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Hindi Section ( 27 Aug 2012, NewAgeIslam.Com)

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Hassan Nisar Please Call Back Such People हसन निसार! प्लीज़ ऐसे लोगों को वापस बुला लो!


असद मुफ्ती

25 अगस्त, 2012

(उर्दू से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

जज ने कहा, ''उनको अपनी बेटी से प्यार नहीं था बल्कि उन्हें इस बात की फिक्र थी कि उनकी बेटी ने पश्चिम मूल्यों को अपना लिया है और ये उनकी बदनामी का कारण बन रही है।''

बाप ने कहा, ''अगर किसी ने शफीला  के बारे में जबान खोली तो उसका भी शफीला जैसा अंजाम होगा।''

छोटी बहन अलीशा ने कहा, ''उसके माँ बाप ने उसके सामने शफीला का दम घोंट कर कत्ल किया था।''

भाई जुनैद ने कहा, ''उसका अंजाम यही होना था।''

सात मर्दों और पांच औरतों पर आधारित ज्यूरी ने कहा, ''उन्होंने अपनी बेटी को कत्ल करके बाकी सारे खानदान की ज़िंदगी भी तबाह कर दी।

शफीला  की एक करीबी दोस्त मेलीसा पोनर ने अदालत का फैसला सुनने के बाद कहा कि, ''आज हमें न्याय मिल गया। मैंने कई बरसों तक इस दिन का इंतजार किया है।''

कुछ घटनाएं और कहानियाँ ऐसी भी हैं जो अनकही रह जाती हैं, उन्हें बताने की हिम्मत नहीं होती और उन्हें खामोश आंखों में या सिले हुए होंठों की थरथराहट से समझा जा सकता है। ये भी एक ऐसी ही कहानी है जो 'सम्मान' के नाम पर लिखी गई है। इस सम्मान नाम की भावना के नाम पर कत्ल के मशहूर मामले में शफीला अहमद के माँ बाप पिता को लंदन की अदालत ने मुजरिम करार दिया है और उन्हें उम्रक़ैद की सजा सुनाई है। न्यायाधीश श्री न्यायमूर्ति रोड्रिक एवंज़ ने अपने फैसले में लिखा है कि बाप इफ़्तिख़ार अहमद और माँ फरज़ाना अहमद को हर हाल में पच्चीस पच्चीस बरस तक जेल में रहना होगा। फैसला सुनाने से पहले चिस्टर कोर्ट के जज जस्टिस रोड्रिक ने ज्यूरी के सदस्यों से कहा कि वो इस मामले का फैसला करते वक्त अपनी भावनाओं और हमदर्दी को एक तरफ रखें और उन्हें फैसले पर हावी न होने दें। सो ऐसा ही हुआ, सात मर्दों और पांच औरतों वाले ज्यूरी ने मृतक शफीला अहमद के सम्मान वाले माँ बाप को इस कत्ल जुर्म में मुजरिम करार दे दिया।

शफीला अहमद सितम्बर 2003 में वारिंग्टन में स्थित अपने घर से लापता हो गई थी बल्कि सच तो ये है कि दुनिया से ही लापता हो गई थी तलाश के बाद पुलिस को उसकी लाश कम्बरिया नदी के कैंट के किनारे से बरामद हुई थी। बाकी की कहानी वही दो समाजों की कहानी है, दो संस्कृतियों का विरोधाभास है, दो मूल्यों का फ़साना है, दो संस्कृतियों का संघर्ष है, लेकिन ठहरिए! मेरे हिसाब से ये दो संस्कृतियों का संघर्ष नहीं है बल्कि वो संघर्ष है जो अशिक्षा, हटधर्मी, असंवेदनशीलता और धार्मिक आस्था के कारण पैदा हुए हैं। यहां आस्था कोई खास अर्थ या महत्व नहीं रखता। हम जो बोते हैं वही काटते हैं ये बिल्कुल ऐसे ही है कि जिन नावों के बादबान खुले हैं वो उनके साथ बह निकलती हैं और अपनी राह पर आगे बढ़ती हैं लेकिन जिन नावों के बादबान खुले नहीं हैं वो उन हवाओं से कोई फायदा नहीं उठातीं। तो क्या ये हवाओं का  कुसूर है? ये घटना पश्चिमी देशों में रहने वाले पाकिस्तानियों की पहली घटना नहीं है न ही इसकी प्रतिक्रिया में पैदा होने वाले हालात पहली बार सामने आये हैं। ये बात गंभीर बीमारी के स्पष्ट संकेत हैं। कुछ समय पहले भी जब कनाडा में रहने वाली एक पाकिस्तानी मूल की लड़की ने हिजाब पहनने से इन्कार कर दिया तो उसका बाप जो दुर्भाग्य से पाकिस्तानी ही था, उस मासूम लड़की का अपने हाथों गला घोंट कर जन्नत का हक़दार हो गया। यह दिल को दहला देने वाली औऱ निर्मम वारदात टोरंटो के उपनगरीय इलाके मसी-साड में पेश आई थी, कनाडा से सारी दुनिया में जारी की गई इस खबर में बताया गया था कि 57 वर्षीय मोहम्मद परवेज नामक एक व्यक्ति ने अपनी 16 वर्षीय बेटी अक़्सा परवेज़ का गला घोंट दिया। लड़की को तुरंत नज़दीकी अस्पताल ले जाया गया और उसे कृत्रिम सांस पर रखा गया लेकिन ज़ालिम बाप के शक्तिशाली हाथों ने ये इलाज कारगर न होने दिया और लड़की उसी रात 'शांतिपूर्ण धर्म'' की भेंट चढ़ गई। क्या कोई बता सकता है कि इस्लाम के आने से पहले और बाद में क्या फर्क बाक़ी रह गया? तब भी लोग अपनी बेटियों को ज़िंदा दफन कर देते थे और अब भी अपने हाथों गला घोंट देते हैं। ये धर्म, संस्कृति के नाम पर जान देने वाली अक़्सा परवेज़ स्थानीय एप्पलवूड हाई स्कूल में पढ़ती थी। उसके साथ पढ़ने वालीं छात्राओं ने बताया कि अक़्सा का कुछ वक्त से अपने परिवार से मतभेद चल रहा था, परिवार के बीच कुछ समस्या थी क्योंकि उसने हिजाब पहनने से इन्कार कर दिया था, हमारे स्कूल की कोई भी बड़ी लड़की हिजाब नहीं पहनती थी।

