजा साहब रहमतुल्लाह अलैहि के बुलाए बिना) 1191 ई. में हिंदुस्तान पर हमलावर हुआ था, लेकिन दिल्ली और अजमेर के राजा पृथ्वीराज चौहान ने उसे हराकर भगा दिया। दो साल बाद हज़रत ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैहि ने ख्वाब में मोहम्मद ग़ौरी को जीत की बशारत दी, तो वो फिर आ गया। पृथ्वीराज चौहान हारा और उसका क़त्ल हुआ। इससे पहले पृथ्वीराज चौहान से हारने के बाद, शहाबुद्दीन ग़ौरी चैन की नींद नहीं सोया और न ही उसने अपने हारे हुए जनरलों को सोने दिया, जब तक दुश्मन से बदला नहीं ले लिया। पाकिस्तान 1971 ई. में हार गया, लेकिन हमारे सैनिकों और लोकतांत्रिक शासक शासन करते और चैन की नींद सोते रहे हमारे कई सैन्य और नागरिक राष्ट्रपति और चुने और नामित प्रधानमंत्रियों ने हज़रत ग़रीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैहि की दरगाह पर हाज़िरी दी, लेकिन ज़ाहिर है कि उन्हें "बुलावा" तो नहीं आया था। वो खुद चले गए।

राष्ट्रपति ज़रदारी ने पिछले साल हज़रत ग़रीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैहि की बारगाह में हाज़िरी दी थी। दौरा निजी था, लेकिन उन्होंने पाकिस्तान के राष्ट्रीय खज़ाने से मज़ार के रख रखाव के लिए 10 लाख अमेरिकी डॉलर का दान दिया था। प्रधानमंत्री राजा परवेज़ अशरफ़ ने नक़द राशि पेश नहीं की। इसलिए कि उनके 9 महीने की सत्ता में राष्ट्रीय ख़ज़ाना तो खाली हो चुका है। यूं भी ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैहि को ज़िंदगी में कभी दान और उपहारों की कभी ज़रूरत नहीं रही। मौत के बाद क्या होगी? शहाबुद्दीन मोहम्मद ग़ौरी हिंदुस्तान फतह करने के बाद ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैहि की क़दम बोसी (हाज़िरी) के लिए हाज़िर हुआ तो उसने ख़्वाजा साहब रहमतुल्लाह अलैहि की ख़िदमत में बड़ी नक़द रक़म और बहुमूल्य उपहार पेश किए, जिन्हें ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैहि ने स्वीकार नहीं किया और कहा कि, "ये सब अजमेर के ज़रूरतमंदों में बाँट दो।" मोहम्मद ग़ौरी ने आदेश का पालन किया और फिर हाज़िर हुआ और बोला कि, "में आपकी भी ख़िदमत करना चाहता हूँ।" ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैहि ने कहा, "दौलत इस दुनिया का फ़ित्नए अज़ीम है और अगर ये चीज़ अच्छी होती तो भी मैं उसकी तरफ नहीं देखता।" ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैहि ने शहाबुद्दीन ग़ौरी से सिर्फ एक फरमाइश किया। कहा, "मक़तूल पृथ्वीराज चौहान के बेटे गोबिंद चौहान को अजमेर का शासक बना दो, ताकि हिंदू क़ौम विजेता मुसलमान क़ौम की सत्ता दिल से स्वीकार कर ले"। ग़ौरी ने हुक्म का पालन किया।

शहाबुद्दीन ग़ौरी अपने गुलाम और क़ाबिल जरनैल क़ुतुबुद्दीन ऐबक को भारत में अपना कार्यवाहक बनाकर गज़नी वापस चला गया। ऐबक ने 16 साल तक मोहम्मद ग़ौरी के कार्यवाहक और 4 साल तक स्वतंत्र राजा के रूप में भारत पर शासन किया। वो सारा जीवन अपने आक़ा का नाम सम्मान से लेता रहा और कहा करता था कि, "मुझे गर्व है कि मैं अपने आक़ा शहाबुद्दीन मोहम्मद ग़ौरी का अद्ना गुलाम हूँ।" प्रधानमंत्री बनने के बाद राजा परवेज़ अशरफ़ ने भी आम सभाओं को संबोधित करते हुए कई बार कहा है कि, "मैं तो पीपुल्स पार्टी का एक अद्ना कार्यकर्ता था और ये राष्ट्रपति ज़रदारी की मेहरबानी है कि मुझे प्रधानमंत्री बना दिया।''

इतिहास में लिखा है कि, सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक अपने शुभचिंतकों और मिलने वालों को लाखों रुपये दे देता था और ग़रीबों और मोहताजों की मदद करने की वजह से, ''लख बख़्श'' मशहूर था। राजा परवेज़ अशरफ़ ने अपने संक्षिप्त कार्यकाल में ऐसा ही किया। विवेक फंड 22 अरब रुपये का था। सरकारी खजाने से 32 अरब रुपये निकलवाये और खर्च किये। 12 अरब रुपये अपने चुनाव क्षेत्र में खर्च कर नाम कमाया। कुतुब उद्दीन ऐबक के दामाद शम्सुद्दीन अलतमश ने भी भारत पर 36 साल तक शासन किया। प्रधानमंत्री राजा परवेज़ अशरफ़ ने अपने दामाद को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्था में नौकरी दिलवा दी है। संभव है वो भी पाकिस्तान के किसी राष्ट्रपति का प्रिय बन कर प्रधानमंत्री बन जाए!