इन छात्राओं ने बताया कि अक़्सा परवेज़ अपने बाप के ज़ोर देने के कारण घर से निकलते समय हिजाब पहन लेती थी और स्कूल आने के बाद प्रचलित कपड़े पहन लेती थी। इन लड़कियों को अच्छी तरह याद था कि वो स्कूल आने के बाद किस तेजी से दौड़ कर वाश रूम में दाखिल होती थी और अपना लिबास बदला करती थी ताकि वो हम सब की तरह लगे, स्कूल की दूसरी हम उम्र लड़कियों की तरह दिखे। इस भयानक हत्या की घटना ने कनाडा जैसे शांतिपूर्ण देश में सदमे की लहर दौड़ा दी। पत्रकारों ने टोरंटो में रहने वाली एक पाकिस्तानी महिला का साक्षात्कार किया तो उसने कहा 'हिजाब कभी भी पाकिस्तानी समाज का हिस्सा नहीं रहा, ये अरब से आया है और अरबी संस्कृति पाकिस्तान से अलग है।''  इस महिला शिक्षक सोनिया अहमद ने पत्रकारों को बताया कि ''वो व्यक्ति (परवेज़) अब ये समझता होगा कि उसने सही कदम उठाया है और वो सीधा जन्नत में जायेगा जहां 70 हूरें उसका इंतज़ार कर रही होंगी। इस महिला ने कहा कि हम पाकिस्तानी दक्षिण एशिया के निवासी हैं और दक्षिण एशियाई निवासियों की संस्कृति अलग है। एक और महिला आस्मा खान जो मुस्लिम गर्ल नाम की पत्रिका की मुख्य संपादक हैं उन्होंने पत्रकारों को बताया कि पूर्व तानाशाह जनरल ज़ियाउल हक़ ने अपने शासनकाल में अरब वहाबी उल्मा और आतिवादियों को आमंत्रित किया जिन्होंने रूसियों के खिलाफ 'जेहाद' के अलावा पाकिस्तानी महिलाओं से शादियां कीं और शौहरों के कहने पर हिजाब की परंपरा का पाकिस्तान में शुरुआत किया जिसे जनरल ज़िया सरकार और उसके चेले चांटो ने बढ़ावा दिया, ज़ियाउल हक़ से पहले हिजाब की कोई मिसाल नहीं मिलती। मुस्लिम गर्ल की मुख्य संपादक ने नौजवान लड़कियों पर माँ बाप की इच्छा थोपे जाने का घोर विरोध किया।

औरत पर जुल्म क्यों किया जाता है? ये वो सवाल है जिस पर आज अपनों और गैरों की उंगलियाँ उठ रही हैं। मेरे हिसाब से इस सवाल का जवाब बहुत सादा और आम है। एक बात तो सब पर वाज़ेह (स्पष्ट) है और ये बात तयशुदा है कि जागीरदाराना और कबाइली रस्मो रिवाज और समाज से हम निकल नहीं सके लेकिन इसके साथ साथ अन्य महत्वपूर्ण तथ्य भी हमें मुंह चिड़ा रहे हैं और वो है हमारा फ़िक़्ही  (धर्मशास्त्रीय) साहित्य। इस संबंध में मुझे अधिक कुछ नहीं कहना कि इसमें कई 'पर्दा नशीनों' के नाम भी आते हैं, मगर इन फ़िक़्ही ज्ञान में महिला से कुछ अच्छा व्यवहार नहीं किया गया। फ़िक़्ह ने औरत को जो मक़ाम दिया है वही फसाद बरपा करने के लिए काफी है। ये बात कहे बिना कोई चारा नहीं कि औरत के बारे में हमारा कुसूर दीने नाकिस (खराब), पुराना, जागीर दाराना और दुश्मनी और भेदभाव पर आधारित है। यही वजह है कि इस फ़िक़्ही (धर्मशास्त्री) साहित्य के तहत ही पाकिस्तानी समाज में औरत के बारे में एक 'मजबूत लेकिन बुरी सोच पैदा हो गई है और ये बुरा विचार न केवल ममलकते खुदादाद में अपना घर बना चुकी है बल्कि इसकी सीमाओं से बाहर पश्चिम में भी अपना रंग दिखा रही है। हम जहाँ जाते हैं घटिया सोच की गठरियाँ सिर पर उठाए जाते हैं। अब यही देखिए पश्चिम में लोकतांत्रिक समाज है, यहाँ हर एक को अपनी बात कहने की पूरी आज़ादी हासिल है। क्या यहाँ औरत की गवाही एक मर्द के बराबर नहीं होती? ब्रिटेन या कनाडा, हॉलैंड या अमेरिका किसी एक नस्ल या संस्कृति का देश नहीं रहा है, बल्कि सारा पश्चिम एक बहु संस्कृति वाला देश बन गया है, लेकिन इस बहु संस्कृति वाले समाज का मतलब ये कभी भी नहीं है कि वहाँ की सदियों पुराने मूल्यों और संस्कृति पर कोई और संस्कृति थोप दी जाये।

आज के मुसलमानों का मार्गदर्शन करने वाले मुल्लाओं, मौलवियों, उल्मा और तथाकथित बुद्धिजीवियों का बहुमत सातवीं और आठवीं सदी के इस्लामी परंपराओं और रस्मो रिवाज को आदर्श समझता है। नए ज़माने की नई ज़रूरतों को पीछे डाल देता है, पुरानी कुंजियों से नए ताले खोलता है। आज जागरूक मुसलमान के लिए ये आवश्यक है कि वो इस समूह को सातवीं सदी की मानसिकता से बाहर निकालें और इस्लाम की ऐसी समकालीन शक्ल पेश करें जो दूसरे धर्म और संस्कृति और परंपराओं के मानने वालों को भी स्वीकार्य हो। मेरे हिसाब से पाकिस्तान से आप्रवासियों की पहली पीढ़ी तक के लोग अपने अपने विश्वासों और विचारधारा और समुदाय ही लेकर विदेश आए थे। अभी मौलवियों और 'उलेमा' लोगों का आगमन शुरू नहीं हुआ था, फिर हुआ ये कि दूसरी और तीसरी पीढ़ी तक पहुंचते पहुंचते पश्चिमी देशों की हर गली और हर मुहल्ले में 'उलेमा' के साथ साथ उनके मसलक, विश्वास और समुदाय भी पहुंच गए। इन लोगों ने पाकिस्तान की तरह पश्चिम में भी सांप्रदायिकता और संकीर्णता के ढोल पीटने शुरू कर दिए। सिर्फ यही नहीं बल्कि समाज को 'कुफ्रिस्तान' मानते हुए इस समाज की बुराईयों को गिना गिना कर नई पीढ़ी को ऐसा संदेश दिया कि इसमें इफ़्तिख़ार अहमद और मोहम्मद परवेज जैसे मुसलमान खुम्बियों की तरह उगने लगे जिसके परिणामस्वरूप आज हम इन उलमा, मौलवियों, मुल्लाओं और उनकी तथकथित परंपराओं की मौत का मातम ही नहीं कर रहे बल्कि उस पश्चिमी समाज के साथ अपने संबंधों की मौत का मातम कर रहे हैं। ब्रिटेन में रह रहे इफ़्तिख़ार अहमद और कनाडा के निवासी मोहम्मद परवेज़ दरअसल इस समाज का कभी भी हिस्सा नहीं रहे। कभी भी हिस्सा नहीं बन सकते तो क्या ये बेहतर नहीं है मेरे प्यारे हसन निसार कि इफ़्तिख़ार अहमद और मोहम्मद परवेज़ ऐसे लोगों को वापस बुला लो? क्या ये अच्छा नहीं है कि ये अपने लोगों में पलट जायें? क्या तुम भी वही सोच रहे हो जो मैं सोच रहा हूँ?

25 अगस्त, 2012 सधन्यवाद: सहाफत, नई दिल्ली

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