मैं चौहान होने के बावजूद पृथ्वीराज चौहान का समर्थक नहीं हूँ बल्कि अपने पूर्वजों के पीर हज़रत ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैहि के अक़ीदतमंद शहाबुद्दीन मोहम्मद ग़ौरी का हमनवा हूँ, लेकिन पाकिस्तान के परमाणु साइनसदान, मोहसिने पाकिस्तान, डॉक्टर अब्दुल क़दीर ख़ान, ग़ौरी की एक ग़लतफहमी दूर करना ज़रूरी समझता हूँ। प्रसिद्ध इतिहासकार मोहम्मद कासिम फरिश्ता के संकलन, तारीखे फरिश्ता' (अनुवाद अब्दुल हई ख़्वाजा) पेज 230 पर लिखा है कि, शहाबुद्दीन मोहम्मद ग़ौरी को 2 शाबान 602 हिजरी (13 मार्च 1206 ई.) को गज़नी में उस इमारत में दफ़्न किया गया था, जो उसने अपनी बेटी के लिए बनवाई थी।'' डॉक्टर अब्दुल क़दीर ख़ान ने (न जाने इतिहास के किस हवाले या परंपरा के आधार पर) झेलम के पास सोहावा में न जाने किस शख्स की कब्र को शहाबुद्दीन ग़ौरी की कब्र मशहूर कर दिया और रख रखाव भी कराया। एक और बात कि, भारत ने अपने देवताओं आकाश, अग्नि और पृथ्वी के नाम पर मिसाइल बनाए। डॉक्टर अब्दुल क़दीर ख़ान ने ये समझ कर कि भारत की मिसाइल पृथ्वी - पृथ्वीराज चौहान के नाम पर बनायी गयी है, उसके मुक़ाबले में, पाकिस्तान की एक मिसाइल का नाम शहाबुद्दीन ग़ौरी के नाम पर ग़ौरी' रख दिया। (ये पढ़ कर अगर डॉक्टर साहब का दिल टूटे तो मैं उनसे क्षमा चाहता हूँ)।

प्रधानमंत्री राजा परवेज़ अशरफ़ ने 6 महीने पहले (यानी प्रधानमंत्री के पद की शपथ लेने के 3 महीने बाद) हज़रत ग़रीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैहि के मज़ार पर चढ़ाने के लिए एक चादर बनवाना शुरू की थी और 35 किलो वज़नी इस चादर को सिर पर उठा कर दरगाह के मुख्य दरवाज़े से मज़ार तक ले गए। अच्छी बात ये है कि ढलती उम्र में भी राजा साहब सिर पर 35 किलो का बोझ उठा सकते हैं। ये प्रैक्टिस उन्हें आगे चल कर काम आ सकती है। हज़रत ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैहि के मुरीद और ख़लीफा (ख़्वाजा कुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी रहमतुल्लाह अलैहि) के मुरीद और ख़लीफा (पाक पतन वाले) पंजाबी के पहले शायर, हज़रत बाबा फरीद शकरगंज रहमतुल्लाह अलैहि फ़रमाते हैं कि ...

"'वालों निक्की पुर सलात, किन्नी न सुनी आई

फरीद उकड़ी पोंदी ई, खड़ा न आप मोहाई"

यानी, ऐ फरीद! आगे बाल से बारीक पुल सेरात है। क्या तेरे कानों को (बुलावे की वो आवाज़) सुनाई नहीं देती? अब खड़ा रह कर अपना आप न गंवा! .... "ख़बर है कि राजा साहब ने ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैहि के दरगाह में पाकिस्तान की तरक्की और खुशहाली के लिए दुआ मांगी। अगर उनकी ये दुआ क़ुबूल हो जाती है तो कार्यवाहक प्रधानमंत्री या उनके बाद आने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री के दौर में गरीबों की भी सुनी जा सकती है, और बहुत से ग़रीब भी, ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैहि के बुलावे पर उनकी दरगाह पर हाज़िरी दे सकेंगे जो सरकारी खर्च से निजी दौरा करने का सामर्थ्य नहीं रखते हैं।

9 मार्च, 2013, स्रोत: नवाये वक़्त, पाकिस्तान

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